साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
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Tuesday, May 25, 2021

आत्मकथ्य

 

मेरी कहानी मेरी ज़ुबानी

 

"चाहे वो महत्मा गांधी हो, या ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब हो.. इनके अलावा फिल्मी दुनिया और हिन्दी साहित्य के कुछ कद्दावर शख्सियतें भी रहीं हैं, जो आत्मकथा जैसा कुछ लिखने के बारे में सोचा और लिखा भी, इसलिए मैं भी इस विधा में कुछ लिखने की जुर्रत कर रहा हूँ।"

       -शिव सिंह सागर         

 

प्रस्तावना

    स्वयं के बारे में लिखना,मतलब मेरे लिए हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में यह सबसे दुर्लभ कार्य हैं। गहराई से सोचने पर मालूम हुआ,आत्मकथा,अथवा आत्मकथ्य विधा पर देश के उन लोगों ने काम किया है, जो देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में एक मिसाल की तरह देखें जाते हैं, चाहे वो महत्मा गांधी हो, या ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साहब हो.. इनके अलावा फिल्मी दुनिया और हिन्दी साहित्य के कुछ कद्दावर शख्सियतें भी रहीं हैं, जो आत्मकथा जैसा कुछ लिखने के बारे में सोचा और लिखा भी, इसलिए मैं भी इस विधा में कुछ लिखने की जुर्रत कर रहा हूँ। एक अदना सा शब्द शिल्पी होने के नाते अपने गुज़रे हुए वक़्त को शब्दों में बांधने का प्रयास कर रहा हूँ! प्रयास कैसा रहा, ये आप सभी लोगों को बताना है।

 आत्मकथ्य: संदेहों के कपोल /राय बहादुर सिंह - अपनी माटी

जन्म

    मेरे जन्म के संबंध में कहा जाता है, वर्ष 1994 के अप्रैल माह की 18 तारीख को एक साधारण किसान परिवार में, ’कश्यपगोत्र रघुकुल के अन्तर्गत लोधी जाति में शिवनारायण लोधी और श्रीमती देवी के घर में हुआ। माता-पिता ने मेरा नाम शिव सिंह रखा। उन दिनों पिता जी सपनों के शहर मुम्बई के एक कपड़े के कारखाने में फौरमैनपद पर कार्यरत थे। पहली संतान के रूप में बालक का जन्म होना खुशी की बात थी। माँ बताती हैं, बाबा जी का स्वर्गवास मेरे जन्म से पहले ही हो गया था, सो दुर्भाग्य ये रहा कि बाबा ( दादा )की गोद में खेलने का सुख नहीं मिला । दाई ( दादी ) से मुझे खूब ढेर सारा प्यार मिला। इसका और भी कारण था, बताते हैं, मेरे माता-पिता के विवाह के 18 साल के एक लंबे अन्तराल के बाद मेरा जन्म हुआ। माता-पिता की हज़ारों मन्नतों और दुआओं से, मेरे जन्म से परिवार में खुशियों की लहर आई।

 

बचपन

    जन्म से चौदह साल तक का समय, हर एक बालक के लिए स्वर्णिम काल होता है। इन दिनों की कीमत कोई वाइट हाऊसदेकर भी नहीं चुका सकता! हाँ मगर ऐसा नहीं  कह रहा कि खूब मौज मस्ती की हो, स्वाभावनुगत मैं बचपन से ही शान्त था। बचपन की शरारतें, ठिठोली, मज़ाक, शायद मेरे उन दिनों से ही नहीं, मेरी ज़िन्दगी से ही दूर थी। मेरे बाद एक भाई और एक बहन का हमारे घर में आगमन हुआ। मेरी माँ एक अति संवेदनशील और भावुक और शांत गृहणी हैं। पिता जी हमारी शिक्षा को लेकर शुरू से ही बहुत सजग थे। बस इसी लिए उन्होंने मुम्बई को छोड़कर घर आ गए, और गांव में आकर खेती बाड़ी में लग गए। फिर खेत ही हमारे गुजर-बसर का एक मात्र साधन था। घर पर रहकर पिता जी पूरी निगरानी के साथ हमारी शिक्षा पर जोर देते थे। ये वही दौर था, जब चार जूतेवाला किस्सा मेरे साथ  हुआ । पिता जी से पिटाई के कई और किस्से इसी दौर के थे‌।

 

