साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Wednesday, September 27, 2023

महिला आरक्षण बिल के पीछे छिपे राजनीतिक षडयंत्र और चुनावी राजनीति के गूढ़ निहितार्थ:नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

महिला आरक्षण बिल:पार्ट 2
नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी 
                डॉ.भीमराव आंबेडकर के संविधान की दुहाई देकर एक पिछड़े परिवार से पीएम बनने के अवसर को बड़े फक्र के साथ दावा ठोकने वाले नरेन्द्र मोदी की सरकार में पारित महिला आरक्षण बिल में ओबीसी महिलाओं के लिए लोकसभा में एक सीट भी आरक्षित नहीं की गई हैं,जबकि डॉ.आंबेडकर किसी समाज की प्रगति या विकास का मानदंड उस समाज की महिलाओं के विकास के साथ जोड़कर देखते थे। महिला आरक्षण बिल एक खास वर्ग की महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और सशक्तिकरण की दिशा में उठाया गया राजनीतिक कदम आरएसएस और बीजेपी सरकार की सवर्ण मानसिकता/वर्ण व्यवस्था/मनुवादी सोच को दर्शाता है। ओबीसी आरक्षण के मामले में आरएसएस और बीजेपी का राजनीतिक चरित्र शुरू से ही विरोधी रहा है। इसलिए ओबीसी महिलाओं के आरक्षण के सम्बंध में भी आरएसएस और बीजेपी से यही उम्मीद थी। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी थी जिसमें बीजेपी भी शामिल थी। एकीकृत जनता पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में सरकार बनने पर कालेलकर आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा किया गया था। चुनाव बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी सरकार ने कालेलकर आयोग की सिफारिशों को लागू करने से इस आधार पर मना कर दिया था कि इसकी रिपोर्ट काफी पुरानी हो चुकी है और ओबीसी की सामाजिक और शैक्षणिक स्तर काफी बदल चुका है। इसे बहाना बनाकर मोरारजी देसाई की सरकार ने एक नया मंडल आयोग गठित कर बड़ी चालाकी से टाल दिया था। वीपी सिंह के नेतृत्व में जब 1989 में जनता दल की सरकार बनी तो बिगड़ते राजनीतिक माहौल की वजह से 1990 में वीपी सिंह द्वारा ओबीसी के लिए केवल सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की घोषणा करते ही बीजेपी ने समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार गिरा दी थी और दूसरी तरफ ओबीसी का आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने ओबीसी की जातियों को लेकर राम मंदिर आंदोलन की रथयात्रा शुरू कर दी जिसमें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। ओबीसी के आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में यदि बीजेपी के चरित्र और कृत्य का अवलोकन और आकलन किया जाए तो वह पूरी तरह ओबीसी विरोधी दिखाई देता रहा है,इसमें कोई संदेह नहीं है। 

एससी-एसटी की महिलाओं को उनके वर्ग के लिए पूर्व प्रदत्त संवैधानिक राजनैतिक आरक्षण का 33% आरक्षण का रास्ता तो साफ है,लेकिन ओबीसी महिलाओं को लोकसभा में आरक्षण के माध्यम से प्रवेश करने का रास्ता नहीं बनाया गया है। ओबीसी को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि महिलाओं के नाम जो 33% राजनैतिक आरक्षण दिया गया है, वो वास्तव में केवल सवर्ण महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था है,जैसा कि सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण के सम्बंध में हुआ था। लोकसभा में महिलाओं के लिए 543 की 33% कुल 181 सीटें आरक्षित होंगी,जिनमें एससी और एसटी की कुल आरक्षित 131सीटों का 33% यानी 47 सीटें (अनुमानित) इस वर्ग की महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण मिल जायेगा। अब 181- 47=134 बची सीटों पर सामान्य वर्ग की सशक्त और संसाधन युक्त परिवार की महिलाओं के लिये चुनाव लड़कर लोकसभा जाने का रास्ता साफ कर दिया गया है क्योंकि सशक्त परिवार की इन महिलाओं का मुकाबला करने वाली आरक्षित वर्ग (एससी-एसटी और ओबीसी,ओबीसी के विशेष संदर्भ में ) की महिलाएं बहुत कम मिल पाएगी। इसलिए इन सीटों पर सामान्य वर्ग की सशक्त और समृद्ध परिवारों की महिलाओं के चुनाव जीतने की सबसे ज्यादा संभावना है। मेरे विचार से सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए वे सीटें आरक्षित की जाएंगी जहां से ओबीसी के पुरुष लंबे अरसे से चुनाव जीतकर आ रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो ओबीसी के लोकसभा में जाने की सम्भावना और संख्या न्यूनतम हो जाएगी जिससे संसद में उनका प्रभावशाली और निर्णायक प्रतिनिधित्व नहीं रह जाएगा और आरएसएस नियंत्रित बीजेपी का यही हिडेन राजनीतिक एजेंडा है। भाजपा-आरएसएस ओबीसी सांंसद और विधायक देने वाली संसदीय और विधानसभा सीटों पर महिला आरक्षण बिल के बहाने कब्ज़ा कर ओबीसी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की एक अदृश्य दूरगामी साज़िश से इनकार नहीं किया जा सकता है। जब संसद में ओबीसी का पर्याप्त प्रतिनिधित्व ही नहीं बचेगा तो जातिगत जनगणना और आरक्षण विस्तार का मुद्दा ही नहीं उठेगा,अर्थात " न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेंगी " की कहावत चरितार्थ होती नजर आएगी। मनुवादी सोच पर अमल करने वाली बीजेपी के महिला आरक्षण बिल का यही असली निहितार्थ है, जिसे ओबीसी को समझने की बहुत जरूरी है। उल्लेखनीय है कि पंचायत राज अधिनियम में एससी- एसटी और ओबीसी को लंबवत(वर्टिकल) और क्षैतिज(होरिजेंटल) दोनों तरह का आरक्षण दिया जा रहा है। क्या पारित महिला आरक्षण बिल और पंचायत राज अधिनियम में महिलाओं के संदर्भ में असंगति या असमानता नहीं होगी?

संविधान और आरक्षण पर सवाल एससी-एसटी और ओबीसी के वे सांसद उठाते हैं जो विपक्ष में होते हैं। यदि वे सत्तारूढ़ दल से हैं तो उस दल और उसके शीर्ष नेतृत्व की वजह से चुप्पी साधे रहने को मजबूर होते हैं। सत्तारूढ़ दल और सरकार का समर्थन कर रहे दलों के सांसद कई तरह के अदृश्य और दृश्य भयों के डर से सरकार की लाइन से हटकर बोलने का साहस नहीं कर सकते और यदि बोलते भी हैं तो 'जितनी चाबी भरी राम ने ,उतना चले खिलौना"जैसी स्थिति दिखाई देती है। चूंकि एससी-एसटी के आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था है, इसलिए उनके आनुपातिक आरक्षण या प्रतिनिधित्व पर कैंची चल नहीं सकती है। जातिगत जनगणना के आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण ओबीसी का आरक्षण या प्रतिनिधित्व अधर में लटका हुआ है। 10%ईडब्ल्यूएस आरक्षण के बाद ओबीसी की ओर से जातिगत जनगणना और प्रतिनिधित्व विस्तार का मुद्दा लगातार उठाये जाने की संभावना बन गयी है जिससे आरएसएस और बीजेपी हमेशा दूर भागना चाहती है। ओबीसी की जातिगत जनगणना और उसके आरक्षण विस्तार की भावी मांग से आरएसएस और बीजेपी बुरी तरह डरी हुई नज़र आती है। इसलिए बीजेपी ओबीसी के प्रतिनिधित्व को यथासंभव कम करने की कोई कोशिश या प्रयास छोड़ना नहीं चाहती है। महिला आरक्षण बिल इसी दिशा में उसकी एक सोची समझी दूरदर्शी राजनीति और रणनीति का हिस्सा है। महिला आरक्षण बिल के ज़रिए महिला वोटों के साथ सवर्णों के वोट साधने की रणनीति की दिशा में भी माना जा रहा है,जैसा 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सामान्य वर्ग के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए लाए गए ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के माध्यम से किया गया एक चुनावी राजनीतिक प्रयास सफल रहा। महिला आरक्षण बिल उसी दिशा में उठाया गया अगला कदम है। आरएसएस और बीजेपी अपने एससी-एसटी और ओबीसी के आरक्षण विरोधी चरित्र के माध्यम से सवर्णों का वोट बैंक अपने साथ स्थायी रूप से टिकाए रखने की दिशा में लगातार काम करती रहती है,लेकिन एससी एसटी और ओबीसी चंद चुनावी प्रलोभनों,धर्म और हिंदुत्व के प्रभाव की वजह से बीजेपी की इन दूरदर्शी चालों से बेख़बर है।

