साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Sunday, June 06, 2021

जेल परिसर में हो रही आपराधिक गतिविधियों/घटनाओं/हत्याओं में जेल प्रशासन की लापरवाही और संलिप्तता से नकारा नही जा सकता- नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

एक विमर्श- 

 

“लापरवाही व अपराधिक घटनाओं का केंद बनता जा रहा है जेल परिसर, ऊंची-ऊंची दीवारों के भीतर पनपते संगठित/संस्थागत "अपराध और भ्रष्टाचार" की असलियत को समझना आसान नही है, जेलों की ही तरह अन्य सरकारी संस्थाओं में भी इसी तरह अपराध और भ्रष्टाचार का आलम बदस्तूर जारी है।”

 

नन्द लाल वर्मा

            किसी ज़माने में अपराधियों के लिए जेलें सबसे सुरक्षित दरगाह जैसी मानी जाती थी। इसलिए  जेल से बाहर जब कोई अपराधी पुलिस या अपने दुश्मन से अपने को असुरक्षित महसूस करता था तो वह किसी पुराने केस की  जमानत कटवाकर या दफा 25/ या शांति भंग जैसे छोटे- मोटे नए अपराध में चालान करवाकर जेल चला जाता था और जेल में आराम से सुरक्षित जिंदगी जीता था। जेल के अंदर एक नई प्रकार की पूरी दुनिया बसती है और उस दुनिया की भी अपनी एक आंतरिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था है जिसे जेल के संतरी से लेकर मंत्री तक बड़े मनोयोग से चलाते हैं।इस अर्थव्यवस्था में एक खास वेशभूषा में रह रहे कैदियों/सज़ायाफ्ताओं की सक्रिय भूमिका होती है और इन्हीं में से पढ़े लिखे लोगों को लिखा-पढ़त का काम दे दिया जाता है।इन्हें जेल की प्रचलित भाषा मे राइटर (लेखक) कहा जाता है।अन्य निरुद्ध अभियुक्तों/कैदियों में इन राइटर्स का अलग रुतबा होता है क्योकिं राइटर्स अन्य जेल कर्मचारियों की तरह ही अनऑफिशियल लिपिकीय कार्य करते हैं।राइटर्स जेल की व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के अभिन्न की तरह होते हैं।इसलिए इनको अन्य निरूद्ध लोगों की तुलना में विशेष रियायतें और सहूलियतें मिल जाती हैं और जेल के अंदर स्वतंत्र और आसान जिंदगी जीते हैं।जेल प्रशासन की तरफ से इनके द्वारा सम्पन्न लिपिकीय कार्य के बदले निर्धारित पारिश्रमिक भी दिया जाता है। कुछ लोग तो इस पारिश्रमिक की अच्छी खासी रकम अपने परिवारों को भी भेज देते हैं और कुछ लोग इस पारिश्रमिक राशि के प्रलोभन और जेल कर्मियों की निकटता और प्रेम के कारण जेल से छूटने के बाद छोटे मोटे अपराध में जानबूझकर चालान कटवाकर जेल ही रास आती है।  देश के टैक्स सिस्टम की तरह जेल का भी अपना टैक्स सिस्टम काम करता है।इस सिस्टम द्वारा निरुद्ध अभियुक्तों से जो भी राजस्व वसूली होती हैं उसका आबंटन केंद्र और राज्य सरकार की भांति संतरी से लेकर मंत्री तक बजटरी सिस्टम से होता है। जब कभी कभार जेल के भीतर शातिर अपराधी कोई बड़ी घटना को अंजाम देता है तो जेल और जिला प्रशासन से लेकर शासन द्वारा निलंबन जैसी कार्रवाई कर घटना की जांच हेतु कोई कमिटी या आयोग बनाकर उत्तरदायित्व निर्वहन की इति श्री कर दी जाती है।धन-दौलत या राजनैतिक सत्ता की बदौलत जेल में निरूद्ध व्यक्ति को जेल में किसी भी प्रकार की दिक्कत नही होती है।सारी व्यवस्था जेल प्रशासन के जिम्मेदारों की मिलीभगत और उनकी निगरानी में होता है और यह बात स्थानीय सत्ताधारी नेताओं, जिला प्रशासन और न्यायपालिका के भी संज्ञान में होता है और व्यवस्था का हर अंग जेल की इस अर्थव्यवस्था से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होता है। जेल प्रशासन द्वारा यहां हर सुख-सुविधा की कीमत तय है।कीमत का भुगतान करिए और जेल के अंदर ऐश करिए।


