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कपिलेश प्रसाद |
भेंड़-बकरियों के झुंड हैं हम
और लक़ीर के फ़क़ीर भी ,
एक ने जो राह पकड़ ली-
चल पड़े हम भी उस ओर।
यह सोंच कर कि सब जा रहे जिस उस ओर
ठीक ही जा रहे होंगे ,
मैं भी कुछ रूक-रूक कर चलता रहा उस ओर
ठानी थी बग़ावत करने की ,
पर ठहर सा गया कुछ सोंच कर?
नहीं चाहते हुए भी चल पड़ा
इनके ही नक्श-ए-कदम पर
क्योंकि हम चल रहे थे किसी के समानान्तर
जो खड़ी उस तरफ वैसी ही एक भीड़ थी !
और खड़ा होना था हमें भी उसके मुकाबिल