साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Thursday, January 29, 2026

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग: उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन विनियमन:2026 Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations-प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.


       भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में वर्णित है कि भारत के किसी भूभाग में किसी भी व्यक्ति को धर्म,जाति, नस्ल,लिंग या जन्म स्थान अर्थात क्षेत्र के आधार पर कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा और न ही भेदभाव का निषेध करेगा।" यह अनुच्छेद भारत के सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों की समान सुरक्षा की गारंटी देता है। "राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या भारत के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा।"
         उपरोक्त अनुच्छेद के व्यापक निहितार्थ के विस्तृत संदर्भ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति,धर्म,क्षेत्र,रंगभेद,लिंग या किसी तरह की दिव्यांगता आधारित भेदभावों को रोकने के उद्देश्य से यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा ‘'उच्च  शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम-2026'’ को लागू कर दिया गया है। यह नियम 15 जनवरी, 2026 से भारत की सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू हो गया है। देश की कथित अगड़ी जातियों के लोगों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। इस विनियमन का विरोध का मतलब संविधान का विरोध,क्योंकि अगड़ी जातियों ने समानता,समता, न्याय और बंधुत्व सम्मत संविधान के अंगीकार तिथि से ही सहजता पूर्वक पसंद और स्वीकार नहीं किया है।
       इस नियमन में एससी-एसटी के साथ ओबीसी को भी जातिगत भेदभाव की परिधि में शामिल कर लिया गया है,अर्थात् अब उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के छात्र,शिक्षक और कर्मचारी भी अपने ऊपर किए जा रहे जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत स्थापित प्रकोष्ठ के समक्ष कर सकते हैं। इससे बहुजन समाज और मजबूत होता दिख रहा है। अब तक केवल एससी-एसटी के लोग ही जातिगत भेदभाव की शिकायत कर सकते थे या यूं कहें कि उनके लिए ही संबंधित संस्थानों में शिकायत और निवारण प्रकोष्ठ बने थे। इस रेगुलेशन के लागू होने के बाद अब एससी-एसटी के साथ ओबीसी के लिए भी समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित किया जाएगा और एक ऐसी समता समिति गठित की जाएगी, जिसमें ओबीसी, महिला,एससी,एसटी और दिव्यांगों को सदस्य के रूप में नामित करना अनिवार्य होगा। इस कमेटी को अपनी समयबद्ध नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। प्रत्येक संस्थान के लिए उक्त कमेटी की रिपोर्ट यूजीसी को भी भेजना अनिवार्य होगा।
        देश में मौजूद सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों के मन में बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस रेगुलेशन में ऐसा क्या है, जिसका विरोध किया जा रहा है? आखिर क्यों पूरे देश में अगड़ी जातियों के लोग इसका विरोध कर रहे हैं? कथित अगड़ी जातियों के लोग इसके विरोध में तर्क दे रहे हैं कि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है और इस रेगुलेशन के माध्यम से अगड़ी जातियों के छात्रों को प्रताड़ित किया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर '‘सवर्ण समाज समन्वय समिति'’ (एस-4) का गठन किया है ताकि एक बड़े संगठन के बैनर तले इस नियम के विरोध में मंडल आयोग के विरोध जैसा बड़ा आंदोलन किया जा सके। सोशल मीडिया पर अगड़ी जातियों के तमाम इंफ्लूएंसर,यूट्यूबर्स और कार्यकर्ता इसके विरोध में उतरकर अभियान चला रहे हैं। स्वामी आनंद स्वरूप ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा है कि “आज यदि सभी सवर्ण समाज के लोग एकजुट नहीं हुए तो पतन निश्चित होगा और यदि एक हो गए तो "धनानंद" का विनाश हो जाएगा।” इसी तरह की एकजुटता के आह्वान तमाम मंचों से हो रहे हैं। 
संदर्भ: धनानंद,मगध के नंद वंश के प्रथम राजा महापद्मनंद के नौवें पुत्र थे और महापद्मनंद की दासी से उत्पन्न हुए थे। उनके नौ भाइयों को मिलाकर “नवनन्द” कहा जाता था। कहा जाता है कि धनानंद ने छल विद्या से अपने पिता महापद्मनंद की हत्या कर दी और तत्पश्चात नंद वंश के उत्तराधिकारी बन गए। वह आगे चलकर नंद वंश के अंतिम सम्राट सिद्ध हुए। धनानंद ने विद्वान ब्राह्मण चाणक्य का अपमान किया था। चाणक्य ने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ धनानंद के राज्य पर आक्रमण कर धनानंद को मार दिया और मगध राज्य पर अपना शासन स्थापित कर लिया।
      दरअसल,भारत के लगभग सभी उच्च शिक्षण संस्थान आज भी सवर्ण वर्चस्व के गढ़ बने हुए हैं। संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के तमाम प्रयासों के बावजूद यहां आज भी वंचित शोषित वर्गों को उचित भागीदारी नहीं मिल पाई है। यहां आज़ादी के बाद से एससी-एसटी के लिए आरक्षण लागू है तथा ओबीसी को नौकरियों में अगस्त,1992 से विश्वविद्यालयों के फैकल्टी भर्ती और नामांकन में 2010 से आरक्षण मिल रहा है। इसके बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित वर्गों की भागीदारी 15% से अधिक नहीं हो पाई है। 30 जनवरी, 1990 से पूरे भारत में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 लागू है। यह अधिनियम एससी-एसटी को जातिगत भेदभाव, हिंसा और अत्याचार से सुरक्षा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के करीब 36 वर्षों के बाद भी देश में एससी-एसटी उत्पीड़न की घटनाओं पर प्रभावी नियमन और नियंत्रण नहीं हो पाया है। 
      यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच वर्षों में बड़ी संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। यूजीसी के 700से अधिक विश्वविद्यालयों और 1500 से अधिक महाविद्यालयों में समान अवसर प्रकोष्ठों और अनुसूचित जाति/जनजाति प्रकोष्ठों द्वारा दर्ज की गई शिकायतें बढ़ी हैं। इन शिकायतों में वृद्धि का एक कारण एससी-एसटी वर्ग में आई जागरूकता भी हो सकती है,लेकिन इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता कि इनके खिलाफ जातिगत भेदभाव अब भी जारी है।
हालांकि,अधिकांश एससी-एसटी प्रकोष्ठ और समान अवसर प्रकोष्ठ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करते हैं। उनके पास निर्णय लेने की खुलकर आजादी नहीं होती। इसलिए किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न के खिलाफ ये न्यायपूर्ण निर्णय नहीं ले पाते हैं।
        उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी के लिए आरक्षण और जातिगत भेदभाव रोकने के लिए कानून लंबे समय से लागू हैं। इसके बावजूद न तो इनकी भागीदारी में समुचित वृद्धि हुई है और न ही इनके खिलाफ जातिगत भेदभाव में कमी आई है। उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी का प्रवेश बहुत बाद में शुरू हुआ। इन्हें भी अब तक समुचित भागीदारी नहीं मिल पाई है और न ही इनके खिलाफ हो रहे जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अब तक कोई रेगुलेशन ही लागू था। पिछड़े वर्गों के आरक्षण रोस्टर में छेड़छाड़ करना और इनके साथ जातिगत भेदभाव करना उच्च शिक्षण संस्थानों में बदस्तूर जारी है। जवाहरलाल नेहरू और दिल्ली विश्वविद्यालय सहित तमाम केंद्र और राज्य विश्वविद्यालयों में नौकरियों और नामांकन में ओबीसी आरक्षण लागू नहीं हो पा रहा है। शैक्षणिक पदों के विज्ञापन तो प्रकाशित होते हैं, उनके लिए इंटरव्यूज भी होते हैं,लेकिन अंततः (एनएफएस) 'नॉट फाउंड सुटेबल’ कहकर उनकी आरक्षित श्रेणी के पदों पर नियुक्ति नहीं की जाती है। अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में 200 से अधिक एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों को ‘एनएफएस’ कर दिया गया। वर्ष 2022 में शिक्षा मंत्रालय ने एक लिखित जवाब में राज्य सभा में बताया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित श्रेणी के 880 प्रोफेसर्स के पद और 3669 असिस्टेंट प्रोफेसर के पद खाली हैं। इनमें से ओबीसी के 1761 पद खाली हैं। यूजीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं। 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में 7 वर्षों से पढ़ा रहे एक ओबीसी एडहॉक असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.समरवीर को निकाल दिया गया और वह इतने दुखी हुए कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए विवश कर दिए गए। आख़िर,उनकी आत्महत्या के लिए दोषी कौन?
      उच्च शिक्षण संस्थानों के सवर्ण कुलपति और साक्षात्कार में बैठने वाले विशेषज्ञों ने मिलकर ‘एनएफएस’ नाम का एक नया अद्भुत धारदार हथियार  बना लिया है। इसके माध्यम से वे यह सिद्ध करते हैं कि वंचित वर्गों के कैंडिडेट्स नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने के लिए यूजीसी के मानदंडों के हिसाब से शैक्षणिक रूप से क्वालिफाइड तो हैं,लेकिन नियुक्ति के लिए ‘सूटेबल’ उपयुक्त या योग्य नहीं है। इस प्रकार के जातिगत भेदभाव के लिए आज तक किसी भी कुलपति या इंटरव्यू में बैठे विशेषज्ञ को सजा देना तो दूर,उनसे एक सवाल भी नहीं किया गया। इस तरह उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गो के लिए आरक्षित हजारों पद या तो खाली हैं या फिर उन्हें सवर्ण अभ्यर्थियों से भर लिया गया है। एससी-एसटी कल्याण की संसदीय समिति ने ‘एनएफएस’ को दिल्ली विश्वविद्यालय में एससी-एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों को जातिवादी मानसिकता के तहत बाहर रखने और आरक्षित श्रेणी की सीटों को खाली रखने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला घातक हथियार माना है। यह उनका संस्थागत बहिष्कार का एक तरीका बन गया है जिसका भरपूर इस्तेमाल देश की तमाम शिक्षण संस्थाओं में हो रहा है। हालांकि,यूजीसी का एक पैनल इसकी जांच कर रहा है,लेकिन इसकी रिपोर्ट कब आएगी और कार्रवाई कब होगी, किसी को पता नहीं है।
      उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27%, एससी के लिए 15%, एसटी के लिए 7.5% और अगड़ी जातियों के ईडब्ल्यूएस के लिए 10% आरक्षण लागू है अर्थात् लगभग 60% सीटें आरक्षित हैं और 40% सीटें अनारक्षित हैं। इन 40% अनारक्षित सीटों को अगड़ी जातियों के लिए पूरी तरह आरक्षित मानकर उन पर सवर्णों की भर्ती की जाती रही है। इन अनारक्षित सीटों पर आरक्षित वर्गों के कैंडिडेट्स को इंटरव्यू के लिए कॉल भी नहीं किया जाता रहा है। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति और महाविद्यालयों के प्राचार्य सवर्ण हैं और वे तमाम तरह के हथकंडे अपनाकर आरक्षित वर्गों की हकमारी करते रहते हैं। आरक्षण के संदर्भ में कोई कारगर नियामक संस्था न होने के कारण ये जातिवादी प्रशासक तानाशाह की भूमिका निभाते हैं। कुलपति और प्राचार्य के पदों पर आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है। इसलिए ये सभी पद शत-प्रतिशत अगड़ी जातियों के लिए एक तरह से आरक्षित हो गए हैं। यह विडंबना ही है कि देश के 99% कुलपति अगड़ी जातियों के हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2020 में सभी कुलपतियों को बुलाकर यह बताने के लिए कहा था कि वे आखिर, आरक्षण नीति का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के इस आदेश का भी कोई परिणाम नहीं निकला। यूजीसी विनियमन- 2026 आज के दौर के द्रोणाचार्यों को सबक सिखाने वाला एक आदेश है,ना कि किसी जाति के खिलाफ। यदि उच्च शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्य के रूप में कार्य करने वालों की रक्षा के लिए तलवारें खींचेंगे तो "एकलव्यों" का भी तीर अब कमान से निकलता हुआ दिखाई देगा। वंचना का शिकार उस एकलव्य की पीड़ा समझिए, जिसे गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या सीखने की इजाजत नहीं दी थी। समय की आहट और नाज़ुकता को पहचानिए। अब संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई सामाजिक शक्ति भारत के वंचित या शोषित वर्ग को ज्यादा दिन तक रोक नहीं सकती है। कोई भी सामाजिक टकराव नई सुबह होने का रास्ता नहीं रोक सकता है।
      लंबे अरसे से विश्विद्यालयों और कॉलेजों में जाति/धर्म के आधार पर अन्याय या असमानता की अदृश्य परंपरा चली आ रही है। आख़िर,यह कब तक चलेगा? सरकार इस सामाजिक अन्याय या भेदभाव को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है तो कोई वर्ग इसमें बाधा नहीं बनना चाहिए। समता और समानता की भावना और आकांक्षा किसी भी देश की एकजुट और अखंड होने के लिए आवश्यक हैं। यदि इन आकांक्षाओं पर कोई प्रहार हो रहा हो, तो सरकार का दायित्व है कि वह उस पर नियंत्रण और उसकी रोकथाम के लिए ठोस प्रभावी कदम उठाए। यह देश तब तक एक है,जब तक यहां के वासियों को इस देश में बेहतरी की उम्मीद है। यह बात विश्व के हर भूभाग के लिए लागू होती है।
        यूजीसी विनियमन 2026 उच्च शिक्षा में वर्ग विशेष के वर्चस्व की दीवारों में दरार पैदा करने की दिशा में एक पहल है। इससे न किसी का हक छिनेगा और न ही किसी पर आसमान टूट पड़ेगा। यह वह पहल है जो संविधान लागू होते ही तुरंत शुरू हो जानी चाहिए थी,लेकिन यदि देर से ही शुरू हुई,तो इसका खुलकर दिलोदिमाग से स्वागत और सम्मान किया जाना चाहिए।
        भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे अरसे से एक शक्तिशाली सामाजिक वर्ग का वर्चस्व कायम रहा है और आज भी है। यह वर्चस्व केवल कानून में ही नहीं है, बल्कि कई तरह की मूल्यांकन प्रक्रियाओं में,शोध कार्य में सुपरवाइजर्स आवंटन में,हॉस्टल आवंटन में, शिक्षकों के चयन और पदोन्नति जैसी प्रक्रियाओं में एक मौन,अदृश्य या अप्रत्यक्ष रूप में भेदभाव लंबे अरसे से होता आ रहा है। यदि यूजीसी इस दमनकारी और भेदभावपूर्ण ढांचे को तोड़ने का प्रयास कर रहा है, तो केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री को इसका श्रेय और बधाई मिलनी चाहिए। इस आदेश के तहत अब उच्च शिक्षण संस्थानों में वरिष्ठ संकाय सदस्यों और संस्थान प्रमुखों के नेतृत्व में गठित समता समिति समान अवसर से जुड़े मामलों की निगरानी करेंगे,यानी अब भेदभाव को आंतरिक और गोपनीय प्रक्रियाओं में छुपाकर रखना कठिन होगा। इस मुद्दे पर वंचित तबके (विशेष रूप से एससी-एसटी और ओबीसी) के लोग सरकार के साथ हैं।
       यह नया विनियमन विशेष रूप से एससी-एसटी, ओबीसी,अल्पसंख्यक, महिलाओं, दिव्यांग छात्रों और शिक्षकों को समान अवसर दिलाने में सहायक सिद्ध होगा। भले ही यह कार्य संविधान विरोधी भाजपा सरकार के कालखंड में हो रहा है तो भी इसका स्वागत उस हर भारतीय नागरिक को करना चाहिए जो समता,मानवता, न्याय,बंधुत्व और बराबरी में यकीन करता है। " हो कहीं भी आग, मगर आग जलनी चाहिए।" अब यदि किसी का मूल्यांकन जानबूझकर प्रभावित किया गया, मानसिक उत्पीड़न किया गया या “तुम यहाँ के लिए फिट नहीं हो” (नॉट फाउंड सूटेबल) जैसे वाक्यों और टूल्स के जरिए हतोत्साहित या रिजेक्ट किया गया, तो ऐसे मसलों पर कार्रवाई के लिए संस्थान में एक अनिवार्य और जवाबदेह प्राधिकरण मौजूद होगा, जिसकी सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई करना संस्थान के लिए बाध्यकारी होगा।
       इस विनियमन के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में एक समान अवसर केंद्र अनिवार्य रूप से स्थापित होगा। शिकायत निवारण की स्पष्ट समय-सीमा तय होगी और उसकी समयबद्ध रिपोर्टिंग यूजीसी तक पहुँचेगी। अब पीड़ित छात्र को डराने के लिए यह कहना आसान नहीं होगा कि “शिकायत करोगे तो करियर खत्म हो जाएगा।” इस दिशा में यह पहला अवसर है जब संस्थान का प्रशासन औपचारिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया है। 
      भारत के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में दलित–पिछड़े छात्रों की आत्महत्या की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं, जो किसी दुर्घटना का नहीं, बल्कि संस्थागत उपेक्षा और सामाजिक बहिष्कार का परिणाम रही हैं। समझने के लिए हैदराबाद के रोहित वेमुला और महाराष्ट्र की पायल तावड़ी इसके बड़े उदाहरण हैं। इस आदेश में काउंसलिंग, मेंटरशिप, सेफ-स्पेस और संस्थान की जवाबदेही को अनिवार्य किया गया है। यह स्पष्ट रूप से रोहित वेमुला और पायल तावड़ी जैसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में एक संस्थागत प्रयास है। आरक्षित वर्ग के शिक्षकों और शोधार्थियों के संदर्भ में चयन,मूल्यांकन और पदोन्नति से जुड़ी प्रक्रियाएँ अब समीक्षा और रिपोर्टिंग के दायरे में होंगी, जिससे मनमानी की गुंजाइश सीमित होगी। शिक्षण संस्थाओं की चयन समितियों की मनमानी, “मेरिट” के नाम पर जातिगत पूर्वाग्रह, योग्य होने के बावजूद हाशिये पर धकेलना,इन तमाम बेईमान प्रक्रियाओं पर यह आदेश प्रहार करता और अंकुश लगाता हुआ नज़र आएगा,क्योंकि यह उनके लिए एक मजबूत संस्थागत सपोर्ट सिस्टम तैयार करने वाला है।
      इस सुधार के ऐतिहासिक कदम को कुछ लोगों ने चुनौती भी दी है और मामला अदालत में भी गया है। दो माह बाद इस पर अदालत की तारीख तय होना महत्वपूर्ण होगा। यदि न्यायपालिका इस आदेश की भावना को समझती है, तो वाकई वर्चस्व की संरचनाओं में दरार पड़ेगी,लेकिन वंचित तबकों को भी सतर्क रहना होगा। उच्च शिक्षण संस्थान इन नियमों को काग़ज़ तक सीमित रखने का प्रयास कर सकते हैं। असली लड़ाई तो इसके ईमानदारी पूर्वक क्रियान्वयन की है। यह आदेश कोई क्रांति नहीं है,लेकिन यह उस क्रांति का कानूनी औज़ार जरूर है, जिसकी माँग वंचित समाज दशकों से करता आ रहा है। कोई आधुनिक दौर का गुरु द्रोणाचार्य किसी दलित एकलव्य का अंगूठा मांगे,अब यह स्वीकार्य नहीं होगा।
      यूजीसी के इस नए विनियमन में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे अगड़ी जातियों को डरने की जरूरत है। फिर भी वो डर रहे हैं। यह रेगुलेशन तो वंचित वर्गों के अंदर के डर को खत्म करने के उद्देश्य और नीयत से बनाया और लागू किया जा रहा है।
          जो अब तक डराते रहे हैं,वे आज खुद डरे हुए हैं!दरअसल, देश के उच्च शिक्षण संस्थान अगड़ी जातियों के लिए आज भी सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं। वे इस गढ़ को किसी भी तरह से बचाना चाहते हैं। इसलिए वो यहां सामाजिक न्याय को लागू करने के तमाम प्रयासों को विफल कर देने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं। मंडल आयोग की सिफारिशों को जब 1990 में लागू करने की घोषणा हुई तो उन्होंने पूरी ताकत और अराजकता से सड़क से लेकर न्यायपालिका तक इसका विरोध किया। हालांकि, वे इसे लागू होने से रोक नहीं पाए। सवर्ण वर्चस्व सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के 27% आरक्षण को वैध तो ठहराया,लेकिन उसमें जातिगत आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% और एक आय सीमा वालों को क्रीमी लेयर मानते हुए आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का आदेश पारित किया। वे इसलिए डरे हुए हैं कि यह रेगुलेशन भी यदि लागू हो गया तो वो वंचित वर्गों के साथ जातिगत और अन्य कई तरह के भेदभाव नहीं कर पाएंगे। वो इसलिए डरे हुए हैं कि उनका जातिवादी वर्चस्व का यह किला ढह न जाए!
         इस विनियमन से सवर्णों को डरने की कतई जरूरत नहीं है। उन्हें अपनी ऊर्जा खुद को जातिवादी अमानवीय मानसिकता से उबरने में खर्च करनी चाहिए। आज भी देश में जाति और धर्म आधारित भेदभाव को हतोत्साहित करने वाले कई कानून और अधिनियम लागू होने के बावजूद वंचित वर्गों के साथ हो रहे जातिगत भेदभाव को अब तक रोका नहीं जा सका है।