           शासन और प्रशासन द्वारा समय समय पर जेल की व्यवस्था का निरीक्षण होने के बावजूद जेल के भीतर हो रही आपराधिक गतिविधियां और गैंगवार हत्याएं जैसी घटनाओं में  शासन/प्रशासन की लापरवाही या संलिप्तता से इनकार नही किया जा सकता है। जेल के बाहर की तरह ही पेशेवर अपराधियों का साम्राज्य जेल के अंदर भी बेखौफ़ चलता है।जिस प्रकार कोई व्यक्ति तब तक पेशेवर अपराधी नही बन सकता जब तक कि स्थानीय सत्ताधारियों या पुलिस का सरंक्षण प्राप्त न हो।ठीक उसी तरह जेल कर्मियों की संलिप्तता के बिना जेल के भीतर पेशेवर अपराधियों की गुंडागर्दी, विदेशी हथियारों से गैंगवार हत्याओं और रंगदारी वसूली को अंजाम नही दिया जा सकता है और इस काम के लिये अच्छी खासी मनमानी कीमत चुकानी पड़ती होगी।पेशेवर अपराधियों द्वारा जेल के भीतर हो रही बेधड़क दारू-मुर्गा की पार्टियों के वायरल वीडिओज़ से स्पष्ट है कि पेशेवर और पैसे वालों के लिए जेल के अंदर और बाहर की दुनिया में कोई फर्क नहीं है।बल्कि,जेल के अंदर वे अपने को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते होंगे।


          जेल परिसरों में आजकल कैंटीन सुविधा भी संचालित है जिसमें खाने-पीने की चीजें उपलब्ध रहती हैं।लेकिन इस कैंटीन में चीजों की कीमत एमआरपी जैसे सरकारी नियमों से नही,बल्कि जेल के खुद के अर्थशास्त्र के हिसाब से तय होती हैं।शासन द्वारा निर्धारित मानदंडों पर निरूद्ध लोगों को भोजन और नाश्ते की व्यवस्था होती है।लेकिन जिस क्वालिटी और क्वांटिटी का भोजन और नाश्ता दिया जाता है, उस पर आए दिन अपराधियों द्वारा मचाए जाने वाले बवालों की खबरें सुनने में आती रहती हैं।इससे लगता है कि जेल की रसोई भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। निरूद्ध अभियुक्तों/ कैदियों के सामान्य इलाज के लिए जेल में अस्पताल की भी व्यवस्था होती है। वहाँ भी पैसे वाले लोग इलाज के नाम पर अस्पताल की सुविधाएं भोगते हैं।क्योंकि जेल की सामान्य बैरकों की तुलना में अस्पताल साफ-सुथरा और स्पेशियस होता है और डॉक्टर के परामर्श पर उसकी डाइट भी  इलाज के नाम पर सामान्य अभियुक्तों के भोजन से बेहतर मिल जाती है।कुछ जेलों के पास कृषि भूमि भी है जिस पर जेल प्रशासन बन्द अभियुक्तों/क़ैदियों से खेती कराकर भरपूर मात्रा में अनाज़ और सब्जी पैदा कराते हैं।इस अनाज़ और सब्जी को जेल में बंद लोगों के भोजन में प्रयोग करने के अतिरिक्त चुनी हुई दिखने में सुंदर और बेदाग सब्जियां जेल कर्मियों के घरों की किचन की शोभा,खुशबू और स्वाद का हिस्सा बनकर धन्य हो जाती हैं।जेल कर्मियों के स्तर के हिसाब से जेल की राशन सामग्री भी उनके घरेलू उपयोग हेतु वितरण की व्यवस्था भी है,ऐसा सुना और देखा भी गया है।


           किसी का कोई मित्र या रिश्तेदार यदि जेल में बन्द है और वह उनसे मुलाकात करने जाता है तो निरुद्ध व्यक्ति से जेल की पूरी हकीकत पता लगाई जा सकती है।एक दिन में जितनी मुलाकातें होती हैं, जेल में निरूद्ध व्यक्ति से एक निर्धारित रकम वसूले जाने का पुख़्ता बंदोबस्त होता है।जो निर्धारित रकम देने में आनाकानी या मजबूरी व्यक्त करता है उसे उसका दंड दूसरे प्रकार से झेलना पड़ता है।विशेष सुविधाओं के लिए विशेष रकम का सामयिक भुगतान की व्यवस्था अलग से है।जैसी सुविधा वैसा भुगतान करिए और जेल में भी उसी रुतबे और गुंडई से राज करिए जैसा जेल के बाहर करते रहे हो।इसी रुतबे और गुंडई की उपज है, जेल में रही अनवरत सुनियोजित गैंगवार हत्याएं। जेल के भीतर हो रही हत्याएं भी गैंगवॉर हत्याओं का ही रूप हैं। जेल परिसर में हो रहे अपराधों में जेल प्रशासन की और जेल के बाहर हो रहे अपराधों में स्थानीय पुलिस प्रशासन और सत्ताधारियों की संलिप्तता से इनकार नही किया जा सकता है। बस हत्याओं का स्थान बदला हुआ होता है।जेल के भीतर और बाहर पनप रहे गैंग्स,अपराधों और हत्याओं के लिए जिम्मेदार कौन है?केवल निलंबन या लाइन हाज़िर करने से पेशेवर गुंडागर्दी और हत्याएं नही रुकने वाली हैं।जिस थाना क्षेत्र और जेल परिसर में आपराधिक गतिविधियां और हत्याएं होती हैं, वहां के जिम्मेदार लोगों के ऊपर भी उस अपराध के लिए अपराधियों के समान ही दोषी मानकर उनके ऊपर भी कानूनी कार्यवाही होनी चाहिए।

लखीमपुर-खीरी (यूपी)

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