साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Friday, May 26, 2023
सत्ता खोने के डर से वर्तमान लोकसभा अपने निर्धारित कार्यकाल से पहले भंग होने की आशंका-नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
Wednesday, May 24, 2023
मैं गुनाहगार हूं- अखिलेश कुमार अरुण
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अखिलेश कुमार 'अरुण' ग्राम- हज़रतपुर जिला-लखीमपुर खीरी मोबाईल-8127698147 |
Friday, May 12, 2023
उचक्के-अखिलेश कुमार 'अरुण'
(लघुकथा)
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अखिलेश कुमार अरुण ग्राम हजरतपुर परगना मगदापुर जिला लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश मोबाइल 8127698147 |
मैं अपने घर से निकली ही थी कि बाईक सवार
दो उचक्के एक राह चलती महिला के दाहिने हाथ की कान की बाली पर हाथ साफ़ कर गए थे।
दौड़कर उस महिला के पास पहुंची जो मारे दर्द के चीख-चिल्ला रही थी, कान की लोर
लहूलुहान थी। देखते-ही देखते 10-१२ लोग जमा हो चुके थे जितने मुहँ उतनी बातें. “बहन, जी सोने के कुंडल थे क्या?”
भर्राए गले से बोली “नहीं नहीं भईया, इस महंगाई के ज़माने में
....आर्टिफीसियल ज्वेलरी पहनने को मिल जाए यही बहुत है।”
भीड़ से किसी ने कहा,
“अपराधी तो दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं।”
पीड़ित महिला बोल
पड़ी, “गलती उनकी नहीं है, मेरे भी तीन बेटे हैं, पूरा जीवन पेट काट-काट कर
उनको पढ़ाया कि दो-चार पैसे के आदमी बन जायेंगे, बड़ा बेटा 30 वर्ष का होने को आया
है....खाली पड़ा रहता है...समाज-परिवार से अलग-थलग, यह भी होंगे उन जैसे बच्चों में
से कोई एक?”
सब लोग जा चुके थे
मेरे भी दो बेटे हैं, बड़े ने दो साल पहले एम०टेक० पास किया है और दुसरे ने इस साल
पालीटेक्निक.......?
बुर्का-मिन्नी मिश्र
Friday, April 14, 2023
बाबा साहब के सपनों का भारत और हम, हमारा उत्तरदायित्व-अखिलेश कुमार ’अरूण’
जयन्ती विशेष
आज हम बाबा साहब की 132 वीं जयंती मनाने जा रहे हैं। उनकी पहली जयंती और आज की जयंती में काफी अंतर देखने को मिलता है। आज से कुछ वर्ष पहले बाबा साहब की जयंती को मनाने वाला उनका अपना समाज था किन्तु आज सर्वसमाज उनकी जयंती को मनाता है, वर्तमान परिदृश्य में बाबा साहब का राजनीतिक ध्रुवीयकरण कर दिया गया है जो वोट बैंक में तब्दील हो चुके हैं। उनके सिद्धांत, शिक्षा, उपदेश सब राजनीति के आगे धूमिल होते जा रहें हैं। बाबा साहब को एक वर्ग विशेष से सम्बन्धित नहीं किया जाना चाहिए, उनको सभी मानें और मनाऐं क्योंकि उन्होंने भारत जैसे विशाल विभिन्नताओं वाले देश का संविधान लिखने में महती भूमिका निभाई है। इसलिए प्रत्येक भारतवाशी उनका कर्जदार है परन्तु यह कहाँ शोभा देता है कि जयंती बाबा साहब की मनाये और उन्ही के सिध्दान्तों, शिक्षाओं आदि को ताक़ पर रख दिया जाए।बाबा साहब डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर सामाजिक रूप से अत्यन्त
निम्न समझे जाने वाले वर्ग में जन्म लेकर भी जो ऊँचाई उन्होने प्राप्त की यह बात
