"औरत की कोई जात नहीं होती" कहानीकार-विपिन बिहारी (जातीय ऊँच-नीच पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के दो छोरों/सिरों के बीच की प्रेम कहानी)....
नारी-विमर्श (नन्दलाल वर्मा एसोसिएट प्रोफेसर)
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नन्द लाल वर्मा |
कहानी-समीक्षा
कहानीकार श्री विपिन बिहारी की "डिप्रेस्ड एक्सप्रेस" के अप्रैल अंक में
प्रकाशित उपर्युक्त शीर्षक की कहानी पढ़ी जिसमें अंतरजातीय विवाह के सामाजिक
सरोकारों को झकझोरने के साथ छद्म आम्बेडकरवादियों की बेहतरीन मनोरंजक
विधाओं/कथानकों के माध्यम से पोल खोलने का सटीक प्रयास किया गया है।कहानी जातीय
ऊँच-नीच पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के दोनों छोरों/सिरों की कलई खोलती नज़र आती
है।कहानी अत्यंत रोचकता और रोमांचकता के साथ सहज रूप से पठनीय है।इस कहानी में एक
तथाकथित ब्राम्हण की लड़की (शालिनी) और एक दलित लड़का सुभाष के साथ कॉलेज अध्ययन के
दौरान दोनों के बीच मानवीय संवेदना और आकर्षण की वजह से एक दूसरे की जाति जाने
बगैर प्रेम हो जाता है। सुभाष पढ़ने में प्रखर और शारीरिक रूप से भी गठीला व सुंदर
है और शालिनी भी किसी मामले में सुभाष से कमतर नही है। शालिनी के पास एक मानवतावादी
और वैज्ञानिक आधुनिक सोच-समझ और निर्णय लेने की क्षमता और साहस है।ब्राम्हण
परिवेश/पृष्ठभूमि में पैदा और पली-पढ़ी-बढ़ी शालिनी समाज और धर्म की आड़ में चल रही
शोषणकारी कुरीतियों और आडंबरों की पोल-पट्टियों को भी अच्छी तरह समझती है।
शालिनी द्वारा सुभाष के सामने विवाह
प्रस्ताव आने पर एक दूसरे की सामाजिक पहचान का खुलासा होता हैं।सुभाष सामाजिक
जातीय भेदभाव- संकटों की ओर आगाह करते हुए कहता है कि भारतीय समाज में विवाह के
लिए प्रेम ही काफी नही है, जाति सबसे
जरूरी है।यहां विवाह लड़का-लड़की के बीच ही नही होता है, बल्कि विवाह जाति के बीच भी होता है।दोनों मंदिर
में विवाह करने के निर्णय के बजाय कोर्ट मैरिज का निर्णय लेते हैं।शालिनी और सुभाष
की इस प्रेम और विवाह के निर्णय की कहानी की सुभाष के घरवालों ,गांववालों और नाते-रिश्तेदारों को भनक तक नही लगी
है।
शालिनी और सुभाष द्वारा कोर्ट मैरिज करने
के निर्णय की जानकारी जब शालिनी के परिवार और नाते रिश्तेदारों को पता चलता है तो
उन्हें सांप सूंघ जाता है,उनके ऊपर पहाड़
टूट पड़ता है और सारे नाते-रिश्तेदारों द्वारा ब्रम्हमुख से पैदा ब्राम्हण की कुलीन
महत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देकर शादी करने के निर्णय को बदलने के लिए हर संभव भरपूर कोशिश और दबाव बनाने के
सभी प्रयास करने में कोई कोर-कसर नही छोड़ी जाती है। परिवार और समाज के लोगों के
बीच शालिनी के ऊपर पारिवारिक और सामाजिक श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा के साथ जाति की
कुलीनता की दुहाई देते हुए प्रताड़ित करने के प्रयास और हत्या की धमकी जैसे उपक्रम
का भी प्रयोग किया जाता हैं। गांव के ब्राम्हणों और रिश्तेदारों की पंचायत में
शालिनी के दुस्साहसिक अडिगता को देखकर उसे कमरे में बंद कर थोड़े दिनों में शादी का
भूत उतर जाने की बात कहकर उसे डराने,धमकाने और अपने को सांत्वना देने की कवायद भी की जाती है।डराने
