साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Friday, May 28, 2021

इंसानियत इन्सान के अन्दर

कोरोना ने मारी इंसानियत, मां के शव के पास बैठे दो दिनों से भूखे मासूम की  किसी ने नहीं की मदद

मै चाहता नही था मगर चाहना पड़ा |
मजबूरियों मे हाथ उसका थामना पड़ा ||
माहौल ऐसा उसने यहाँ कर दिया खड़ा |
उसके सफेद झूठ को सच मानना पड़ा ||
जो बच गए हैं उनपे दोबारा ना घात हो |
इस वास्ते दुश्मन का हाल जानना पड़ा ||
मैं भी कहीं बन जाऊं ना बदनाम मसीहा |
इस डर से गिरहबां में खुद ही झाँकना पड़ा ||
चैनो अमन सुकूँ की हिफाजत मैं कर सकूँ |
इस तरह अपने ख्वाब में भी जागना पड़ा ||
जिन्दा रहे इंसानियत इंसान के अंदर |
बेचैन शुबह शाम दुआ मागना पड़ा ||
श्याम किशोर बेचैन
9125888207



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