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| नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. |
साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Thursday, October 29, 2026
नैतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष न्यायिक सेवा में कितना नैतिक और न्यायिक चरित्र का रहा होगा-प्रो० नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
ईडब्ल्यूएस आरक्षण घोटाले का लेटेस्ट वर्जन:(ब्राह्मणवादी सोच की बानगी)-प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)
Thursday, January 29, 2026
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग: उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन विनियमन:2026 Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations-प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)
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| नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. |
Friday, December 19, 2025
सार्वजनिक संस्थानों के बेतहाशा निजीकरण-नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
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| नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. |
सवर्ण वर्ग के आर्थिक
रूप से कमज़ोर अभ्यर्थियों के लिए 10% (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण
जिसका सबसे ज़्यादा दुरूपयोग होने के आंकड़े समय समय पर आते दिख जाना,बेतहाशा बढ़ती
बेरोज़गारी, महंगी होती शिक्षा, ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली न होना,पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते दाम,संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं पर गुजरात लॉबी का नियंत्रण, एकेडमिक
संस्थाओं में एक विशेष संगठन की संस्कृति से पोषित लोगों की भर्ती और एसी-एसटी और
ओबीसी के अभ्यर्थियों को एनएफएस के नाम पर भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर उनके स्थान
पर सामान्य वर्ग के अपने चहेतों की भर्ती करना, आरक्षण में एसी-एसटी और ओबीसी को
ओवरलैपिंग के लाभ से वंचित करना,एसी-एसटी और ओबीसी का आरक्षण छीनने की नीयत से विशेषज्ञता के नाम पर
" लेटरल एंट्री" के माध्यम से अपने चहते सवर्ण वर्ग के अभ्यर्थियों की
बड़ी संख्या में हर साल भर्ती करना, आरक्षण ऐसे तरीके से लागू करना
जिससे एसी-एसटी और ओबीसी के अभ्यर्थियों की संख्या उनके संवैधानिक आरक्षण के
प्रतिशत तक सिमटकर रह जाए अर्थात् आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस अभ्यर्थियों को उनकी
लिखित परीक्षा में उच्च मेरिट होने के बावजूद वे अंतिम चयनित सूची
में अनारक्षित वर्ग में न जा सके अर्थात ऐसे मेरिट धारी अभ्यर्थियों को ओवरलैपिंग
के लाभ से वंचित किया जाए (इसकी बानगी यूपीएससी की लिखित और साक्षात्कार में
आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मिले अंकों के तुलनात्मक अध्ययन से ली जा सकती है।
सामान्य वर्ग की तुलना में आरक्षित वर्ग अभ्यर्थियों के लिखित परीक्षा में अंक
अधिक और उन्हीं अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में अंक कम दिए जाने की साजिश लंबे
अरसे से चली आ रही है जिसकी वजह से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी या तो निम्न स्तर की
नौकरियां पाते हैं या मेरिट कम हो जाने की वजह से चयन सूची से ही बाहर हो जाते
हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूपी में 69000 प्राथमिक
