साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Thursday, April 13, 2023

शोषितों- वंचितों के लिए निर्भीकता की मिसाल-मसाल और विद्यार्थियों के लिए बेमिसाल आदर्श/प्रेरक व्यक्तित्व हैं,डॉ.बी.आर.आंबेडकर-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

महापुरुषों के आदर्श से साभार
एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर) सेवा निवृत
वाणिज्य विभाग
वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी

           डॉ.भीम राव आंबेडकर एक ऐसे प्रेरणास्रोत हैं जो हर निराश,हताश और परेशान व्यक्ति की सामाजिक,धार्मिक,आर्थिक और राजनीतिक मुक्ति का मार्ग तैयार और आजीवन संघर्ष करते हुए दिखाई देते हैं। डॉ.आंबेडकर को यदि 20 वीं सदी का महानतम व्यक्ति की संज्ञा दी जाए तो अतिशयोक्ति नही होगी। जय भीम भी जय हिंद की तरह ही एक ऐसा नारा या उदघोष है जो हर वंचित- शोषित व्यक्ति के अंदर सतत संघर्ष के लिए एक अद्भुत असीम ऊर्जा और शक्ति का संचार करता है। भीषण विषम सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों और दुश्वारियों से गुजर कर उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है,वह दुनिया की इतिहास में एक अमिट छाप है। उनके जीवन संघर्ष की गाथा संजीदगी और ईमानदारी के साथ जो भी पढेगा, उसकी आंखें एक बार भीगती या डबडबाती जरूर नज़र आएंगी।
           हाथ में नीला झंडा लेकर जय भीम बोलने,नीला कपड़ा पहनने या मूंछ ऐंठने से कोई आंबेडकरवादी नही बन जाता है। आंबेडकरवादी बनने की इस मिथ्या परंपरा या पहचान से बाहर निकलकर डॉ.आंबेडकर की तरह अपने को शिक्षा की भट्ठी में तपाना होगा। जय भीम का नारा तभी बुलंद और सार्थक होगा जब बहुजन समाज के लोग आंबेडकर जी की वैचारिकी या दर्शन को व्यावहारिक जीवन में अर्थात आचरण में उतारेंगे। डॉ.भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के सामने दीपक,मोमबत्ती और अगरबत्ती जलाकर केवल उनका उपासक ही नहीं बनना है, बल्कि उनकी विचारधारा का संवाहक भी बनना है अर्थात उनकी वैचारिकी को पूरी शिद्दत से खड़ा करना है। आंबेडकर जी खुद कहा करते थे कि मैं मूर्तियों और प्रतिमाओं में नहीं ,बल्कि क़िताबों में रहता हूँ। इसलिए आंबेडकरवादी बनने के लिए हर इंसान को उनकी वैचारिकी-दर्शन को पढ़कर आत्मसात करना होगा। बहुजनों को डॉ.आंबेडकर जी सवर्णों के सिर पर बैठने का ऐसा अद्भुत सिद्धांत या हथियार (संविधान और सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण व्यवस्था) देकर गए हैं जिसकी अकूत ताकत के साथ वह शान से सिर उठाकर चल सकता है। वह कहते थे "शिक्षा शेरनी का वह दूध है जिसे जो पिएगा वह दहाड़ेगा।" दलित समाज आज भी घोड़ी,बारात और चारपाई पर बैठने तक सिमटा और लड़ता हुआ दिखाई देता है। ऐसा वही कहते हैं जो दलित अशिक्षित और अज्ञानी हैं। डॉ आंबेडकर के बताए रास्ते पर चलकर ब्राह्मण जैसा बनने का प्रयास तो कीजिए। फिर देखिए आपको सिर पर बैठाने के लिए लोग लाइन लगाकर दिखेंगे।