आरएसएस और बीजेपी के इस महिला आरक्षण बिल के पीछे छिपे जिस राजनीतिक षडयंत्र और चुनावी राजनीति के गूढ़ निहितार्थ को गम्भीरतापूर्वक समझने की जरूरत है,उस पर अभी ओबीसी का फोकस ही नही है। आरएसएस और बीजेपी ने ओबीसी को मंदिर-मस्जिद,हिन्दू-मुस्लिम,छद्म राष्ट्रवाद और चंद चुनावी लालच में अच्छी तरह फंसाकर रखा है। ज्यादातर क्षेत्रीय दल सामाजिक न्याय का नारा देकर उभरे हैं। इसलिए उनका आधार वोट बैंक सामाजिक,शैक्षणिक और राजनीतिक रूप से शोषित,वंचित और पिछड़ा समाज ही है। इस समाज के लोग राजनीति के लिए उतने सक्षम, सशक्त और तिकड़मी नहीं हैं, जितना कि सवर्ण लोग सक्षम, संसाधन युक्त और तिकड़मबाज है। चुनाव में संसाधनों और राजनीतिक परिपक्वता के संदर्भ में सवर्ण समाज के लोगों के सामने ओबीसी प्रत्याशी कॉन्फिडेंस के स्तर पर कमजोर साबित होते हैं और महिला आरक्षण हो जाने के बाद उनके समाज की महिला प्रत्याशी के सामने ओबीसी महिला प्रत्याशी कितनी मजबूती और कॉन्फिडेंस के साथ लड़ पाएगी,उसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है,क्योंकि ओबीसी की महिलाएं अभी व्यक्तिगत तौर पर सवर्ण महिलाओं की तुलना में उतनी राजनीतिक रूप से स्वतंत्र,सक्षम और कॉन्फिडेंट नही दिखती हैं। ओबीसी की अधिकांश पढ़ी-लिखी महिलाएं या तो छोटी-छोटी नौकरी कर रही हैं या घर-परिवार की देखभाल कर रही हैं। सामाजिक परिवेश की वजह से राजनीतिक रूप से ओबीसी महिलाएं सवर्ण महिलाओं की तुलना में अभी भी बहुत पीछे हैं। बातचीत करने के मामले में सवर्ण महिलाएं ओबीसी महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा प्रभावशाली और वाकपटु होती हैं,ऐसा उनके सामाजिक परिवेश में खुलेपन की वजह से होता है। ओबीसी महिलाओं में राजनीति के वांछित गुणों और तत्वों के अभाव की वजह से ओबीसी की महिला प्रत्याशी सवर्ण महिला प्रत्याशी के सामने मतदाताओं को प्रभावित करने के मामले में पूरी दमदारी के साथ लड़ नहीं पाती है। बीजेपी सरकार द्वारा पारित महिला आरक्षण से ओबीसी का अधिकतम राजनीतिक नुकसान होने के बावजूद पिछड़े वर्गों के उत्थान और भागीदारी की राजनीति करने का दावा करने वाले दलों (अपना दल-एस,सुभासपा, निषाद समाज पार्टी ) का बीजेपी के साथ सरकार में भागीदार बनकर इस बिल के समर्थन में पूरी दमदारी के साथ खड़ा होना उनके सामाजिक और राजनीतिक एजेंडे और राजनीतिक वैचारिकी और चाल-चरित्र पर बड़ा सवालिया निशान लगाता हुआ दिखाई देता है। इन दलों को याद रखना चाहिए कि पिछड़ों के उत्थान और प्रतिनिधित्व की झूठी राजनीतिक वकालत कर सत्ता की मलाई चाटने का यह राजनीतिक चरित्र और उपक्रम लंबे समय तक नहीं चल पाएगा। बहुजन समाज के बल पर सत्ता के शिखर तक पहुंची बीएसपी की सामाजिक और राजनीतिक दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। ऐसे दलों और उनके आधार वोट बैंक को इन सबसे सबक सीखने की जरूरत है।

Wednesday, September 20, 2023

मोदी सरकार का आधा-अधूरा और विसंगतिपूर्ण " नारी शक्ति वंदन बिल"-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)


            "इस बिल को महिला आरक्षण बिल या सवर्ण महिला आरक्षण बिल कहें .....पढ़िए इस पुरे लेख में आखिर क्या है यह महिला आरक्षण बिल ?....महिला आरक्षण बिल के आधे-अधूरे और विसंगतियों को लेकर विरोधियों के पास भी अपने ठोस तर्क हैं जिनके आधार पर वे चर्चा के दौरान सरकार को घेर सकते हैं........बीजेपी गठबंधन सरकार के लिए गले की हड्डी बन सकता है और सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों में एक नई तरह की एकजुटता के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं"
नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी 

    ✍️महिला आरक्षण बिल एक संविधान संशोधन विधेयक है, जो भारत में लोकसभा और सभी राज्य विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण देने की बात करता है। यह बिल 1996 में पहली बार पेश किया गया था, लेकिन अब तक पारित नहीं हो पाया है। महिला आरक्षण बिल भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण की दिशा में उठाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। भारत में, महिलाओं की लोकसभा में 2023 में भागीदारी केवल 14.5% है, जो विश्व में सबसे कम में से एक है। महिला आरक्षण बिल के पारित होने से उम्मीद है कि महिलाओं की प्रतिनिधित्व में वृद्धि होगी और वे नीति निर्माण में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेंगी। हालांकि, सोमवार को चली कैबिनेट बैठक को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है,लेकिन इस बात की चर्चा तेज है कि केंद्रीय कैबिनेट ने महिला आरक्षण बिल को मंजूर कर दिया है।विपक्ष कई बिन्दुओं को लेकर इस महिला आरक्षण बिल पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। वह सवाल उठा रहा है कि जब सभी पार्टियां बिल के समर्थन में थीं, तो फिर 10 साल तक इंतजार करने की क्या जरूरत पड़ी और ओबीसी महिलाओं के आरक्षण पर सरकार अपनी मंशा क्यों नही जता रही है? उनका कहना है कि ऐसा कुछ राज्यों के सन्निकट चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर महिला वोट बैंक तैयार करने की दिशा में यह उपक्रम किया जा रहा है। 
✍️इस महिला आरक्षण बिल के समर्थकों का तर्क है कि यह महिलाओं के सशक्तिकरण और समानता स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। उनका मानना है कि इस आरक्षण से महिलाओं को राजनीति में प्रवेश करने और अपनी नेतृत्व क्षमता की भूमिकाओं को हासिल करने के लिए एक समान अवसर उपलब्ध होगा,जबकि इस बिल में एससी-एसटी महिलाओं के लिए क्षैतिज (होरिजेंटल) आरक्षण की बात कही जा रही है और ओबीसी महिलाओं के बारे में इस बिल में कोई जगह नहीं दी गयी है, तो फिर ऐसी स्थिति में यह बिल सशक्तिकरण और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम कैसे साबित होगा? तुलनात्मक रूप से सामान्य वर्ग की महिलाएं एससी-एसटी और ओबीसी की महिलाओं से प्रत्येक क्षेत्र में आगे हैं और वर्तमान में महिला राजनीति की भागीदारी की बात की जाए तो सामान्य वर्ग की महिलाओं की ही अधिकतम भागीदारी दिखाई देती है,एससी -एसटी और ओबीसी महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की दिखती है। महिला आरक्षण बिल के आधे-अधूरे और विसंगतियों को लेकर विरोधियों के पास भी अपने ठोस तर्क हैं जिनके आधार पर वे चर्चा के दौरान सरकार को घेर सकते हैं। फिलहाल, सरकार लोकसभा में दो तिहाई बहुमत से और राज्यसभा में राजनीतिक प्रबंधन से बिल पास कराने की स्थिति में सक्षम दिखती है। बिल पास होने के बाद इसकी विसंगतियों को लेकर विपक्ष या सामाजिक न्याय का कोई संगठन सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ओबीसी महिला आरक्षण के बिंदु पर सरकार के निर्णय से परे राय देते हुए निर्णय दे सकती है।
✍️नए संसद भवन में देश की आधी आबादी नारी शक्ति को राजनैतिक रूप से सशक्तिकरण की दिशा में लोकसभा और विधान सभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए विगत दो दशकों से अधिक समय से लंबित महिला आरक्षण विधेयक मोदी सरकार राज्यों और लोकसभा चुनाव से पहले एक बार फिर लेकर लायी है। इस बिल की विषय सामग्री का अध्ययन करने के बाद ही पता चल पाएगा कि बिल की वास्तविक विषयवस्तु क्या है। कहा जा रहा है कि यदि यह बिल पारित होकर कानून बन जाता है तो भी उसके लागू होने की संभावना 2029 तक पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती है। परिसीमन और जनगणना एक जटिल प्रक्रिया मानी जाती है। इस बिल की विसंगतियों और संभावना पर शुरुआती दौर में ही तरह- तरह की उंगलियां उठने लगी हैं। बताया जा रहा है कि एससी-एसटी की तरह लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण दिए जाने की बात कही गई है। एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को उनको मिलते आ रहे 15 % और 7.5 % राजनीतिक आरक्षण के भीतर ही आरक्षण दिया जाएगा,यह भी सुनने में रहा है। तो इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि बाकी आरक्षण अन्य एक विशिष्ट वर्ग (सामान्य वर्ग) की महिलाओं को 33% आरक्षण का लाभ दिए जाने की बात है। ओबीसी की महिलाओं के राजनैतिक आरक्षण की बात इस बिल में कहीं नहीं है, ऐसा तथ्य सामने निकलकर आ रहा है। एससी और एसटी वर्ग की महिलाओं को तो क्षैतिज (होरिजेंटल) आरक्षण का लाभ मिल जाएगा क्योंकि उनके वर्ग को पहले से ही राजनैतिक आरक्षण मिलता आ रहा है, लेकिन ओबीसी महिलाओं को आरक्षण कैसे मिल पायेगा, ओबीसी को तो राजनैतिक आरक्षण नहीं मिल रहा है जबकि 1953 में गठित काका कालेलकर आयोग और 1979 में गठित मंडल आयोग की सिफारिशों में ओबीसी को राजनैतिक आरक्षण की भी सिफारिश है। चूंकि एससी और एसटी को केवल लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं में ही आरक्षण मिल रहा है, उनके लिए राज्यसभा तथा राज्यों की विधान परिषदों में आरक्षण की व्यवस्था अभी भी नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस बिल में एससी और एसटी की महिलाओं को राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों में आरक्षण देने की बात कही गयी है,कि नही ? और यदि ऐसा नहीं है तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संगठनों ,राजनीतिक दलों और उनके बौद्धिक मंचों से लंबित इस अधूरे राजनैतिक आरक्षण की मांग नए सिरे से उठना लाज़मी होगा। 
✍️चूंकि ओबीसी को वर्तमान में राजनैतिक आरक्षण नहीं मिल रहा है, इस आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि उनकी महिलाओं को एससी-एसटी की महिलाओं की तरह क्षैतिज आरक्षण कैसे मिल सकता है? यदि ओबीसी की महिलाओं के लिए आरक्षण की बात इस बिल में है तो फिर उन्हें एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं की तरह क्षैतिज आरक्षण नहीं मिल पायेगा। ऐसी स्थिति में महिलाओं में दो भिन्न कैटेगिरी हो जाने से उनके बीच एक नई तरह की खाई पैदा होती दिखेगी जो कि नैसर्गिक न्याय के खिलाफ़ होगी। परिस्थितियों से यह सम्भव लग रहा है कि पहले एससी-एसटी की तर्ज पर ओबीसी के नए राजनैतिक आरक्षण की बात नए सिरे से उठे। अभी तक ओबीसी को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थाओं में 27% आरक्षण सीमा और क्रीमीलेयर की शर्त के साथ ही आरक्षण मिल रहा है। 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण के बाद ओबीसी को मिल रहे 27% आरक्षण सीमा की शर्त को लगातार खारिज किया जा रहा है, क्योंकि ओबीसी आरक्षण पर निर्णय देते समय सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की कुल सीमा 50% निर्धारित की थी। ईडब्ल्यूएस पर 2023 में आये सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से यह सीमा टूट गई है,ऐसा माना जा रहा है। अब एक बड़ा सवाल यह उठता है कि महिला आरक्षण में यदि ओबीसी महिलाओं को शामिल नही किया जाता है तो मोदी जी के " नारी शक्ति वंदन " नारे और बिल की व्यावहारिकता और सार्थकता कैसे सिद्ध होगी? सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक मंचों से इस बिल को कई तरह की विसंगतियों से भरा हुआ बताया जा रहा है और यह भी कहा जा रहा है कि सन्निकट राज्य विधासभाओं और 2024 के लोकसभा चुनाव के भविष्य को लेकर जल्दबाजी में लाया गया यह बिल मोदी जी का एक और जुमला साबित हो सकता है।
✍️2019 में जब सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 10% आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल पास हुआ था तो उसके बाद से ही ओबीसी आरक्षण की सीमा बढ़ाने और जातिगत जनगणना की मांग जोर शोर से उठ रही है। महिलाओं को 33% राजनैतिक आरक्षण देने के लिए लाए गए इस बिल के बाद जातिगत जनगणना और उसके हिसाब से आरक्षण दिए जाने की एक सामाजिक और राजनीतिक मांग उठने का एक और माक़ूल मौका मिलता हुआ दिख रहा है। यदि सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियां इस बिल पर बहस के दौरान यह मांग उठाती हैं और विसंगतियों के कारण बिल के पास होने या लागू होने में कोई अड़चन पैदा होती है तो यह स्थिति बीजेपी गठबंधन सरकार के लिए गले की हड्डी बन सकता है और सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों में एक नई तरह की एकजुटता के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं, अर्थात विपक्ष की राजनैतिक एकता के गठबंधन का दायरा और बड़ा होने के साथ पहले से अधिक मजबूत बन सकता है। इस बिल से विपक्ष को सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना कराने का एक और सुअवसर मिलने की संभावना जताई जा रही है। यदि ओबीसी महिलाओं को आरक्षण की परिधि में नहीं लाया गया तो 2024 के लोकसभा चुनाव सरकार के लिए भारी पड़ सकता है। जरा इस पर गम्भीरतापूर्वक सोचिएगा!

