अपने जन्मदिन पर विशेष
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मेरे जन्म का प्रमाण पापा जी के द्वारा हस्तलिखित |
बहुत बहुत आभार
आप सब परिवारी, ईष्ट-मित्र, साथियों, व गुरुजनों का।
-अखिलेश कुमार
अरुण
26/04/2021
अपने जन्मदिन पर विशेष
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मेरे जन्म का प्रमाण पापा जी के द्वारा हस्तलिखित |
बहुत बहुत आभार
आप सब परिवारी, ईष्ट-मित्र, साथियों, व गुरुजनों का।
-अखिलेश कुमार
अरुण
26/04/2021
लॉकडाउन बचाव है गारंटी नहीं, ठोस कदम उठायें
(स्वतंत्र दस्तक के जौनपुर संस्करण में २२ अप्रैल २०२१ को प्रकाशित)
महामारी अपने विकराल रूप को धारण करते जा रही है. कोविड-19 का यह दूसरा दौर है, पहली खेप में हम जीत गए थे लगभग-लगभग सब कुछ ठीक था. पिछले साल जो हुआ सो हुआ कितने अपने मौत की गोद में सोकर परिवार को रोने-धोने को छोड़ गए, जिसके घर से कमाऊ पूत/पति/भाई/बाप/बहन/माँ चले गए उनके घर में अभी भी अँधेरा छाया हुआ है. जो जिन्दा हैं वह अपनी रोजी-रोटी के जुगत में किसी नई जगह पर अपने हुनर का प्रदर्शन करने में जी-जान से लग गए कि बॉस अगले महीने उनकी तरक्की कर देगा तो मुन्ने का दूध और बूढ़े माँ-बाप के दावा दारू में कुछ सहूलियत हो जाएगी, स्कूल/कालेज में लड़के मनोयोग से पढ़ने का मन बनाने लगे थे, शिक्षक पढ़ाने लगे थे. शादी-बारात के मंडप सजने लगे थे. दुकानों पर खरीदारी जारी थी. देश धीरे-धीरे अपने पुराने ढर्रे पर जाने लगा था. होली-दीपावली, ईद, तीज-त्योहार, धार्मिक यात्राओं आदि का चलन पुनः चालू हो गया था. नेताओं का अपना त्यौहार मनने लगा, सभाएं होने लगी, चुनाव के बिगुल बजने लगे एक दुसरे को पटखनी देने के लिए जोर-आजमयिस चालू था. बस यहीं हम गच्चा खा गए. कोरोना को लेकर जितने गाईडलाईन्स जारी किये गए सब धरे के धरे रह गए हम (देश की जनता) लापरवाह हुए ही सरकार सो गई एकदम कुम्भकर्ण वाली नींद.
जब कोरोना की पहली लहर आकर जाने को थी तब हमें इस महामारी से बचने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए थे. खतरा टला नहीं था इसका भान सभी को था चाहे वह आम आदमी हो या खास. पहली गलती को सुधारने का हमें जो मौका हाथ लगा हम बेफिक्र होकर दूसरी लहर के आने का इंतजार कर रहे थे और उसके लिए पूरा खुला मैदान तैयार कर रहे थे. उसके स्वागत में तैयार हम भूल गए थे कि अभी हम कोरोना के कहर से निकल कर आये हैं. जो गलती पूर्व में हो चुकी थी उसको सुधारने का मौका मिला था. मुलभुत चिकत्सकीय सुविधाओं को युद्धस्तर पर विकसित करना था. आक्सीजन के नए प्लांट लगाये जाने चाहिए थे. वेंटिलेटर बेड और कोरोना जाँच उपकरणों को अस्पतालों में बढ़ावा देना चाहिए था, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाथ फैलाकर अपनी चिकत्सकीय क्षमता को बढ़ाना चाहिए था किन्तु यह सब हम न कर सके अब तो जन-सामान्य को छोड़िये अपनों को बचाने की गुहार वर्तमान सत्ता के नेता तक लगा रहे हैं विपक्षियों की क्या विसात....समाचार पत्रों के हवाले से खबर आई है कि देश में दो-चार जगह आक्सीजन प्लांट लगाये जाने के लिए भूमि-पूजन किया गया है. देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, अमर उजाला स्वतंत्र प्रभार आदि में प्रमुखता से खबर छपा है कि उत्तर प्रदेश में नई प्रोगशालायें खोलने वालों को सहयोग दिया जाये, 220 सिलेंडर की क्षमता का डीआरडीओ की सहायता से नया आक्सीजन प्लांट स्थापित किया जायेगा जहाँ अगले हफ्ते तक ऑक्सीजन उत्पादित हो सकेगा तथा नए मेडिकल कालेज खोलने के लिए आक्सीजन प्लांट की अनिवार्य शर्त रखी गई है. कुछ स्टील फैक्ट्रियां अपने यहाँ मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन करेंगी. यह राज्य सरकार का स्वागत योग्य सराहनीय फैसला है.
