साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Wednesday, June 02, 2021

ग़ज़ल (डी.के.भास्कर)

डी के भास्कर


तुम्हारा आंकड़ों का खेल जारी है

हमारी जिन्दगी पर खूब भारी है।

 

बयाँ सब कर रही हैं तैरती लाशें

हकीकत इस तरह सारी उघारी है।

 

तुम्हें कैसे भला यूं नींद आती है

हमें पूछो कि कैसे शब गुजारी है।

 

अगर कुछ लोग मरते हैं मरें बेशक

मगर सरकार को तस्वीर प्यारी है।

 

तुम्हारे अश्क झूठे हैं फरेबी हैं

रुदाली बन गये कैसी बिमारी है।

 

बड़ी उम्मीद से ये ताज सौंपा था

यही गलती पड़ी भारी हमारी है।

 

समय की मांग है अब चल फकीरा चल

उठा झोली बढ़ा अपनी सवारी है।

(संपादक मासिक पत्रिका डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, मथुरा)

 

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