कोरोना
का दूसरा दौर और हम
-अखिलेश
कुमार ‘अरुण’
(स्वतंत्र दस्तक, जौनपुर से प्रकाशित 19 अप्रैल 2021)
मेरे इस लेख लिखे जाने तक भारत में कोरोना मरीजो की संख्या पुरे भारत में 1,42,91,917 है, प्रदेशों की बात करें तो महाराष्ट्र अपने यहाँ कोरोना मरीजों की संख्या 36,39,855 के साथ पहले स्थान पर है। हम जिस प्रेदश में रहते हैं वहां मतलब अपने उत्तर प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या 7,66,360 के साथ ७ वें स्थान पर है। अच्छी बात यह है कि अपने देश में कोरोना से मरने वालों की संख्या काफी कम है। भारत में कुल कोरोना मरीजों की संख्या 1,42,91,917 के सापेक्ष मरने वालों की संख्या- 1,74,308 है जो 1।26 प्रतिशत है।
इस वैश्विक महामारी की भयावहता को हमारा देश अन्य देशों की
अपेक्षा नहीं देख सका है। इटली, फ़्रांस, चीन, अमेरिका में जो देखने को मिला वह
काफी डरावना और मानसिक अवसाद का कारण बना, व्यक्ति अपने जीवन को जीने के लिए पल-पल
की कुशलता का कामना कर रहा था। उस स्थिति का सरकार ने जमकर फायदा उठाया
मंदिर-मस्जिद के मुद्दे को भुनाया गया, किसान निति को लागू करने का बिल लाया गया,
धारा 370 हटाया गया आदि जो पेंडिग मुद्दे थे उनको सलटाने में कोई कोर-कसर बाकी
नहीं रखा गया परिणामतः लोगों का विश्वाश सरकार की नीतियों से उठता गया और कोरोना
से सम्बंधित गाईडलाईस की अवहेलना जनसामान्य के द्वारा की जाने लगी क्योंकि लोगों
को यह संदेह हो गया की सरकार कोरोना की आडं में अपने उल्लू सीधा कर रही है जिसके
चलते आज हम फिर पुनः कोरोना के मुहँ जा फंसे हैं। पिछली बार कोरोना के चलते जो
लाकडाउन किया गया जो नीतियाँ लागू की गयीं उसका पालन हमारे देश के नागरिकों ने
बखूबी किया और कर भी रहे थे किन्तु सरकार ऊँघ रही थी। सरकार की तयारी कोरोना को
लेकर पहले भी और आज भी नगण्य है। अस्पताल आदि की अत्याधुनिक सुविधाओं पर ध्यान नहीं
दिया गया और न दिया जा रहा है।
कोरोना की विश्वसनीयता पर सरकार के कुछ कार्य आज भी प्रश्नचिन्ह का कार्य कर रहे हैं जैसे धार्मिक यात्राओं का निर्वाध अवागमन, कुम्भ मेले का स्नान, राज्य स्तरीय चुनाव की रैलियाँ और स्थानीय चुनावों में लोगों की उमड़ती भींड आदि आखिर क्या है यह? क्या कहेंगे इसे? सरकार की मंशा क्या है? क्या चाहती है सरकार और क्या चाहते हैं हमारे देश के लोग? एक साथ हजारों प्रश्न व्यक्ति को एक ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया है जहाँ उसका जीवन है भी और नहीं भी है, क्या करे अपने लिए और अपने परिवार के लिए उसकी इस मनःस्थिति का जिम्मेदार हमारी वर्तमान सरकार है।
देश का हर एक व्यक्ति काम-धाम से घर आता है तो परिवार के
प्रत्येक सदस्य का मन भायातंकित हो उठता है। हमारे बीच से कौन सुबह का किरण देखेगा
और कौन नहीं, एक माँ-बाप के सामने बच्चों
की और बच्चों के सामने माँ-बाप की, भाई-बहन, पति-पत्नी और नाते-रिश्तेदारों
की रोनी सूरत एक साथ हजारों सवाल खड़े कर
जाती है आपनो से बिछड़ने का गम हर वक्त साये की तरह हमारे आगे-पीछे मंडरा रही है।
चिकत्सकीय जगत के लोग कोरोना जैसी वैश्विक बीमारी को दुधारू गाय
समझ कर खूब दुह रहे हैं। प्राईवेट अस्पताल संचालक सामान्य व्यक्ति के जाँच रिपोर्ट
में कोरोना की पुष्टि कर दो-चार दिन इलाज कर अच्छा-खासा रूपये ऐंठ लेते हैं और
नेगेटिव कर चलता बनते हैं। बड़े-बड़े महानगरीय शहरों में चिकत्सकीय जगत की
काली-करतूतें जग-जाहिर हो रहीं हैं किन्तु उन पर न सरकार का सिकंजा है और नहीं
प्रशासनिक कार्यवाही की जा रही है। हस्पतालों के प्रति राज्य और केंद्र सरकार की
लापरवाही का नतीजा है कि प्राईवेट अस्पतालों की खेती फल-फूल रही है।
जन-सामान्य की कम होती भागीदारी कोरोना महामारी को फलने-फूलने
में सहायता प्रदान कर रही है इसलिए लोगों को स्वंय से स्वयं के प्रति और अपने
ईष्ट-मित्रों, परिवार के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है तभी हम अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रख
सकते हैं क्योकिं अपनी सुरक्षा अब अपने हाँथों है और उसे आप जाने मत दें।
*इति*