पिछली सरकारों ने क्या किया क्या नहीं किया उसका
रोना रोने से ज्यादा बेहतर होगा की वर्तमान सताधारी सरकारें जनता के प्रति
उत्तरदायी हों और जनता की सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य की योजनाओं
में चिकत्सीय सेवाओं को विकसित करने में प्राथमिकता दें तथा कोरोना या कोरोना जैसी
आने वाली वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए स्वंय को तैयार रखें. जाति-धर्म,
क्षेत्रवाद, भाषाई आधार पर राजनैतिक पाशा चलने का तरीका बदलना होगा. तभी हम अपने
भविष्य को सजा और सवंरा हुआ पाएंगे तथा मानवीयता को जिन्दा रख पाएंगे
अखिलेश
कुमार अरुण
स्वतंत्र
टिप्पणीकार/लेखक
ग्राम
हजरतपुर,लखीमपुर-खीरी
ਕੋਰੋਨਾ
ਦਵਾਈ ਸਾਕਾਰਾਤਮਕ ਅਤੇ ਤੁਹਾਡੀ ਸਵੈ-ਸ਼ਕਤੀ
ਲਾਲ ਬੁਖਾਰ, ਚਿਕਨਗੁਨੀਆ ਅਤੇ ਇਥੋਂ ਤਕ ਕਿ ਪਿਛਲੀ ਲਾਗ ਵਾਲੀਆਂ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਦੀ ਭਿਆਨਕਤਾ ਕੁਝ ਅਜਿਹੀ ਹੋਵੇਗੀ ਜੋ ਅੱਜ ਕੋਰੋਨਾ ਵਜੋਂ ਵੇਖੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ. ਲਾਗ ਤੇਜ਼ੀ ਨਾਲ ਫੈਲ ਰਹੀ ਹੈ, ਇਕ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਇਕ ਲੋਕ ਕੋਰੋਨਾ ਦੀ ਪਕੜ ਵਿਚ ਆ ਰਹੇ ਹਨ, ਕਿਤੇ, ਪੂਰਾ ਪਰਿਵਾਰ ਕੋਰੋਨਾ ਦੀ ਪਕੜ ਦੁਆਰਾ ਕੋਰੋਨਾ ਦੇ ਗਲ੍ਹਿਆਂ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹੈ, ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਛੁਟਕਾਰਾ ਪਾਉਣ ਲਈ ਹੱਲ. ਕੋਰੋਨਾ ਦੇ ਹੁਣ ਸਿਰਫ ਅਤੇ ਕੇਵਲ ਸਕਾਰਾਤਮਕ ਵਿਚਾਰ, ਸੋਚ, ਸੰਦੇਸ਼, ਸਵੈ-ਸ਼ਕਤੀ ਸ਼ਾਮਲ ਹਨ. ਲੱਖ
ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਲੋਕ ਕੋਰੋਨਾ ਦੀ ਪਕੜ ਵਿਚ ਆ ਰਹੇ ਹਨ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿਚ ਦਵਾਈ ਅਤੇ ਸ਼ਰਾਬ ਅਤੇ ਖਾਣ
ਪੀਣ ਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਲੈਣ ਲਈ ਬਾਹਰ ਜਾਣਾ ਪਏਗਾ, ਤੁਸੀਂ
ਪਰਿਵਾਰ ਵਿਚ ਉਦੋਂ ਤਕ ਨਹੀਂ ਰਹਿ ਸਕਦੇ ਜਦੋਂ ਤਕ ਤੁਸੀਂ ਪਰਿਵਾਰ ਵਿਚ ਭੁੱਖ ਨਾਲ ਮਰ ਨਹੀਂ
ਜਾਂਦੇ. ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ, ਤੁਹਾਨੂੰ
ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਨੂੰ ਕੋਰੋਨਾ ਦੀ ਖ਼ਬਰ ਤੋਂ ਦੂਰ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਜੋ
ਤੁਹਾਨੂੰ ਮਾਨਸਿਕ ਤੌਰ ਤੇ ਕਮਜ਼ੋਰ ਬਣਾਉਂਦਾ ਹੈ.