की नीयत से शालिनी और सुभाष की हत्या जैसी बन्दर-घुड़कियां भी दी जाती है।लेकिन
हत्याओं के बाद उपजने वाले पुलिस और कोर्ट के कानूनी पचड़ों और आर्थिक संकटों के डर
से घरवाले अपनी ज़िद छोड़ देते हैं। शालिनी के अटल निर्णय को भांपते हुए और समाज के
लोगों द्वारा दिये गया यह आश्वासन "कि शालिनी के अंतरजातीय विवाह से तुम्हारे
सामाजिक मान-सम्मान के प्रति समाज की नज़र में कोई फर्क नही पड़ेगा" भरे और
दुखी मन से शालिनी को उसके हाल पर छोड़ दिए जाने के निर्णय हेतु घरवालों को विवश
होना पड़ता है।
कोर्ट मैरिज करने के
बाद जब शालिनी और सुभाष अपने गांव -घर पहुंचते है तो सुभाष के माता-पिता के सामने
दूसरे प्रकार के संकट खड़े दिखाई देते है। सुभाष की मां के मन मे उपज रहे कई तरह के
आशंकाओं भरे प्रश्नों के तीरों की बौछार का सामना शालिनी अत्यंत समझदारी और
शालीनता से मुस्कुराते हुए उनको निरुत्तर बना देती है। इकलौते बेटे की शादी में
खूब दान-दहेज़ मिलने या मांगने के सपने देख रहे माता-पिता पर वज्रपात जैसा असर पड़ता
दिखाई देता है। शुरुआत में शालिनी की जाति पर सभी लोग सशंकित दिख रहे हैं और जब
पता चलता है कि शालिनी ब्राम्हण है तो गांव के सुभाष की बिरादरी के लोग शालिनी को
टकटकी बांधकर आश्चर्यजनक ढंग से निहारते हुए नज़र आते हैं और जिसके मन मे जो आता है
,सहज भाव से अपनी-अपनी अभिव्यक्ति दिए जाने
का सिलसिला जारी रखता हैं।कोई कहता है कि " सुभाष की अम्मा,अहो भाग्य तुम्हारा! जो तुम्हारे घर में बम्हनी
बहू ने कदम रखे है! तुम्हारा घर-द्वार सब पवित्तर हो जाएगा और धन-धान्य से भर
जाएगा।" उधर एक पिता के सारे सपने चकनाचूर होते नज़र आ रहे हैं और सुभाष की
माता को एक अदृश्य भय सताने लगता है।उन्होंने कहीं यह सुन रखा है कि ऐसी बहुएं
ससुराल-घर के साथ नही रहती है,पति को अपने
कब्जे में कर लेती हैं और मायके से यह कसम खाकर आती हैं कि अपने माँ बाप की तरह
पति को भी उसके मां - बाप से अलग कर देती हैं और रिश्तेदारी -बिरादरी तक छुड़वा
देती है। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देता है।बिरादरी के समझाने पर सारी
शंकाओं और आशंकाओं के बीच शालिनी को बहू स्वीकारते और पूरी मान्यता देते हुए
ससम्मान विधि-विधान से घर मे प्रवेश कराया जाता है।
शालिनी एक सुशिक्षित
और समझदार लड़की है।दलित परिवार में भी नौ दुर्गा व्रत जैसे धार्मिक अनुष्ठानों और
आडंबरों को देखकर वह और भी चकित होती है कि ब्राम्हण तो धर्म को जानता है और धर्म
उसके लिए एक धंधा/आजीविका का साधन रहा है।इसलिए धार्मिक अनुष्ठानों/उपक्रमों के
माध्यम से उसे ज़िंदा रखना उसका धर्म बनता है। किंतु यह भोला-भाला दलित समाज धर्म
को न जानते हुए भी धर्म की चादर ओढ़े उसके भंवरजाल में फंसा हुआ है। वह ऐसे लोगों
को छद्म अंबेडकरवादियों की संज्ञा देती है जिनके घर मे हिन्दू देवी- देवताओं की
मूर्तियों के बीच में डॉ.आम्बेडकर की भी एक फोटो या मूर्ति रखी दिखती है। शालिनी
अपनी शिक्षा और आधुनिक/मानवतावादी सोच से सुभाष के घर के माहौल को बदलने की सफलता
के बाद उस दलित समाज मे डॉ.आंबेडकर के मानवतावादी और समतामूलक समाज की अवधारणा पर
आधारित असली दर्शन और वैचारिकी के माध्यम से सामाजिक जागरूकता फैलाने का अभियान
चलाने की इच्छा ज़ाहिर करती है,तो सुभाष और