हम सबके लिये अत्यन्त प्रेरणादायी है। जो कार्य भगवान बुध्द ने 2500 वर्ष पूर्व शुरू किया था जिसके कर्णधार रहे
संत रैदास, कबीर, ज्योतिबा फुले आदि, वही कार्य बड़ी लगन ईमानदारी व कड़ी मेहनत और विरोधियों का
सामना करते हुये बाबा साहब दलित-अतिदलित,महिला-पुरूषों के लिये किए हैं। बाबा साहब नया भारत चाहते
थे जिसमें स्वतंत्रता समता और बन्धुत्व हो जो हमें संविधान के रूप दिया, वह चाहते थे कि जब एक भारतीय दूसरे भारतीय से
मिले तो वे उनको अपने भाई-बहन के समान देखें, एक नागरिक दूसरे के लिये प्रेम और मैत्री महसूस
करे लेकिन भारतीय समाज में कुछ हद तक सुधर हुआ है किन्तु जिस भारत और भारतियों की
कल्पना की गयी थी उसके विपरीत स्वतंत्रता, समता और बधुंत्व जो संविधान में लिखा है इसे राजनीति के
बड़े-बड़े घाघ नेता आज भी दलित-अतिदलित
लोगों तक पहुँचने नहीं देते। जाति विहीन समाज की स्थापना के बिना स्वतंत्रता,
समता और बधुंत्व का कोई
महत्व नहीं है। बाबा साहब ने कहा था, “निःसंदेह हमारा संविधान कागज पर अश्पृश्यता को समाप्त कर देगा
किन्तु यह 100 वर्ष तक भारत
में वायरस के रूप में बना रहेगा।” और आज हम संविधान
लागू किये जाने से लेकर 73 वर्ष के बूढ़े भारत में निवास कर रहे हैं जहाँ
हिन्दू-मुस्लिम, उंच-नीच, स्वर्ण-दलित, अतिदलित की राजनीति से ऊपर नहीं उठ सके हैं।
“यदि हिन्दू धर्म अछूतों का धर्म है तो उसको
सामाजिक समानता का धर्म बनना होगा चर्तुवर्ण के सिध्दान्तों को समाप्त करना होगा
चर्तुवर्ण और जाति भेद दलितों के आत्म सम्मान के विरूध्द हैं।” उक्त कथन के साथ
बाबा साहब हिन्दू धर्म में बने रहने के लिए जीवन के अंतिम समय तक प्रयासरत रहे
किन्तु हिन्दू धर्म के ठेकेदारों ने ऐसा नहीं होने दिया परिणामतः बाबा साहब ने 24 अक्टूबर 1956 को अपने लाखो अनुयायियों की संख्या मे बौद्ध
धर्म को अंगीकार कर लिए, अतः आज जिन लोगों कि जन-आन्दोलन में रूचि है उन्हे केवल धार्मिक दृष्टिकोण
अपनाना छोड़ देना चाहिये तथा उन्हें सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण अपनाकर सामाजिक और
आर्थिक पुर्ननिमार्ण के लिये अमूल्य परिवर्तन वादी कार्यक्रम पर जोर देना चाहिए
बिना इसके दलित-अतिदलित लोगों की दसा में सुधार लाया जाना संभव नहीं है।
विश्व के महान विद्वानों की श्रेणी में अग्रणी बाबा साहब अम्बेडकर की यह युक्ति ‘‘सभी समस्याओं से मुक्ति का मार्ग राजनीतिक कुंजी है।’’ यथार्त सत्य है, जिसे प्राप्त करने के लिए पूरे जीवन संघर्षरत रहे। अपने समाज को हक दिलाने के लिए अपने परिवार को काल के मुंह मे ढकेल कर समाज के हक की लड़ाई लड़ते रहे। यह अधिकार, एकमात्र मत का अधिकार न होकर राजनैतिक अधिकार है जिसके बल पर किसी एक परिवार की नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश में रह रहे उन सभी व्यक्तियों की अस्मिता का आधार है चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति, धर्म को मानने वाला हो। कोई एक देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व के इतिहास को बदलने की ताकत रखता है। 