साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Thursday, June 03, 2021

ग़ज़ल (अरविन्द असर)

 

अरविन्द असर


कैसे बताऊं बात कि हालात हैं बुरे,

दिन बन गया है रात कि हालात हैं बुरे।

 

श्मशान, अस्पताल में लाशों के ढेर हैं,

रोकें ये वारदात कि हालात हैं बुरे।

 

कैसा ये दौर है कि करोड़ों को आजकल,

दूभर है दाल- भात कि हालात हैं बुरे।

 

इस सोच में हूं गुम कि चलूं कौन सी मैं चाल,

है हर क़दम पे मात कि हालात हैं बुरे।

 

गैरों की छोड़िए कि अब अपने भी इन दिनों,

देते नहीं हैं साथ कि हालात हैं बुरे।

 

हम डाल -डाल बचने की कोशिश में हैं, मगर

है रोग पात- पात कि हालात हैं बुरे।

 

बचना है गर तुम्हें तो "असर " इस निजाम पर,

जमकर चलाओ लात कि हालात हैं बुरे।

 

 

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Ph no.9871329522,8700678915

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