साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
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Friday, December 10, 2021

भेड़िये शहर के-सुरेश सौरभ

(पटकथा)
शार्ट फिल्म











-ःफिल्म के मुख्य पात्रः-

1-सीओ-रमन सिंह।  

2-सीओ की पत्नी-मीना सिंह।

3-सीओ की बेटी-रीता।

4-गरीब बूढ़े माँ-बाप और बलात्कार से पीड़ित उसकी युवा बेटी।

5-सहयोगी दरोगा राम सिंह व कोतवाली के कुछ अन्य पुलिस कर्मी।

6-मंत्री गौरव पांडे।

 सीन-1

सीओ सिटी अपने घर में आते ही कुर्सी पर पसर गये। उनके सामने उनकी पत्नी मीना सिंह चाय की ट्रे रखते हुए बोलीं-क्या बात है, आज आप बहुत उदास लग रहंे हैं?

सीओ-कुछ नहीं हाँ रीता आई (सामने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखते हुए जो रात के दस बजा रही थी)

पत्नी कप में चाय ढरकाते हुए बोली-नहीं?

सीओ गुस्से में-क्यों-क्यों इतनी देर हो गई,जब,जब रोज आठ बजे तक कोंचिंग पढ़ कर जाती है, तो आज क्यों इत्ती देर हो गयी। वैसे भी शहर के हालात ठीक नहीं है,फिर क्यों इत्ती देर तक टहल रही है।

पत्नी चाय देते हुए-हुंह आप पुलिस वालों के, तो गुस्सा हमेशा नाक पर ही धरा रहता है।

सीओ-मीना तुम कुछ नहीं जानती?

पत्नी-क्या जानँू जब मुझ से कह गई है कि कोेंचिंग के बाद अपनी किसी सहेली की बर्थ डे पार्टी में जायेगी और वापिसी करने में थोड़ी देरी हो जायेगी,तो क्यों खामखा चिन्ता करूं।

(सीओ की आँखों में कोई नमी थी) वह चाय पीते हुए बोले-जवान बेटियों का बाप होना भी अब तो सबसे बड़ा गुनाह लगता है।

पत्नी-आप काहे चिन्ता करते हैं जिस शहर की जिम्मेदारी आप जैसे नेक ईमानदार अफसर के भरोसे हो, वहाँ किसी जवान बेटी के बाप को कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं?

सीओ-यही दिक्कत है मीना कि शहर की जिम्मेदारी हम पुलिस अफसरांे के भरोसे नहीं बल्कि आवारा सांडांे के भरोसे है।

पत्नी-क्या हुआ? जब से आप इस शहर में ट्रान्सफर होकर आये हैं, तब से बहुत उदास रहते हैं। क्या हुआ, आज तो बहुत दुखी लग रहंे हैं? कुछ बताओ तो सही?(पीठ के पीछे कन्धे पर हाथ रखते हुए पत्नी सान्त्वना देते हुए बोली)

सीओ-आज दोपहर की बात है (फिर सीओ खयालों में खो जातें हैं।)

     सीन-2

(एक गरीब बूढ़ी महिला और उसकी युवा बेटी और उसका बाप सीओ के सामने रो-गिड़गिड़ा रहे हैं।)

बुढ़िया-साहब मेहबानी कर के मेरी रिपोर्ट लिख लीजिए। उस हरामखोर ने मेरी बेटी की आबरू लूट ली है, हमें कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं छोड़ा।

बूढ़ा रोते हुए-इतने दिनों से थाना कोतवाली के चक्कर काट रहा हूँ लग रहा, इस शहर में सब पत्थर दिल बसते हैं भेड़िये ही भेड़िया रहते हैं, इसलिए यहाँ कोई किसी की सुनने वाला नहीं।

सीओ-आप लोग तसल्ली रखिए, देखिए हम जांच कर रहे हैं, अरोपियांे को जल्द से जल्द हम पकडं़ेगे।

बलात्कार से पीड़ित लड़की रोते हुए सीओ की ओर गुस्से से देखते हुए कहती है-ये क्यों नहीं कहते सत्ता के भेड़ियो से डर रहे हैं। इसलिए आप को शहर की बेटियों की परवाह नहीं, परवाह सिर्फ आप को अपनी नौकरी की है। अपनी कुर्सी की है।

सीओ गुस्से-ऐ! लड़की ज्यादा दिमाग न खराब कर वर्ना...

लड़की-वर्ना क्या करोगे, क्या करोगे लो लो तुम भी लूट लो, गरीबों को दुनिया लूट रही है, तो तुम क्यों छोड़ो  (वह लड़की सीओ के सामने आकर अपने बदन के उभारो को कर देती है सीओ अपनी पीठ घूमा लड़की की ओर कर देता है। उसके सहयोगी दरोगा और कुछ पुलिस वाले भी शर्म से सिर झुका लेते हैं)  

बुढ़िया रोते हुए-बेटा तेरे भी घर-परिवार में कोई न कोई बेटी होगी। आज मेरे साथ हुआ कल हो न हो तेरे साथ हुआ तो..

रोबदार मूछों वाला सीओ का सहयोगी दरोगा राम सिंह तभी बुढ़िया को डपटता है-चोप चोप! ज्यादा चपड़-चपड़ की तो....(बुढ़िया डर के मारे कांपने लगती है। उसकी बेटी और उसका बूढ़ा पति भी डर से कांपने लगतें हैं)

दरोगा-सालों समझ में नहीं आ रहा, उत्ती देर से साहब समझा रहें पर कुछ समझ ही नहीं पा रहंे हैं। रात भर तुम सब को लॉकअप में बंद रखूंगा? दिमाग ठिकाने आ जायेगा तुम सबका।

तभी सीओ के मोबाइल की घंटी बजती है। वह अपना फोन उठाते हैं। बोले-जी जी सर जय हिन्द सर

उधर से एक मंत्री गौरव पांडे बोलता है-कैस होे सीओ साहब?

