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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Thursday, January 29, 2026

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग: उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन विनियमन:2026 Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations-प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.


       भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में वर्णित है कि भारत के किसी भूभाग में किसी भी व्यक्ति को धर्म,जाति, नस्ल,लिंग या जन्म स्थान अर्थात क्षेत्र के आधार पर कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा और न ही भेदभाव का निषेध करेगा।" यह अनुच्छेद भारत के सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों की समान सुरक्षा की गारंटी देता है। "राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या भारत के भीतर कानूनों के समान संरक्षण से इनकार नहीं करेगा।"
         उपरोक्त अनुच्छेद के व्यापक निहितार्थ के विस्तृत संदर्भ में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति,धर्म,क्षेत्र,रंगभेद,लिंग या किसी तरह की दिव्यांगता आधारित भेदभावों को रोकने के उद्देश्य से यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) द्वारा ‘'उच्च  शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम-2026'’ को लागू कर दिया गया है। यह नियम 15 जनवरी, 2026 से भारत की सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू हो गया है। देश की कथित अगड़ी जातियों के लोगों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। इस विनियमन का विरोध का मतलब संविधान का विरोध,क्योंकि अगड़ी जातियों ने समानता,समता, न्याय और बंधुत्व सम्मत संविधान के अंगीकार तिथि से ही सहजता पूर्वक पसंद और स्वीकार नहीं किया है।
       इस नियमन में एससी-एसटी के साथ ओबीसी को भी जातिगत भेदभाव की परिधि में शामिल कर लिया गया है,अर्थात् अब उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के छात्र,शिक्षक और कर्मचारी भी अपने ऊपर किए जा रहे जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत स्थापित प्रकोष्ठ के समक्ष कर सकते हैं। इससे बहुजन समाज और मजबूत होता दिख रहा है। अब तक केवल एससी-एसटी के लोग ही जातिगत भेदभाव की शिकायत कर सकते थे या यूं कहें कि उनके लिए ही संबंधित संस्थानों में शिकायत और निवारण प्रकोष्ठ बने थे। इस रेगुलेशन के लागू होने के बाद अब एससी-एसटी के साथ ओबीसी के लिए भी समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित किया जाएगा और एक ऐसी समता समिति गठित की जाएगी, जिसमें ओबीसी, महिला,एससी,एसटी और दिव्यांगों को सदस्य के रूप में नामित करना अनिवार्य होगा। इस कमेटी को अपनी समयबद्ध नियमित रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। प्रत्येक संस्थान के लिए उक्त कमेटी की रिपोर्ट यूजीसी को भी भेजना अनिवार्य होगा।
        देश में मौजूद सामाजिक न्याय की पक्षधर शक्तियों के मन में बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस रेगुलेशन में ऐसा क्या है, जिसका विरोध किया जा रहा है? आखिर क्यों पूरे देश में अगड़ी जातियों के लोग इसका विरोध कर रहे हैं? कथित अगड़ी जातियों के लोग इसके विरोध में तर्क दे रहे हैं कि इसका दुरुपयोग किया जा सकता है और इस रेगुलेशन के माध्यम से अगड़ी जातियों के छात्रों को प्रताड़ित किया जा सकता है। जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर '‘सवर्ण समाज समन्वय समिति'’ (एस-4) का गठन किया है ताकि एक बड़े संगठन के बैनर तले इस नियम के विरोध में मंडल आयोग के विरोध जैसा बड़ा आंदोलन किया जा सके। सोशल मीडिया पर अगड़ी जातियों के तमाम इंफ्लूएंसर,यूट्यूबर्स और कार्यकर्ता इसके विरोध में उतरकर अभियान चला रहे हैं। स्वामी आनंद स्वरूप ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा है कि “आज यदि सभी सवर्ण समाज के लोग एकजुट नहीं हुए तो पतन निश्चित होगा और यदि एक हो गए तो "धनानंद" का विनाश हो जाएगा।” इसी तरह की एकजुटता के आह्वान तमाम मंचों से हो रहे हैं। 
