साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Tuesday, June 15, 2021

कोई तो बचाओ हम ऑक्सीजन उत्सर्जकों को-मधुर कुलश्रेष्ठ

व्यंग्य
प्राकृतिक ऑक्सीजन उत्सर्जक वृक्ष, घर के बड़े बूढ़ों की तरह निगाहों में खटक रहे थे। आधुनिकता की चमकीली रपटीली सड़क पर अवांछनीय तत्वों की तरह जड़ें जमाए हटने के लिए तैयार ही नहीं थे। ऐसी भी क्या परोपकारिता कि बदले में कुछ नहीं चाहिए। बस देते ही रहना व्यक्तित्व का दुर्लभ गुण। “गिव एंड टेक” वाले युग में ऐसे कुलक्षण वाले सड़क या घरों में नहीं अजायबघरों में ही अच्छे लगते हैं। कम से कम वहां टिकट के नाम पर कुछ तो धनोपार्जन हो जाता है। वृक्ष बचाओ, जंगल बचाओ के कवच में पीठ पर छुरा सहते सहते आखिर वृक्ष और वृद्ध दम तोड़ गए।

अब विकास ने चैन की सांस ली। सारे अवरोधक खत्म। फर्राटे से गाड़ी दौड़ाई जा सकेगी। गाड़ी दौड़ेगी तो न, न करते हुए भी बहुत कुछ लॉकर में समा ही जाएगा। पर हाय रे कोरोना, तुच्छ सी ऑक्सीजन के लिए हाय हाय करवा दी। पर्यावरण संरक्षण वालों, गरीबों की हिमायत वालों, एक्टिविस्टों की दुकानें चमकने लगीं। आपदा में कृत्रिम ऑक्सीजन से फेफड़े भी अघा-अघा कर दम तोड़ गए। लॉकर गले गले तक अफरा गए। लोग 99 को 100 बनाने की ललक में तरह-तरह के मंसूबे पलने लगे। हर अस्पताल में ऑक्सीजन संयत्र पर संयत्र लगाने की गंगा में डुबकियां लगीं। संयत्र बने तब तक कोरोना दम तोड़ चुका।
रात गई बात गई। ऑक्सीजन संयंत्र उपेक्षित होकर अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाने को मजबूर। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं। उपेक्षा से तंग आकर वृक्षों और संयत्रों दोनों ने गुहार लगाई कोई तो बचाओ हम ऑक्सीजन उत्सर्जकों को।

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