संविधान दिवस की पूर्व संध्या पर
किसी भी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था एक ऐसी खूबसूरत और सर्वोत्तम राज्य व्यवस्था मानी जाती है जिसमें सभी वर्गों या पक्षों की असहमति के लिए ना सिर्फ सम्मान और स्वागत के लिए पर्याप्त जगह होती है, बल्कि वह कई राजनीतिक दलों के अस्तित्व और उसकी राजनीतिक सक्रियता के रूप में उसकी राजनैतिक संस्कृति में विद्यमान होती है अर्थात् असहमति की आवाज़ देश के लोकतंत्र, विपक्ष और प्रबुद्ध नागरिकों के जीवंत होने का लक्षण माना जाता है। असहमति की गुंजाइश के बिना कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था स्वस्थ और सशक्त नहीं बन सकती है। आज के दौर में संविधान द्वारा संचालित और नियंत्रित भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था बहुसंख्यकवाद/ हिंदुत्व /कथित नव राष्ट्रवाद व धर्मवाद की सांस्कृतिक चपेट में है और असहमति व्यक्त करने वालों को बाधित और दंडित करने की एक नयी संस्कृति का वर्चस्व और भय स्थापित होता हुआ दिखाई देता है।
आज बहुत से नए कानून और सरकारी कार्रवाईयों की बाढ़ सी आई हुई है जो रोजमर्रा की व्यक्त की जाने वाली असहमितियों की लोकतांत्रिक आवाज़ को दबाने,कुचलने और चुप कराने का सरकार या राज्य द्वारा लगातार उपक्रम या षड्यंत्र किया जा रहा है। आज आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में राजनीति,धर्म और मीडिया के असर की वजह से बेवजह आक्रामकता, नागरिक व्यवहार में सौम्यता,सहजता और परस्पर आदर के बजाय आहत होने, लड़ने और झगड़ने के मुहावरे बढ़ते जा रहे हैं। देश में एक प्रकार से नागरिक लय भंग होता नजर आ रहा है। आज लगभग हर दिन राज्य व्यवस्था अपनी और संवैधानिक-लोकतांत्रिक मर्यादाओं- मूल्यों का उल्लंघन करता हुआ नजर आ रही है जिसका समाज बुरी तरह से शिकार बना हुआ है। आज देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था होने के बावजूद सरकार के प्रति किसी भी प्रकार की व्यक्त असहमति या विरोध को सख्त दंडनीय रूप लेती जा रही है अर्थात वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, जो लोकतंत्र के लिए एक सबसे बड़ी खूबसूरती मानी जाती है,अत्यंत जोखिम और साहस भरा काम हो गया है और असहमति व्यक्त करने वाले कई प्रकार की कानूनी अड़चनों और मुश्किलों में पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
आज संविधान से संचालित और नियंत्रित लोकतांत्रिक या गणतांत्रिक व्यवस्था की सभी संस्थाओं की स्वात्तायता व निष्पक्षता ही समाप्त नहीं हो चुकी है बल्कि, देश के संविधान की व्यवस्थाओं को विफल या निष्प्रयोज्य कर देश के ओबीसी, एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों की प्रगति के रास्ते अवरुद्ध कर नफ़रत और आशंकाओं से युक्त माहौल पैदा किया जा रहा है। बार- बार संविधान की समीक्षा के नाम पर एक विशेष संस्कृति से पोषित और नियंत्रित व्यवस्था द्वारा कुछ वर्गों के मन में घोर आशंकाएं और अनिश्चितताएं पैदा कर समाज में साम्प्रदायिक वैमनस्यता के बीज बोकर एक तरह से भय का माहौल पैदा किया जा रहा है। आज देश की संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था एक नए प्रकार की अदृश्य और अपरिभाषित तानाशाही या अराजकता की चपेट में है,अर्थात् देश का संविधान खतरे के दौर में है।
पता- मो० राजगढ़ जिला लखीमपुर-खीरी 262701