संदर्भ: धनानंद,मगध के नंद वंश के प्रथम राजा महापद्मनंद के नौवें पुत्र थे और महापद्मनंद की दासी से उत्पन्न हुए थे। उनके नौ भाइयों को मिलाकर “नवनन्द” कहा जाता था। कहा जाता है कि धनानंद ने छल विद्या से अपने पिता महापद्मनंद की हत्या कर दी और तत्पश्चात नंद वंश के उत्तराधिकारी बन गए। वह आगे चलकर नंद वंश के अंतिम सम्राट सिद्ध हुए। धनानंद ने विद्वान ब्राह्मण चाणक्य का अपमान किया था। चाणक्य ने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ धनानंद के राज्य पर आक्रमण कर धनानंद को मार दिया और मगध राज्य पर अपना शासन स्थापित कर लिया।
      दरअसल,भारत के लगभग सभी उच्च शिक्षण संस्थान आज भी सवर्ण वर्चस्व के गढ़ बने हुए हैं। संविधान सम्मत सामाजिक न्याय के तमाम प्रयासों के बावजूद यहां आज भी वंचित शोषित वर्गों को उचित भागीदारी नहीं मिल पाई है। यहां आज़ादी के बाद से एससी-एसटी के लिए आरक्षण लागू है तथा ओबीसी को नौकरियों में अगस्त,1992 से विश्वविद्यालयों के फैकल्टी भर्ती और नामांकन में 2010 से आरक्षण मिल रहा है। इसके बावजूद उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित वर्गों की भागीदारी 15% से अधिक नहीं हो पाई है। 30 जनवरी, 1990 से पूरे भारत में एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 लागू है। यह अधिनियम एससी-एसटी को जातिगत भेदभाव, हिंसा और अत्याचार से सुरक्षा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन इस अधिनियम के लागू होने के करीब 36 वर्षों के बाद भी देश में एससी-एसटी उत्पीड़न की घटनाओं पर प्रभावी नियमन और नियंत्रण नहीं हो पाया है। 
      यूजीसी द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि पूरे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच वर्षों में बड़ी संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। यूजीसी के 700से अधिक विश्वविद्यालयों और 1500 से अधिक महाविद्यालयों में समान अवसर प्रकोष्ठों और अनुसूचित जाति/जनजाति प्रकोष्ठों द्वारा दर्ज की गई शिकायतें बढ़ी हैं। इन शिकायतों में वृद्धि का एक कारण एससी-एसटी वर्ग में आई जागरूकता भी हो सकती है,लेकिन इस बात से इनकार तो नहीं किया जा सकता कि इनके खिलाफ जातिगत भेदभाव अब भी जारी है।
हालांकि,अधिकांश एससी-एसटी प्रकोष्ठ और समान अवसर प्रकोष्ठ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के प्रशासनिक नियंत्रण में काम करते हैं। उनके पास निर्णय लेने की खुलकर आजादी नहीं होती। इसलिए किसी भी प्रकार के जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न के खिलाफ ये न्यायपूर्ण निर्णय नहीं ले पाते हैं।
        उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी-एसटी के लिए आरक्षण और जातिगत भेदभाव रोकने के लिए कानून लंबे समय से लागू हैं। इसके बावजूद न तो इनकी भागीदारी में समुचित वृद्धि हुई है और न ही इनके खिलाफ जातिगत भेदभाव में कमी आई है। उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी का प्रवेश बहुत बाद में शुरू हुआ। इन्हें भी अब तक समुचित भागीदारी नहीं मिल पाई है और न ही इनके खिलाफ हो रहे जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए अब तक कोई रेगुलेशन ही लागू था। पिछड़े वर्गों के आरक्षण रोस्टर में छेड़छाड़ करना और इनके साथ जातिगत भेदभाव करना उच्च शिक्षण संस्थानों में बदस्तूर जारी है। जवाहरलाल नेहरू और दिल्ली विश्वविद्यालय सहित तमाम केंद्र और राज्य विश्वविद्यालयों में नौकरियों और नामांकन में ओबीसी आरक्षण लागू नहीं हो पा रहा है। शैक्षणिक पदों के विज्ञापन तो प्रकाशित होते हैं, उनके लिए इंटरव्यूज भी होते हैं,लेकिन अंततः (एनएफएस) 'नॉट फाउंड सुटेबल’ कहकर उनकी आरक्षित श्रेणी के पदों पर नियुक्ति नहीं की जाती है। अकेले दिल्ली विश्वविद्यालय में 200 से अधिक एससी-एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों को ‘एनएफएस’ कर दिया गया। वर्ष 2022 में शिक्षा मंत्रालय ने एक लिखित जवाब में राज्य सभा में बताया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षित श्रेणी के 880 प्रोफेसर्स के पद और 3669 असिस्टेंट प्रोफेसर के पद खाली हैं। इनमें से ओबीसी के 1761 पद खाली हैं। यूजीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश भर के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं। 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में 7 वर्षों से पढ़ा रहे एक ओबीसी एडहॉक असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.समरवीर को निकाल दिया गया और वह इतने दुखी हुए कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए विवश कर दिए गए। आख़िर,उनकी आत्महत्या के लिए दोषी कौन?