Tuesday, September 12, 2023

लिखा नहीं जाता और कलम है कि मानती नहीं-डॉ० हरिवंश शर्मा


      नजरिया
डॉ हरिवंश शर्मा (प्राचार्य)
आदर्श जनता महाविद्यालय
देवकली, लखीमपुर-खीरी 
        यात्रा की थकान अभी उतर नही पाई थी । अचानक याद आया कि जरूरी काम एक बाकी है । मैंने मोबाइल उठाया और हमारे सहयोगी कम्प्यूटर सहायक डी के जी से पूछा, " आज आफिस आओगे क्या ? 
    "सर जी, वैसे तो मुझे दवा लेने जाना है हॉ अगर कोई जरूरी काम हो तो आ जाते है। 
    "किस समय बता दो" मैने पूछा। बोले," कहिए अभी आ जाऊं ।" 
    "तब ठीक है, मैं बस कपड़े बदलकर तुरन्त आता हू ।"
    मैने पत्नी से कहा ,"आफिस कुछ जरूरी काम है थोड़ा वक्त लगेगा ।"
    "खाना कब खाओगे ? पत्नी ने पूछा । 
    "दो - ढाई तो बज ही जाएगा ।"
    वैसे भी इस समय बच्चों के हास्टल जाने के बाद घर आधा सन्नाटा ही रहता है । ऐसे में अगर मोबाइल भी साथ छोड़ दे तो संसार ही अधूरा हो जाये । खैर छोडिए बात ये नही है कुछ और है ।
    स्कूटी लेकर मै घर से निकला था । जल्दी भी थी क्यों किसी को इन्तजार कराना मेरी आदत नही । ख्यालों में था कि कुछ बैंक का काम भी निपटा ही लेते है । बच्चों को कुछ पैसे भेजने है पर ये क्या बैक खुली भी है बन्द भी है सबसे सरल उपाय - सर्वर नही आ रहा । चेक तो जमा हो जाएगी मैंने पूछा तो हिकारत भरे स्वर में बोला नही आज वह भी नही हो पाएगा । मै मन ही बुदबुदाया सीधे मेन्टीनेन्स की बन्दी नही बोल रहे । फिर याद आया कि डाकघर में भी एक खाता है वहां चलते है । वैसे तो अमूमन यहाॅ के कर्मचारी तो बैंक से ज्यादा बेढंगे है । कभी सीधे मुह बात छोडिये जनाब चाल भी तिरछी रहती है । शायद मेरे साथ ही ऐसा हो क्योंकि न पान पुड़िया खाकर बतियाते है और न ही भौकाल बनाने के लिए धत् तेरी करते है । खैर मै पहुचा तो जमा निकासी वाले राना बाबू नही थे । मिश्रा जी भी नही दिखे । एक बैठा था उससे पूछा तो बताया . मिश्रा जी बीमार है । उनकी जगह एक नये सज्जन बैठे थे । उनसे मालूम किया तो बोले - मिश्रा जी बीमार है ऐसे जमा निकासी सब कुछ बन्द । पास में बैठे एक एजेन्ट महाशय मुझे तरह तरह के ज्ञान देने लगे । पिण्ड छुड़ाकर मै बाहर आया । मन में गुस्से का गुब्बार जरूर था । यह मनोदशा लेकर मैं स्कूटी से आगे बढ़ा तो बायें साइड की तरफ पड़ने वाली कोतवाली से एक्टिवा पर सवार एक नौजवान पुलिस वाला जिसकी पीठ पर आज के चलन का पिट्ठू बैग था । वह सरपट चौरहे की तरफ बढ़ा । जन्माष्टमी के चलते शहर के चौराहों पर लगने वाली पटरी थी दुकानों के चलते सदा सर्वदा कहने को ही फुटपाथ है । पुलिस वाले के पीछे उसकी बगल एक साइकिल वाला चल रहा था । उसकी उम्र कुछ अधेड होगी । यह क्या अचानक वह पुलिसवाला - साले हरामखोर आदि सहित मा बहन की दो चार गालियां उस साइकिल वाले देने लगा | साले मारुगा थप्पड़ । भीड थी । ऐसे किसी से साइकिल मोटर साइकिल लड़ जाना स्वाभाविक था । इसी के फलस्वरूप वह गालियां खा रहा था चुपचाप बड़े प्रेम से । कसूर था कि साइकिल उस महापुरुष से कैसे छू गई तो इतना प्रसाद जरूरी था । थोड़ा पीछे मै था । मुझे लगा कहीं मेरी स्कूटी उसकी स्कूटी से लड गई होती तो क्या होता? खैर उनको वर्दी ऐसी ही जनरक्षा सुरक्षा के मद्देनजर मिली है । भीड की धक्कम धक्का के चलते सब इधर उधर जा रहे थे । में भी अपने रास्ते चला गया 1 मन सिफ रह गया अफसोस कि हर जगह मनुष्य के ये कौन कौन से रुप देखने को मिल रहे । वाह री ये दुनिया ।  चाहते हुये भी कलम नही रुकी ।

Saturday, September 02, 2023

यदि संविधान बदला तो एससी-एसटी और ओबीसी की गति उस लोहार जैसी ही होगी जिसे भेंट में मिले चंदन के बाग-नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)