शिक्षक भर्ती में आरक्षित वर्ग की लगभग 19000 पद
सवर्णों को दे देना, इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल और डबल बेंच का निर्णय आरक्षित वर्ग के
पक्ष में आने के बावजूद प्रदेश की सवर्ण मानसिकता की सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम
कोर्ट चली गई और भर्ती के पांच साल बाद भी यह मुकदमा सवर्ण वर्चस्व सुप्रीम कोर्ट
में जानबूझकर एक अरसे से लंबित पड़ी है........आदि), देश में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर
काम न होने से वैश्विक स्तर पर तकनीक के मामले में पिछड़ने की वजह से अधोमानक (सब
स्टैण्डर्ड) उत्पाद होने की वजह से विदेशों में भारतीय उत्पादों की डिमांड कम होने
से निर्यात की मात्रा कम और आयात अधिक होने से विदेशी मुद्रा के संदर्भ में भारतीय
मुद्रा रुपये का लगातार नीचे लुढ़कना अर्थात् विदेशी विनिमय दर में भारी गिरावट,लोकतांत्रिक मूल्यों और
मानदंडों पर वैश्विक स्तर पर गिरावट, पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का
दावा करने के बावजूद अस्सी करोड़ जनता का पांच किलो राशन के लिए सुबह से लेकर शाम
तक लाइन में खड़े होना,विश्व
की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दावा करने वाले देश की प्रति व्यक्ति आय और
हैपीनेस इंडेक्स की सूची में भारत का स्थान और सड़कों पर भीख मांगती जनता, शैक्षणिक
संस्थाओं में न तो शिक्षक हैं और न ही छात्र फिर भी विश्वगुरु बनने का दावा,किसानों की फसल के लिए
डॉ.एमएस स्वामीनाथन कमीशन की एक सिफारिश "फसल की एमएसपी " तक लागू न कर
पाना,मर्जर
के नाम पर सरकारी स्कूलों की संख्या कम करना और बंद कर देना और निजी शिक्षण
संस्थाओं को बढ़ावा देना जिससे देश के गांव में रहने वाले किसान, पंद्रह सालों से
पढ़ा रहे शिक्षकों के टीईटी पास करना अनिवार्य करने से शिक्षकों में एक अनावश्यक
बेचैनी पैदा करना,कृषि
मजदूर और साधारण मजदूर जो स्थानीय रोजगार उपलब्ध न होने की वजह से रोजी- रोटी के
लिए अपने गृह राज्य के शहरों और अन्य राज्यों में प्रवासी मजदूरों के बच्चों से
दूर होती शिक्षा...... संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लंघन आदि ऐसे
सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षणिक और आर्थिक
महत्वपूर्ण ज्वलंत मुद्दे हैं जिन पर जनता के जागरूक वर्ग के लोगों की नाराज़गी से
बीजेपी को चुनावी राजनीति का नुकसान और विपक्ष को लाभ किस हद तक हो सकता है,यह तो आने वाले समय में
ही पता चल पाएगा, क्योंकि पिछले लगभग 12सालों में आरएसएस और
बीजेपी संवैधानिक लोकतंत्र की कसौटी पर खरी उतरती नज़र नहीं आई है, जैसा कि लोकसभा
चुनाव में ओबीसी और एससी-एसटी की नाराज़गी की वजह का खामियाजा भुगतना पड़ा। वहां
संविधान के बजाय मनुस्मृति की जातीय ऊंच- नीच पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के
सिद्धांतों, नियमों और परंपराओं को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है,जो भारतीय संविधान के
प्रावधानों के ठीक विपरीत हैं। संविधान के जो अनुच्छेद 340,341और 342 जो
समाज के पिछड़े वर्गों के विशेष कल्याण और उत्थान के बनाए गए हैं,उनका बीजेपी सरकार में
सही दिशा में क्रियान्वयन की विश्वसनीयता की उम्मीद करना मुश्किल लग रहा है।
आरएसएस और बीजेपी के एजेंडे में संविधान में परिभाषित और वर्णित ओबीसी और
एससी-एसटी के सामाजिक,राजनीतिक, शैक्षणिक और
आर्थिक सरोकार नहीं दिख रहे हैं। वो संविधान समीक्षा के बहाने संविधान के समाजवादी
और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नष्ट करना चाहते हैं,या यूं कहा जा सकता है कि वो संविधान को बदल कर उसमें मनुस्मृति जैसे