शिक्षा

    मैं हमेशा से ही औसत दर्जे का छात्र था। इस लिए सामान्य शिक्षा अर्जित कर सका, ठाकुर दीन सिंह इंटर कॉलेज से हाई स्कूल, चौधरी रधुनाथ सहाय इंटर कॉलेज हथगाम से इण्टरमीडिएट, और सदानंद महाविद्यालय छिवलहा हथगाम से स्नातक की पढ़ाई की इसके अतिरिक्त कम्प्यूटर शिक्षा में दक्षता हासिल की।

 

साहित्य और सिनेमा

    हाई स्कूल की परीक्षा पास करने के बाद छुट्टियों के दिन चल रहे थे।यही वो वक़्त था जब मैंने अपने जीवन की पहली कविता लिखी। कुछ-कुछ याद है उस कविता का शीर्षक थाएहसान फिर कविताएँ लिखने का सिलसिला तब से शुरू हुआ था, जो अभी भी चल रहा है। हिन्दी साहित्य की कुछ-कुछ समझ अब आनी शुरू हुई है। लेखन को लेकर विधाएँ समझने में बहुत समय लगा। लेकिन आभार है ईश्वर का सही वक़्त पर मुझे शिवशरण बंधु और डा० वारिस अंसारी जैसे गुणी साहित्यिक गुरु मिल गए तो कुछ आसानी हुई। फिर कविताओं को लेकर चाहे, गीत हो, ग़ज़ल या नई कविताएँ, इनके साथ-साथ बाल कविताओं पर भी मेरी कलम चली, इसी बीच माँ सरस्वती की कृपा से एक कविता लिखी 'मोची हो गए मेरे पापाजिसकी खूब चर्चा भी हुई। इधर पत्र-पत्रिकाओं में लेखन व प्रकाशन सुचारू रूप से चल रहा था। साथ ही इधर मंचों पर मैं अपनी कविताएँ सुना रहा था, तभी एक कार्यक्रम के दौरान एक सज्जन ने एक एल्बम के लिए गीत लिखने के लिए प्रस्तावित किया, तो मैंने उनके लिए दो गीत लिख दिए, गाने ज्यादा चले तो नहीं, पर लोगों ने मेरे लेखन की प्रसंशा की, जिससे मुझे बहुत हौसला मिला। एक साल बाद एक लघु फिल्म में अभिनय करते हुए पता यह चला इन फिल्मों के पीछे एक निर्देशक नाम की कोई एक चीज़ होती है। उसकी कुशलता को जानने व समझने के लिए गूगल, यूट्यूब से जानकारियां एकत्र की और फिर लग गया अपने फिल्म बनाने के अभियान पर, आज मैं डेढ़ दर्जन से ज्यादा लघु फिल्मों का निर्देशन कर चुका हूँ!

             इसके अतिरिक्त हिन्दी, भोजपुरी के पांच गीत लिख चुका हूँ, जो यूट्यूब पर चल रहें हैं। इन सब कामों के लिए अब तक कई सम्मान भी मिल चुके हैं। इन दिनों मैं कहानी लेखन में व्यस्त हूँ!

 आत्मकथा : वतन से दूरी ही मेरी साहित्य साधना की मूल प्रेरणा है!

अभिरूचियां

    पढ़ाई लिखाई का जब तक मतलब समझ आया तब बहुत देर हो चुकी थी। मुझे पढ़ाई छोड़े नौ बरस हो गए। अब साहित्य की किताबें,पत्र, पत्रिकाएँ, पढ़ने में बड़ा मन लगता है। सिनेमा देखना, किक्रेट देखना, सुनना आदि पसंद है! मुशी प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, नागार्जुन, अदम गोंडवी, दुष्यंत कुमार, मेरे पंसदीदा साहित्यकार हैं। और देश दुनिया का इतिहास जानने में मुझे  खासी रूचि है!

 

विवाह

    फरवरी 2018 में मेरा विवाह प्रियंका लोधी के साथ हुआ! उनसे मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हुई। जिसका नाम सिद्धार्थ लोधी है। भविष्य की योजना में बेटे को अच्छी शिक्षा, माँ बाप की सेवा, और सम्मान जनक जीवन के अतिरिक्त और किसी चीज़ की इच्छा नहीं है!



शिव सिंह सागर’ 

                       बन्दीपुर हथगाम फतेहपुर

                       मो. 9721141392


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