सीओ-जी फस क्लास।

मंत्री-देखो वह केस जल्दी से जल्दी खत्म करने की कोशिश करो।अगर मीडिया तक मामला पहुंचा तो रफा-दफा करने में टाइम भी लगेगा और हमारा पैसा भी खामखा जाया होगा।

सीओ इशारे से पीड़िता लड़की, उसके मां-बाप को रामसिंह से बाहर ले जाने को कहता है। राम सिंह घुड़कते हुए उन्हें सीओ के आफिस से निकालते हुए बोला-चलो चलो चलो बाहर

(रामसिंह उन्हें बाहर निकाल कर खुद भी बाहर चला जाता है)

मंत्री-क्या बात है ऑफीसर तुम खामोश क्यों हो?

सीओ-सर उन्हंे अपने ऑफिस से निकलवा रहा था इसलिये वो थोड़ा....

मंत्री-ओह! अब एकान्त में हो।

(सीओ अपने आस-पास खड़े कुछ पुलिस वालांे को भी अपने केबिन से बाहर जाने को इशारे से कहता है।)

सीओ-हाँ हाँ जी सर बोलिए।

मंत्री-तुम्हें मालूम है हर घर-परिवार में जब एक-दो नालायक बच्चे निकल जातें हैं, तो ऐसे बच्चों से कभी-कभी गलतियां भी हो जाया करतीं हैं। इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें हम घर से निकाल दें या उन्हें उनके हाल पर छोड़ दें। फिर हमारी इतनी बड़ी पार्टी का परिवार है। सबको देखना पड़ता है। सब हमारे किसी न किसी काम आतंे हैं।

सीओ-पर सर वह अपनी रिपोर्ट लिखाने के लिए बहुत रो-गिड़गिड़ा रहे हैं। बहुत हाथ-पांव जोड़ रहें हैं।

मंत्री गुस्से में-हुंह तब तुम क्या चाहते हो। अपनी पार्टी की इज्जत दांव पर लगा दूं। अपनी इमेज खराब कर लूं। उन सड़क छाप भिखमंगों के लिए। मेरी बात कान खोल कर सुन लो गौरव पांडे मेरा नाम है किसी तरह से मेरे गौरव की हानि न होने पाए वर्ना तुम जानते हो मैं कितना शरीफ आदमी हूं। किसी भी तरह यह केस खत्म करो। इतना परेशान उस रेप पीडिता और उसके परिवार वालो को करो कि वह रिपोर्ट लिखाना तो दूर पुलिस को ख्वाब में भी कभी देखें तो उनकी रूह फना हो जाये। (इतना कह कर फोन काट दिया।)

सीओ-सर सुनिए सुनिए सर

सीन-3

सीओ अपने खयालों से वापस आये पत्नी से बोले-कुछ समझ में नहीं आता कि अपनी नौकरी बचाऊं या मंत्री के नालायक गलतियां करने वाले बच्चों को बचाऊँ। कुछ समझ में नहीं आता। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूँ..

पत्नी-बस अपना ईमान बचाओ।

सीओ-वही तो सत्ता के बहरूपियों के पास गिरवी पड़ा है।

तभी धड़ाक से दरवाजा खुलता है। सीओ की बेटी रीता बदहवास हक्की-बक्की सी अंदर आती है। उसके चेहरे पर चोट के निशान है। बाल उलझे हैं। कपड़े अस्त-व्यस्त हैं। और जोर-जोर से सांसें खींचते हुए दुखी स्वर में बचा लो मम्मी, बचा लो पापा कहते-कहते अपने मम्मी-पापा की ओर तेजी से बढ़ती है फौरन मम्मी-पापा लपक कर अपने गले से उसेे लगा लेते हैैं।

क्या हुआ क्या हुआ रीता क्या हुआ मेरी बेटी-हैरत और भय से सीओ और उनकी पत्नी बार-बार पूछतें हैं।

बेटी रोते-सिसकते हुए बोली-बडी मुश्किल से उन भेड़ियों से अपनी जान और इज्जत बचा कर भागती हुई आई हूं। 

सीओ साहब का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है और उनके कानों में उस बलात्कार पीड़िता की बुढ़िया मां की फरियाद बजने जगती है।....बेटा तेरे भी घर-परिवार में कोई न कोई बेटी होगी। आज मेरे साथ हुआ, कल हो न हो तेरे साथ हुआ तो..

गुस्से में अपने दांत पीस कर सीओ बोले-अब मेरा कुछ बचे न बचे, पर अपना सम्मान बचाने के लिए, बेटियों को इस शहर के भेड़ियो से बचाने के लिए, कुछ भी करूंगा। कुछ भी करूंगा। चाहे जो हो जाए,चाहे नौकरी रहे या भाड़ मंे जाए।

सुरेश सौरभ
   -ःसमाप्तः-


 
कहानी-पटकथा-संवाद-
(उपन्यासकार-स्तम्भकार-पत्रकार-व्यग्ंयकार एवं शिक्षक, पता-निर्मल नगर लखीमपुर खीरी यूपी मो-7376236066 )

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