24 जनवरी 1950 को संविधान पर अन्तिम रूप से आत्मार्पित हस्ताक्षर करते हुये बाबा साहब ने कहा था कि मैने आज रानी के पेट का आपरेशन कर दिया आज के बाद कोई राजा पैदा नहीं होगा। परन्तु दुःख इस बात का है कि इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो वर्तमान राजनीति परिवारवाद के चलते उसी लीक पर जा चुकी है। जिसकी सम्पूर्ण जिम्मोदारी हम सब की है क्योंकि हम अपने मत के अधिकार का दुर्पयोग करते चले जा रहे हैं और एक के बाद परिवारवाद की राजनीति को बढ़ावा देकर वंशानुगत राजनीति का समर्थन कर रहे हैं । उत्तर प्रदेश के 2022 की राजनीति में परिवारवाद की राजनीति का भी असर रहा है, संसद और विधायक के बेटे-बेटियों को सत्ता सौंपते जा रहे हैं।
दलितों-अतिदालितों और पिछड़ों के लिए बाबा साहब अपने शोधपत्रों-पत्रिकाओं, लेखों, सभा-संगोष्ठियों में जहाँ कहीं, जब भी मौका मिलता तब उनकी उक्ति गर्जते सिंह की गर्जना की भाँति गगन में प्रतिध्वनित हो उठती, ‘‘जाओ लिख दो तुम अपनी दीवारों पर कि हम इस देश की शासक जातियाँ हैं, हम उसी कौम के वंशज है जिसके समय में यह देश सोने कि चिड़िया कहलाता था।’’ वे सम्पूर्ण समस्याओं के समाधान की कुंजी पर एकाधिकार प्राप्त करने के लिये शिक्षित बनो, शिक्षित करो और संगठित रहो के नारा पर बल देते हुये कहते हैं कि तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण इसी में है। अपने आत्म-सम्मान की जिन्दगी को जी सकोगे अन्यथा कि स्थिति में उस चैराहे पर खड़े भीखमंग्गे की तरह पूरे जीवन अपने अधिकारों की भीख मांगते रहोगे। राजनीतिक सत्ता का हस्तान्तरण होता रहेगा, सरकारें आती और जाती रहेंगी। तुम्हारी सुध तो दूर तुम पर कोई थूकेगा नहीं। बहुत नेकदिली किसी सरकार की सत्ता हुई भी तो तरस खाकर एक-आध धेला (आपका हक) फेंक देगा उससे क्या होने वाला इससे अच्छा तो मौत को गले लगा लो गुलामों की जिन्दगी जिने से बेहतर है मरजाना।
उनका यह क्रान्तिकारी सामाजिक परिवर्तन का आन्दोलन 19वीं सदी के दूसरे दसक के मध्य से 6 वें दसक के मध्य, जीवन के अन्तिम क्षण 06 दिसम्बर 1956 तक चलता रहा फिर शनैः-शनैः खेल शुरू हुआ, लोकतांत्रिक शासन के आने पर राजनैतिक रोटी सेंकने का, पार्टियाँ आती-जाती रहीं। अपने हिसाब से वंचितों का शोषण जारी रहा। वोट का अधिकार मिला किन्तु उसका सही प्रयोग वंचितवर्ग आज तक नहीं कर सका। कभी जाति के नाम पर तो कभी धर्म के नाम पर। अलगाववाद, भ्रष्टाचार, दारू-मुर्गा और सब कुछ फ्री का चाहिए परिश्रम न करना पड़े आदि के नाम पर वोट देते रहे है । और उसी में अपने लोगों का मान-सम्मान खुशी तलाशते रहे और यह आज भी बदस्तूर जारी है। वंचितवर्ग कितना भी पढ़-लिख गया हो किन्तु मानसिक गुलामी और संकीर्णता का शिकार बना हुआ है।