चिंतनीय_आलेख
नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी 

         एक बार एक राजा ने एक लोहार की कारीगरी से खुश होकर उसे चंदन का बाग इसलिए भेंट कर दिया कि वह चंदन की बेशकीमती लकड़ी बेचकर धनवान बन जाये।
उस लोहार को चंदन के पेड़ की कीमत और उपयोगिता का कोई अंदाजा नहीं था। इसलिए उसने अपने पेशे की उपयोगिता के हिसाब से चंदन के पेड़ो को काटकर उन्हें भट्टी में जलाकर कोयला बनाकर अपने काम में और अपने पेशेवर साथियों को बेचना शुरू कर दिया। ऐसा करते-करते, धीरे-धीरे एक दिन बेशकीमती चंदन का पूरा बाग कोयला के रूप में तब्दील होकर बिक और उसकी भट्टी में जल गया।
          एक दिन राजा घूमते हुए उस लोहार के घर के बाहर से गुजर रहे थे तो राजा ने सोचा अब तो लोहार चंदन की लकड़ी बेच-बेचकर बहुत अमीर हो गया होगा। सामने देखने पर लोहार की स्थिति जैसे की तैसी ही बनी हुई नजर आई। यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। अनायास राजा के मुँह से निकला यह कैसे हो सकता है! राजा ने अपने जासूसों से सच का पता लगावाया तो पाया चंदन के बाग की बेशकीमती लकडी को तो उसने कोयला बनाकर बेच दिया और अपनी भट्टी में प्रयोग कर लिया है। यह सुनकर राजा ने अपना माथा पीटते हुए कहा कि उपहार,भेंट और दान किसी पात्र व्यक्ति को ही देना चाहिए। तब राजा ने लोहार को बुलाकर पूछा,तुम्हारे पास चंदन की एकाध लकडी बची है या सबका कोयला बनाकर बेच दिया? लोहार के पास कुल्हाडी में लगे चंदन के बेंट के अलावा कुछ भी नहीं था,उसने वह लाकर राजा को दे दिया।
          राजा ने लोहार की कुल्हाड़ी का बेंट लेकर लोहार को चंदन के व्यापारी के पास भेज दिया, वहाँ जाकर लोहार को कुल्हाड़ी के बेंट के बदले अच्छे खासे पैसे मिल गये। यह देखकर लोहार भौचक रह गया, उसकी आंखो में आंसू आ गये। उसकी स्थिति " अब पछताये होत क्या,जब चिड़ियां चुंग गयी खेत " जैसी हो गयी थी। वह बहुत पछताया और फिर उसने रोते हुए आँसू पोछकर राजा से एक और बाग देने की विनती की। तब राजा ने उससे कहा कि " ऐसी भेंट जीवन में बार-बार नहीं मिलती हैं बल्कि, एक बार ही मिलती है।"
         अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को संविधान प्रदत्त अधिकार विशेषकर मतदान का अधिकार चंदन के बाग की भेंट की तरह मिले हुए हैं। इन्हें पांच किलो मुफ्त राशन, सब्सिडी पर मिल रही घरेलू गैस,शौचालय एवं किसान सम्मान निधि के नाम पर मिल रही चन्द आर्थिक सहायता के लालच में बेचा जा रहा है। अगर संविधान प्रदत्त अधिकारों के संरक्षण के लिए एकजुट होकर सड़क से लेकर संसद तक विरोध-प्रदर्शन नहीं किया गया तो एससी-एसटी और ओबीसी की हालत उस लोहार जैसी होने में देर नहीं लगेगी। लोकतंत्र के आवरण में छुपी वर्तमान तानाशाह प्रवृत्ति की सत्ता की नीयत साफ नहीं लग रही है। यदि 2024 के लोकसभा चुनाव में आरएसएस से निकले मनुवादी भाजपाई एक बार फिर संसद में कब्जा करने में सफल हो जाते हैं तो डॉ आंबेडकर का न्याय पर आधारित संविधान बदलना तय है। डॉ.भीमराव आंबेडकर जी के अथक प्रयासों से पिछड़े समाज को जो सांविधानिक अधिकार मिले हैं जिनकी वजह से उसका एक बड़ा हिस्सा सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक रूप से एक सशक्त मध्यम वर्ग बनकर उभरा है। यह वर्ग अच्छा खा रहा है, उनके बच्चे देश विदेश की प्रतिष्ठित संस्थाओं में पढ़ और रिसर्च कर रहे हैं, सूट,बूट और टाई पहनकर मूछों पर ताव देकर आज़ादी से घूम रहा है, घोड़ी पर चढ़कर बारात निकाल रहा है, अच्छे मकानों और हवेलियों में रह रहा है, बड़ी बड़ी कारों में घूम रहा है, शिक्षित होकर बौद्धिक वर्ग विभिन विषयों और मुद्दों पर सड़क से लेकर उच्च संस्थाओं में सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ सीना तानकर लिख और दहाड़ रहा है, जिन्हें आज़ादी से पहले चारपाई पर बैठने का अधिकार नहीं था, वे आरक्षण की वजह से बड़े-बड़े अधिकारी बन रहे हैं, ऐसा होने से मनुवादियों को लग रहा है कि वे उनके सिर पर बैठ रहे हैं, ये सब मनुवादियों को अच्छा नहीं लग रहा है। संविधान बदलने के बाद वही पुरानी मनुस्मृति की व्यवस्था लागू होने की पूरी सम्भावना है जो सामाजिक व्यवस्था में ऊंच-नीच और भेदभाव से भरी जाति व्यवस्था फिर से कायम होने की पूरी सम्भावना दिख रही है। डॉ.आंबेडकर की सोच की दूरदर्शिता की वजह से राजनैतिक आरक्षण के माध्यम से जो एससी और एसटी के 131 सांसद हर लोकसभा में पहुंच रहे हैं, संविधान बदलने के बाद एससी और एसटी एक भी सांसद बनाने के लिए तरस जाएगा। बहुजन समाज को मिल रहे चुनावी प्रलोभनों से निजात पानी होगी। बहुजन समाज (एससी- एसटी और ओबीसी) की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि सारे सामाजिक और राजनीतिक द्वेष और दुराग्रह दरकिनार कर 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान,लोकतंत्र और उसके सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों के गठबंधन को ही जिताने में अपनी सारी राजनीतिक ऊर्जा लगाएं और समाज को भी प्रेरित व जागरूक करें।
        जब डॉ.आंबेडकर ने भारतीय संविधान की रचना की थी,वह मनुवाद पर आंबेडकर द्वारा किया गया करारा प्रहार था। इसलिए मनुवादी आंबेडकर और उनके संविधान से घोर नफ़रत करते हैं और उन्होंने ऐलानिया तौर पर भारतीय संविधान को स्वीकार करने से मना भी कर दिया था। सांविधानिक व्यवस्थाओं को देखकर मनुवादियों को सांप सूंघ गया था। संविधान ने एससी -एसटी और ओबीसी को केवल आरक्षण ही नहीं दिया,उसने बहुजन समाज को बहुत कुछ दिया है, जैसे आठ घण्टे का कार्य दिवस, महिलाओं को मातृत्व अवकाश और महिलाओं को तो डॉ आंबेडकर ने इतना दिया है, जितना उन्हें देश के सारे समाज सुधारक नहीं दे पाए। इसके बावजूद देश की 50प्रतिशत आबादी को डॉ.आंबेडकर के योगदान का एहसास नहीं है। देश के वंचित वर्ग के जीवन में जो भी बदलाव आया है वह सिर्फ डॉ.आंबेडकर और उनकी सांविधानिक व्यवस्थाओं से ही सम्भव हो पाया है। जिन्हें डॉ.आंबेडकर और उनके संविधान से प्रेम या लगाव नहीं है,अर्थात उससे नफ़रत करते हैं तो वे संविधान के माध्यम से डॉ.आंबेडकर द्वारा दी गयी सारी सुविधाओं और लाभों को त्याग दें,तब उन्हें संविधान की अहमियत पता चल जाएगी। इसलिए वर्तमान सत्ता द्वारा संविधान के बदलाव की संभावना से उपजने वाले गम्भीर दुष्प्रभावों को भांपते हुए बहुजन समाज को समय रहते ही सावधान और सजग हो जाना चाहिए और उस लोहार को मिली चंदन की लकड़ी की कीमत की तरह अपने सांविधानिक अधिकारों की कीमत पहचान कर संविधान की रक्षा करने की दिशा में आज से ही गम्भीर विचार-विमर्श के माध्यम से सामाजिक व राजनीतिक स्तर पर सार्थक प्रयास शुरू कर देना चाहिए अन्यथा लोहार की तरह बेशकीमती चीज खो जाने के बाद पछतावे और हाथ मलने के सिवा कुछ हासिल नहीं होने वाला। भारतीय संविधान की अनमोल विरासत देश के हर वर्ग और नागरिक के हित में है। इसलिए इसके सरंक्षण की जिम्मेदारी भी सभी नागरिकों की बनती है। वर्तमान सत्त्तारुढ़ दल द्वारा बिना एजेंडे के संसद का विशेष सत्र बुलाने के गूढ़ निहितार्थ को समझने की जरूरत है। राजनीतिक और बौद्धिक गलियारों में संभावित बिंदुओं पर प्रकाश डालने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है, लेकिन इस सत्र के एजेंडों की असलियत सत्र शुरू होने के बाद ही सामने आ पाएगी।

अपना-अपना अहसास-डॉ हरिवंश शर्मा

डॉ हरिवंश शर्मा (प्राचार्य)
आदर्श जनता महाविद्यालय
देवकली, लखीमपुर-खीरी 
यात्रा-वृतांत

       आज मुझे 6:50 की ट्रेन से लखनऊ जाना था । स्लीपर का टिकट बेटे ने यह कहते हुए ऑनलाइन बुक कर दिया कि गर्मी का सीजन है साधारण कम्पार्टमेन्ट में यात्रा करना कठिन है । ऊपर से भीड़ का अपना आलम । हालांकि खुद की पढ़ाई के दिनों र्में खूब यात्रा की है वह भी साधारण रेल के डिब्बे में ही । तब कोयले वाला इंजन हुआ करता था जो अक्सर जेम्सवाट की  केतली वाला किस्सा खूब याद दिलाता था । ग्रेजुएशन पूरा करते . करते छोटी लाइन पर पर एक सुबह की ट्रेन डीजल वाले इन्जन से दौडने लगी थी । वकालत की पढ़ाई के दौरान भी खूब आना - जाना ट्रेनो से ही हुआ । आज की यह यात्रा कुछ अलग सा अहसास कराने वाली थी । मुझे इसका कतई अन्दाजा नही था । स्टेशन पर पहुंचा तो जी आर पी वाला बोला कहा जाना है ? मैने उससे पूछा कि एस . 2 किधर लगेगा । उसने कहा बस यही खड़े रहिये इधर ही लगेगा । छोटी लाइन  को अब बड़ी लाइन में तब्दील कर  दिया गया है ।  लेकिन स्टेशन वही जिन्दगी जी रही है । कहने को भर कि नई बिल्डिंगें बन गई है पर लोग तो वैसे ही ख्यालों से लबरेज  छोटी लाइन जैसे I कोई जानकारी नही रहती कौन सा कम्पार्टमेन्ट किधर लगेगा । यात्रियों को अपना डिब्बा दूंढने में खूब इधर से उधर कसरत करनी पड़ती है । यह रोज बरोज होता है । ट्रेन आई मेरा डिब्बा आगे के बजाय  बिल्कुल पीछे था । यदि दौड़कर न जाता तो ट्रेन का छूटना तय था । खैर डिब्बे तक पहुचने में इतना वक्त नही लगा जितना उसके अन्दर घुसने में | खचाखच भरी ट्रेन में बड़ी मसक्कत करके गेट पर ही बडी मुश्किल से खड़े होने की जगह मिल पायी । लोग चिल्ला रहे थे । औरतें चीख रही थी । बच्चे रो रहे थे । कुछ खो गए थे और कुछ खोज रहे थे । तभी एक ग्रामीण औरत चिल्लाती - रोती  भीड को चीरती हुई गेट की तरफ आती दिखाई दी । हाय ! मेरा बेटा  बाहर रह गया है । मेरे आदमी ( हसबैण्ड ) भी बाहर है ट्रेन चल दी है । कोई मेरे बेटे को ला दो । कोई उन्हें बता दो । हाय हम क्या करे ! अरे ! वह तो धीरे धीरे चलती ट्रेन से कूदने ही जा रही थी तभी एक महिला ने बाहर  से  उसके बेटे को गेट थी तरफ बढ़ाया । लोगों ने झट से खीचकर उस महिला के हवाले कर दिया । बेटे को पाकर उसके चेहरे पर शान्ति के भाव थे । वह फिर जोर जोर से चिल्लाने लगी । इनके पापा स्टेशन पर ही रह गये । अब हम का करी । ऐसे में कुछ की हैसी भी छूट गई। कुछ ने उसे ढाँढ़स बंधाया।
        साधारण डिब्बे की भीड को मात देता हुआ स्लीपर कोच की खीसे निकल रही थी । कई बार मन हुआ यह स्लीपर कोच कोई पुरुष होता तो मैं इसकी बतीसी तोड देता ।
        बगल में खड़ी एक  महिला का बच्चा भूख से व्याकुल था । वह उसे दूध पिलाने के लिए आंचल की तरक हाथ ले जाती फिर संकोच वश रुक जाती । लोग सिर्फ देख रहे  थे । बीच गलियारे में खड़ी वह महिला परेशान थी कि क्या करे और कैसे अपने बच्चे को दूध पिलाये । इस पर भी सामने बैठे 40 साला आदमी की नजर नही हट रही थी । उसकी नजर सिर्फ दो जगह पर अटकी थी एक तो अपनी दोनों टांगे इस कदर चौड़ी करके बैठा था कि कोई वहाँ बैठ न जाये | दूसरे कि वह अपने बच्चे को कब और कैसे दूध पिलाएगी | मेरी रिजर्व 71 नम्बर वाली बर्थ पर भी कुछ ऐसे ही दुष्ट कब्जा किये बैठे थे । उसके पति भी मजबूर वही मेरे पास खड़े थे । मैने पूछा कि क्या आप इन सबको धक्का मारते हुये भीड को चीरकर मेरी वाली बर्थ तक जा सकते हो । बच्चे का रोना उनसे भी देखा न जा रहा था | बोले और क्या कर सकते है । मैने उन्हे टिकट दिपा कहा जाकर उनको खड़ा कर दो और कहो मेरी सीट बुक है हटो यहाँ से | बस फिर क्या एक बाप अपने बच्चे के लिए जो कर सकता है किया और लड - झगड़ कर मेरी बताई सीट पर जा बैठा । लोग उसे धक्का दे रहे थे उसे जोरो से चिल्लाकर कहा ये मेरी सीट है 71 नम्बर वाली यहाँ से हटिए । उन दोनों ने अपने बैठने भर की जगह बना ली थी। मै भीड मे दबा कसमसा रहा था । लेकिन सन्तुष्टि थी मेरे स्लीपर के टिकट का पैसा अब वसूल हो गया था । टांगे फैलाये बैठे उस आदमी को पीटने का मन हो रहा था । आसपास के लोग भी खफा थे । तभी उस महिला ने मेरी तरफ हाथ हिलाकर बुलाया । भैया जगह है आप भी आकर बैठ लो काफी देर से खड़े हो । भीड में बडी मुश्किल से मै वहाँ पहुचा तो दोनो बहुत प्रसन्न थे । मुझे उनकी दुआ का  अहसास हो रहा था ।
वही  बगल थी सीट पर बैठे एक सिख युवक व युवती पर मेरी नजर पड़ी युवक ने बताया वह मेरे ही शहर के एक विद्यालय का छात्र रहा है और दिल्ली में नौकरी करता है । जिसे वह दीदी -दीदी कह रहा था । मैने पहचाना वह कोई और नही उन्नीस वर्ष पहले वह कक्षा दो की मेरी स्टूडेन्ट सिमरन कौर बजाज थी जो दिल्ली में ही जॉब करती है । एक शिक्षक के लिए इससे बड़ा कुछ नही । मुझे ऐसे में कई प्रकार के अहसास हो रहे थे जो मुझे रोमांचित कर रहे थे जो अकथनीय है।