Friday, December 19, 2025

सार्वजनिक संस्थानों के बेतहाशा निजीकरण-नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.

सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर अभ्यर्थियों के लिए 10% (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण जिसका सबसे ज़्यादा दुरूपयोग होने के आंकड़े समय समय पर आते दिख जाना,बेतहाशा बढ़ती बेरोज़गारीमहंगी होती शिक्षाओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली न होना,पेट्रोलियम उत्पादों के बढ़ते दाम,संवैधानिक और स्वायत्त संस्थाओं पर गुजरात लॉबी का नियंत्रणएकेडमिक संस्थाओं में एक विशेष संगठन की संस्कृति से पोषित लोगों की भर्ती और एसी-एसटी और ओबीसी के अभ्यर्थियों को एनएफएस के नाम पर भर्ती प्रक्रिया से बाहर कर उनके स्थान पर सामान्य वर्ग के अपने चहेतों की भर्ती करनाआरक्षण में एसी-एसटी और ओबीसी को ओवरलैपिंग के लाभ से वंचित करना,एसी-एसटी और ओबीसी का आरक्षण छीनने की नीयत से विशेषज्ञता के नाम पर " लेटरल एंट्री" के माध्यम से अपने चहते सवर्ण वर्ग के अभ्यर्थियों की बड़ी संख्या में हर साल भर्ती करनाआरक्षण ऐसे तरीके से लागू करना जिससे एसी-एसटी और ओबीसी के अभ्यर्थियों की संख्या उनके संवैधानिक आरक्षण के प्रतिशत तक सिमटकर रह जाए अर्थात् आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस अभ्यर्थियों को उनकी लिखित परीक्षा में उच्च मेरिट होने के बावजूद वे अंतिम चयनित  सूची में अनारक्षित वर्ग में न जा सके अर्थात ऐसे मेरिट धारी अभ्यर्थियों को ओवरलैपिंग के लाभ से वंचित किया जाए (इसकी बानगी यूपीएससी की लिखित और साक्षात्कार में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को मिले अंकों के तुलनात्मक अध्ययन से ली जा सकती है। सामान्य वर्ग की तुलना में आरक्षित वर्ग अभ्यर्थियों के लिखित परीक्षा में अंक अधिक और उन्हीं अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में अंक कम दिए जाने की साजिश लंबे अरसे से चली आ रही है जिसकी वजह से आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी या तो निम्न स्तर की नौकरियां पाते हैं या मेरिट कम हो जाने की वजह से चयन सूची से ही बाहर हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूपी में 69000 प्राथमिक शिक्षक भर्ती में आरक्षित वर्ग की लगभग 19000 पद सवर्णों को दे देनाइलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल और डबल बेंच का निर्णय आरक्षित वर्ग के पक्ष में आने के बावजूद प्रदेश की सवर्ण मानसिकता की सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई और भर्ती के पांच साल बाद भी यह मुकदमा सवर्ण वर्चस्व सुप्रीम कोर्ट में जानबूझकर एक अरसे से लंबित पड़ी है........आदि)देश में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर काम न होने से वैश्विक स्तर पर तकनीक के मामले में पिछड़ने की वजह से अधोमानक (सब स्टैण्डर्ड) उत्पाद होने की वजह से विदेशों में भारतीय उत्पादों की डिमांड कम होने से निर्यात की मात्रा कम और आयात अधिक होने से विदेशी मुद्रा के संदर्भ में भारतीय मुद्रा रुपये का लगातार नीचे लुढ़कना अर्थात् विदेशी विनिमय दर में भारी गिरावट,लोकतांत्रिक मूल्यों और मानदंडों पर वैश्विक स्तर पर गिरावटपांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का दावा करने के बावजूद अस्सी करोड़ जनता का पांच किलो राशन के लिए सुबह से लेकर शाम तक लाइन में खड़े होना,विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दावा करने वाले देश की प्रति व्यक्ति आय और हैपीनेस इंडेक्स की सूची में भारत का स्थान और सड़कों पर भीख मांगती जनताशैक्षणिक संस्थाओं में न तो शिक्षक हैं और न ही छात्र फिर भी विश्वगुरु बनने का दावा,किसानों की फसल के लिए डॉ.एमएस स्वामीनाथन कमीशन की एक सिफारिश "फसल की एमएसपी " तक लागू न कर पाना,मर्जर के नाम पर सरकारी स्कूलों की संख्या कम करना और बंद कर देना और निजी शिक्षण संस्थाओं को बढ़ावा देना जिससे देश के गांव में रहने वाले किसानपंद्रह सालों से पढ़ा रहे शिक्षकों के टीईटी पास करना अनिवार्य करने से शिक्षकों में एक अनावश्यक बेचैनी पैदा करना,कृषि मजदूर और साधारण मजदूर जो स्थानीय रोजगार उपलब्ध न होने की वजह से रोजी- रोटी के लिए अपने गृह राज्य के शहरों और अन्य राज्यों में प्रवासी मजदूरों के बच्चों से दूर होती शिक्षा...... संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लंघन आदि ऐसे सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षणिक और आर्थिक महत्वपूर्ण ज्वलंत मुद्दे हैं जिन पर जनता के जागरूक वर्ग के लोगों की नाराज़गी से बीजेपी को चुनावी राजनीति का नुकसान और विपक्ष को लाभ किस हद तक हो सकता है,यह तो आने वाले समय में ही पता चल पाएगाक्योंकि पिछले लगभग 12सालों में आरएसएस और बीजेपी संवैधानिक लोकतंत्र की कसौटी पर खरी उतरती नज़र नहीं आई हैजैसा कि लोकसभा चुनाव में ओबीसी और एससी-एसटी की नाराज़गी की वजह का खामियाजा भुगतना पड़ा। वहां संविधान के बजाय मनुस्मृति की जातीय ऊंच- नीच पर आधारित सामाजिक व्यवस्था के सिद्धांतोंनियमों और परंपराओं को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है,जो भारतीय संविधान के प्रावधानों के ठीक विपरीत हैं। संविधान के जो अनुच्छेद 340,341और 342 जो समाज के पिछड़े वर्गों के विशेष कल्याण और उत्थान के बनाए गए हैं,उनका बीजेपी सरकार में सही दिशा में क्रियान्वयन की विश्वसनीयता की उम्मीद करना मुश्किल लग रहा है। आरएसएस और बीजेपी के एजेंडे में संविधान में परिभाषित और वर्णित ओबीसी और एससी-एसटी के सामाजिक,राजनीतिकशैक्षणिक और आर्थिक सरोकार नहीं दिख रहे हैं। वो संविधान समीक्षा के बहाने संविधान के समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष चरित्र को नष्ट करना चाहते हैं,या यूं कहा जा सकता है कि वो संविधान को बदल कर उसमें मनुस्मृति जैसे प्रावधान शामिल करना चाहते हैं। आरएसएस और हिन्दू महासभा का स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संविधान और राष्ट्रीय तिरंगे की रचना तक जो चरित्र उभर कर सामने आया है,उससे उनकी देश भक्ति और आम जनता के प्रति उनकी भावना से उनके असली चरित्र का सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

