साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Tuesday, June 08, 2021

सुरेश सौरभ की "वर्चुअल रैली"-अखिलेश कुमार अरुण

वर्चुअल रैली (पुस्तक समीक्षा)

समीक्षक-अखिलेश कुमार अरुण

पुस्तक का नाम-वर्चुअल रैली

लेखक-सुरेश सौरभ

लेखक का पता-निर्मल नगर लखीमपुर-खीरी

प्रकाशक-इंडिया बुक प्राईवेट लिमिटेड नोएडा दिल्ली

आईएसबीएनः 978-93-86330-77-2

प्रथम संस्करण-2021

मूल्य- 160.00 रुपये

पृष्ठ-104

वर्चुअल रैलीसुरेश सौरभ के द्वारा लिखित लघुकथाओं का एक चर्चित संग्रह है। आप ने लेखन में लगभग 15-20 वर्षों का समय गुजारा है। आप के साहित्यिक अनुभवों और प्रयोगों का सार है यह पुस्तक, आप से हमारा परिचय सर्वप्रथम आप के साहित्य के माध्यम से ही हुआ। इस कोरोना काल में आप की पुस्तक वर्चुअल रैलीहमें प्राप्त हुई। यह पुस्तक पढ़ते समय,हमारी सरसरी निगाह से पढ़ने की आदत में यकायक स्थिरता आती गई। फिर एक-एक रचनाओं को तसल्ली से पढ़ता ही चला गया। ऐसा लगा इसमें संकलित रचनाएँ उन सबकी  हैं ,जो हमारे आस-पास मध्यम और गरीब मजदूर तबका है, जो अपने उदरपूर्ति और परिवार की आवश्यकतों को पूरा करने के लिए दूर देश-प्रदेश जा बसता है। उसके जीवन में कौन-कौन सी समस्याएँ-दुष्वारियाँ आतीं हैं और उसका सामना वह कैसे? किन परिस्थितियों में करता है? यह सच्ची यथार्थ की तस्वीर सौरभ जी की लघुकथाओं मिलेगी। बिना किसी ठोस तैयारी के शासन का फ़रमान, संपूर्ण लॉकडाउन, उधर नेता वर्चुअल रैली में लगे हुए हैं, देश के आम जनमानस की तताम दुष्वारियों की खबर से बेखर अपने में मस्त।

 वर्चुअल रैलीलघुकथा संग्रह को, कोरोना से लड़ने वाले योद्धाओं को समर्पित करते हुए लेखक महोदय ने यह जता दिया है कि यह पुस्तक देश-प्रदेश के जनमानस की आवाज को उनके प्रतिनिधित्व के रूप में बुलंद कर रही हैं। मानवीयता और मानवीय संवेदनाओं को परत दर परत कुरेदती हुई यह रचनाएँ जन-सामान्य की एक मुखर ललकार सरीखी हैं।

इस लघुकथा संग्रह में कुल 71 लघुकथाएँ संग्रहीत हैं परदेशी बहन की राखीसे लेकर कन्टेनमेंट जोन में प्रेम तक  सभी लघुकथाएँ पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ी हैं। इस पुस्तक के पाठक होने के नाते मैंने इसके पाठकीय सफ़र में वर्चुअल रैली, प्यास, मजदूर, हाय! कोरोना, बहुरुपिया, दौलत, भूख और योग, दो शराबी, बिकाऊ मॉल, एक आत्मा की चिट्ठी, पुनर्जन्म, पंडित जी का प्रायश्चित, आदि लघुकथाएँ कायदे से पढ़ी हैं, ऐसा लगता है, यह मेरे देश की जनता की आत्मा से निकली हुई सच्ची आवाज है, और उस आवाज में, कोरोना काल में, लॉकडाउन से उपजी हुई पीड़ा और कुंठा को सहज ढंग से प्रस्तुत करने का कार्य लेखक ने अपनी लेखनी की ईमानदार स्याही से कागजों पर उकेरा है। जहाँ मानवता ख़त्म होती है, वहीं उसे रेखांकित करने का सफल और सार्थक प्रयास  लेखक ने किया गया है।

इन लघुकथाओं को पढ़ते हुए इसके कथानकों ने हमारे मन को बहुत अन्दर तक झकझोर दिया, कहीं-कहीं मन अधीर हो उठता है तो कहीं मन खिन्न हो जाता है। अपने देश के जिम्मेदारों के प्रति, एक आत्मा की चिट्ठीशीर्षक से संकलित लघुकथा में एक पात्र के माध्यम से लेखक लिखतें हुए कहते हैं कि सैकड़ों किलोमीटर के सफ़र ने मुझे भूख, प्यास, थकन और टूटन ने तोड़कर रख दिया है......और मैं टूटकर सड़क पर बिखर गई.......फिर रुदन और सिर्फ रुदन।... रोटी, दौलत, आशियाना, तार, माँ की पेंशन, हाय! कोरोना आदि लघुकथाएँ दिल-दिमाग और मन को विचलित कर जाती हैं। इस संग्रह की लघुकथाएँ साहित्य जगत की अमूल्य  धरोहर साबित होंगी, ऐसा मुझे विश्वास है।

(6 जून 2021 को प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे, मध्य प्रदेश)

अखिलेश कुमार अरुण


ग्राम-हजरतपुर, जिला-लखीमपुर(खीरी)

उ०प्र० 262701

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