प्रावधान शामिल करना चाहते हैं। आरएसएस और हिन्दू महासभा का स्वतंत्रता आंदोलन से
लेकर संविधान और राष्ट्रीय तिरंगे की रचना तक जो चरित्र उभर कर सामने आया है,उससे उनकी देश भक्ति और
आम जनता के प्रति उनकी भावना से उनके असली चरित्र का सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा
सकता है।
यूपी की एसआईआर में मतदाताओं की घटी संख्या पर योगी आदित्यनाथ के आए चिंतायुक्त बयान और पंकज चौधरी की ताजपोशी की भावी राजनीति के संभावित निहितार्थ: प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के
नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष के स्वागत समारोह में मुख्यमंत्री जी ने जनवरी 2025 के मुकाबले लगभग चार करोड़ मतदाता कम हो जाने पर गहरी चिंता जाहिर करते
हुए कहा है कि इन मतदाताओं
का लगभग 80-90% वोट बीजेपी यानि कि हमारा वोट है। इन चार करोड़ मतदाताओं का गहनता पूर्वक
जांच कर उनके एसआईआर से संबंधित प्रपत्र तैयार कर उन्हें जमा कराने के यथा संभव और
शीघ्र प्रयास किए जाएं जिससे हमारा कोई मतदाता अपने मताधिकार से अर्थात
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागिता करने से वंचित न हो सके। भारी संख्या में घटे
मतदाताओं को लेकर मुख्यमंत्री एक बड़े संभावित राजनीतिक घटनाक्रम या साजिश के
मद्देनजर अपनी भावी राजनीति को भी लेकर चिंतित दिखाई देते हैं,ऐसा लोगों का मानना है। वह यूपी में घटे या कटे
वोटों को बिहार की तर्ज़ पर बीजेपी द्वारा कथित वोट चोरी के रूप में नहीं देख रहे
हैं,बल्कि उसके
उलट अपनी भावी राजनीति के लिए आंशका और संशय भरी नज़रों से देख रहे हैं। वह वोटों
की घटी संख्या को कथित वोट चोरी को बीजेपी की चुनावी रणनीति और राजनीति के पक्ष
में नहीं देख रहे हैं,बल्कि वह
ठीक उसके उलट इस कथित वोट चोरी/वोटों की संख्या में आई भारी कमी को लेकर बेहद
गंभीर और राजनीतिक रूप से चिंतित दिखाई दे रहे हैं,जबकि
बीजेपी और उसके आनुषंगिक संगठनों की ओर से भारी संख्या में घटे वोटों पर को बयान
तक नहीं आया हुआ सुना या दिखाई दिया है। योगी आदित्य नाथ के बयान से ऐसा लगता है
कि वोट की भारी कमी की समस्या उनकी खुद की है। वह इसे अपनी भावी राजनीति से संबद्ध
कर देख रहे हैं। योगी के इस बयान के बड़े मायने हो सकते हैं,ऐसा विश्लेषकों का आकलन है।
राजनीतिक
गलियारों में चर्चा है कि पंकज चौधरी योगी की पसंद नहीं हैं। इसीलिए गोरखपुर पावर
पॉइंट से प्रदेश अध्यक्ष बनाना योगी की स्थानीय राजनीति में एक बड़ा हस्तक्षेप
माना जा रहा है। भौगोलिक क्षेत्र की विविधता(डायवर्सिटी) को ध्यान में रखते हुए
वहां से संगठन और सरकार में लोगों की सहभागिता,चुनावी
राजनीतिक सफलता के विस्तार और पकड़ के हिसाब से उचित मानी जाती है,पंकज चौधरी की नियुक्ति इस व्यावहारिक सिद्धांत
के अनुरूप नहीं दिख रही है। एक ही क्षेत्र में दो पावर पॉइंट बनने से....।
सामाजिक-राजनीतिक
समीकरण साधने के फार्मूले से कुर्मी समाज से प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बीजेपी की
रणनीति तो साफ दिखाई देती है। संभवतः अध्यक्ष पद के लिए योगी की पसंद पूर्व
अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह थे जो उनके बेहद निकट,विश्वासपात्र
और आज्ञाकारी माने जाते हैं,लेकिन
गुजरात लॉबी कुर्मी समाज से ऐसे व्यक्ति को लाना चाहती थी जो सामाजिक और बीजेपी की
आंतरिक राजनीति, दोनों को
साध सके। माना जा रहा है कि शाह और मोदी की उसी राजनीतिक स्ट्रैटजी के टूल के रूप
