साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Wednesday, June 09, 2021

ग़ज़ल (नन्दी लाल)

नन्दी लाल
एक खाने के बनेंगे चार खाने शाम तक।

भूल जायेंगे किए वादे सयाने शाम तक।।

आके चोटी से पसीना एड़ियां छूता है जब,

तब कहीं पाता है पट्ठा चार आने शाम तक।।

भोर है सो कर उठे हैं जो कहे सच मान लो,

याद आयेंगे कहीं फिर से बहाने शाम तक।।

पेट है या फिर किसी वैश्या का पेटीकोट है,

खा गए लाखों नहीं फिरभी अघाने शाम तक।।

देख लें जिसको वही मर जाए अपने आप में

और कितने कत्ल कर देंगे न जाने शाम तक।।

लूट  की हैं इसलिए वह  धूप से बचती रहें,

तान देंगे कुर्सियों पर   शामियाने शाम तक।।

नासमझ कुछ यार अपना दिल बदलते ही रहे,

रूप बदले  रंग बदले  और बाने शाम तक ।।

 

         पता-गोला गोकर्णनाथ खीरी

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