            विद्यार्थी जीवन में जिस भीमराव को क्लास के बाहर बैठा दिया जाता था। वह बालक फिर भी किसी भी प्रकार की ग्लानि या अपमान महसूस न करते हुए अपने ज्ञान अर्जन के मार्ग पर पूरी हिम्मत और शिद्दत से चलता चला जाता है। कोलंबिया और लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसी दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में एक साधारण परिवार का एक असाधारण बालक स्वयं को एक सच्चा विद्यार्थी/शोधार्थी सिद्ध करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है। आज उन्हें पूरी दुनिया में ज्ञान के प्रतीक अर्थात सिंबल ऑफ नॉलेज की संज्ञा से नवाज़ा जाता है। डॉ.आंबेडकर की शैक्षणिक ज्ञान की वजह से ही डॉ.आंबेडकर की बहुआयामी वैचारिकी -दर्शन को कोलंबिया विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल कर वहां के छात्रों को पढ़ाया और उन पर शोध कराया जा रहा है और हमारे देश में डॉ. आंबेडकर का बहुआयामी साहित्य और दर्शन लंबे समय तक आम लोगों के पास पहुंचने तक नही दिया गया। बहुजन समाज से निकले अन्य समाज सुधारकों और विचारकों की तरह डॉ.आंबेडकर को भी इतिहास के पन्नों में जानबूझकर इसलिए दबाए रखा गया जिससे देश का वंचित,शोषित और अशिक्षित एससी-एसटी,ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग में सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक चेतना का संचार न हो सके। 
           सामाजिक छुआछूत के कारण डॉ.आंबेडकर को जिस समाज ने क्लास के बाहर बैठने के लिए मजबूर किया, उन्होंने उसी के बीच या उसके सिर पर बैठकर अपने अकूत ज्ञान की बदौलत पूरी निर्भीकता के साथ ऐसा संविधान रच दिया जिसमें कहीं भी किसी भी स्तर पर रंचमात्र भेदभाव,प्रतिक्रिया या बदले की भावना नहीं झलकती है। डॉ आंबेडकर बहुजन समाज को संविधान रूपी ऐसा मजबूत हथियार दे गए हैं जिसके बल पर वह बेधड़क बोल सकता है। वह अपने सामाजिक, राजनीतिक और अन्य हक लेने के साथ उनके लिए कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई भी लड़ सकता है। डॉ.आंबेडकर की आज की हैसियत का पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश की विभिन्न पार्टियों के बैनर-पोस्टर-भाषण डॉ.आंबेडकर के नाम और चित्र के बिना अधूरे से लगते हैं। आज के दौर में राजनीतिक सत्ता के क्षितिज या कैनवस पर डॉ.आंबेडकर को इग्नोर करना असंभव सा हो गया है। यथास्थितिवादी सोच की राजनीति करने वाली राजनीतिक पार्टियों के भी राजनीतिक आयोजन आंबेडकर के चित्रों से अछूते नही हैं। वर्तमान दौर की राजनीति में डॉ.आंबेडकर की वैचारिकी या दर्शन एक अपरिहार्य विषय बन चुका है। देश के हर नागरिक को डॉ.की सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था के मोटे-मोटे सिद्धांतों को जरूर पढ़ना चाहिए। आज के वैज्ञानिक और आर्थिक युग में यह दुर्भाग्य का विषय है कि समाज मे सोशल साइंस के विषय लेकर अध्ययन और शोध करने  वाले छात्र-छात्राओं का कमतर मूल्यांकन किया जा रहा है। आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था पर समाज का एक ऐसा भी वर्ग है जो यह कहता है कि आंबेडकर ने हमारी जिंदगी बर्बाद कर दी और दूसरा वर्ग गर्व से सीना ऊंचाकर कर जय भीम का उदघोष करते हुए शान से कहता है कि डॉ.आंबेडकर हमारे भगवान हैं, मसीहा हैं और मुक्तिदाता हैं। सामाजिक व्यवस्था के दो छोरों पर बैठे लोगों की इस सोच के भारी अंतर से डॉ.आंबेडकर की सार्थकता और प्रासंगिकता का सहज आभास किया जा सकता है। अंत में, हर परेशान और निराश इंसान के मसीहा डॉ.आंबेडकर की अक्षुण्ण स्मृतियों को सादर नमन!

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