शिक्षित बनों के नाम पर अधकचरे शिक्षा तक सिमित हो रह गए हैं, आज सामान्य परिवार के लोग अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहे है क्योंकि शिक्षा का निजीकरण एक बड़ा अभिशाप है जहाँ शिक्षा इतनी महँगी हो गयी है और वहीँ दूसरी तरफ लोग-मंदिर मस्जिद की ओर दौड़ रहे हैं, कापी-किताबों से विमुख होते जा रहे भविष्य में आने वाली यह वर्तमान खेप देखिये क्या गुल खिलाती है, शांत मन से हम चिंतन करें तो पाएंगे कि जाति-धर्म के नाम पर संकुचित मानसिकता के युवा जो धर्म की राजनीति के शिकार हो चुके हैं वह आने वाले भारत के कल (भविष्य) को नफरत के सिवाय और कुछ नहीं दे सकते। वर्तमान भारत देश के लोकतान्त्रिक शक्ति का दुरपयोग देश के सत्ता धारी दल पुरे मनोयोग से कर रहे हैं उनके ऐजेण्डे से देश का विकास और लोगों की समस्या गायब है।
बाबा साहब की जयंती भी आज केवल और केवल वोट की राजनिति बनकर रह गयी है, बाबा साहब के जन्मदिवस पर वास्तव में हम भारतवासी उनके सिधान्तों और शिक्षाओं का सच्चे मन से संकल्प ले लें तो बदलते भारत की तस्वीर विश्व की इकलौती तस्वीर होगी जो हमें एक अलग पहचान दिला सकती है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हम और हमारी राजनीति हिंन्दू-मुस्लिम, असहिष्णुता, दलित कार्ड से ऊपर ही नहीं उठ पा रही है और यह तब-तक चलता रहेगा जब-तक भारत का हर एक नागरिक चाहे वह सवर्ण हो, अवर्ण (शूद्र) हो अपनी समाज और देश के प्रति जिम्मेदारी का अहसास नहीं करते तब तक बाबा साहब के सपनों के भारत का निर्माण असम्भव है, इसलिए हमें आज नहीं तो कल इस बात की प्रतिज्ञा लेनी होगी कि बाबा साहब के सपनों के भारत का निर्माण हमारी प्राथमिकताओं में से एक है और उसके निर्माण का हम आज संकल्प लेते हैं।
Thursday, April 13, 2023
शोषितों- वंचितों के लिए निर्भीकता की मिसाल-मसाल और विद्यार्थियों के लिए बेमिसाल आदर्श/प्रेरक व्यक्तित्व हैं,डॉ.बी.आर.आंबेडकर-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
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एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर) सेवा निवृत वाणिज्य विभाग वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी |
मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए का परिष्कृत रूप मिले मौर्या और अखिलेश,उभर न जाये और क्लेश-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
राजनैतिक मुद्दा
"बीएसपी के लावारिस पड़े 10-12% को अपने पाले में डॉ.आंबेडकर के नाम पर खींच सकती है,उसकी दलील शायद यह दी जा रही है कि अब बसपा सुप्रीमो राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होकर नेपथ्य में जा चुकी हैं। मृग तृष्णा की तरह यह उनकी भूल है, क्योंकि राजनीतिक विश्लेषकों और बुद्धजीवियों का मानना है कि बदलते राजनीतिक परिवेश या प्रतिकूल राजनीतिक घटनाक्रम की आशंका वश यह आधार वोट बैंक शांत जरूर दिखता है, लेकिन लावारिस तो कतई नहीं कहा जा सकता है और न ही फ़िलहाल,उभरती वैकल्पिक दलित राजनीति में शिफ्ट होती दिख रही है।"
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एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर) सेवा निवृत वाणिज्य विभाग वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी |
Tuesday, April 11, 2023
समसामयिक मुद्दों पर रंग बिखेरती सौरभ की "बेरंग"-नृपेन्द्र अभिषेक नृप
Friday, March 31, 2023