ਸੋਸ਼ਲ
ਮੀਡੀਆ 'ਤੇ ਚਲ ਰਹੀ
ਖ਼ਬਰਾਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਅਣਜਾਣੇ ਵਿਚ ਕੋਰੋਨਾ ਦੇ ਮੂੰਹ ਵਿਚ ਧੱਕ ਰਹੀ ਹੈ. ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਉਪਭੋਗਤਾ
ਖਬਰਾਂ ਨੂੰ ਸਾਂਝਾ ਕਰਨ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਸੱਚਾਈ ਦੀ ਤਹਿ ਤੱਕ ਨਹੀਂ ਜਾਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ, ਅਜਿਹਾ ਨਹੀਂ ਹੈ ਕਿ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ
ਖਬਰਾਂ ਅਫਵਾਹ ਹੋਣ. ਕੁਝ ਸਚਾਈਆਂ ਵੀ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਹੋਰ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਤੋਂ ਹੋਣ ਵਾਲੀਆਂ ਮੌਤਾਂ ਦੀ ਗਿਣਤੀ
ਵੀ ਅੱਜ ਕੋਰੋਨਾ ਵਿੱਚ ਗਿਣੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਇਸ
ਲਈ ਕੋਰੋਨਾ ਨੇ ਆਪਣਾ ਭਿਆਨਕ ਰੂਪ ਧਾਰ ਲਿਆ ਹੈ। ਜੇ ਕੋਈ ਸਾਡੇ ਦੋਸਤਾਂ ਨਾਲ ਮਗਨ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, ਤਾਂ ਇਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਕੋਲ ਰੱਖੋ ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ 'ਤੇ ਇਸ ਨੂੰ ਸਾਂਝਾ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਚੋ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਕਰਨ
ਨਾਲ, ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ
ਆਪ ਨੂੰ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਮਾਨਸਿਕ ਤਣਾਅ ਤੋਂ ਬਚਾ ਸਕਦੇ ਹਾਂ.
ਅੱਜ, ਜੋ ਲੋਕ ਇਸ ਮਹਾਂਮਾਰੀ ਦੇ ਪ੍ਰਕੋਪ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਹਨ, ਆਪਣਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਘੱਟਣ ਨਹੀਂ ਦਿੰਦੇ, ਸਿਹਤਮੰਦ ਪਰਿਵਾਰਕ ਮੈਂਬਰ ਅਫਵਾਹਾਂ ਤੋਂ ਦੂਰ ਰਹਿਣ
ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦੇ ਪੀੜਤਾਂ ਦੀ ਸਹਾਇਤਾ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਸਾਰੀ ਰਜਾ ਲੈਣ, ਜਦ ਤੱਕ ਉਹ ਠੀਕ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੇ ਅਤੇ ਤੰਦਰੁਸਤ ਹੋ
ਸਕਦੇ ਹਨ. ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਇਕ ਸਾਵਧਾਨੀ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ, ਆਤਮ-ਵਿਸ਼ਵਾਸ
ਅਤੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਬਣਾਈ ਰੱਖਣ ਦੀ ਜ਼ਰੂਰਤ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਤੁਹਾਡੇ ਦੇਸ਼ ਦਾ ਨਿਜ਼ਾਮ ਤੁਹਾਨੂੰ ਅਤੇ
ਤੁਹਾਡੇ ਸਮਾਨ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਅਤੇ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀ ਤਾਕਤ ਦਾ ਅਨੰਦ ਲੈਣ ਵਿਚ ਰੁੱਝਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ. ਕੋਰੋਨਾ
ਦੇ ਨਾਮ ਤੇ, ਸਰਕਾਰ
ਵੱਲੋਂ ਵਧੇਰੇ ਸਹਾਇਤਾ ਦਿਖਾਈ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ, ਪਰ
ਹੁਣ ਇਹ ਸੁਨਿਸ਼ਚਿਤ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਸਰਕਾਰ ਨੀਂਦ ਤੋਂ ਕੁੰਭਕਰਨੀ ਵੱਲ ਚਲੀ ਗਈ ਹੈ।ਜਿਸ ਕਿਹਾ ਜਾ
ਰਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਰਾਜ ਸਰਕਾਰਾਂ ਉੱਤੇ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ। ਅਜਿਹੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿੱਚ, ਕੋਰੋਨਾ ਨਾਲ ਨਜਿੱਠਣ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਹੁਣ ਸਾਡੀ
ਆਪਣੀ ਹੈ.