Wednesday, August 23, 2023

आज़ादी की यात्रा बेहद रोमांचक-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)


"आजादी महज एक सियासी और रंगारंग महोत्सव का विषय नहीं है। आजादी तभी सच्ची और खूबसूरत लगती है,जब आम आदमी सम्मानजनक जीवन जी सके और महोत्सव, जनोत्सव का रूप ले सके।'’
     
नंदलाल वर्मा (सेवानिवृत्त ए0 प्रो0)
युवराज दत्त महाविद्यालय, खीरी
phone-9415461224
    भारत अपनी आजादी के 76 साल पूरे करने जा रहा है। इन 76 सालों को दो हिस्सों में बांटकर आज़ादी का अवलोकन और मूल्यांकन किया जा सकता है। पहले 50 साल, यानी कि 1947 से लेकर 1996 तक और बाकी के 26 साल, यानी कि 1997 से 2023 तक। इस अवधि में भारत की आज़ादी की यात्रा बेहद रोमांचक रही है, लेकिन इस यात्रा में कहीं-कहीं इतने गहरे धब्बे भी लगे जिसे कोई भी देश दोहराना नहीं चाहेगा। इस यात्रा में समाजवाद से लेकर बाजारवाद की तरफ तेज़ी से बढ़ते कदमों की दस्तक है और समाज के राजनीतिक होने की कहानी भी। आज एक सवाल जो सबसे जरूरी लगता है कि नागरिकों के लिए आजादी के मायने क्या हैं,क्या जिम्मेदार आज़ादी का मतलब लोगों के बीच ठीक ढंग से ले जा पाए और क्या लोगों ने इसे ठीक तरह से समझा और उसका पालन किया? इसे भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस संबोधन से समझने का प्रयास करते हैं जो उन्होंने 15 अगस्त 1947 को दिया था।

           नेहरू जी ने कहा था कि "हमारा मुल्क आजाद हुआ, सियासी तौर पर एक बोझा जो बाहरी हुकूमत का था, वह तो हट गया है,लेकिन आजादी भी अजीब-अजीब जिम्मेदारियां लाती है और बोझे लाती है। अब उन जिम्मेदारियों का सामना हमें करना है और एक आजाद हैसियत से हमें आगे बढ़ना है और अपने बड़े-बड़े सवालों को हल करना है। सवाल हमारी जनता का उद्धार करने का है, हमें गुरबत को दूर करना है,बीमारी दूर करनी है। आजादी महज एक सियासी विषय नहीं है। आजादी तभी सच्ची,ईमानदार और खूबसूरत लगती है,जब आम जनता को उसका फायदा मिले।'’
           नेहरू जी के पूर्वोक्त कहे शब्दों पर यदि आज के दौर में गौर करें तो एक मुल्क के तौर पर हम काफी आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन कहीं न कहीं जिम्मेदारियों को लेकर आज भी लोगों के मन में झिझक और संशय बना हुआ है। नेहरू ने जिस भारत का सपना देखा था ,वह आज एक महत्वपूर्ण मुहाने पर दिखता है, जहाँ आर्थिक रूप से कुछ संपन्नता और समृध्दि तो जरूर आई है,लेकिन सामाजिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक स्तर पर जो विफलता या कमी दिखाई दे रही है, वह एक आजाद मुल्क के लिए तो कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता है। यह सबसे बेहतर समय है कि सामाजिक-राजनीतिक सांप्रदायिकता और वैमनस्यता के जहर से देश को मुक्त कर सही राह पर ले जाया जाए।
           नेहरू ने भारत में सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक प्रतिबद्धता और समृद्धता की बुनियाद डाली थी। बुनियादी ढांचे से लेकर देश के लिए महत्वपूर्ण संस्थाओं को बनाने का काम किया। इसरो,आईआईटी, एम्स, आईआईएम आदि जैसी उच्च स्तरीय बुनियादी संस्थाएं आज भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, देश ने कला, संस्कृति, साहित्य और खेल जगत में उपलब्धि की बुलंदियों को छुआ है,लेकिन इसके उलट अभी भी देश का एक बड़ा तबका बेरोजगारी,भुखमरी और गरीबी की चपेट में है और समाज में आर्थिक विषमता की खाई लगातार गहराती जा रही है। बेलगाम बेरोजगारी ने देश को बुरी तरह घेर रखा है जिसकी वजह से समय-समय पर युवाओं का उबाल और तनाव सड़कों तक पहुंच जाता है। दूसरी तरफ कोविड महामारी के दौरान भारत के स्वास्थ्य ढांचे की जो असल तस्वीर सामने आई, वह एक स्वस्थ देश के लिए तो बिल्कुल अच्छा नहीं कहा जा सकता। आज़ादी के इतने सालों बाद भी अगर लाशें गंगा किनारे पड़ी हुई दिखाई देती हैं तो इससे सत्ता की मानवीय संवेदनाओं पर सवाल उठना लाज़िमी है।
          आजादी को लेकर आज तक जो विश्लेषण हो रहे हैं उनमें एक बुनियादी चीज़ जो सबसे ज्यादा खतरे में है, वह है "आजादी"। बीते कुछ समय में यह शब्द ही इतना विवादास्पद बन या बनाया गया है, एक ऐसा माहौल बना या बनाया गया है कि आज़ाद भारत में संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए संसद से लेकर सड़क तक स्पेस लगभग खत्म सा होता जा रहा है। नेहरू जी भारत को आडंबरों से छुटकारा और वैज्ञानिक तौर-तरीकों से जीने की बात किया करते थे, लेकिन आज के राजनीतिक दायरों से ही ‘काला जादू’ और 'नींबू-मिर्च-काले धागे ' की बात खुलकर की जाती है। इसलिए डॉ.आंबेडकर ने संविधान में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की व्यवस्था दी है। धर्म और जाति के राजनीतिक घोल ने इस देश की संविधान में वर्णित धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद को खोखला कर दिया है और अगर आज़ादी के इतने सालों बाद भी इसे दुरुस्त नहीं किया गया तो फिर आजादी के कोई मायने रह नहीं जाएंगे।
        भारत की यह यात्रा आज जिस पड़ाव पर है वहां सबसे ज्यादा विवादास्पद और झूठ चीज़ ‘आजादी’ शब्द ही है। इस पर बीते कुछ सालों से सुनियोजित तरीके से लगातार राजनीतिक हमले हो रहे हैं। कहीं किसी को अपनी बात रखने पर मारा-पीटा जा रहा है तो कहीं असहमति या अभिव्यक्ति की आज़ादी को राष्ट्र विरोध या द्रोह से जोड़कर कानूनी कार्रवाई की जा रही है। बीते कुछ सालों में दर्जनों सामाजिक कार्यकर्ताओं,स्वतंत्र पत्रकारों,बुद्धिजीवियों,अकडेमीशियन्स और सभ्य समाज से जुड़े लोगों को अपनी बात मुखरता से रखने पर जेल भेजा गया। सरकार की नीतियों और फैसलों पर असहमति को लेकर सत्ता में बैठे लोग आजकल जितना नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं,उतना आजाद भारत के इतिहास में कभी नहीं देखा गया। बुद्धिजीवियों ने भारत के समृद्ध इतिहास को विस्तार से बताया है जहां एक दूसरे से संवाद की परंपरा काफी मजबूत रही है, लेकिन जैसे-जैसे आजादी मिले साल दर साल गुजरते जा रहे हैं, वैसे-वैसे संवाद और साझी विरासत और परंपरा भी कमजोर होती जा रही है और ऐसा मौजूदा भारतीय राजनीति में स्पष्ट तौर पर दिख भी रहा है। 

