साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Wednesday, May 26, 2021

कविता, महामारी

 

महामारी

महामारी ! महामारी !

बख़्श दे अब जान हमारी।


पहले से तबाह थे,

महंगाई और बेरोजगारी की आफतों से,

अब तूने दिखाई न भागने की लाचारी।

कब तक मास्क पहने, घर में बैठें-

दूरी बनाएं, अस्पताल जाएं-

अब सरकार से दूरी हुई हमारी।

 

कोरोना का उतना रोना नहीं,

जितना शासन की लापरवाही का ।

महामारी से उतनी लाशें हुईं नहीं,

जितनी लाचार चिकित्सा एवं दवाई से।

भूख, भय, अपनों से दूरी-

एवं अस्पतालों की अत्याचारी से,

संकट वक्त है महामारी का।

 

लाशों पर राजनीति और बिजनेस,

लाशों की कोई कदर नहीं,

श्मशानों, कब्रिस्तानों में जगह नहीं,

नदी किनारे कुत्ते नोचें, रोड किनारे कौए-गिद्ध,

अपनों ने लाशों को त्यागा,

कर्मकांड हो कैसे सिद्ध।

 

कहीं अंग निकासी, इलाज पर लूट-

न ऑक्सीजन और न जीवन पर छूट।

आमजन ने सब कुछ खोया,

इस महामारी में-

कभी घर में, अस्पतालों में रोया

तो कभी हो लाचार जीवन की लाचारी में।

 

हौसला रखें, सावधानी रखें।

संभव हो एक दूजे को आगे आएं।

अंधभक्ती न करें सरकारी।

महामारी ! महामारी !

तेरे निश्चित ‘अंत’ की है, बारी ।।




संतोष कुमार अंजस

लखीमपुर-खीरी(उ०प्र०)

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