ਅਖਿਲੇਸ਼
ਕੁਮਾਰ 'ਅਰੁਣ'
ਫ੍ਰੀਲਾਂਸ
ਟਿੱਪਣੀਕਾਰ / ਲੇਖਕ
ਪਿੰਡ
ਹਜ਼ਰਤਪੁਰ, ਜੀਲਾ ਲਖੀਮਪੁਰ-ਖੇੜੀ
पिछली बार लॉकडाउन में घर गया तो घर की साफ-सफाई करते/करवाते हुए मेरे द्वारा #काष्ठ_निर्मित_ट्रेक्टर हाथ लगा जिसको बड़े मनोयोग से बनाया था. जितनी रचनात्मकता लगा सकता था लगया. तब हम 6 या 7 वें दर्जे में होगें. खिलौनों की रचनात्मकता को लेकर रात भर सोचते और दिन में लग जाते, दिन-भर खुटुर-पुटुर दुकान के बाँट ज्यादातर हथौड़ी-छेनी के निचे ही रहते थे. #ट्रेक्टर के साथ-साथ #कल्टीवेटर, #तवे_का_हैरो, #कराहा, #ट्राली सब हुबहू नक़ल थे जो लड़की और लोहे के बनाये गए थे. उनमें से अब केवल ट्रेक्टर ही बचा हुआ है वह भी अगला पहिया (ट्रेक्टर के माफिक ही स्टेरिंग के साथ मुड़ता था) विहीन, लोहे के खिलौने (कराहा, कल्टीवेटर, हैरो, ट्राली) जो ट्रेक्टर के साथ उपयोग में लाये जाते थे हमारे शहर में पढ़ने आने के कुछ साल बाद पापा ने किसी कबाड़ी वाले को बेच दिए. आज होता तो उसे अपने बचपन के ऐतिहासिक धरोहरों में संजो के रखता. उससे बचपन की बहुत सारी यादें जुड़ी हुई हैं, याद है कि गर्मी की दुपहरी में घर के कामों से निवृत होकर माता जी के आराम में खट्ट-पट्ट ध्वनि और खेल-खिलौनों को लेकर भाईयों से मारा-पिटी चें-पों/चिल्ल-पों से बिघ्न डालना और फिर माता जी के द्वारा कूटे जाना...मन भर रो लेने के बाद नींद बहुत अच्छी आती थी. शाम को नींद खुलने पर सुबह का भ्रम हो आता था कुछ क्षण ऐसे निकल जाता था सुबह है कि शाम.
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मेरे बचपन का खिलौना |
हमारे बचपन के दिनों में (90 का दशक) खेल-खिलौनों
के नाम पर मेले-ठेले में 2 रुपये से लेकर 20 रूपये तक के अच्छे-खासे खिलौने क्या?