   आजादी के 76 साल पूरे होने पर जहां देश को अपनी विविधता के सहारे खुद को ज्यादा मजबूत करने की दिशा में काम करना चाहिए था, वहीं चीज़ें इसके उलट होती दिख रही हैं। समाज में विभाजन की खाई इतनी गहरी बन चुकी है कि लंबे समय से आस पास रहने वाले लोग रातोंरात एक दूसरे को शक और संशय की नज़र से देखने लगे हैं। कोई भी देश जब तक अपनी विविधता को नहीं अपनाता है तो आगे बढ़ने की उसकी सारी संभावनाएं धूमिल होती नज़र आती हैं। भारत अपनी सामाजिक,सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता के साथ विकास और लोकतंत्र को लेकर विदेशों में तो जोरदार तरीके से पेश करता है, लेकिन उसके भीतर लोकतंत्र की जो स्थितियां बनती जा रही हैं,उसे लेकर कुछ नहीं कर पा रहा है। 76 सालों में जो आम आदमी ने जो खोया है वह यह है कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर यह दर्ज हो चुका है कि भारत में डॉ.भीमराव आंबेडकर का संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र कमजोर हुआ है। संविधान की रक्षक सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों द्वारा सार्वजनिक मंच पर आकर यह चिंता जताना कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है,देश के बहुजन समाज के लिए एक बड़ी क्षति है।
           आज़ादी के पहले कुछ साल काफी अहम रहे हैं। उस दौरान बुनियादी संरचनाओं के जरिए देश को आगे तो बढ़ाया गया,लेकिन उसके बाद राजनीति इतनी हावी होती चली गई कि सामाजिक और आर्थिक विकास उसी में उलझकर रह गया। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने खुद को असाधारण शक्तियां प्रदान कर नागरिक अधिकारों और राजनीतिक विरोध पर अधिकांश विरोधियों को जेल में डाल दिया और प्रेस पर सेंसर लगा दिया था। उस समय कई अन्य मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था, जिसमें उनके बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में पुरुष नसबंदी के लिए चलाया गया अभियान भी शामिल था। भारतीय इतिहास की आजादी के बाद आपातकाल सबसे विवादास्पद घटनाओं में से एक है, लेकिन संविधान की लोकतांत्रिक बुनियाद मजबूत होने के कारण देश उस स्थिति से जल्दी बाहर निकला और अगले कुछ ही दशकों में उदारवादी अर्थव्यवस्था के सिद्धातों को अपनाते हुए विकास की ओर एक बार फिर चल पड़ा।
          भारत सरकार द्वारा आजादी के 76वें साल में हर घर तिरंगा के साथ  "मिट्टी को नमन-वीरों का वंदन” और "मेरी माटी-मेरा देश" अभियान का नारा दिया गया है। राष्ट्रवाद की नई सोच और समझ विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। इन दिनों जहां देखो वहां सिर्फ 'मेरी माटी-मेरा देश ' और तिरंगे की ही बात हो रही है। हालांकि, बीते सालों में दो ऐसे मौके भी आए जब तिरंगे के मायने को सही तरह से प्रदर्शित किया गया। पहला मौका सीएए-एनआरसी को लेकर हुए लंबे आंदोलन में आया जब बड़ी संख्या में एक समाज के लोगों ने हाथों में तिरंगा थामा वहीं दूसरा मौका एक साल से अधिक चले किसान आंदोलन में आया जब किसानों ने तिरंगे को हाथों में लेकर मोदी सरकार से सवाल करते रहे और अपने अधिकारों की मांग करते रहे। 
           यह अच्छी बात है कि सरकार आजादी के 76वें साल का जश्न एक साथ मिलकर मनाने की बात कर रही है, लेकिन क्या देश के लोग आजादी की साझी परंपरा या विरासत का भी जश्न मना रहे हैं, क्या तिरंगे में निहित 'आइडिया ऑफ इंडिया' की जो बात है, उसे लोग समझ रहे हैं या क्या सरकार इस दिशा में लोगों के बीच जागरूकता ला पाई है? 76वें साल में घरों पर सिर्फ़ तिरंगा लहराने और भारत माता की जय बोलने से ही देशभक्ति सिध्द नहीं होती, इसके लिए जरूरी है कि तिरंगे और भारत माता में छिपे व्यापक संदेश को आत्मसात किया जाए। आजादी के 76वें साल में भारत के हर नागरिक को इस संदेश को समझाने की जरूरत है कि सिर्फ तिरंगा फहराने से आज़ादी के असल मतलब को नहीं समझा जा सकता। यह जरूरी है कि जश्न मनाते हुए हम पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए आने वाले भविष्य की बेहतरी के लिए काम करें। हम एक ऐसा राष्ट्र बनकर उभरे जहां किसी भी तरह का सामाजिक और राजनीतिक वैरभाव न हो,सांप्रदायिक कटुता के लिए कोई जगह न हो और वैचारिक संकीर्णता न हो।
           विश्व-बंधुत्व का संदेश जब हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देते हैं, तो उससे पहले यह जरूरी है कि अपने देश के भीतर रहने वाले सभी जाति, धर्म और समाज के लोग मिलकर रहें,क्योंकि सभी को एक साथ लेकर आगे बढ़ने में ही देश की तरक्की और बेहतरी है। आज़ादी का अमृत महोत्सव मनाने के बाद भी देश में जाति,धर्म,लिंग और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाएं थमने का नाम नही ले रही है। गुजरात, मध्यप्रदेश और मणिपुर के मानवता को शर्मसार करने वाले दृश्यों के बाद यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि देश के नागरिक गुलामी से मुक्त होने के बाद आज़ादी या कुंठा के दौर से गुजर रहे हैं?
          आजादी हासिल करने का संघर्ष जितना शानदार और समावेशी था उसे कायम रखने में देश के जिम्मेदार एक सीमा तक नाकाम रहे हैं। छोटी-छोटी घटनाओं और प्रयासों से कहीं न कहीं हमारी आजादी पर हमले जारी हैं और देश की बड़ी आबादी मौजूदा खतरों को भांप नहीं पा रही है, क्योंकि उसे तरह-तरह के गैरजरूरी बहसों,मुद्दों और प्रलोभनों में उलझाया जा रहा है और इसके पीछे एक बड़ी साज़िश अंजाम ले रही है जो कई मौकों पर उभरकर सामने आ जाती है। यह प्रवृत्ति देश के लिए,नागरिकों के लिए और हमारी मेहनत से अर्जित की गई बेशकीमती आजादी के लिये बेहद खतरनाक है।
          आज़ादी के 76 वर्ष पूर्ण होने पर हम किस चीज का जश्न मनाएं?.... घटते नागरिक उत्तरदायित्व बोध का, संवैधानिक संस्थाओं और पदों की गिरती मर्यादा और विश्वसनीयता का, छिनती अभिव्यक्ति की आजादी का,बढ़ती सामाजिक- राजनीतिक वैमनस्यता से उपजती मॉब लिंचिंग का या संसद के भीतर और बाहर तानाशाह,असंवेदनशील और निर्लज्ज होती लोकतांत्रिक सत्ता का चरित्र का या देश के ऊपर बढ़ते कर्ज़ का या कृषि और किसानों की बदहाली और आत्म हत्याओं का या बेरोजगार युवाओं की त्रासदी का, सरकार के प्रवक्ता बन चुके लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (पूंजीपतियों की बाज़ारवादी समाचार और विचारविहीन टीवी और प्रिंट मीडिया) का, तीन कृषि क़ानूनों की वापसी के लिए आंदोलनरत अन्नदाताओं की राहों में कीले गाड़ने का,यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने पर सड़क पर घसीटी गईं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाली पहलवान बेटियों का,लगभग तीस करोड़ बीपीएल आबादी का, हर महीने पांच किलो राशन की बाट जोहती अस्सी करोड़ जनता का, खत्म कर दिया गया बुढ़ापे का आर्थिक सहारा पुरानी पेंशन का ? मेरे विचार से आजादी का असल जश्न मनाने के लिए नागरिक उत्तरदायित्व बोध पैदा करने की जरूरत है। भारत के उन वीर सपूतों को शत-शत नमन जिनके अथाह बलिदानों और संघर्षों की वजह से आज़ादी मिली।

Wednesday, July 05, 2023

सामाजिक न्याय (आरक्षण) सम्बन्धी बेहद संवेदनशील और गम्भीर विषय-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

नंदलाल वर्मा (सेवानिवृत्त ए0 प्रो0)
युवराज दत्त महाविद्यालय, खीरी
आरक्षण है तो आखिर किसके लिए?????
पढ़िए इस मुद्दे पर सेवानिवृत्त प्रोफेसर एन०एल० वर्मा जी का महत्त्वपूर्ण लेख
      लाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर पद हेतु होने वाले साक्षात्कार की श्रेणी वार जारी कट ऑफ सूची: 
अनारक्षित या सामान्य वर्ग: 141.5
अनुसूचित जाति              :  237.5
ओ.बी.सी.                       : 270.5
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        आरक्षित श्रेणी (एससी और ओबीसी) के सामाजिक न्याय की आरक्षण व्यवस्था के जानकारों और जिम्मेदारों से जानना चाहता हूँ कि उपरोक्त जारी सूची बनाने में मनुवादियों ने किस तरह की दिमागी गणित लगायी है? आरक्षण व्यवस्था लागू करने में सुनिश्चित है कि अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की कट ऑफ के बराबर या उससे कम/नीचे अंकों से आरक्षित वर्ग (एससी और ओबीसी) के अभ्यर्थियों की सूची शुरू होती है और निर्धारित न्यूनतम योग्यता अंक तक जाती है। अनारक्षित या सामान्य वर्ग की सूची में अनारक्षित और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों में बिना भेदभाव किये कुल 50% अनारक्षित रिक्त पदों पर अनारक्षित वर्ग के 50%पदों के लिए सूची जारी की जाती है, अर्थात अनारक्षित वर्ग की सूची विशुद्ध रूप से मेरिट के आधार पर बनाये जाने की व्यवस्था है जिसमें अभ्यर्थियों की विशुद्ध मेरिट क्रमांक के आधार पर अनारक्षित और आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी शामिल किए जाते हैं। इसके बाद आरक्षित वर्ग (एससी 21% और ओबीसी 27%) के अभ्यर्थियों की अलग-अलग उनकी मेरिट क्रमांक के आधार पर निर्धारित न्यूनतम योग्यता अंक तक बनाई जाती है। आरक्षण विरोधी शातिर शक्तियों द्वारा उपरोक्त जारी सूची में जिस फार्मूले को प्रयोग कर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को आरक्षण से वंचित करने की जो साजिश रची है, उस साजिश को आरक्षित वर्ग के कितने जागरूक और जिम्मेदार लोग समझ रहे हैं, वे मुझसे संपर्क और संवाद कर सकते हैं। जो इस साजिश को नहीं समझ पा रहे हैं, ऐसे जिज्ञासु विशेषकर मुझसे संपर्क और संवाद स्थापित कर इसमें छिपी साज़िश को समझने का कष्ट करें। गलत तरीके से आरक्षण लागू करने और निजीकरण से आरक्षित वर्ग के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है। उपरोक्त सूची तैयार कर आरक्षण लागू करने में आरक्षण विरोधियों द्वारा एक अत्याधुनिक तकनीक को ईजाद किया गया है जिससे आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को उनके निर्धारित आरक्षण प्रतिशत की सीमा तक समेटा जा सके। 69000 प्राथमिक शिक्षक भर्ती में आरक्षित वर्ग के लगभग 19000 पदों के आरक्षण को अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को दे दिया गया है जिसमें मा. उच्च न्यायालय ने निर्णय देकर यूपी सरकार को 50% आरक्षण देते हुए 69000 पदों की संशोधित सूची जारी करने का निर्देश भी दिया है, लेकिन राज्य सरकार आज तक संशोधित सूची जारी नहीं कर पाई है। आरक्षित वर्ग के लगभग 19000 पदों पर अनारक्षित/ सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी नौकरी कर प्रति माह लगभग 50000 रुपये वेतन (कुल 95करोड़ रुपए प्रति माह) पाकर अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत कर रहे हैं और आरक्षित वर्ग के वंचित अभ्यर्थी अपने हक के लिए सरकार,सड़क और कोर्ट कचहरी में भिखारियों की तरह गिड़गिड़ा रहे हैं और इस आरक्षण महाघोटाले पर सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दल पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं। आरक्षित वर्ग के जागरूक और संवेदनशील नागरिकों को आरक्षण विरोधी सरकारों को सत्ता से बेदखल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहिए।