 

 

 

 

 


यूपी की एसआईआर में मतदाताओं की घटी संख्या पर योगी आदित्यनाथ के आए चिंतायुक्त बयान और पंकज चौधरी की ताजपोशी की भावी राजनीति के संभावित निहितार्थ: प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

     

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.

     उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष के स्वागत समारोह में मुख्यमंत्री जी ने जनवरी 2025 के मुकाबले लगभग चार करोड़ मतदाता कम हो जाने पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इन  मतदाताओं का लगभग 80-90% वोट बीजेपी यानि कि हमारा वोट है। इन चार करोड़ मतदाताओं का गहनता पूर्वक जांच कर उनके एसआईआर से संबंधित प्रपत्र तैयार कर उन्हें जमा कराने के यथा संभव और शीघ्र प्रयास किए जाएं जिससे हमारा कोई मतदाता अपने मताधिकार से अर्थात लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागिता करने से वंचित न हो सके। भारी संख्या में घटे मतदाताओं को लेकर मुख्यमंत्री एक बड़े संभावित राजनीतिक घटनाक्रम या साजिश के मद्देनजर अपनी भावी राजनीति को भी लेकर चिंतित दिखाई देते हैं,ऐसा लोगों का मानना है। वह यूपी में घटे या कटे वोटों को बिहार की तर्ज़ पर बीजेपी द्वारा कथित वोट चोरी के रूप में नहीं देख रहे हैं,बल्कि उसके उलट अपनी भावी राजनीति के लिए आंशका और संशय भरी नज़रों से देख रहे हैं। वह वोटों की घटी संख्या को कथित वोट चोरी को बीजेपी की चुनावी रणनीति और राजनीति के पक्ष में नहीं देख रहे हैं,बल्कि वह ठीक उसके उलट इस कथित वोट चोरी/वोटों की संख्या में आई भारी कमी को लेकर बेहद गंभीर और राजनीतिक रूप से चिंतित दिखाई दे रहे हैं,जबकि बीजेपी और उसके आनुषंगिक संगठनों की ओर से भारी संख्या में घटे वोटों पर को बयान तक नहीं आया हुआ सुना या दिखाई दिया है। योगी आदित्य नाथ के बयान से ऐसा लगता है कि वोट की भारी कमी की समस्या उनकी खुद की है। वह इसे अपनी भावी राजनीति से संबद्ध कर देख रहे हैं। योगी के इस बयान के बड़े मायने हो सकते हैं,ऐसा विश्लेषकों का आकलन है।

        राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पंकज चौधरी योगी की पसंद नहीं हैं। इसीलिए गोरखपुर पावर पॉइंट से प्रदेश अध्यक्ष बनाना योगी की स्थानीय राजनीति में एक बड़ा हस्तक्षेप माना जा रहा है। भौगोलिक क्षेत्र की विविधता(डायवर्सिटी) को ध्यान में रखते हुए वहां से संगठन और सरकार में लोगों की सहभागिता,चुनावी राजनीतिक सफलता के विस्तार और पकड़ के हिसाब से उचित मानी जाती है,पंकज चौधरी की नियुक्ति इस व्यावहारिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं दिख रही है। एक ही क्षेत्र में दो पावर पॉइंट बनने से....।

        सामाजिक-राजनीतिक समीकरण साधने के फार्मूले से कुर्मी समाज से प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बीजेपी की रणनीति तो साफ दिखाई देती है। संभवतः अध्यक्ष पद के लिए योगी की पसंद पूर्व अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह थे जो उनके बेहद निकट,विश्वासपात्र और आज्ञाकारी माने जाते हैं,लेकिन गुजरात लॉबी कुर्मी समाज से ऐसे व्यक्ति को लाना चाहती थी जो सामाजिक और बीजेपी की आंतरिक राजनीतिदोनों को साध सके। माना जा रहा है कि शाह और मोदी की उसी राजनीतिक स्ट्रैटजी के टूल के रूप में बनाए गए और विकसित किए जाने वाले सामाजिक और राजनीतिक ब्रांड उत्पाद के रूप में देखे जा रहे हैं,पंकज चौधरी।

          नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष श्री पंकज चौधरी की नियुक्ति पर राजनीतिक विश्लेषकोंपत्रकारोंबुद्धिजीवी और जातीय संगठनों के गलियारों में तरह- तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म नज़र आ रहा है। कुछ का मानना है कि पंकज चौधरी की नियुक्ति योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने या दरकिनार करने की दिशा में अमित शाह और मोदी जी का संयुक्त रूप से उठाया गया एक दूरगामी शांत कदम है जिसकी आहट भविष्य में सुनी जा सकती है,अर्थात पंकज चौधरी की नियुक्ति,योगी आदित्यनाथ की भविष्य में उभरने वाली राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। विगत कई चुनावों से योगी आदित्यनाथ को आरएसएस के हिंदू एजेंडे के लिए सर्वोत्तम और सर्वाधिक प्रभावी कैंडिडेट के तौर पर माना जा रहा है और आरएसएस के हिसाब से वो सबसे उपयुक्त हैं। इसलिए गुजरात लॉबी द्वारा पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना आरएसएस के बेवजह बढ़ते दखल और दबाव तथा योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व की राजनीति के बढ़ते कद और आरएसएस की भावी रणनीति की काट करने और धीमी गति से विफल करने की दिशा और प्रक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।

         पंकज चौधरी की नियुक्ति को 2027 विधानसभा चुनाव में कुर्मी जाति के वोट साधने की कवायद की दिशा में भी देखा जा रहा है। 2024 में संपन्न लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से सात कुर्मी सांसदों का चुना जाना बीजेपी के शीर्ष रणनीतिकारों के लिए 2029 में बीजेपी के पूर्ण या दो तिहाई बहुमत के लिए लगातार बेचैनी पैदाकर रहा है। इस बहुमत को हासिल करना इसलिए ज़रूरी है,क्योंकि बिहार में नीतीश कुमार के जेडीयू और आंध्र प्रदेश में चन्द्र बाबू नायडू की राजनीतिक बैसाखी की वजह से कुछ अशुभ होने की आशंका की वजह से बीजेपी अपने एजेंडे पर अपनी पूरी गति से काम नहीं कर पा रही है। शाह और मोदी देश की वर्तमान संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अदृश्य तानाशाही के रूप को विधिक रूप से बदलना चाहते हैं। बुद्धिजीवियों का आकलन है कि मोदी और शाह की सत्ता का चरित्र इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी और जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर से काफी हद तक मेल खाता दिखता है।