टिकिया वाली बन्दुक,चाबी वाली कार हाथी-घोड़ा बस यही मिलता था. तकनिकी रूप से
खिलौनों में हम ज्यादा तरक्की नहीं किये थे या यूँ कहें कि हम खिलौनों की अच्छी दुकान
पर पहुँच ही नहीं पाते होंगे. तब घर की आर्थिक स्थिति फ़िलहाल ठीक थी किराने की
दुकान के साथ-साथ साईकिल की दुकान थी, फर्निचरी का भी काम होता था. पिता जी मेठगिरी
(ठेकेदारी) भी करते थे, मने कुल मिला के दाल-रोटी का इंतजाम हो जाता था. बचपन में
हमारा पढ़ाई लिखाई से ज्यादा मन दुकान-दौरी के साथ ही साथ रचनात्मकता में रमा रहता
था. छः बधिया से लेकर छोटे-छोटे कियारीदार चारपाई की बुनाई (नाना को बुनते देख कर
सीख लिया था.), बांस/शहतूत की टोकरी और अल्युमिनियम तार की टोकरी बर्तन रखने के
लिए (जिसको हमारे तरफ खांची बोलते हैं) रेडियो
रिपेयरिंग पंखे की वाईन्डिंग/रिपेयरिंग, सिलाई मशीन रिपेयरिंग थोड़ी-बहुत दर्जीगिरी,
फर्निचरी का काम पापा को करते देख कर सीख लिया था, दरवाजे, कुर्सी-मेज, चारपाई,
तख्ता आदि बनाने में निपुड हो गया था. सबसे बड़ी मजे की बात यह थी कि शादी व्याह
में दुल्हे-दुल्हन की पाटी (बैठने का पीढ़ा) पुजाई या बारात के वापस आने पर बेड/दहेज़
के तख्ते को फिट करने की लिए जाता तो 151 रुपये से कम न लेता, हमारे चक्कर में
दुसरे छोटे भाईयों को माता जी गुस्से में आकार खरी-खोटी सुनती थी, “इसका जीवन तो
कट जायेगा तुम्हारे लोगों का क्या होगा न पढ़ने में हो न कुछ गुण ढंग में.....मने बहुत कुछ सुना देतीं
थीं.
हाईस्कूल के बाद (पापा जी का कहना था फेल हो गए
तो पढ़ाई छोड़ा देंगे .....अपना भी कुछ ऐसा ही था पर हुआ कुछ और हम दोनों भाई नवल
किशोर और मैं गुड सेकेण्ड डिवीजन से पास हो गए पूरे गाँव में पास होने वाले पहले
थे) इंटर के बाद पढ़ाई का ऐसा चस्का लगा कि आज डिग्रियों की भरमार है और गुलाम (सरकारी
नौकर) बनने की जद्दोजहद जारी है. बचपन का सब हुनर छूट गया आज पढ़ाई-लिखाई तक सिमित
होकर रह गया हूँ. बेकार और बेरोजगार/प्राइवेट विद्यालय की प्रोफेसरी है, मझला भाई
दुबई में डोमेस्टिक इलेक्ट्रीशियन का काम करता है और दो भाई एक बहन पढ़ाई-लिखाई में
लगे हुए हैं.
(स्मृतियों के झरोखे से)
फेसबुक के वाल पर अबाध गति से दौड़ती उंगलिया यकायक थम सी गयीं, मानो बज्रपात हो गया. साहित्यजगत का एक और तारा जीवन के अंतिम पटल पर जाकर शून्य में विलीन हो गया. पिछले वर्ष से लेकर आज तक हमने साहित्य के क्षेत्र से अनेक शब्द-साधकों को खो दिया है. कोरोनाकाल का बरपा कहर अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है. अनेक नामचीन साहित्यकारों गिरिराज किशोर, राहत इन्दोरी, शांति स्वरुप बौद्ध आदि को हमने खोया है और खोते जा रहे हैं, साहित्यकारों की इस श्रंखला में बीते का 17 अप्रेल को एक और नाम जुड़ गया. जाने-माने साहित्यकार पदमश्री सम्मान के साथ-साथ दर्जनों साहित्यिक सम्मान से सम्मानित नरेन्द्र कोहली जी कोरोना के चपेट में आने से काल-कवलित हो गए. साहित्य जगत के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है.