Friday, June 30, 2023

वेदनाओं की मुखर अभिव्यक्ति है किन्नर कथा-सत्य प्रकाश ‘शिक्षक

पुस्तक समीक्षा



पुस्तक-इस दुनिया में तीसरी दुनिया 
(साझा लघुकथा संग्रह संपादक-डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर‘ एवं सुरेश सौरभ)  
मूल्य-249
प्रकाषन-श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष-202

                संवेदनशील व्यक्ति आस-पास की घटनाओं को नजर अंदाज नहीं कर सकता, जो घटता है उसके मन पर गहरा असर डालता है। इस दुनिया में तीसरी दुनिया (‘किन्नर कथा) नामक लघुकथाओं के संकलन में रचनाकारों ने उन तमाम संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया है जो प्रायः के अछूती रही हैं। घृणा, प्रेम, प्रतिशोध ग्लानि के ताने-बाने से चुनी संग्रह की लघुकथाओं में किन्नरों के प्रति जन सामान्य की, दुर्भावना साफ झलकती है। प्रस्तुत कृति मेें लेखक-लेखिकाओं ने अनुत्तरित मुद्दों को विमर्श प्रदान किया है। संग्रहीत 78 लघुकथाकारों की लघुकथायें जीवन के कटु सत्य को उजागर करती हैं। अंजू निगम की ‘आशीष‘ कथा में किन्नरों की सदाशयता प्रकट होती है-जब पता चलता है कि मुंडन संस्कार करा के लौटे परिवार का पर्स ट्रेन में चोरी हो चुका है, तो वे सोहर गा-बजाकर आशीष देते हुये बिना नेग लिये टोली के साथ बाहर निकल जाती हैं। अभय कुमार भारती की लघुकथा ‘फरिश्ते‘ में किन्नरों की टोली ट्रेन में जिस तरह जहर खुरानी के शिकार यात्री की मदद करती है, वह प्रशंसनीय है। दृष्टव्य है, जब सहयात्री एक-दूसरे का मुख ताकते रह जाते हैं तब किन्नरों की संवेदना काम आती है। इस प्रकार प्रस्तुत संकलन में योगराज प्रभाकर, डॉ. लता अग्रवाल, राहुल शिवाय, राम मूरत राही, विजयानंद विजय, राजेंद वर्मा, विभा रानी श्रीवास्तव,हर भगवान चावला, संतोष सुपेकर आदि रचनाकारों ने किन्नरों की संवेदनाओं का चित्रण एवं विश्लेषण उनके जीवन के विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखकर बहुत ही कायदे से किया है। समीक्ष्य साझा संग्रह ‘इस दुनिया में तीसरी दुनिया‘ के सफल संयोजन व संपादन के लिये डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर‘ एवं सुरेश सौरभ जी को बहुत-बहुत बधाई। नयी राहों का यह संग्रह अन्वेषी बने ऐसी कामना है।
समीक्षक-सत्य प्रकाश ‘शिक्षक‘
पता-कीरत नगर टेलीफोन एक्सचेन्ज के पीछे लखीमपुर-खीरी पिन-262701
मो-7985222074


Monday, June 26, 2023

इस दुनिया में तीसरी दुनिया से साक्षात्कार -डॉ.आदित्य रंजन

(पुस्तक समीक्षा)

पुस्तक-इस दुनिया में तीसरी दुनिया (साझा लघुकथा संग्रह)
संपादक -डॉ.शैलेष गुप्त 'वीर'/सुरेश सौरभ 
मूल्य-249
प्रकाषन-श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली को
प्रकाशन वर्ष-2023

किन्नर विमर्श पर आधारित ‘‘इस दुनिया में तीसरी दुनिया‘‘ के सम्पादक डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर‘ व सुरेश सौरभ जी ने किन्नरों के जीवन की हकीकतों-तकलीफों को परत-दर परत खोलने के लिए इस संग्रह में सामयिक-मार्मिक लघुकथाओं का साझा संकलन प्रस्तुत किया है। जहाँ हमारा सम्पूर्ण समाज स्त्री एवं पुरुष इन्हीं दो वर्गों को समाज की धुरी मान बैठा, है वहीं इन दोनों से पृथक एक ऐसा वर्ग भी है जो न तो पूर्ण स्त्री है और न ही पूर्ण पुरुष, यह वर्ग है किन्नर का, जिसे हमारे समाज में हिजड़ा, छक्का, खोजा और अरावली आदि नामों से जाना जाता है।
      परिवार और समाज से परित्यक्त यह किन्नर समुदाय लगातार अपने हक तथा अपने वजूद के लिए संघर्ष करता रहता है। समाज का यह वर्ग जो स्त्री एवं पुरुष के मध्यबिंदु पर खड़ा है, अपनी अपूर्णता के कारण समाज में हीन दृष्टि से देखा जाता है। अपनी अपूर्णता के दर्द को तिल-तिल सहते ये किन्नर कभी समाज में अपने हक के लिए तो कभी अपने वजूद की पूर्णता के लिए,कभी निज से तो कभी समाज से संघर्ष करते दीख पड़ते हैं।
       इस लघुकथाओं के संग्रह में किन्नर जीवन की त्रासदी, अकेलेपन, परिवार से परित्यक्त होने का दर्द और समाज के तिरस्कार को सहते किन्नरों के जीवन का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। संग्रह में विभिन्न लेखकों की लघुकथाओं के संकलन होने के नाते किन्नरों के विषय में बहुकोणीय दृष्टिकोण व विमर्श परिलक्षित होता है।
     इस संग्रह की प्रथम लघुकथा अंजू खरबंदा की ‘‘बुलावा‘‘ है, जिसमें संभ्रांत समाज द्वारा किन्नरों के प्रति सद्भावना दर्शायी गई है। डॉ. कुसुम जोशी द्वारा रचित ‘मैं भी हिस्सा हूँं‘ एक ऐसे किन्नर की कहानी है जिसे अपने कालेज की पढ़ाई के दौरान समाज से संघर्ष करके संभलते हुए दिखाया गया है। 
     ‘इस दुनिया में तीसरी दुनिया‘ में अठहत्तर बेहतरीन लघुकथाओं का समावेश किया गया है। लेकिन विशेष रूप से सुरेश सौरभ की ‘राखी का इंतजार‘, सीमा वर्मा की ‘बढ़ोत्तरी‘, सरोज बाला सोनी की ‘बहन कब आयेगी‘, रेखा शाह आरबी की ‘त्याग‘, माधवी चौधरी की ‘अधूरापन‘, प्रियंका श्रीवास्तव ‘शुभ्र‘ की ‘न्याय‘, गुलजार हुसैन की ‘चोट‘, दुर्गा वनवासी की ‘पीड़ा‘ आदि लघुकथाओं में किन्नरों के जीवन, समाज में स्थान और उनकी पहचान को बड़े ही अच्छे ढंग से, संजीदा तरीके से प्रस्तुत किया है। इन लघुकथाओं के माध्यम से समाज में एक नवीन दृष्टिकोण उजागर होगा और यह पुस्तक निश्चित तौर पर समाज में किन्नरों के प्रति लोगों की सोच में परिवर्तन लाने का कार्य करेगी। इसके लिए मैं इस पुस्तक के सम्पादक डा. शैलेष गुप्त वीर व सुरेश सौरभ को कोटि-कोटि बधाई देता है। साथ ही मै श्वेतवर्णा प्रकाशन नई दिल्ली को भी बधाई देता है, जिन्होंने इस पुस्तक के कवर डिजाइन से लेकर शब्द संयोजन तक में बेतरीन कार्य किया तथा आकर्षक और हार्ड बाउंड रूप में पुस्तक प्रकाशित करके पाठकों तक पहुँचाने का सुफल किया। संग्रह पठनीय संग्रहणीय है और किन्नर विमर्श के शोधकर्ताओं के लिए नये द्वार खोलेगा।

समीक्षक डॉ आदित्य रंजन
प्रवक्ता ( प्रा.भा.इतिहास)
आदर्श जनता महाविद्यालय
देवकली लखीमपुर खीरी

फिल्म आदिपुरुष के संवाद और भाषा की सीमाएं: आखिर ‘आज की हिंदी’ अथवा आज की भाषा’ किसे कहेंगे हम-अजय बोकिल

अजय बोकिल
वरिष्ट संपादक

मनोज मुंतशिर ने जो वाक्य प्रयोग किए हैं, क्या वो सचमुच आज के उस समाज की भाषा है, जो सभ्यता के दायरे में आते हैं। वैसे मनोज मुंतशिर कोई महान गीतकार या लेखक हैं भी नहीं। उन्हें कुछ पुरस्कार जरूर मिले हैं, लेकिन उनका लिखा कोई गीत कालजयी हो और लोगों के होठों पर सदा कायम रहा हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। उन्होंने अपना नाम मनोज शुक्ला से ‘मुंतशिर’ सिर्फ इस वजह से कर लिया कि उन्हें यह शब्द भा गया था। 