       बिहार विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के स्ट्राइक रेट से बीजेपी आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही है और इसी रणनीति से वह पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में सफलता करना चाहती है। चुनावी विश्लेषण और चर्चा में यह बात उभर कर आ रही है कि बीजेपी अपने मकसद में सफल हो सकती है। इसलिए पंकज चौधरी का अध्यक्ष बनाना यूपी के आगामी विधान सभा चुनाव की राजनीति में कुर्मी कार्ड के रूप में एक तुरुप का इक्का की तरह जीत के लिए अकाट्य और मजबूती की दिशा में भी देखा जा रहा है और चर्चा यहां तक है कि अमित शाह और मोदी द्वारा "एक तीर से दो शिकार" की कहावत को चरितार्थ करते हुए पंकज चौधरी को यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री का फेस तक घोषित किया जा सकता है। ऐसा करने से यूपी के कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लाने की रणनीति काफी हद तक सफल भी हो सकती है और लोक सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी में गए कुर्मी समाज के आकर्षण को बढ़ने से रोके जाने में काफी राहत मिल सकने की संभावना जताई जा रही है,अर्थात् कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लुभाने में महत्वपूर्ण फैक्टर साबित हो सकता है।

         कुर्मी समाज की राजनीतिक फलक पर पहचान कराने और स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और अपना दल के संस्थापक डॉ.सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (एस) विगत कई चुनावों में बीजेपी के एनडीए गठबंधन में शामिल होकर चुनावी राजनीति का एक अभिन्न और मजबूत हिस्सा बना हुआ है और राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में उसकी भागीदारी भी है। चुनाव में सीट शेयरिंग के मामले में बीजेपी नेतृत्व एनडीए गठबंधन के सहयोगी दल विशेषकर जाति आधारित पार्टियां चुनाव के समय अपनी-अपनी जाति की संख्या की दुहाई देकर बड़ी हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाती रही हैं जिसमें सामाजिक और राजनीतिक रूप से मजबूत माने जाने वाला अपना दल (एस) बड़ी भूमिका का दावा करता रहा है। सुभासपा के  ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के संजय निषाद चुनाव के वक्त गिरगिट और बरसती मेढक की तरह रंग बदलकर किसी पार्टी के नेतृत्व के बारे में अगड़म बगड़म बोलने में कोई संकोच नहीं करते हैं और इन लोगों के बारे में लोगों का मानना है कि सत्ता की मलाई के लिए ये नेता चुनाव से पहले और बाद में किसी भी संभावित सत्ताधारी दल की गोद में बैठ सकते हैं। कुर्मी जाति से आने वाले पंकज चौधरी की नियुक्ति ऐसे दलों से उपजने वाले सामाजिक और राजनीतिक दबाव को कम करने की संभावना के रूप में देखी जा रही है।

         भविष्य में यदि पंकज चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की बीजेपी/मोदी-शाह की संभावित रणनीति सफल साबित होती है तो फिर एक सजातीय राजनीतिक दल का दबाव कम होना बहुत स्वाभाविक हो सकता है,क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में एक कुर्मी नेता की घोषणा मात्र से कुर्मी समाज में एक अभूतपूर्व सामाजिक - राजनीतिक चेतना और जोश का संचार होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए संभव है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल की ओर से ऐसा होने की कोई संभावना तक नहीं दिखाई दी है। लोगों का अनुमान है कि यदि बीजेपी की ओर से ऐसा किया जाता है तो यूपी में कुर्मी समाज अपने राजनीतिक विस्तारसम्मान और समृद्धि की प्रबल संभावना को देखते हुए बीजेपी के साथ भारी संख्या में जाने से रोकना संभव नहीं होगा और ऐसी स्थिति में बीजेपी के एनडीए गठबंधन में अपना दल को सम्मान जनक और महत्वपूर्ण सहभागिता मिलती है तो यह राजनीतिक परिस्थिति "सोने में सुहागा" होने जैसी हो सकती है। पंकज चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना और एनडीए में अपना दल (एस) को पर्याप्त भागीदारी मिलने पर कुर्मी बिरादरी भारी संख्या में एनडीए गठबंधन के साथ जाना स्वाभाविक लगता है,लेकिन कुर्मी समाज का शिक्षित और जागरूक वर्ग जिसकी संख्या लगभग नगण्य लगती है,संवैधानिक सामाजिक न्याय के आरक्षण और संविधान की रक्षा के लिए बीजेपी के खिलाफ और विपक्ष के साथ जाने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ने वाला है।

        बीएसपी की राजनीतिक सक्रियता के निम्न तापमान और गठबन्धन की राजनीति से दूरी अर्थात् बीजेपी की "बी" टीम होने वाला बीएसपी पर लगता कथित आरोप बीजेपी की चुनावी राजनीति में सफलता में सहूलियत देता नजर आता है। उधर असुदुद्दीन ओवैसी की एआईआईएमआई और तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बंगाल में अचानक बाबरी मस्जिद निर्माण और एक अलग राजनीतिक दल बनाने की घोषणा और ओवैसी के साथ पश्चिम बंगाल में मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना जताने और उसी दौरान पश्चिम बंगाल में धीरेन्द्र शास्त्री के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए निकाली जा रही यात्रा बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति को और मज़बूत करती हुई दिखाई देती है। राजनीतिक विचारकों का मानना है कि ये सब उपक्रम और उपकरण बीजेपी के लिए मुफीद साबित होते दिखाई दे रहे हैं।

 

 

 


Friday, September 12, 2025

शेर का परिवार-अखिलेश कुमार अरुण


  व्यंग्य  

(दिनांक ११ सितम्बर २०२५ को मध्यप्रदेश से प्रकाशित इंदौर समाचार पत्र पृष्ठ संख्या-१०)

अखिलेश कुमार 'अरुण' 
ग्राम- हज़रतपुर जिला-लखीमपुर खीरी 
मोबाईल-8127698147


घर के बाहर बैठे कादिर मियां से हमारी नजर क्या मिली सलाम अलैकुम के साथ बात ही बातों में चर्चा-ए-आवाम होने लगी। बोले, भई क्या कहें? देश की हालत उस दुल्हन जैसी हो गई है जो सुहागरात की एक रात  नेता आकर घूंघट उठाई का रस्म अदा कर उसकी अस्मिता से खेलता है और फिर उसकी हाल पर छोड़कर कहीं खो जाता है, अब उसे न विधवा की जिन्दगी मयस्सर होती है और नहीं सधवा की! उस पर भसुरों-देवरो की ठट्ठेबाजी अलग।

भसुरों-देवरों! कुछ समझा नही।

अरे! भईया भसुर माने जेठ (अमेरिका), देवर (चीन-जापान) का समझे?

ओ! बात तो सही है। कितना सटीक बात कह गये मानसपटल पर दर्ज हो गई है, सच ही तो है  देश की अस्मिता ही तो एक के बाद एक लूटी जा रही है। उसके बच्चे (जनता) इस आस में है कि कोई फ़रिश्ता ऐसा तो होगा या आयेगा जो देश की हालत और जनता के दर्द को कम करेगा।

कहां खो गये मिंया?

कहीं नहीं, एक गहरी सांस अदंर खींचते हुये थोड़ी देर रुककर, मन को तसल्ली देते हुये बोला, और कर ही क्या सकते हैं?