सियासी जंग की शिकार हुई दोस्ती-अखिलेश कुमार अरुण
बचाने वाले से बड़ा न कोय
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अखिलेश कुमार अरुण ग्राम हजरतपुर परगना मगदापुर जिला लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश मोबाइल 8127698147 |
वह भी क्या समय होता था जब लोग दोस्ती में जान दे देते थे. आज का समय ऐसा हो गया है कि लोगों को आदमी तो आदमी पशु-पक्षी और मानव की दोस्ती भी हजम नहीं हो रही है. भाई मैं न सारस के समर्थन में हूँ और न ही उस युवक आरिफ के समर्थन में क्योंकि दोनों ने गलत किया है. यह हमारे और हमारी सरकार के सिद्धांतों के खिलाफ़ है. न मनुष्य सारस से दोस्ती कर सकता है और न सारस मनुष्य से यहाँ सरासर गलती सारस की नहीं आरिफ की है उसने सारस को क्यों बचाया, सारस को नहीं आरिफ को कैद करना चाहिए था क्योंकि इस प्रकार की घटना को कोई और नवयुवक अंजाम न दे सके, मरते तड़पते पशु-पक्षियों को उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए क्योंकि आज के समय में गौतम बुद्ध का हंस, देवदत्त को ही दिया जाना इस बात का प्रमाण है. भले ही इस बात से आप सहमत न हों लेकिन इतना तो जरुर है कि आज भी सरंक्षित वन्यजीवों का शिकार धड़ल्ले से हो रहा है जिसमें कहीं न कहीं देवदत्त इसमें शामिल हैं.
गायों के साथ फोटो खिंचाने वाले देखते ही देखते सच्चे गौभक्त बन जाते हैं और जो वास्तव में गायों की सेवा करते हैं उनका कहीं नाम नहीं होता यही हुआ है आरिफ के साथ वन्यजीवों की ब्रांडअम्बेसडर बनी बैठी हैं दिया मिर्जा जिनका जीवों से दूर-दूर का नाता नहीं होगा या एक-दो कुत्ता-बिल्ली पाल रही होंगी और एक से एक अनाम पशु-पक्षी प्रेमी उनके लिए न जाने क्या-क्या करते हैं. आरिफ आज के समय में पशु-पक्षी प्रेमियों के लिए एक उदाहरण बन गया था. उसकी और उसके सारस की दोस्ती उन लोगों के लिए किसी एक ऐसे सन्देश देने से कम नहीं था जो नवयुवकों को पशु-पक्षी काम करता. सारस आरिफ के पास रहता तो कोई गलत नहीं था कहा जाता है कि सारस जिसको चाह जाता है उसके लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देता है यहाँ तक कि अपने प्राण भी तो क्या सारस आरिफ से अलग रहकर जिन्दा रह पायेगा?
वन्यजीव सरंक्षण के नाम पर सरकार के बैकडोर से कौन-कौन सा खेला होता है यह किसी को बताने की जरुरत नहीं है. वन्यजीव सरंक्षण अधिनियम १९७२ के तहत विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षी जो विलुप्त होने की कागार पर हैं उनको सरंक्षित किया गया है उसमें से एक साईबेरियन सारस भी शामिल है. इस अधिनियम को तब लाया गया था जब हमारे देश में प्राचीन समय में शौक के लिए और अंग्रेजी हुकूमत में व्यापार के लिए बड़े पैमाने पर पशु-पक्षियों का शिकार किया जाने लगा जो १९ वीं शताब्दी के अंत तक आते-आते कई प्रकार के जीवों के आस्तित्व को समाप्त करने की अंतिम सीमा पर था तब १९७२ में पशु-पक्षियों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए इस क़ानून को लाया गया तथा २००३ में इसको विस्तारित करते हुए दंड और सजा की समयावधि को और बढ़ा दिया गया.