      उच्च शिक्षण संस्थानों के सवर्ण कुलपति और साक्षात्कार में बैठने वाले विशेषज्ञों ने मिलकर ‘एनएफएस’ नाम का एक नया अद्भुत धारदार हथियार  बना लिया है। इसके माध्यम से वे यह सिद्ध करते हैं कि वंचित वर्गों के कैंडिडेट्स नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होने के लिए यूजीसी के मानदंडों के हिसाब से शैक्षणिक रूप से क्वालिफाइड तो हैं,लेकिन नियुक्ति के लिए ‘सूटेबल’ उपयुक्त या योग्य नहीं है। इस प्रकार के जातिगत भेदभाव के लिए आज तक किसी भी कुलपति या इंटरव्यू में बैठे विशेषज्ञ को सजा देना तो दूर,उनसे एक सवाल भी नहीं किया गया। इस तरह उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गो के लिए आरक्षित हजारों पद या तो खाली हैं या फिर उन्हें सवर्ण अभ्यर्थियों से भर लिया गया है। एससी-एसटी कल्याण की संसदीय समिति ने ‘एनएफएस’ को दिल्ली विश्वविद्यालय में एससी-एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों को जातिवादी मानसिकता के तहत बाहर रखने और आरक्षित श्रेणी की सीटों को खाली रखने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला घातक हथियार माना है। यह उनका संस्थागत बहिष्कार का एक तरीका बन गया है जिसका भरपूर इस्तेमाल देश की तमाम शिक्षण संस्थाओं में हो रहा है। हालांकि,यूजीसी का एक पैनल इसकी जांच कर रहा है,लेकिन इसकी रिपोर्ट कब आएगी और कार्रवाई कब होगी, किसी को पता नहीं है।
      उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए 27%, एससी के लिए 15%, एसटी के लिए 7.5% और अगड़ी जातियों के ईडब्ल्यूएस के लिए 10% आरक्षण लागू है अर्थात् लगभग 60% सीटें आरक्षित हैं और 40% सीटें अनारक्षित हैं। इन 40% अनारक्षित सीटों को अगड़ी जातियों के लिए पूरी तरह आरक्षित मानकर उन पर सवर्णों की भर्ती की जाती रही है। इन अनारक्षित सीटों पर आरक्षित वर्गों के कैंडिडेट्स को इंटरव्यू के लिए कॉल भी नहीं किया जाता रहा है। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों के कुलपति और महाविद्यालयों के प्राचार्य सवर्ण हैं और वे तमाम तरह के हथकंडे अपनाकर आरक्षित वर्गों की हकमारी करते रहते हैं। आरक्षण के संदर्भ में कोई कारगर नियामक संस्था न होने के कारण ये जातिवादी प्रशासक तानाशाह की भूमिका निभाते हैं। कुलपति और प्राचार्य के पदों पर आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं है। इसलिए ये सभी पद शत-प्रतिशत अगड़ी जातियों के लिए एक तरह से आरक्षित हो गए हैं। यह विडंबना ही है कि देश के 99% कुलपति अगड़ी जातियों के हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2020 में सभी कुलपतियों को बुलाकर यह बताने के लिए कहा था कि वे आखिर, आरक्षण नीति का पालन क्यों नहीं कर रहे हैं? राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के इस आदेश का भी कोई परिणाम नहीं निकला। यूजीसी विनियमन- 2026 आज के दौर के द्रोणाचार्यों को सबक सिखाने वाला एक आदेश है,ना कि किसी जाति के खिलाफ। यदि उच्च शिक्षण संस्थाओं में द्रोणाचार्य के रूप में कार्य करने वालों की रक्षा के लिए तलवारें खींचेंगे तो "एकलव्यों" का भी तीर अब कमान से निकलता हुआ दिखाई देगा। वंचना का शिकार उस एकलव्य की पीड़ा समझिए, जिसे गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या सीखने की इजाजत नहीं दी थी। समय की आहट और नाज़ुकता को पहचानिए। अब संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई सामाजिक शक्ति भारत के वंचित या शोषित वर्ग को ज्यादा दिन तक रोक नहीं सकती है। कोई भी सामाजिक टकराव नई सुबह होने का रास्ता नहीं रोक सकता है।
