व्यंग्य
प्राकृतिक ऑक्सीजन उत्सर्जक वृक्ष, घर के बड़े बूढ़ों की तरह निगाहों में खटक रहे थे। आधुनिकता की चमकीली रपटीली सड़क पर अवांछनीय तत्वों की तरह जड़ें जमाए हटने के लिए तैयार ही नहीं थे। ऐसी भी क्या परोपकारिता कि बदले में कुछ नहीं चाहिए। बस देते ही रहना व्यक्तित्व का दुर्लभ गुण। “गिव एंड टेक” वाले युग में ऐसे कुलक्षण वाले सड़क या घरों में नहीं अजायबघरों में ही अच्छे लगते हैं। कम से कम वहां टिकट के नाम पर कुछ तो धनोपार्जन हो जाता है। वृक्ष बचाओ, जंगल बचाओ के कवच में पीठ पर छुरा सहते सहते आखिर वृक्ष और वृद्ध दम तोड़ गए।
रात गई बात गई। ऑक्सीजन संयंत्र उपेक्षित होकर अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाने को मजबूर। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। उपेक्षा से तंग आकर वृक्षों और संयत्रों दोनों ने गुहार लगाई कोई तो बचाओ हम ऑक्सीजन उत्सर्जकों को।