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का मुख्य उद्देश्य शिकार पर प्रतिबंध लगाकर, उनके आवासों को कानूनी सुरक्षा देकर और अंत में वन्यजीव व्यापार को प्रतिबंधित करके लुप्तप्राय प्रजातियों की शेष आबादी की रक्षा करना है। अधिनियम में अंकित शब्दों के विपरीत आरिफ और सारस की दोस्ती थी क्योंकि आरिफ सारस को घायल अवस्था में पाता है और उसकी सेवा-सुस्रुसा से ठीक होकर सारस आरिफ का कायल हो गया था. सारस के आबादी/आवास में आरिफ का आना-जाना नहीं था और नहीं वह उसका व्यापार कर रहा था और न ही ऐसा कोई काम कर रहा था जिससे सारस को कोई शारीरिक क्षति होने की आशंका थी तो ऐसे में कौन सी विपदा आन पड़ी कि आनन-फानन में वन विभाग की टीम इतनी सक्रियता दिखाते हुए सारस को कैद कर पक्षी और मनुष्य की दोस्ती को तार-तार कर दिया.
सारस और आरिफ की दोस्ती में होना तो यह चाहिए था कि आरिफ को पशु-पक्षियों के सरंक्षण की कोई बड़ी जिम्मेदारी देते या ब्रांडअम्बेसडर बना देते क्योंकि जहाँ दिया मिर्जा (अभिनेत्री ) को भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट का अम्बेसडर बनाया जा सकता है जिनको जीवों से कुछ नहीं लेना-देना, उत्तर प्रदेश में स्वच्छ भारत मिशन के अम्बेसडर अक्षय कुमार हैं जो विमल पान मसाला का प्रचार-प्रसार करते हैं जिसको खाकर लोग जगह-जगह सरकारी आफिसों की दीवारों को रंग-बिरंगा किये रहते हैं. इन सबसे लाख गुना सही था आरिफ जिसे वन्यजीवों के सरंक्षण के लिए ब्रांड अम्बेसडर बनाकर एक नईं पहल की शुरुआत की जा सकती थी और अधिक से अधिक लोगों को पशु-पक्षियों के प्रति जागरूक किया जा सकता था.
लेखक-अखिलेश कुमार अरुण
ग्राम-हजरतपुर, जिला-खीरी
Tuesday, March 21, 2023
दो बड़े राजवंशों के बीच का काल, मौर्योत्तर काल का इतिहास-अखिलेश कुमार अरुण
समीक्षा
इतिहास गतिशील विश्व का अध्ययन है जिस पर भविष्य की नींव रखी जाती है, बीते अतीत काल का वह दर्पण है जिसमें वर्तमान पीढ़ी अपनी छवि देखती है और भविष्य को संवारती है। पृथ्वी पर जितने भी प्राणी पाए जाते हैं उन सब में मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो अपने अतीत में घटी घटनाओं को याद रखता है। जिस क्रम में आज जो भी कुछ हम पढ़ने को पाते हैं वह पूर्व घटित घटनाओं का वर्णन होता है। जिसे विभिन्न समयकाल में शोध कर लिखा गया है और इतिहास लेखन में अभी बहुत कुछ लिखा जाना बाकी है। अतः इसी लेखन की अग्रेत्तर पीढ़ी में डॉ० आदित्य रंजन अपनी पुस्तक मौर्योत्तर काल में शिल्प-व्यापार एवं नगर विकास (200 ई०पू० से 300 ई०) लेकर आते हैं जो अपने विषयानुरूप एकदम अछूता विषय है जिस पर कोई सटीक पुस्तक हमें पढ़ने को नहीं मिलती। यह पुस्तक पांच अध्यायों में विभक्त है जिसमें मौर्योत्तर काल में शिल्प, व्यापर, नगर विकास और मुद्रा अर्थ व्यवस्था तथा माप-तौल पर सटीक लेखन किया गया है।
इतिहास के अध्येताओं और विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक बहुत ही उपयोगी साबित होगी और इसे अपने पूर्व पुस्तकों की पूरक कहना न्यायोचित होगा। इस पुस्तक में दो बड़े राजवंशों (मौर्य और गुप्त काल) के बीच में छिटपुट राजवंशों के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक जानकारी उपलब्ध कराती है तथा सामंतवाद के प्रारम्भिक चरण की शुरुआत में शिल्प-श्रेणियों तथा वर्ण व्यवस्था के समानांतर जाति व्यवस्था के विकास की कहानी को स्पष्ट करती है ।
पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा है कि इस
काल के ग्रन्थों में शिल्पियों के जितने प्रकार प्राप्त होते हैं वह पूर्व
ग्रन्थों में नहीं मिलते...नि:सन्देह इस काल के धन्धों में दस्तकारों की अत्यधिक
बढ़त हुई शिल्पी लोग संगठित होते थे जिनको संगठित रूप में श्रेणी कहा जाता था।
पुस्तक के सन्दर्भ में यह कथन न्यायोचित है। वह सब कुछ इतिहास के अध्येता को इस
पुस्तक में पढ़ने को मिलेगा जिसकी आवश्यकता मौर्योत्तर काल के इतिहास को जानने के
लिए आवश्यक बन पड़ता है।
इस पुस्तक में मौर्योत्तर कालीन विकसित शिल्प एवं शिल्पियों तथा उनके व्यवसाय सम्बंधित शुद्धता (सोने-चांदी जैसे धातुओं में मिलावट आदि) के अनुपात को भी निश्चित किया गया है निर्धारित अनुपात से अधिक अंश होने पर शिल्पी को दण्ड देने का प्रावधान है। इस पुस्तक में कहा गया है कि कौटिल्य सोना (स्वर्ण) पर राज्य का एकाधिकार स्थापित करता है। यहां तक कि धोबी (रजक) को वस्त्र धोने के लिए चिकने पत्थर और काष्ट पट्टिका का वर्णन भी मिलता है और यह भी निर्धारित है कि धोबी को जो कपड़े धुलने के लिए मिलते थे उसको किसी को किराए पर देता है अथवा फाड़ देता है तो उसे 12 पड़ का दण्ड देना होता था। मौर्योत्तर काल में पोत निर्माण का भी कार्य किया जाता था जिसका वर्णन इस पुस्तक में किया गया है सामान्यतः इन सब बातों का वर्णन इतिहास की पूर्ववर्ती पुस्तकों में पढ़ने को नहीं मिलता है इस लिहाज से यह पुस्तक अत्यन्त महत्वपूर्ण और उपयोगी सिद्ध होती है।
मौर्यकालीन राज्य और व्यापार से संबंधित राजाज्ञा और वस्तुओं के क्रय विक्रय से सम्बंधित अनुज्ञप्ति-पत्र, थोक भाव पर बेचे जानी वाली वस्तुओं का मूल्य निर्धारण वाणिज्य अधीक्षक के द्वारा किया जाना तथा मिलावट तथा घटतौली आदि के सन्दर्भ में कठोर से कठोर दण्ड का विधान आदि सामान्यतः बाजार नियंत्रण अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल की महान उपलब्धि है किन्तु इस में वर्णित बाजार व्यवस्था को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि खिलजी का बाजार नियंत्रण मौर्य और मौर्योत्तर कालीन व्यवस्था का विकसित स्वरूप है।
पुस्तक के अंतिम अध्याय में मुद्रा अर्थव्यवस्था तथा माप-तौल पर मौर्योतर कालीन सिक्के और माप के परिणाम को विस्तृत रूप से वर्णित किया गया है। सिक्कों के वर्णित प्रकारों में अग्र, अर्जुनायन, अश्वक, औदुम्बर, क्षुद्रक, कुतूल, कुनिंद, मालव, शिबि, औधेय (काल विभाजन के आधार पर १. नंदी तथा हाथी प्रकार के सिक्के, 2.कार्तिकेय ब्रहामंड देव लेख युक्त सिक्के, ३. द्रम लेखयुक्त सिक्के, ४. कुषाण सिक्कों की अनुकृति वाले सिक्के तथा माप-तौल के लिए निर्धारित माप के परिमाणों यथा-रक्तिका, माशा, कर्ष, पल, यव, अंगुल, वितास्ति, हस्त, धनु, कोस, निमेष, काष्ठ आदि का उल्लेख पुस्तक उपयोगिता को सिद्ध करते हैं।
Monday, March 20, 2023
झोला उठाकर जाने की जिद-सुरेश सौरभ
