साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Wednesday, June 23, 2021

ग़ज़ल-ओमप्रकाश गौतम

ओमप्रकाश गौतम
गई हैं क्यूं शये बाजार , अब ये बेटियां। 
कश्तियों के वास्ते, मझधार अब ये बेटियां। 
इस जमाने में भला ,उस बाप को निद्रा कहां। 
ब्याह के काबिल हुईं, तैयार अब ये बेटियां।। 
मुल्क के आईन ने हर, जर पे इनको हक दिया। 
मांगती कब पापा से, अधिकार अब ये बेटियां।। 
कहने को विद्वान हैं जो ,इल्म के हैं बादशा। 
बिन दहेजों के कहां ,स्वीकार अब ये बेटियां।। 
हुस्न के बाजार में, किरदार की कीमत कहां । 
हर गुणों से युक्त हैं ,बेकार अब ये बेटियां।। 
पूछते हैं लोग हम से ,हैं दिए तहजीब क्या। 
है तेरी तहजीब, ना इकरार अब ये बेटियां।। 
कर लिया पत्थर कलेजा ,गौतम उस दिन बाप ने। 
छोड़ कर जो रहीं, घर-बार अब ये बेटियां ।।

पढ़िये आज की रचना

मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण

(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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