पूरे दार्शनिक होते हुये एक गम्भीर मुद्रा अख्तियार कर कहने लगे, करने को तो जनता, बहुत कुछ कर ले बरखुर्दार किन्तु एकजाई नहीं हैं, जनता हिरनों का झुण्ड जो ठहरी, उसे मालूम है कि अगले दिन शेर का निवाला हमारे ही बीच से कोई और बनेगा? बस ऐसे ही चलता रहेगा। हम घास-फूंस खाकर शरीर में ऊर्जा, अपने लिये नहीं शेर के परिवार और उसके सगे-सम्बन्धियों के लिये संचित करते हैं और यह बदस्तूर चलता रहेगा।


Friday, July 18, 2025

संविधान बनाम सनातन" की दुबारा जंग छिड़ने की आशंका-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)


नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.
आगामी बिहार,पश्चिम बंगाल और 2027 के शुरुआत में होने वाले विधान सभा चुनावों में विपक्षी दलों का जातिगत जनगणना, आरक्षण और संविधान एक बड़ा और कारगर मुद्दा न बन सके और उसकी चुनावी राजनीति और रणनीति 
को विफल करने की योजना या साजिश में बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस और उसके कथित धार्मिक,सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आनुषंगिक संगठनों ने वैचारिक स्तर पर अभी से काम करना शुरू कर दिया है। लोक सभा में वक़्फ़ बोर्ड संशोधन बिल पेश होने के कुछेक घण्टों पहले आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने काशी के ज्ञानवापी  और मथुरा में श्रीकृष्ण की जन्मभूमि से जुड़े आंदोलनों अभियानों और कार्यक्रमों में आरएसएस के स्वयंसेवकों की सक्रिय सहभागिता के बारे में जो कहा है,उसके गहन राजनीतिक निहितार्थ निकालने और समझने की जरूरत है।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और उसके दिव्य-भव्य उद्घाटन की सफलता के बाद ऐसा लग रहा था कि आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठन अब संतुष्ट हो चुके हैं और अनुमान लगाया जा रहा था कि उन्होंने काशी और मथुरा जैसे धार्मिक-राजनीतिक विषय त्याग दिए हैं, लेकिन दत्तात्रेय के उद्बोधन से यह साबित हो गया है कि उनके राजनीतिक एजेंडों 
में ये दोनों विषय महत्वपूर्ण हैं। कन्नड़ की एक पत्रिका में दिए गए साक्षात्कार में दत्तात्रेय ने बताया है कि 1984 में विश्व हिंदू परिषद और साधु संतों ने तीन (अयोध्या, काशी और मथुरा) मंदिरों की बात कही थी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हमारे स्वयं सेवक काशी और मथुरा के मंदिरों के लिए कार्य करना चाहते हैं, तो वो उन्हें रोकेंगे नहीं। उनके इस वक्तव्य से साफ है कि इन दो हिन्दू धार्मिक स्थलों से जुड़े विवाद और आंदोलनों को शुरू करने के लिए एक नई ऊर्जा और धार देने की कार्य योजना संगठन स्तर पर बन चुकी है। समय आने पर उसे मूर्त रूप दिया जाएगा.

उत्तर प्रदेश स्थित हिंदुओं के दो पवित्र धार्मिक स्थल काशी और मथुरा भौगोलिक रूप से बिहार,पश्चिम बंगाल और यूपी से काफी नजदीक हैं। सन्निकट चुनावों में विपक्षी दलों द्वारा बिहार और यूपी में जातिगत जनगणना, उसके अनुरूप सामाजिक न्याय अर्थात् आरक्षण की विस्तारवादी राजनीति और संविधान बचाओ जैसे बड़े सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे बनने के डर से आरएसएस और बीजेपी अंदरूनी रूप से उसकी धार्मिक काट निकालने में जुटी हुई है, क्योंकि देश में जब जब सामाजिक न्याय या आरक्षण का सामाजिक मुद्दा उठता हुआ दिखाई दिया है तब तब आरएसएस, बीजेपी और उनके आनुषंगिक संगठन धर्म की ध्वजा लेकर निकलते हुए दिखाई दिए हैं।1990 में वीपी सिंह सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% आरक्षण की घोषणा होते ही ओबीसी का ध्यान भटकाने के लिए लालकृष्ण आडवाणी द्वारा राम मंदिर के लिए सारनाथ से यात्रा शुरू करना इसका एक उदाहरण है। आरएसएस और बीजेपी के लोग देश के बहुजन समाज(एससी-एसटी और ओबीसी) की राजनीतिक गोलबंदी के लिए हमेशा धर्म का सहारा लेने की हर संभव प्रयास करते रहे हैं। धार्मिक आधार पर सामाजिक गोलबंदी से सर्वाधिक फायदा किस दल को मिलता है,यह बताने की जरूरत नहीं है।

संघ प्रमुख मोहन भागवत मंदिरों और मस्जिदों को मुद्दे बनाने की सोच को लेकर हमेशा यह कहते हुए दिखाई दिए हैं कि इससे सामाजिक ताने बाने को नुकसान पहुंचता है,वह ऐसा कहकर संतुलन साधते हुए नज़र आते हैं। फिलहाल,आरएसएस के दत्तात्रेय ने इन दो मुद्दों पर वक्तव्य देकर धार्मिक राजनीति को नई ऊर्जा देने के साथ नई हवा देने का कार्य किया है और विपक्षी दलों के सामने एक बड़ी राजनीतिक चुनौती पैदा करने जैसा काम किया है। अयोध्या की अपार राजनीतिक और रणनीतिक सफलता ने हिंदुत्व की राजनीति की नींव तो पहले से ही मजबूत कर दी है। देश के बौध्दिक और राजनीतिक गलियारों में आरएसएस के दत्तात्रेय के वक्तव्य का गंभीरतापूर्वक आंकलन और विश्लेषण किया जा रहा है और निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि यदि आरएसएस और बीजेपी काशी और मथुरा के मुद्दों पर राजनीति करने पर अपने स्वयं सेवकों को उतारती है तो देश में एक बार फिर सामाजिक और राजनीतिक रूप से उथल-पुथल और अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है। स्वयं सेवकों और जनसाधारण की धार्मिक भावनाएं जब उबाल पर होती हैं तो फिर उनको अनुशासित करना मुश्किल हो जाता है। 2047 तक देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने का जो संकल्प बीजेपी ने लिया है, देश के बेरोजगार युवाओं के लिए देश मे औद्योगिक  संरचना के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी और कोई भी देश या पूंजीपति ऐसे माहौल में अपनी पूंजी को सुरक्षित न समझकर,भारत में निवेश करने के बारे में विचार और साहस नहीं करेगा और फिर भारत का विकसित राष्ट्र बनाने का सपना कैसे पूरा होता नज़र आएगा? 

Wednesday, July 09, 2025

बहुजन समाज का संविधान बनाम सनातन-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