नरेन्द्र
कोहली जी कोई रचना हमारे हाथ लगी तो वह थी ‘क्षमा करना जीजी’ जो एक सामाजिक उपन्यास है जिसकी रचना कर पाठकों के
अंतर्मन में अपनी पैठ बना लिए थे. मैं इस उपन्यास को पढ़ता ही चला गया अंतिम पृष्ठ
तक, इस उपन्यास का चित्रण परिवार
के सम्बन्धों के भावुक वातावरण को लेकर चित्रित किया गया है, किन्तु इसकी मूल व्यथा पारिवारिक सम्बन्धों तक
ही सीमित न होकर निम्न मध्य वर्ग की नारी के जीवन में, विकास
पथ के विघ्नों के रूप में उसके सामने आती अनेक समस्याएं हैं। परिवारजनों का स्नेह
बंधन भी एक बाधा हो सकता है। इस उपन्यास की नायिका जिजीविषा से भरी एक जुझारू
महिला है जो अपने सामर्थ्य, श्रम तथा साहस के बल पर जीवन का
निर्माण करना चाहती है। वह वैसा कर पाती है या नहीं इसमें मतभेद हो सकता है,
लेकिन वह अपने सम्मान की रक्षा में सफल होती है, इसमें कहीं कोई संदेह नहीं कि यह एक कालजयी रचना नहीं है । नरेन्द्र कोहली के इस सामाजिक
उपन्यास को हिन्दी पाठक समाज द्वारा खूब सराहा गया है। एक और उपन्यास है ‘न
भूतो न भविष्यति’ स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित उपन्यास है जिसमें लेखक ने
बड़े मनोयोग से अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया है, आदि से अंत तक इस उपन्यास से
स्वामी विवेकान्द जी के कर्म, लक्ष्य और उनकी उपलब्धियों की स्पष्ट झलक मिलती है
एक बार पुनः स्वामी जी जीवित हो जाते हैं .
कोहली जी की रचनाओं में 'परिणति', 'नमक का कैदी', 'संचित
भूख', 'किरचे', 'निचले फ्लैट में'
और 'नींद आने तक' जैसी
कहानियाँ, पाठकों द्वारा न भुलाई गयीं न भुलाई जाएँगी। अपनी वेजोड़ रचनाकरिता के
लिए आप सदैव साहित्य जगत में ध्रुव तारे की तरह टिमटिमाते रहेंगें.
-अखिलेश कुमार अरुण
कोरोना
का दूसरा दौर और हम
-अखिलेश
कुमार ‘अरुण’
(स्वतंत्र दस्तक, जौनपुर से प्रकाशित 19 अप्रैल 2021)
मेरे इस लेख लिखे जाने तक भारत में कोरोना मरीजो की संख्या पुरे भारत में 1,42,91,917 है, प्रदेशों की बात करें तो महाराष्ट्र अपने यहाँ कोरोना मरीजों की संख्या 36,39,855 के साथ पहले स्थान पर है। हम जिस प्रेदश में रहते हैं वहां मतलब अपने उत्तर प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या 7,66,360 के साथ ७ वें स्थान पर है। अच्छी बात यह है कि अपने देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या काफी कम है। भारत में कुल कोरोना मरीजों की संख्या 1,42,91,917 के सापेक्ष मरने वालों की संख्या- 1,74,308 है जो 1।26 प्रतिशत है।
इस वैश्विक महामारी की भयावहता को हमारा देश अन्य देशों की
अपेक्षा नहीं देख सका है। इटली, फ़्रांस, चीन, अमेरिका में जो देखने को मिला वह
काफी डरावना और मानसिक अवसाद का कारण बना, व्यक्ति अपने जीवन को जीने के लिए पल-पल
की कुशलता का कामना कर रहा था। उस स्थिति का सरकार ने जमकर फायदा उठाया
मंदिर-मस्जिद के मुद्दे को भुनाया गया, किसान निति को लागू करने का बिल लाया गया,
धारा 370 हटाया गया आदि जो पेंडिग मुद्दे थे उनको सलटाने में कोई कोर-कसर बाकी
नहीं रखा गया परिणामतः लोगों का विश्वाश सरकार की नीतियों से उठता गया और कोरोना