घरवाले उसे सहर्ष स्वीकार करते हुए उसे अपने पंखों से उड़ने और विचरने की पूरी
आज़ादी देते है।शालिनी के इस सामाजिक जनजागरण अभियान में उसकी दोनों पढ़ी-लिखी ननदे भी बढ़-चढ़कर
हिस्सा लेती हैं।
हमारे समाज की
ऊँच-नीच की जातीय व्यवस्था में भी अजीबोग़रीब क़ानून-कायदे होते हैं।जब कोई ब्राम्हण
जाति की लड़की किसी दलित लड़के से प्रेम विवाह कर लेती है तो कथित उच्च जातियों और
मीडिया में भूचाल सा आ जाता है और मीडिया को इससे ज्यादा टीआरपी बढ़ाने का दूसरा
सर्वाधिक प्रभावकारी मिर्च-मसाला नही दिखता है।समाज, मीडिया और राजनीति में दिन-रात ऐसी बहसें छिड़ी रहती हैं और
कोहराम मचता है जैसे कोई प्रलयकारी समुद्री तूफान से सामाजिक तानेबाने और जान-माल
का खतरा पैदा हो गया हो।जाति की श्रेष्ठता रूपी सम्मान और उनकी राजनीति को ऐसा
लगता है,जैसे लकबा मार गया
हो। लेकिन जब कोई दलित लड़की किसी गैर दलित लड़के से प्रेम विवाह कर ले तो उस पर
उतना हायतोबा क्यों नही मचता है ? यह एक सामाजिक
साज़िश/रहस्य मेरी समझ से परे है।अंतरजातीय विवाह के भी कुछ अनसुलझे सवाल,समस्याएं और आशंकाएं हैं जिनका उत्तर ढूंढना आसान
नही है।दलित लड़के के साथ किसी अन्य कथित श्रेष्ठ जाति की लड़की के प्रेम विवाह में
दलित समाज के लड़के और घरवालों पर जानमाल का खतरा सदैव मंडराता रहता है।
इस कहानी में
सामाजिक-धार्मिक विषयों के वे प्रसंग और संवाद बेहद मार्मिक और यथार्थपरक हैं जो
सामाजिक/धार्मिक व्यवस्था की अभिन्न और अमिट मान्यताओं का जटिल रूप धारण किए हुए
हैं।भारतीय समाज में प्रेम, वह भी
अन्तरजातीय प्रेम और सामाजिक व्यवस्था में ऊँच-नीच के दो छोरों/सिरों के बीच प्रेम
जैसी स्थिति को सामाजिक और धार्मिक संकट के रूप में देखा जाता है।सामाजिक व्यवस्था
की तथाकथित नीच जाति और सर्वश्रेष्ठ जाति के बीच तो सामाजिक महासंकट ही नही कईयों
के जीवन-मरण का संकट खड़ा दिखाई देता है और स्थिति तब और भयानक और विकराल रूप धारण
किए हुए दिखाई देती है जब यह सब तथाकथित सबसे नीच जाति ( दलित) का लड़का और
ब्रम्हमुख उत्पन्न सर्वश्रेष्ठ और कुलीन ब्राम्हण जाति की लड़की के बीच घटित होता
है।कहानी में शालिनी-सुभाष का प्रेम प्रस्ताव और उसके बाद विवाह के निर्णय के
सामाजिक व्यवस्थापरक संवाद,विवाह निर्णय
की जानकारी के बाद उस ब्राम्हण परिवार में माता-पिता के सामने उपजे जातीय
श्रेष्ठता,प्रतिष्ठा और
धार्मिक संकट / उलझनें,शालिनी के
सूझबूझ भरे विद्रोही तेवर से समाज के सामने खड़े होने वाले भावी सामाजिक संकट और
उसके बाद घर पहुंचने पर अदभुत और अकल्पनीय अदृश्य भय और आशंकाओ के कथानकों में
सामाजिक, दर्शन दिखाई देता है
जो अंदर तक झकझोरता हैं। बहुजन पाठकों को इस कहानी को अवश्य पढ़ना चाहिए।मेरे विचार
से आनंद और रोमांच से परिपूर्ण यह कहानी डॉ आंबेडकर की वैचारिकी/दर्शन से काफी सन्निकट और
उत्प्रेरित लगती है,क्योंकि अंत मे
शालिनी अपनी ननदों को अंतरजातीय विवाह के फायदे(जातीय कट्टरता में कमी आना, संतान तेजतर्रार और सोचने-समझने की शक्ति में
बदलाव के साथ उच्च आई.क्यू की पैदा होती है) बताते हुए उन्हें जाति के बाहर शादी
करने के लिए प्रेरित करती है।
लखीमपुर-खीरी (यूपी
9415461224,
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