साहित्य के नवांकुर
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अल्का गुप्ता |
हर किस्सा जिंदगानी
का अजीब सा है
क्यूं कहता है कोई? तूं खुशनसीब सा है
ग़म में मुस्काना भी एक तरकीब सा है
कोई हो जो साथ दे!
उल्फत में, हाथ-स्पर्श वो करीब सा है
दर्द अश्कों का मेरे यार तरतीब सा है
ग़म में मुस्काना भी एक तरकीब सा है
कोई हो जो साथ दे!
नावाकिफ, अपना बेशक वह गरीब सा है
तन्हा नहीं दौर-ए-आज वह अदीब सा है
तकलीफ में साथ दे, दिल-ए-करीब सा है
कोई हो जो साथ दे!
पता-लखीमपुर खीरी उ०प्र०