से सम्बंधित गाईडलाईस की अवहेलना जनसामान्य के द्वारा की जाने लगी क्योंकि लोगों
को यह संदेह हो गया की सरकार कोरोना की आडं में अपने उल्लू सीधा कर रही है जिसके
चलते आज हम फिर पुनः कोरोना के मुहँ जा फंसे हैं। पिछली बार कोरोना के चलते जो
लाकडाउन किया गया जो नीतियाँ लागू की गयीं उसका पालन हमारे देश के नागरिकों ने
बखूबी किया और कर भी रहे थे किन्तु सरकार ऊँघ रही थी। सरकार की तयारी कोरोना को
लेकर पहले भी और आज भी नगण्य है। अस्पताल आदि की अत्याधुनिक सुविधाओं पर ध्यान नहीं
दिया गया और न दिया जा रहा है।
कोरोना की विश्वसनीयता पर सरकार के कुछ कार्य आज भी प्रश्नचिन्ह का कार्य कर रहे हैं जैसे धार्मिक यात्राओं का निर्वाध अवागमन, कुम्भ मेले का स्नान, राज्य स्तरीय चुनाव की रैलियाँ और स्थानीय चुनावों में लोगों की उमड़ती भींड आदि आखिर क्या है यह? क्या कहेंगे इसे? सरकार की मंशा क्या है? क्या चाहती है सरकार और क्या चाहते हैं हमारे देश के लोग? एक साथ हजारों प्रश्न व्यक्ति को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ उसका जीवन है भी और नहीं भी है, क्या करे अपने लिए और अपने परिवार के लिए उसकी इस मनःस्थिति का जिम्मेदार हमारी वर्तमान सरकार है।
देश का हर एक व्यक्ति काम-धाम से घर आता है तो परिवार के
प्रत्येक सदस्य का मन भायातंकित हो उठता है। हमारे बीच से कौन सुबह का किरण देखेगा
और कौन नहीं, एक माँ-बाप के सामने बच्चों
की और बच्चों के सामने माँ-बाप की, भाई-बहन, पति-पत्नी और नाते-रिश्तेदारों
की रोनी सूरत एक साथ हजारों सवाल खड़े कर
जाती है आपनो से बिछड़ने का गम हर वक्त साये की तरह हमारे आगे-पीछे मंडरा रही है।
चिकत्सकीय जगत के लोग कोरोना जैसी वैश्विक बीमारी को दुधारू गाय
समझ कर खूब दुह रहे हैं। प्राईवेट अस्पताल संचालक सामान्य व्यक्ति के जाँच रिपोर्ट
में कोरोना की पुष्टि कर दो-चार दिन इलाज कर अच्छा-खासा रूपये ऐंठ लेते हैं और
नेगेटिव कर चलता बनते हैं। बड़े-बड़े महानगरीय शहरों में चिकत्सकीय जगत की
काली-करतूतें जग-जाहिर हो रहीं हैं किन्तु उन पर न सरकार का सिकंजा है और नहीं
प्रशासनिक कार्यवाही की जा रही है। हस्पतालों के प्रति राज्य और केंद्र सरकार की
लापरवाही का नतीजा है कि प्राईवेट अस्पतालों की खेती फल-फूल रही है।
जन-सामान्य की कम होती भागीदारी कोरोना महामारी को फलने-फूलने
में सहायता प्रदान कर रही है इसलिए लोगों को स्वंय से स्वयं के प्रति और अपने
ईष्ट-मित्रों, परिवार के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है तभी हम अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रख
सकते हैं क्योकिं अपनी सुरक्षा अब अपने हाँथों है और उसे आप जाने मत दें।
*इति*
बालिका दिवस पर विशेष
बाल गंगाधर बागी की रचना से हम अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हैं-
सावित्री हमारी अगर माई न होती
तो अपनी कभी भी पढ़ाई न होती
जानवर सी भटकती मैं इंसान होकर
ज्योति शिक्षा की अगर तूं थमाई न होती
ये देह माँ ने दिया, पर सांस तेरी रही
ये दिया ही न जलता गर तूं बताई न होती
किसकी अंगुली पकड़ चलती मैं, दिन ब दिन
गर तूं शिक्षा की सरगम सुनाई न होती.
