आँधियों में पार कर देना मुझे मझधार से।
नाव ने यह बात कर ली है नदी की धार से।।
वह कभी कीमत न समझे जान की पहचान की,
यह मुनाफा खोर चौड़े हो गए व्यापार से।।
भूख जब इन्सान की बर्दाश्त से बाहर हुई,
सर पटक कर मर गया तब आदमी दीवार से।।
मौत का मंजर नजर में, फर्श पर लेटा हुआ ,
वह गुजारिश कर रहा बहरी हुई सरकार से।।
बुझ गई जो झोपड़ी की आग दो सुलगा उसे,
आ गई फिर से खबर उस बेरहम दरबार से।।
काम में अपने बराबर वह खड़ा मुस्तैद है,
बेवजह की अब बहस करिए न चौकीदार से।।
कोन जहरीली कहाँ है कौन सेहत मंद हैं,
आ रही उड़कर हवाएँ यह समंदर पार से।।
नन्दी लाल
गोला गोकर्णनाथ खीरी