में बनाए गए और विकसित किए जाने वाले सामाजिक और राजनीतिक ब्रांड उत्पाद के रूप
में देखे जा रहे हैं,पंकज
चौधरी।
नवनिर्वाचित
प्रदेश अध्यक्ष श्री पंकज चौधरी की नियुक्ति पर राजनीतिक विश्लेषकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवी और जातीय संगठनों के
गलियारों में तरह- तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म नज़र आ रहा है। कुछ का मानना है
कि पंकज चौधरी की नियुक्ति योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने या
दरकिनार करने की दिशा में अमित शाह और मोदी जी का संयुक्त रूप से उठाया गया एक
दूरगामी शांत कदम है जिसकी आहट भविष्य में सुनी जा सकती है,अर्थात पंकज चौधरी की नियुक्ति,योगी आदित्यनाथ की भविष्य में उभरने वाली
राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। विगत कई चुनावों से योगी आदित्यनाथ
को आरएसएस के हिंदू एजेंडे के लिए सर्वोत्तम और सर्वाधिक प्रभावी कैंडिडेट के तौर
पर माना जा रहा है और आरएसएस के हिसाब से वो सबसे उपयुक्त हैं। इसलिए गुजरात लॉबी
द्वारा पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना आरएसएस के बेवजह बढ़ते दखल और
दबाव तथा योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व की राजनीति के बढ़ते कद और आरएसएस की भावी
रणनीति की काट करने और धीमी गति से विफल करने की दिशा और प्रक्रिया के तौर पर देखा
जा रहा है।
पंकज चौधरी की नियुक्ति को 2027 विधानसभा चुनाव में कुर्मी जाति के वोट साधने की कवायद की दिशा में भी
देखा जा रहा है। 2024 में संपन्न लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से सात कुर्मी सांसदों का
चुना जाना बीजेपी के शीर्ष रणनीतिकारों के लिए 2029 में बीजेपी के पूर्ण या दो तिहाई बहुमत के लिए लगातार बेचैनी पैदाकर रहा
है। इस बहुमत को हासिल करना इसलिए ज़रूरी है,क्योंकि
बिहार में नीतीश कुमार के जेडीयू और आंध्र प्रदेश में चन्द्र बाबू नायडू की
राजनीतिक बैसाखी की वजह से कुछ अशुभ होने की आशंका की वजह से बीजेपी अपने एजेंडे
पर अपनी पूरी गति से काम नहीं कर पा रही है। शाह और मोदी देश की वर्तमान संवैधानिक
लोकतांत्रिक व्यवस्था को अदृश्य तानाशाही के रूप को विधिक रूप से बदलना चाहते हैं।
बुद्धिजीवियों का आकलन है कि मोदी और शाह की सत्ता का चरित्र इटली के तानाशाह
बेनिटो मुसोलिनी और जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर से काफी हद तक मेल खाता दिखता है।
बिहार
विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के स्ट्राइक रेट से बीजेपी आत्मविश्वास
से भरी नजर आ रही है और इसी रणनीति से वह पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में होने
वाले चुनावों में सफलता करना चाहती है। चुनावी विश्लेषण और चर्चा में यह बात उभर
कर आ रही है कि बीजेपी अपने मकसद में सफल हो सकती है। इसलिए पंकज चौधरी का अध्यक्ष
बनाना यूपी के आगामी विधान सभा चुनाव की राजनीति में कुर्मी कार्ड के रूप में एक
तुरुप का इक्का की तरह जीत के लिए अकाट्य और मजबूती की दिशा में भी देखा जा रहा है
और चर्चा यहां तक है कि अमित शाह और मोदी द्वारा "एक तीर से दो शिकार"
की कहावत को चरितार्थ करते हुए पंकज चौधरी को यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव में
मुख्यमंत्री का फेस तक घोषित किया जा सकता है। ऐसा करने से यूपी के कुर्मी समाज को
बीजेपी के पक्ष में लाने की रणनीति काफी हद तक सफल भी हो सकती है और लोक सभा चुनाव
में समाजवादी पार्टी में गए कुर्मी समाज के आकर्षण को बढ़ने से रोके जाने में काफी
राहत मिल सकने की संभावना जताई जा रही है,अर्थात्
कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लुभाने में महत्वपूर्ण फैक्टर साबित हो सकता
है।
कुर्मी
समाज की राजनीतिक फलक पर पहचान कराने और स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका
निभाने वाले और अपना दल के संस्थापक डॉ.सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल और
आशीष पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (एस) विगत कई चुनावों में बीजेपी के एनडीए
गठबंधन में शामिल होकर चुनावी राजनीति का एक अभिन्न और मजबूत हिस्सा बना हुआ है और
राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में उसकी भागीदारी भी है। चुनाव में सीट शेयरिंग के मामले में
बीजेपी नेतृत्व एनडीए गठबंधन के सहयोगी दल विशेषकर जाति आधारित पार्टियां चुनाव के
समय अपनी-अपनी जाति की संख्या की दुहाई देकर बड़ी हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाती
रही हैं जिसमें सामाजिक और राजनीतिक रूप से मजबूत माने जाने वाला अपना दल (एस)
बड़ी भूमिका का दावा करता रहा है। सुभासपा के ओमप्रकाश
राजभर और निषाद पार्टी के संजय निषाद चुनाव के वक्त गिरगिट और बरसती मेढक की तरह
रंग बदलकर किसी पार्टी के नेतृत्व के बारे में अगड़म बगड़म बोलने में कोई संकोच
नहीं करते हैं और इन लोगों के बारे में लोगों का मानना है कि सत्ता की मलाई के लिए
ये नेता चुनाव से पहले और बाद में किसी भी संभावित सत्ताधारी दल की गोद में बैठ
सकते हैं। कुर्मी जाति से आने वाले पंकज चौधरी की नियुक्ति ऐसे दलों से उपजने वाले
सामाजिक और राजनीतिक दबाव को कम करने की संभावना के रूप में देखी जा रही है।
भविष्य
में यदि पंकज चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की बीजेपी/मोदी-शाह
की संभावित रणनीति सफल साबित होती है तो फिर एक सजातीय राजनीतिक दल का दबाव कम
होना बहुत स्वाभाविक हो सकता है,क्योंकि
मुख्यमंत्री के रूप में एक कुर्मी नेता की घोषणा मात्र से कुर्मी समाज में एक
अभूतपूर्व सामाजिक - राजनीतिक चेतना और जोश का संचार होने से भी इनकार नहीं किया
जा सकता है। ऐसा इसलिए संभव है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल की ओर से ऐसा होने की
कोई संभावना तक नहीं दिखाई दी है। लोगों का अनुमान है कि यदि बीजेपी की ओर से ऐसा
किया जाता है तो यूपी में कुर्मी समाज अपने राजनीतिक विस्तार, सम्मान और समृद्धि की प्रबल संभावना
को देखते हुए बीजेपी के साथ भारी संख्या में जाने से रोकना संभव नहीं होगा और ऐसी स्थिति में बीजेपी के एनडीए
गठबंधन में अपना दल को सम्मान जनक और महत्वपूर्ण सहभागिता मिलती है तो यह राजनीतिक
परिस्थिति "सोने में सुहागा" होने जैसी हो सकती है। पंकज चौधरी को
मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना और एनडीए में अपना दल (एस) को पर्याप्त
भागीदारी मिलने पर कुर्मी
बिरादरी भारी संख्या में एनडीए गठबंधन के साथ जाना स्वाभाविक लगता है,लेकिन कुर्मी समाज का शिक्षित और जागरूक वर्ग
जिसकी संख्या लगभग नगण्य लगती है,संवैधानिक
सामाजिक न्याय के आरक्षण और संविधान की रक्षा के लिए बीजेपी के खिलाफ और विपक्ष के
साथ जाने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ने वाला है।
बीएसपी
की राजनीतिक सक्रियता के निम्न तापमान और गठबन्धन की राजनीति से दूरी अर्थात्
बीजेपी की "बी" टीम होने वाला बीएसपी पर लगता कथित आरोप बीजेपी की
चुनावी राजनीति में सफलता में सहूलियत देता नजर आता है। उधर असुदुद्दीन ओवैसी की
एआईआईएमआई और तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बंगाल में
