फेसबुक के वाल पर अबाध गति से दौड़ती उंगलिया यकायक थम सी गयीं, मानो बज्रपात हो गया. साहित्यजगत का एक और तारा जीवन के अंतिम पटल पर जाकर शून्य में विलीन हो गया. पिछले वर्ष से लेकर आज तक हमने साहित्य के क्षेत्र से अनेक शब्द-साधकों को खो दिया है. कोरोनाकाल का बरपा कहर अभी थमने का नाम नहीं ले रहा है. अनेक नामचीन साहित्यकारों गिरिराज किशोर, राहत इन्दोरी, शांति स्वरुप बौद्ध आदि को हमने खोया है और खोते जा रहे हैं, साहित्यकारों की इस श्रंखला में बीते का 17 अप्रेल को एक और नाम जुड़ गया. जाने-माने साहित्यकार पदमश्री सम्मान के साथ-साथ दर्जनों साहित्यिक सम्मान से सम्मानित नरेन्द्र कोहली जी कोरोना के चपेट में आने से काल-कवलित हो गए. साहित्य जगत के लिए यह एक अपूर्णीय क्षति है.
नरेन्द्र
कोहली जी कोई रचना हमारे हाथ लगी तो वह थी ‘क्षमा करना जीजी’ जो एक सामाजिक उपन्यास है जिसकी रचना कर पाठकों के
अंतर्मन में अपनी पैठ बना लिए थे. मैं इस उपन्यास को पढ़ता ही चला गया अंतिम पृष्ठ
तक, इस उपन्यास का चित्रण परिवार
के सम्बन्धों के भावुक वातावरण को लेकर चित्रित किया गया है, किन्तु इसकी मूल व्यथा पारिवारिक सम्बन्धों तक
ही सीमित न होकर निम्न मध्य वर्ग की नारी के जीवन में, विकास
पथ के विघ्नों के रूप में उसके सामने आती अनेक समस्याएं हैं। परिवारजनों का स्नेह
बंधन भी एक बाधा हो सकता है। इस उपन्यास की नायिका जिजीविषा से भरी एक जुझारू
महिला है जो अपने सामर्थ्य, श्रम तथा साहस के बल पर जीवन का
निर्माण करना चाहती है। वह वैसा कर पाती है या नहीं इसमें मतभेद हो सकता है,
लेकिन वह अपने सम्मान की रक्षा में सफल होती है, इसमें कहीं कोई संदेह नहीं कि यह एक कालजयी रचना नहीं है । नरेन्द्र कोहली के इस सामाजिक
उपन्यास को हिन्दी पाठक समाज द्वारा खूब सराहा गया है। एक और उपन्यास है ‘न
भूतो न भविष्यति’ स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित उपन्यास है जिसमें लेखक ने
बड़े मनोयोग से अपनी रचनाशीलता का परिचय दिया है, आदि से अंत तक इस उपन्यास से
स्वामी विवेकान्द जी के कर्म, लक्ष्य और उनकी उपलब्धियों की स्पष्ट झलक मिलती है
एक बार पुनः स्वामी जी जीवित हो जाते हैं .
कोहली जी की रचनाओं में 'परिणति', 'नमक का कैदी', 'संचित
भूख', 'किरचे', 'निचले फ्लैट में'
और 'नींद आने तक' जैसी
कहानियाँ, पाठकों द्वारा न भुलाई गयीं न भुलाई जाएँगी। अपनी वेजोड़ रचनाकरिता के
लिए आप सदैव साहित्य जगत में ध्रुव तारे की तरह टिमटिमाते रहेंगें.
-अखिलेश कुमार अरुण