 
~~सूक्ष्म विश्लेषणात्मक अध्ययन~~ 

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.
       पिछड़े वर्ग के लोगों ने यदि विगत 75 वर्षों में संविधान का अनुच्छेद 340 पढ़कर उसे अच्छी तरह समझ लिया होता और सरकार द्वारा इस अनुच्छेद को समझाया गया होता तो वे आज मस्ज़िद के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने का काम कदापि न करते और न ही अपनी शिक्षा और रोजगार छोड़कर कांवड़ या अन्य किसी धार्मिक यात्रा में शामिल होते,बल्कि वे अपने आरक्षण (सरकारी शिक्षा - नौकरियों और राजनीति) जैसे संवैधानिक अधिकारों के बारे में जागरूक होकर उन्हें हासिल करने और देश की राज व्यवस्था में अपना यथोचित हिस्सा लेने के लिए लड़ रहे होते! हनुमान चालीसा का पाठ राम भक्त हनुमान जी की स्तुति या भक्ति में किया जाता है। मस्जिद के सामने हनुमान चालीसा पढ़ने या पढ़वाने का निहितार्थ या औचित्य क्या है,इसे गंभीरता से समझने की जरूरत है! पिछले कुछ सालों में सत्ता और समाज के एक वर्ग विशेष और कथित सांस्कृतिक संगठन से उपजी एक राजनीतिक पार्टी द्वारा हिंदुत्व की राजनीति के उद्देश्य से ओबीसी को संविधान के अनुच्छेद 370 के बारे में खूब बताया और समझाया गया और यदाकदा विशेषकर चुनावी मौसम में आज भी उसकी जानबूझकर खूब चर्चा की जाती है। संविधान का अनुच्छेद 370 अनुच्छेद 340 के बाद आता है, लेकिन ओबीसी को कभी अनुच्छेद 340 के बारे में न तो बताया गया और न ही उसमें निहित उद्देश्यों को समझाया गया और न ही आज के दौर में भी सत्ता द्वारा ओबीसी के सामाजिक और शैक्षणिक उन्नयन के लिए बनाये गए अनुच्छेद 340 की राजनीतिक मंचों पर न तो बात होती है और न ही उसकी विस्तृत व्याख्या या विश्लेषण होता है। यदि विगत और वर्तमान सरकार द्वारा ओबीसी को  अनुच्छेद 340 की विस्तृत जानकारी दी गई होती तो उसे काका कालेलकर - मंडल आयोग और उनके द्वारा ओबीसी के उन्नयन हेतु सरकार को दी गई सिफारिशों के बारे में भी जानकारी हो जाती! न तो सरकार द्वारा और न ही सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा ओबीसी के आम आदमी को इन सभी विषयों के बारे में न तो बताया गया और न ही समझाया गया जिसकी वजह से दलित और वंचित समाज के लोग अपने अधिकारों को छोड़,धार्मिक मुद्दों से उबर नहीं पाए। वे संविधान के बजाय सनातन या धर्म को महत्व देते रहे और समाज का एक वर्ग विशेष उनका आरक्षण का हक खाकर देश की व्यवस्था में 80% पर आज भी काबिज़ हैं और धर्म के नाम पर उपजे और ओबीसी के बलबूते फलते- फूलते धंधे से सभी तरह के सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक लाभ ले रहा है। ओबीसी के लोग धर्म की अफ़ीम चाटते रहे और...........।
          1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा ओबीसी के सामाजिक और शैक्षणिक उत्थान के लिए बने मंडल आयोग की सिफारिशों में से केवल एक सिफारिश (सरकारी नौकरियों में ओबीसी को 27% आरक्षण) लागू करने की घोषणा होते ही उसके खिलाफ देश की सड़कों पर एक खास वर्ग की अराजकता देखने को मिली और ओबीसी अपने आरक्षण के अधिकारों के लिए सड़कों पर न उतरें,हिंदुत्व और धर्म की राजनीति को धार देने के उद्देश्य से राम मंदिर के नाम पर प्रायोजित ढंग से गुजरात से रथ यात्रा निकाली गई जिससे ओबीसी अपने संवैधानिक अधिकारों को छोड़कर धर्म की ध्वजा उठाने में लग गई। इसी मुद्दे पर बीजेपी ने सरकार से अपना समर्थन वापस लेकर वीपी सिंह की सरकार गिरा दी थी। इसी बीच घोषित आरक्षण की संवैधानिक वैधता का मामला सुप्रीम कार्ट चला गया। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा घोषित 27% आरक्षण को वैध तो ठहराया ,लेकिन मनुवादी सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस निर्णय आदेश में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय कर दी और साथ में ओबीसी अभ्यार्थियों के लिए एक क्रीमी लेयर की एक आय सीमा तय कर दी जिसमें आने वाले ओबीसी अभ्यार्थियों को आरक्षण की परिधि से बाहर करने की साजिश रच दी, जबकि आरक्षण की वैधता संबंधी याचिका में इन बिंदुओं का कहीं जिक्र तक नहीं किया गया था। यदि यह 27% आरक्षण कुछ वर्षों तक लागू होने के बाद इस आरक्षण से जो क्रीमी लेयर वाला वर्ग तैयार हो होता,उस पर आय सीमा लगाते तो उचित कहा जा सकता था, लेकिन अभी आरक्षण लागू भी नहीं हो पाया,मनुवादियों ने अपनी बारीक बुद्धि लगाकर क्रीमी लेयर की सीमा तय कर ओबीसी को आरक्षण से पहले ही बाहर कर दिया,यह एक सोची समझी साजिश का हिस्सा था जिसे ओबीसी का सामाजिक राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग इसके निहितार्थ नहीं समझ पाया। जैसे ही ओबीसी शिक्षा में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करने की स्थिति में आया तो एनएफएस नाम की अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर सभी आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को " नॉट फाउंड सूटेबल " घोषित कर ओबीसी और एससी-एसटी के मेरिटोरियस अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया से बाहर करना शुरू कर दिया।
        शिक्षा में बढ़ती जागरूकता और भागीदारी के परिणामस्वरूप आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस अभ्यर्थियों के ओवरलैपिंग अर्थात अनारक्षित वर्ग में जगह हासिल करने से खीजकर उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में 69000 शिक्षक भर्ती में ओबीसी और एससी के लगभग 20000 अभ्यर्थियों की आरक्षण से मिलने वाली नौकरी छीनकर उनकी जगह सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को शिक्षक बना दिया गया जो विगत पांच वर्षों से अच्छी खासी तनख्वाह लेकर खुशहाल जीवन जी रहे हैं और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को ज़लालत की जिंदगी जीने के लिए यूपी सरकार द्वारा मजबूर कर दिया गया है। राष्टीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश और हाई कोर्ट (सिंगल और डबल बेंच) के निर्णय के बावजूद बीजेपी की यूपी सरकार ने उक्त भर्ती की संशोधित सूची जारी नहीं की गई जिसके फलस्वरूप सरकार ने सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को सुप्रीम कोर्ट जाने का एक खुला अवसर दे दिया और आज की तारीख़ में यह मामला मनुवादी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो गया है। आरक्षित वर्ग की नौकरियां छीनकर सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी शिक्षक बनकर हर महीने लगभग 60000रुपए वेतन लेकर एक खुशहाल जीवन जी रहे हैं और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
       ओबीसी और एससी-एसटी जनप्रतिनिधियों की विधानसभा और लोकसभा में पर्याप्त संख्या होने और सामाजिक न्याय के नाम पर बनी जातिगत पार्टियां जैसे ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा, अनुप्रिया पटेल (कुर्मियों) का अपना दल(एस) और डॉ. संजय निषाद की  निषाद पार्टी के सरकार में शामिल होने के बावजूद आरक्षित वर्गों के खुलेआम छीने जा रहे आरक्षण पर विधानसभा और लोकसभा में किसी जनप्रतिनिधि की जुबान तक नहीं खुलती सुनाई दी और यदि सुनाई भी दी तो "जितनी चाबी भरी राम ने, उतना चले खिलौना " जैसी स्थिति नजर आती दिखी। आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों द्वारा किए गए धरना-प्रदर्शन स्थल पर जाने और सहानुभूति जताने तक की हिम्मत किसी ओबीसी और एससी-एसटी के किसी जनप्रतिनिधि में नहीं दिखाई दी। वर्तमान में आजाद समाज पार्टी के नगीना लोक सभा सांसद चंद्रशेखर आजाद की धरना- प्रदर्शन स्थल पर उपस्थिति जरूर देखने को मिली थी।