आज हम सब 13 वें बालिका दिवस के उपलक्ष्य में एकत्र हुए हैं, इस राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत महिला और बाल-विकास मंत्रालय के तत्वाधान में भारत सरकार ने 2008 में किया था। वर्तमान समय के बदलते परिवेष में बालिकाओं को प्रयाप्त स्वतन्त्रता प्रदान की गई है केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों ने अनेक योजनाओं का किर्यान्वयन किया हुआ है किन्तु अबोध बच्चियां आज भी कोख में मार दी जा रही हैं। इतिहास के पन्नों में बालिकाओं के साथ की जाने वाली कु्ररता बरबस ही आंखों में पानी ला देता है, अबोध बच्चियों को तालू में अफीम चिपकाकर मारने की बात हो या देवदसी प्रथा के नाम पर क्रूरता, बालविवाह, सतीप्रथा, आदि-आदि। बदस्तूर यह सब आज भी जस का तस जारी है बस नाम बदलकर यथा-गर्भ में भ्रूण जंाच, बालात्कार-व्यभिचार, अनमेल विवाह, आदि।
इन सब बुराईयों को दूर करने के लिए षिक्षा ही एक ऐसा अस्त्र है जिससे सारे बन्धनों को तोड़ा जा सकता है अतः भारत देष में षिक्षा का अलख जगाने वाली सावित्रि बाई फूले पहली महिला हैं जो स्त्री-षिक्षा के लिए अपने को समर्पित कर दिया था। देश की पहली महिला शिक्षक, समाज सेविका, मराठी की पहली कवयित्री और वंचितों की आवाज बुलंद करने वाली क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी, 1831 को महाराष्ट्र के पुणे-सतारा मार्ग पर स्थित नैगांव में एक दलित कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम खण्डोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। 1840 में मात्र 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई फुले का विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले के साथ हुआ। उनका सौभाग्य रहा कि उन्हे ज्योतिबा फूले के रुप में उन्हें पति मिला, जिनका पग-पग पर सहयोग मिला। षिक्षा पर जोर देते हुए उन्होनें कहा है कि स्वाभिमान से जीने के लिए पढ़ाई करो।
आप जब व्याह कर आईं थीं तब आप अषिक्षित थीं इस क्रम में सबसे पहले ज्योतिबा जी ने आपको पढ़ाया-लिखाया, इस काबिल बनाया कि आप स्त्री-षिक्षा की मसाल को जला सकें। यह सब फूले परिवार के लिए इतना आसान नहीं था। जब आपको षिक्षित करने का कार्य ज्योतिबा जी कर रहे थे तब भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रताड़ना को आपने सहन किया। उस समय तक महिला को षिक्षित किया जाना सामान्य बात नहीं थी। सावित्री जी एक महिला के साथ-साथ शूद्र समुदाय से थीं। यानी एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा वाली स्थिति आस-पास के पितृ-प्रधान समाज के लोग आपके सास-ससुर के कान भरते रहते थे परिणामतः आप दोनों को परिवार से अलग कर दिया गया, यह दम्पति दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर हो गये थे किन्तु हिम्मत नहीं हारे अपने कर्म पर अडिग रहे। सावित्रीबाई फुले जब पढ़ाने के लिए अपने घर से निकलती थी, तब लोग उन पर कीचड़, कूड़ा और गोबर तक फेंकते थे। इसलिए वह एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थी और स्कूल पहुंचकर गंदी हुई साड़ी को बदल लेती थी।
सावित्रीबाई फुले और उनके पति ज्योतिराव फुले ने वर्ष 1848 में मात्र 9 विद्यार्थियों को लेकर एक स्कूल की शुरुआत की। बाद में उनके मित्र सखाराम यशवंत परांजपे और केशव शिवराम भावलकर ने उनकी शिक्षा की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने महिला शिक्षा और दलित उत्थान को लेकर अपने पति ज्योतिराव के साथ मिलकर छुआछूत, बाल विवाह, सती प्रथा को रोकने व विधवा पुनर्विवाह को प्रारंभ करने की दिशा में कई उल्लेखनीय कार्य किये। उन्होंने शुद्र, अति शुद्र एवं स्त्री शिक्षा का आरंभ करके नये युग की नींव रखने में आपने अदम्य साहस का परिचय दिया है जिसके लिए भारत की प्रत्येक महिला आपकी ऋणी है और रहेगी वह चाहे सवर्ण समाज की हो अथवा शुद्र, अति शुद्र समाज की महिला क्योंकि महिलाओं की गिनती वंचित तबके में की जाती है, यह अपने देष दुर्भाग्य है कि हम सावित्री बाई फूले जी को वह सम्मान नहीं देते जिसकी कि वह हकदार हैं सम्पूर्ण महिला जाति का शैक्षिक उध्दार सावित्री बाई फूले की ही देन है।
उनके योगदान को लेकर 1852 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया। साथ ही केंद्र और महाराष्ट्र सरकार ने सावित्रीबाई फुले की स्मृति में कई पुरस्कारों की स्थापना की और उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।
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(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...