      लंबे अरसे से विश्विद्यालयों और कॉलेजों में जाति/धर्म के आधार पर अन्याय या असमानता की अदृश्य परंपरा चली आ रही है। आख़िर,यह कब तक चलेगा? सरकार इस सामाजिक अन्याय या भेदभाव को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है तो कोई वर्ग इसमें बाधा नहीं बनना चाहिए। समता और समानता की भावना और आकांक्षा किसी भी देश की एकजुट और अखंड होने के लिए आवश्यक हैं। यदि इन आकांक्षाओं पर कोई प्रहार हो रहा हो, तो सरकार का दायित्व है कि वह उस पर नियंत्रण और उसकी रोकथाम के लिए ठोस प्रभावी कदम उठाए। यह देश तब तक एक है,जब तक यहां के वासियों को इस देश में बेहतरी की उम्मीद है। यह बात विश्व के हर भूभाग के लिए लागू होती है।
        यूजीसी विनियमन 2026 उच्च शिक्षा में वर्ग विशेष के वर्चस्व की दीवारों में दरार पैदा करने की दिशा में एक पहल है। इससे न किसी का हक छिनेगा और न ही किसी पर आसमान टूट पड़ेगा। यह वह पहल है जो संविधान लागू होते ही तुरंत शुरू हो जानी चाहिए थी,लेकिन यदि देर से ही शुरू हुई,तो इसका खुलकर दिलोदिमाग से स्वागत और सम्मान किया जाना चाहिए।
        भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में लंबे अरसे से एक शक्तिशाली सामाजिक वर्ग का वर्चस्व कायम रहा है और आज भी है। यह वर्चस्व केवल कानून में ही नहीं है, बल्कि कई तरह की मूल्यांकन प्रक्रियाओं में,शोध कार्य में सुपरवाइजर्स आवंटन में,हॉस्टल आवंटन में, शिक्षकों के चयन और पदोन्नति जैसी प्रक्रियाओं में एक मौन,अदृश्य या अप्रत्यक्ष रूप में भेदभाव लंबे अरसे से होता आ रहा है। यदि यूजीसी इस दमनकारी और भेदभावपूर्ण ढांचे को तोड़ने का प्रयास कर रहा है, तो केंद्र सरकार और शिक्षा मंत्री को इसका श्रेय और बधाई मिलनी चाहिए। इस आदेश के तहत अब उच्च शिक्षण संस्थानों में वरिष्ठ संकाय सदस्यों और संस्थान प्रमुखों के नेतृत्व में गठित समता समिति समान अवसर से जुड़े मामलों की निगरानी करेंगे,यानी अब भेदभाव को आंतरिक और गोपनीय प्रक्रियाओं में छुपाकर रखना कठिन होगा। इस मुद्दे पर वंचित तबके (विशेष रूप से एससी-एसटी और ओबीसी) के लोग सरकार के साथ हैं।
       यह नया विनियमन विशेष रूप से एससी-एसटी, ओबीसी,अल्पसंख्यक, महिलाओं, दिव्यांग छात्रों और शिक्षकों को समान अवसर दिलाने में सहायक सिद्ध होगा। भले ही यह कार्य संविधान विरोधी भाजपा सरकार के कालखंड में हो रहा है तो भी इसका स्वागत उस हर भारतीय नागरिक को करना चाहिए जो समता,मानवता, न्याय,बंधुत्व और बराबरी में यकीन करता है। " हो कहीं भी आग, मगर आग जलनी चाहिए।" अब यदि किसी का मूल्यांकन जानबूझकर प्रभावित किया गया, मानसिक उत्पीड़न किया गया या “तुम यहाँ के लिए फिट नहीं हो” (नॉट फाउंड सूटेबल) जैसे वाक्यों और टूल्स के जरिए हतोत्साहित या रिजेक्ट किया गया, तो ऐसे मसलों पर कार्रवाई के लिए संस्थान में एक अनिवार्य और जवाबदेह प्राधिकरण मौजूद होगा, जिसकी सिफारिशों पर समयबद्ध कार्रवाई करना संस्थान के लिए बाध्यकारी होगा।
       इस विनियमन के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में एक समान अवसर केंद्र अनिवार्य रूप से स्थापित होगा। शिकायत निवारण की स्पष्ट समय-सीमा तय होगी और उसकी समयबद्ध रिपोर्टिंग यूजीसी तक पहुँचेगी। अब पीड़ित छात्र को डराने के लिए यह कहना आसान नहीं होगा कि “शिकायत करोगे तो करियर खत्म हो जाएगा।” इस दिशा में यह पहला अवसर है जब संस्थान का प्रशासन औपचारिक रूप से उत्तरदायी बनाया गया है। 