अचानक बाबरी मस्जिद निर्माण और एक अलग राजनीतिक दल बनाने की घोषणा और ओवैसी के साथ
पश्चिम बंगाल में मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना जताने और उसी दौरान पश्चिम बंगाल
में धीरेन्द्र शास्त्री के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए निकाली जा
रही यात्रा बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति को और मज़बूत करती हुई दिखाई देती है।
राजनीतिक विचारकों का मानना है कि ये सब उपक्रम और उपकरण बीजेपी के लिए मुफीद
साबित होते दिखाई दे रहे हैं।
Friday, September 12, 2025
शेर का परिवार-अखिलेश कुमार अरुण
व्यंग्य
(दिनांक ११ सितम्बर २०२५ को मध्यप्रदेश से प्रकाशित इंदौर समाचार पत्र पृष्ठ संख्या-१०)
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| अखिलेश कुमार 'अरुण' ग्राम- हज़रतपुर जिला-लखीमपुर खीरी मोबाईल-8127698147 |
घर के बाहर बैठे कादिर मियां से हमारी नजर
क्या मिली सलाम अलैकुम के साथ बात ही बातों में चर्चा-ए-आवाम होने लगी। बोले, “भई क्या कहें? देश की हालत उस दुल्हन जैसी हो गई है जो
सुहागरात की एक रात नेता आकर घूंघट उठाई
का रस्म अदा कर उसकी अस्मिता से खेलता है और फिर उसकी हाल पर छोड़कर कहीं खो जाता
है, अब उसे न विधवा की
जिन्दगी मयस्सर होती है और नहीं सधवा की! उस पर भसुरों-देवरो की ठट्ठेबाजी अलग।”
“भसुरों-देवरों!” कुछ समझा नही।
“अरे! भईया भसुर माने
जेठ (अमेरिका), देवर (चीन-जापान) का
समझे?”
“ओ! बात तो सही है।” कितना सटीक बात कह
गये मानसपटल पर दर्ज हो गई है, सच ही
तो है देश की अस्मिता ही तो एक के बाद एक लूटी जा रही है। उसके बच्चे (जनता)
इस आस में है कि कोई फ़रिश्ता ऐसा तो होगा या आयेगा जो देश की हालत और जनता के दर्द
को कम करेगा।
“कहां खो गये मिंया?”
कहीं नहीं, एक गहरी सांस अदंर खींचते हुये
थोड़ी देर रुककर,
मन को तसल्ली देते
हुये बोला, “और कर ही क्या सकते हैं?”
पूरे दार्शनिक होते हुये एक गम्भीर मुद्रा
अख्तियार कर कहने लगे, “करने को तो जनता, बहुत कुछ कर ले बरखुर्दार किन्तु एकजाई
नहीं हैं, जनता हिरनों का
झुण्ड जो ठहरी, उसे मालूम है कि
अगले दिन शेर का निवाला हमारे ही बीच से कोई और बनेगा? बस ऐसे ही चलता रहेगा। हम घास-फूंस खाकर
शरीर में ऊर्जा,
अपने लिये नहीं शेर
के परिवार और उसके सगे-सम्बन्धियों के लिये संचित करते हैं और यह बदस्तूर चलता
रहेगा।
Friday, July 18, 2025
संविधान बनाम सनातन" की दुबारा जंग छिड़ने की आशंका-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
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| नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. |
Wednesday, July 09, 2025
बहुजन समाज का संविधान बनाम सनातन-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
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| नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. |
पढ़िये आज की रचना
नैतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष न्यायिक सेवा में कितना नैतिक और न्यायिक चरित्र का रहा होगा-प्रो० नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश...
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प्रो० नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224. उत्तर प्रदेश शिक्षा स...
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(एक सच्चाई यह भी) ए०के०’अरुण’ उ०प्र० की शिक्षा व्यवस्था को क्या कहें ग़ालिब ..........जुलाई में तो फल मिल जाता है, किताब नहीं मिल...