Friday, July 04, 2025

युवा पीढ़ी की किताबों से बढ़ती दूरी और डिजिटल स्क्रीन की बढ़ती लत एक भयानक दौर-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.
          कोरोना वायरस से उपजी आपात स्थिति से निपटने के लिए ऑनलाइन पढ़ने-पढ़ाने और डिजिटल बुक्स को क्लास रूम पढ़ाई के एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में विकसित किया गया था, लेकिन अब उसने बहुत तेजी से अपने पैर पसारते हुए बहुत बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। आज हर जगह इंटरनेट की सुलभता के कारण विद्यार्थियों एवं पाठकों की डिजिटल किताबों तक पहुंच बहुत तेज़ी से बढ़ी है। दरअसल, छपी हुई किताबों की तुलना में इनकी कीमत बहुत सस्ती पड़ रही है। साहित्यकारों,शिक्षाविदों एवं मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि छपी पुस्तकों में कई तथ्य ऐसे पाए जाते हैं जो उन्हें  डिजिटल बुक्स से बेहतर साबित करती है।
         एक तथ्य है कि दिमागी स्वस्थता के लिए छपी किताबें पढ़ना बहुत जरूरी है। रचनात्मकता, एकाग्रता और स्मरण शक्ति (याददाश्त) जैसे गुण विकसित और समृद्ध करने में छपी हुई किताबों की बेहतर भूमिका मानी जाती है। स्मरण शक्ति एक मानसिक क्षमता है जिसके ज़रिए हम अपने अनुभवों को संग्रहीत करते हैं.ई-बुक्स पढ़ने से वह अनुभूति नहीं हो सकती है जो हाथ में किताब लेकर पढ़ने से होती है। इंटरनेट की बढ़ती खुमारी की वजह से अब पहले जैसी लाइब्रेरी विलुप्त होती जा रही हैं। तेजी से पैर पसारते व्यावसायिक रूप लेती शिक्षा व्यवस्था में पुस्तकों के बढ़ते बोझ, ट्यूशन कोचिंग और प्रतिस्पर्धा के बढ़ते दबाव की वजह से छात्रों के पास पाठ्यक्रम के अलावा समाज,साहित्य,अर्थव्यवस्था,राजव्यवस्था, राजधर्म, नैतिक शिक्षा जैसे विषयों की पुस्तकें पढ़ने के लिए वक्त नहीं बचता है। बढ़ती प्रतिद्वंदिता और माता-पिता की आकांक्षाओं और इच्छाओं के अनाबश्यक दबाव ने बच्चों को पहले से कई गुना ज्यादा व्यस्त रहने के लिए मजबूर कर दिया है। रही-सही कसर स्मार्टफोन और इंटरनेट की दुनिया ने कर दी है जिससे आज के साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दौर में वैसी एकाग्रता,रचनात्मकता और कल्पनाशीलता नहीं पनप पा रही है जो छपी पुस्तकों से उपजती और पनपती है। 
          छपी हुई पुस्तकों से वर्तमान पीढ़ी की लगातार बढ़ती दूरी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है, बल्कि यह कहें कि वह एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। आज की युवा पीढ़ी पढ़ने के बजाय मनोरंजक रील्स और वीडियो देखना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। उपभोक्तावादी और भौतिकवादी संस्कृति की बढ़ती तेजी से बदलते सामाजिक-पारिवारिक परिदृश्य की वजह से अब जन्म दिन या किसी अन्य पारिवारिक/सामाजिक उत्सवों पर किताबों की जगह स्मार्टफोन या स्मार्टवाच उपहार देने की एक नई संस्कृति पैदा हो गई है। दो-तीन दशक पहले खाली वक्त में कॉलेज परिसरों और पुस्तकालयों में पुस्तकों के विभिन्न लेखकों एवं पुस्तकों की चर्चा होती थी,वह आज लगभग खत्म सी हो चुकी है। अब वहां इंटरनेट वीडियो और ओटीटी सीरीज की बात होती है। हर बच्चा और युवा अपने स्मार्टफोन पर व्यस्त दिखाई देता है।
         फरवरी माह में हर साल लगने वाले दिल्ली के पुस्तक मेले में अभी भी विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों की भारी मात्रा में उपन्यास,कहानी और किस्सा कहानियों की पुस्तकें देखी और खरीदी जा रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि कितने लोग इन किताबों को पढ़ने में रुचि रखते हैं या पढ़ते हैं। बड़े-बड़े लेखकों और साहित्यकारों की पुस्तकें खरीदने का एक नया फ़ैशन भी तेजी से उभर रहा है,लेकिन ज्यादातर ऐसी पुस्तकें लोगों की निजी लाइब्रेरी या ड्राइंग रूम में सजाकर उनके सामाजिक स्टेटस सिंबल तक सिमटती जा रही हैं। शेक्सपियर की "किताबें इंसान की सुख-दुख में सबसे बेहतर दोस्त" की कहावत की प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है,क्योंकि वे बिना किसी निर्णय या शर्त के साथ संगति, ज्ञान और भागने का साधन प्रदान करती हैं। वे आराम, मनोरंजन और ज्ञान का स्रोत हो सकती हैं, जो हमारे जीवन को अनगिनत तरीकों से समृद्ध करती हैं।यह विचार व्यक्त करता है कि किताबें एक करीबी दोस्त की तरह ही साहचर्य, ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करती हैं। यह भावना व्यापक रूप से साझा की जाती है और अक्सर विभिन्न रूपों में व्यक्त की जाती है, जो हमारे जीवन में पुस्तकों की मूल्यवान भूमिका को उजागर करती है। किताबें आराम और मनोरंजन का स्रोत हो सकती हैं, खासकर अकेलेपन या ऊब के समय में। वे जीवन के विभिन्न पहलुओं में विशाल मात्रा में जानकारी, विभिन्न दृष्टिकोण और अंतर्दृष्टि तक पहुँच प्रदान करते हैं। किताबें हमारी कल्पना और रचनात्मकता को उत्तेजित करती हैं, जिससे हम विभिन्न दुनिया और परिदृश्यों का पता लगा सकते हैं। आज जरूरत है,अपने बच्चों को पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करने की। घर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक एक सामाजिक एवं शैक्षणिक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। बचपन में यदि बच्चों में किताबों से मोह भंग हुआ तो बड़ा होने पर वो पुस्तकों को हाथ भी नहीं लगाना पसंद नहीं करेंगे। 
        देश में आज भी अच्छी-अच्छी पुस्तकों से पुस्तकालय समृद्ध है, जहां विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों और साहित्यिक पुस्तकों का अपार भंडार है। पाठकों से वे आज सूनी पड़ी हुई है और ई-लाइब्रेरी में भीड़ दिखाई देती है। इस स्थिति में सुधार लाने के लिए समाज के सभी जागरूक तबकों और शैक्षणिक संस्थाओं को एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने की जरूरत है। आज साइंस एंड टेक्नोलॉजी के दौर में भी छपी पुस्तकें प्रासंगिक हैं,लेकिन अभिभावकों को अपने बच्चों में पढ़ने की आदत शुरू से ही डालना जरूरी है। स्कूल-कॉलेजों में इस कार्य के लिए एक अतिरिक्त क्लास रखा जा सकता है। युवा पीढ़ी की किताबों से लगातार बढ़ती दूरी हमारे भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता है। नियमित रूप से छपी पुस्तकें पढ़ने से याददाश्त बढ़ती,मजबूत होती है और एकाग्रता भी समृद्ध होती है।
            इंटरनेट पर देखी और पढ़ी गई विषय सामग्री लोग जल्दी भूल जाते हैं, ऐसा मनोवैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का मानना है। इसके विपरीत छपी हुई पुस्तकों से पढ़ी गई सामग्री लंबे समय तक जहन में रहती है। किसी जमाने में इतिहास, भूगोल और साहित्य के बड़े-बड़े अध्याय तक याद कर लिए जाते थे। किताबें छात्रों में आलोचनात्मक और विश्लेषणात्मक रूप से समझने और सोचने की क्षमता पैदा और विकसित करती हैं और इसके साथ-साथ स्थापित रूढ़ियों, परंपराओं, मान्यताओं और धारणाओं पर सवाल करने के लिए एक जिज्ञासा भी पैदा करती हैं और प्रोत्साहित करती हैं। विषय को गहनता और गंभीरता पूर्वक समझने की क्षमता पैदा करती हैं। ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल का वर्ष 1949 में प्रकाशित उपन्यास "1984" (नाइनटीन ऐटी फोर ) कल्पनाशीलता,रचनात्मकता,दूरदर्शिता,आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक सोच पैदा करने की प्रेरणा देने वाला एक बेहतरीन उदाहरण हो सकता है।
         शिक्षाविदों का मानना है कि आज के तनावयुक्त माहौल में छपी पुस्तकें एक बड़ी भूमिका अदा कर सकती हैं। किताबें भावनात्मक बुद्धिमत्ता के साथ सहानुभूति और संवेदनशीलता विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाती है। छपी किताबें पढ़ने से मनुष्य की कल्पनाशीलता और सकारात्मक रचनात्मकता भी बढ़ती है, लेकिन ऐसा डिजिटल सिस्टम में नहीं होता है। मनोवैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं का मानना है कि बेतहाशा डिजिटल प्रभाव की वजह से पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों में संवेदनात्मक और भावनात्मक लगाव में कमी देखी जा रही है। अलग-अलग काल खंडों की पुस्तकें पढ़ने से उस परिवेश की विस्तृत जानकारी मिलती है और उनकी कल्पना शक्ति को प्रोत्साहित करती है। इसका एक अच्छा उदाहरण हैरी पॉटर सीरीज का दिया जा सकता है। इस पुस्तक के दिलचस्प पात्र उनकी जादुई दुनिया के किस्से विस्तार से पढ़कर छात्रों में उड़ान भरने की ललक पैदा कर देते हैं। आज भी दुनिया में इसके करोड़ों लोग दीवाने हैं। ऐसी किताबें पढ़ने से बच्चे सपने देखने के साथ खुद की काल्पनिक दुनिया की रचना करने की दिशा में भी प्रेरित होते हैं। छपी किताबें पढ़ने से बच्चों का शब्द भंडार बढ़ता है और मजबूत होता है। छात्र न केवल नए शब्दों से परिचित होते हैं,बल्कि उनके अनुसार उन्हें रचते भी हैं। छपी किताबों के अध्ययन से बच्चों का ज्ञान समृद्ध होता है। नए शब्द सीखने के लिए किताबों से बेहतर दूसरा कोई विकल्प या तरीका नहीं कहा जा सकता है।
           मनोवैज्ञानिक एवं शोधकर्ताओं का भी मानना है कि रात को बिस्तर पर सोने से पहले किताबें पढ़ना एक अच्छा साधन माना गया है। इससे सकून और शांति भरी नींद आती है और इसके विपरीत देर रात तक इंटरनेट या मोबाइल चलाने वाले लोगों की नींद में खलल पैदा होने की शिकायत आ रही है। मानसिक अवसाद से दूर रखने में किताबें काफी हद तक कारगर साबित हो रही है। मोबाइल की इलेक्ट्रॉनिक किरणों से एक तरीके से विकृति पैदा होने की बात को भी हमारे चिकित्सक,मनोवैज्ञानिक,शिक्षाविद और शोधकर्ता बता रहे हैं और उनका परामर्श है कि इंटरनेट और मोबाइल पर बेतहाशा बढ़ती निर्भरता और लत हमारे देश की युवा पीढ़ी को एक खोखली और अंधकारमय सुरंग की ओर धकेलती जा रही है। समय रहते यदि इस पर सामाजिक और सरकारी स्तर पर संयुक्त रूप से उचित प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में पैदा होने वाले संकटों की बेतहाशा मार की हम कल्पना तक नहीं कर सकते हैं। इस गंभीर समस्या पर समाज के सभी तबकों और सत्ता प्रतिष्ठानों को गहन चिंतन-मनन कर कोई ठोस उपाय ढूंढ कर उसको धरातल पर साकार रूप देना होगा।

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