      भारत के कई प्रतिष्ठित संस्थानों में दलित–पिछड़े छात्रों की आत्महत्या की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं, जो किसी दुर्घटना का नहीं, बल्कि संस्थागत उपेक्षा और सामाजिक बहिष्कार का परिणाम रही हैं। समझने के लिए हैदराबाद के रोहित वेमुला और महाराष्ट्र की पायल तावड़ी इसके बड़े उदाहरण हैं। इस आदेश में काउंसलिंग, मेंटरशिप, सेफ-स्पेस और संस्थान की जवाबदेही को अनिवार्य किया गया है। यह स्पष्ट रूप से रोहित वेमुला और पायल तावड़ी जैसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में एक संस्थागत प्रयास है। आरक्षित वर्ग के शिक्षकों और शोधार्थियों के संदर्भ में चयन,मूल्यांकन और पदोन्नति से जुड़ी प्रक्रियाएँ अब समीक्षा और रिपोर्टिंग के दायरे में होंगी, जिससे मनमानी की गुंजाइश सीमित होगी। शिक्षण संस्थाओं की चयन समितियों की मनमानी, “मेरिट” के नाम पर जातिगत पूर्वाग्रह, योग्य होने के बावजूद हाशिये पर धकेलना,इन तमाम बेईमान प्रक्रियाओं पर यह आदेश प्रहार करता और अंकुश लगाता हुआ नज़र आएगा,क्योंकि यह उनके लिए एक मजबूत संस्थागत सपोर्ट सिस्टम तैयार करने वाला है।
      इस सुधार के ऐतिहासिक कदम को कुछ लोगों ने चुनौती भी दी है और मामला अदालत में भी गया है। दो माह बाद इस पर अदालत की तारीख तय होना महत्वपूर्ण होगा। यदि न्यायपालिका इस आदेश की भावना को समझती है, तो वाकई वर्चस्व की संरचनाओं में दरार पड़ेगी,लेकिन वंचित तबकों को भी सतर्क रहना होगा। उच्च शिक्षण संस्थान इन नियमों को काग़ज़ तक सीमित रखने का प्रयास कर सकते हैं। असली लड़ाई तो इसके ईमानदारी पूर्वक क्रियान्वयन की है। यह आदेश कोई क्रांति नहीं है,लेकिन यह उस क्रांति का कानूनी औज़ार जरूर है, जिसकी माँग वंचित समाज दशकों से करता आ रहा है। कोई आधुनिक दौर का गुरु द्रोणाचार्य किसी दलित एकलव्य का अंगूठा मांगे,अब यह स्वीकार्य नहीं होगा।
      यूजीसी के इस नए विनियमन में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे अगड़ी जातियों को डरने की जरूरत है। फिर भी वो डर रहे हैं। यह रेगुलेशन तो वंचित वर्गों के अंदर के डर को खत्म करने के उद्देश्य और नीयत से बनाया और लागू किया जा रहा है।
          जो अब तक डराते रहे हैं,वे आज खुद डरे हुए हैं!दरअसल, देश के उच्च शिक्षण संस्थान अगड़ी जातियों के लिए आज भी सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं। वे इस गढ़ को किसी भी तरह से बचाना चाहते हैं। इसलिए वो यहां सामाजिक न्याय को लागू करने के तमाम प्रयासों को विफल कर देने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं। मंडल आयोग की सिफारिशों को जब 1990 में लागू करने की घोषणा हुई तो उन्होंने पूरी ताकत और अराजकता से सड़क से लेकर न्यायपालिका तक इसका विरोध किया। हालांकि, वे इसे लागू होने से रोक नहीं पाए। सवर्ण वर्चस्व सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के 27% आरक्षण को वैध तो ठहराया,लेकिन उसमें जातिगत आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% और एक आय सीमा वालों को क्रीमी लेयर मानते हुए आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का आदेश पारित किया। वे इसलिए डरे हुए हैं कि यह रेगुलेशन भी यदि लागू हो गया तो वो वंचित वर्गों के साथ जातिगत और अन्य कई तरह के भेदभाव नहीं कर पाएंगे। वो इसलिए डरे हुए हैं कि उनका जातिवादी वर्चस्व का यह किला ढह न जाए!
         इस विनियमन से सवर्णों को डरने की कतई जरूरत नहीं है। उन्हें अपनी ऊर्जा खुद को जातिवादी अमानवीय मानसिकता से उबरने में खर्च करनी चाहिए। आज भी देश में जाति और धर्म आधारित भेदभाव को हतोत्साहित करने वाले कई कानून और अधिनियम लागू होने के बावजूद वंचित वर्गों के साथ हो रहे जातिगत भेदभाव को अब तक रोका नहीं जा सका है।

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