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-अखिलेश कुमार 'अरुण' |
मिस मायावती 2 बच्चों के साथ गली में जा रही थीं। वहां खड़े एक व्यक्ति ने उनसे पूछा- क्या ये दोनों बच्चे जुड़वां हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा- नहीं, यह 4 साल का है और वह 8 साल का है। इसके बाद उस आदमी ने कहा- मुझे विश्वास नहीं होता कि कोई आदमी वहां दो बार भी जा सकता है।'
सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए लोग किस हद तक गिर सकते हैं. यह हम रणदीप हुड्डा से सीख सकते हैं. इन लोगों का बस चले तो आज भी दलित/वंचितों को पैर का धूल बना कर रखें, यह आज जो सेलिब्रिटी बना हुआ है वह वंचितों की देन है. मजदूर,रिक्सा चालक, फेरीवाला, आदि अपने दिन भर के कामों से थक हार कर आज भी सस्ते/महंगे मोबाइल के यूट्यूब पर इनकी अभिनीत फिल्मो को देखकर इन्हें स्टार बनाते हैं उनका व्यूवर बढ़ाते हैं ....यह यहीं तक सिमित नहीं रहा है गाँव के परिवेश टीवी,वीसीआर/डीवीडी/वीसीडी से लेकर शहर के सिनेमा हाल तक में वंचित तबके की ही भीड़ होती है. जहाँ पर फिल्म के एक-एक दृश्य पर हूटिंग और तालियों की गड़गड़ाहट सुनाने को मिलता है वह यही काले और नस्लीय जाति भेद के लोग हैं जिनकी इज्जत यह सरे आम तार-तार कर रहा है.
पुराने वायरल अंग्रेजी वीडियो का हिंदी सार जिसमे यह शख्स कहता है' मिस मायावती 2 बच्चों के साथ गली में जा रही थीं। वहां खड़े एक व्यक्ति ने उनसे पूछा- क्या ये दोनों बच्चे जुड़वां हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा- नहीं, यह 4 साल का है और वह 8 साल का है। इसके बाद उस आदमी ने कहा- मुझे विश्वास नहीं होता कि कोई आदमी वहां दो बार भी जा सकता है।' जातीय और रंगभेद पर यह तंज है, विडिओ लिंक https://youtu.be/_0VOcRSbVAE हिसार (हरियाणा) में ऍफ़ आई आर दर्ज की जा चुकी है पर इतने से कुछ नहीं होगा जब तक की कोई ठोस कानून नहीं बनाया जाता जिस सेलिब्रेटी
के मन में जो आये वंचित समुदाय के प्रतिष्ठित नेताओं पर अनाप-शनाप बोलकर रातों-रात
स्टार बन जाता है. जितनी छवि अभिनेता अपने काम को लेकर नहीं बना पता है उसे कहीं
ज्यादा बाबा साहब, कांशीराम, मायावती, मुलायम सिंह, लालू यादव के साथ साथ जातिसूचक
चोरी-चमारी, भंगी जैसा नहीं दिखाना चाहती, अहीर समझ रखे हो का, आदि-आदि शब्दों का
इस्तेमाल कर लोग चमक जाते हैं. और हम प्राथमिकी दर्ज कराकर बस खुश हो जाते हैं ऐसे
में हमारी और हमारे समाज की छवि कभी भी नहीं सुधर सकती और नहीं सुधारी जा सकती है.
रणदीप हुड्डा की पहली फिल हाईवे देखे थी एक दो सीन को छोड़ दें तो और सब समान्य था कीन्तु अभिनय अच्छा लगा. पहली बार में ही उसके अभिनय का कायल हो गया था. लगे हाथ सर्वजीत भी देख लिये किन्तु उसके अभिनय में कहीं ऐसा नहीं लगा की यह ओछी मानसिकता का व्यक्ति है. यह भ्रम भी आज टूट गया आखिर इसने अपनी जातीय मानसिकता को उजागर कर ही दिया. हमको ऐसे लोगों से घृणा क्यों हो जाती है?????? या ये सबके सब घृणा लायक ही होते हैं, नहीं ऐसा नहीं है सब एक जैसे नहीं हो सकते लेकिन इस अभिनेता से यह उम्मीद नहीं थी.
जाति है की जाती नहीं है, जाति तुम कब जाओगी हमारे दिल, दिमाग और देश से कर्म के आधार पर कब लोग यहाँ (भारत में) सम्मान पायेंगे?????????????????????????? अनंत तक यह एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर ही रह जायेगा, शायद सदा के लिए.
UN ने ब्रांड अम्बेसडर के पद से हटाया, हमने अपने दिलोदिमाग से और आप??????
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार/साहित्यकार हैं.
पता-ग्राम हजरतपुर, लखीमपुर-खीरी
उत्तर प्रदेश-262804