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सुरेश सौरभ निर्मल नगर लखीमपुर-खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701 मो-7376236066 |
Sunday, March 19, 2023
बोलना होगा-अखिलेश कुमार अरुण
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अखिलेश कुमार अरुण ग्राम हजरतपुर परगना मगदापुर जिला लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश मोबाइल 8127698147 |
आज भी हमें, बराबरी करने देते नहीं हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
संविधान एक सहारा था उस पर भी हाबी हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
आदि-अनादि
काल के हम शासक न जाने कब हम गुलाम बन गए,
तूती
बोलती थी कभी हमारी और न जाने हम कब नाकाम हो गए
राज-पाट सब सौंप दिए या हड़प लिया गया हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
शिक्षा
के द्वार बंद कर दिए, किये हमें हमारे अधिकार से वंचित,
हम
कामगार लोग जीने को मजबूर थे, हो समाज में कलंकित।
गुणहीन न थे हम, हमको अज्ञानी बना दिए और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
जब
तुमने हम पर अत्याचार किया, जातीय प्रताड़ना किये,
गले में
मटकी कमर में झाड़ू और पानी को मोहताज किये,
छूने पर घड़ा आज भी जहाँ मार देते हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
अपनी बहन-बेटी
की आबरू को तुम्हारी विलासिता के लिए,
है, नांगोली
का स्तन काटना आज भी इस बात का प्रमाण लिए,
हाथरस की उस लड़की का कुनबा तबाह किए और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
अमनिवियता
को समर्पित भरे-पड़े तुम्हारे साहित्य पर,
जहाँ
लिखते हो पुजिये गुणहीन, मूर्ख सम विप्र चरण,
जहाँ, मानवीयता को सोचना ही पाप लिए हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
तुमने
पशु को माता कहा और एक वर्ण विशेष को अछूत,
गोबर को
गणेश कहा और तर्क करने को कहा बेतूक,
हम बने रहे मूर्ख, बेतुकी बातों को मानते गए और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
मंदिर
कौन जाता है किन्तु हमारे राष्ट्रपति को जाने नहीं दिए,
सत्ता
क्या गयी, बाद एक मुख्यमंत्री के जो कुर्सी धुलवा दिए,
बाद हमारे विधानसभा को शुद्ध करवाते हो और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें ।।
बोल ही
तो नहीं रहे थे-
लेकिन
अब बोलेंगे तुम्हारे गलत को ग़लत और सही को सच्च से,
मिडिया
तुम्हारी है फिर डरते हो तुम हमारी अनकही एक सच्च से
क्योंकि
तुम्हारे लाखों झूठ पर हमारा एक सच्च काफी है,
हम, इस रोलेक्टसाही में लोकतंत्र के मुखर आवाज हैं और सोचते हो कि हम कुछ न बोलें।
पढ़िये आज की रचना
मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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अपने जन्मदिन पर विशेष मेरे जन्म का प्रमाण पापा जी के द्वारा हस्तलिखित आज फेसबुक चुपके-चुपके हमारे जन्मदिन का टैग चला रहा है. अपने चाहन...
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सभ्य मानव की बर्बर कहानी हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरने के ठीक 4 दिन पहले शिन को उसके तीसरे जन्मदिन पर चटक लाल रंग की तिपहिया साइकिल उसके चाचा ...