यह भाषा एक खास वर्ग को मानसिक संतुष्टि प्रदान करती है और सहजता व निर्लज्जता के भेद को मिटाती है। 
विस्तार
रामकथा से प्रेरित विवादित फिल्म ‘आदिपुरूष’ उसके संवाद लेखक मनोज मुंतशिर द्वारा जन दबाव में सिनेमा के डायलॉग बदले जाने के बाद भी हिट होने की पटरी से उतर गई लगती है। जो संवाद बदले गए हैं उनमें भी बदलाव क्या है? ‘तू’ से ‘तुम’ कर दिया गया है या फिर ‘लंका लगाने’ (यह भी विचित्र प्रयोग है) की जगह ‘लंका जला देंगे’ अथवा शेषनाग को ‘लंबा’ करने के स्थान पर ‘समाप्त’ कर देंगे, कर दिया गया है। लेकिन इस विवाद की शुरुआत में संवाद लेखक, गीतकार मनोज मुंतशिर ने एक बात कही थी।  जिस पर व्यापक बहस की गुंजाइश है।

दरअसल, मनोज ने जिन टपोरी संवादो पर आपत्ति हुई थी, उनके बचाव में कहा था- मैंने ये संवाद ‘आज की भाषा’ में लिखे हैं। मनोज की बात मानें तो ‘जो हमारी बहनों...उनकी लंका लगा देंगे’ जैसे वाक्य ‘आज की हिंदी’ है।

अब सवाल यह है कि ‘आज की हिंदी’ अथवा आज की भाषा’ हम किसे कहेंगे? यह कैसे तय होगा कि जो लिखी या बोली जा रही है,  वह आज की हिंदी ही है? हर समाज में अमूमन भाषा तीन तरह से प्रचलन में होती हैं।
 

पहली, वो लिखी जाने वाली व्याकरण सम्मत, विचार सम्प्रेषण और सृजन की भाषा होती है।
दूसरी वो जो हम आम बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं और जिसका व्याकरणिक नियमों से बंधा होना अनिवार्य नहीं है तथा जिसमें अर्थ सम्प्रेषण ज्यादा अहम है
तथा तीसरी वो जो आपसी बोलचाल में अथवा समूह विशेष में प्रयुक्त होती है, और अभद्रता-भद्रता के भेद को नहीं मानती।
 
आमतौर पर इसे लोकमान्य होते हुए भी टपोरी, फूहड़ अथवा बाजारू भाषा कहते हैं। सभ्य समाज इसके सार्वजनिक उपयोग से परहेज करता है और प्रयोग करता भी है तो किसी विशिष्ट संदर्भ में ही। अंग्रेजी में इसे ‘स्लैंग’ कहा जाता है। 

यह वो भाषा है जिसमें स्थानीय रूप से उपजे या गढ़े गए शब्दों की भरमार होती है। गालियां और उनके अभिनव प्रयोग इस भाषा का वांछित हिस्सा होते हैं। सभ्य समाज में वर्जित शब्दों का  टपोरी भाषा में धड़ल्ले से प्रयोग होता है और इसे कोई अन्यथा भी नहीं लेता।

यह भाषा एक खास वर्ग को मानसिक संतुष्टि प्रदान करती है और सहजता व निर्लज्जता के भेद को मिटाती है। इसमें  भी एक ‘किन्तु’ यह है कि जो व्यक्ति अपनी टपोरी भाषा में दूसरे के लिए हल्के और गाली युक्त शब्दों का बेहिचक प्रयोग करता है, वही व्यक्ति खुद उसके लिए इसी भाषा का प्रयोग करने पर आक्रामक भी हो सकता है। अर्थात् ऐसी भाषा कितनी भी सहज हो, लेकिन मानवीय गरिमा के अनुकूल नहीं होती।  

बदलता समाज और बदलती हुई भाषा 
इसमें दो राय नहीं कि हर एक-दो दशक में भाषा बदलने लगती है। उसमें नए भावों के साथ नए शब्द आते हैं तो पुराने शब्दों को नए तेवर देने  की गरज पड़ती है, कई शब्द चलन से बाहर भी होते हैं, उनकी जगह नए शब्द और मुहावरे रूढ़ होने लगते हैं। सभ्यता और संस्कृति का बदलाव, टकराव और परिवर्तित सामाजिक चेतना भी नए शब्दों की राह आसान करती है। कई बार शब्द वही होते हैं,  लेकिन उनके अर्थ संदर्भ बदल जाते हैं।  

अगर ‘आज की भाषा’ की बात की जाए तो हम उस भाषा की बात कर रहे होते हैं, जिसे अंग्रेजी में मिलेनियल जनरेशन, जनरेशन जेड या फिर अल्फा जनरेशन कहा जाता है। मिलेनियल ( सहस्राब्दी) पीढ़ी उसे माना गया है, जिसका जन्म 1986 से लेकर 1999 के बीच हुआ है। इसी पीढ़ी को ‘जनरेशन जेड’ भी कहा गया है।

21 वीं सदी के आरंभ से लेकर इस सदी के पहले दशक में जन्मी पीढ़ी को ‘अल्फा जनरेशन’ नाम दिया गया है। मिलेनियल और अल्फा जनरेशन की भाषा में बुनियादी फर्क यह है कि अल्फा जनरेशन की भाषा पर इंटरनेटी शब्दावली का असर बहुत ज्यादा है और वो पारंपरिक शब्दों के संक्षिप्तिकरण में ज्यादा भरोसा रखती है। इसे हम माइक्रो मैसेजिंग, व्हाट्सएप मैसेज में युवाओं द्वारा प्रयुक्त भाषा से समझ सकते हैं। 

इस पीढ़ी की भाषा में भाषाई शुद्धता और लिपि की अस्मिता का कोई आग्रह नहीं है। हिंदी रोमन लिपि में अपने ढंग और शब्दों तो तोड़-मरोड़ कर धड़ल्ले से लिखी जा रही है। यही उनके सम्प्रेषण की भाषा है। जिसे एक ने कही, दूजे ने समझी’ शैली में इस्तेमाल किया जाता है। इस भाषा में अभी साहित्य सृजन ज्यादा नहीं हुआ है ( हुआ हो तो बताएं)। क्योंकि इस भाषा का सौंदर्यशास्त्र अभी तय होना है। कई लोगों को यह कोड लैंग्वेज जैसी भी प्रतीत हो सकती है। यानी शब्दों के संक्षिप्त रूप धड़ल्ले से प्रयोग किए जा रहे हैं, नए रूप गढ़े भी जा रहे हैं, लेकिन उनका अर्थ पारंपरिक ही हो यह आवश्यक नहीं है। अलबत्ता जैसे-जैसे अल्फा जेनरेशन वयस्क होती जाएगी, उसकी अपनी भाषा में साहित्य सृजन  भी सामने आएगा। तब पुरानी पीढ़ी उसे कितना समझ पाएगी, यह कहना मुश्किल है।  

जहां तक मिलेनियल जनरेशन की बात है तो यह पीढ़ी पुरानी और नई पीढ़ी के संधिकाल में पली बढ़ी है, इसलिए इसे हिंदी का संस्कार अपने पूर्वजों की भाषा से विरासत में मिला हुआ है तथा उस विरासत में इस पीढ़ी ने अपनी सृजन शैली का तड़का लगाया है। इसलिए इस पीढ़ी की भाषा का तेवर पूर्ववर्तियों  की तुलना में अलग, ज्यादा संवेदनशील और जमीनी लगता है। बावजूद इसके इस पीढ़ी की भाषा पर प्रौद्योगिकी और इंटरनेट का (दु) ष्प्रभाव बहुत कम है।

इसमें अलग लिखने और दिखने की चाह तो है, लेकिन परंपरा से हटने का बहुत अधिक आग्रह नहीं है। मिलेनियल  जनरेशन अब अधेड़ावस्था में है और 20 सदी के संस्कारों और 21वीं सदी के नवाग्रहों के बीच अपना रचनात्मक और अभिव्यक्तिगत संतुलन बनाए रखने में विश्वास करती है।          

अब देखें कि मनोज मुंतशिर ने जो वाक्य प्रयोग किए हैं, क्या वो सचमुच आज के उस समाज की भाषा है, जो सभ्यता के दायरे में आते हैं। वैसे मनोज मुंतशिर कोई महान गीतकार या लेखक हैं भी नहीं। उन्हें कुछ पुरस्कार जरूर मिले हैं, लेकिन उनका लिखा कोई गीत कालजयी हो और लोगों के होठों पर सदा कायम रहा हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। उन्होंने अपना नाम मनोज शुक्ला से ‘मुंतशिर’ सिर्फ इस वजह से कर लिया कि उन्हें यह शब्द भा गया था।
 
मुंतशिर अरबी का शब्द है और इसके मानी हैं अस्त-व्यस्त अथवा बिखरा हुआ। ‘आदिपुरूष’ के विवादित संवादों में मनोज का ‘मुंतशिर’ चरित्र ही ज्यादा उजागर हुआ लगता है। वरना ‘लंका लगा देंगे’ जैसा वाक्य प्रयोग तो अल्फा जनरेशन की हिंदी में भी शायद ही होता होगा।  

वैसे भाषा में नया प्रयोग कोई गुनाह नहीं है, बशर्ते वह मूर्खतापूर्ण और अनर्थकारी न हो। कई बड़े लेखकों ने भी अपने गढ़े हुए चरित्रों को यथार्थवादी बनाने के लिए आम बोलचाल की भाषा कहलवाई है। यदा-कदा फिल्मों (ओटीटी प्लेटफॉर्म पर तो यह खूब हो रहा है) में भी शुद्ध गालियों का इस्तेमाल हुआ है। लेकिन ऐसे चरित्रों के लिए किया गया है, जो समाज के बहुत बड़े वर्ग की आस्था का विषय नहीं है, जो समाज से उठाए गए आम  मानवीय चरित्र हैं। लेकिन ‘आदिपुरूष’ के साथ तो ऐसा नहीं है। इसे बताया भले ही रामायण से प्रेरित हो, लेकिन हकीकत में यह कुछ बदले हुए रूप में ‘रामायण’ ही है। यह रामायण सदियों से लोगों के मन में इस कदर बैठी हुई है, उसके चरित्र इतने स्पष्ट तथा समाज को संदेश देने वाले हैं कि उनसे किसी भी तरह की छेड़छाड़ सामूहिक मन को विचलित करने वाली है। 

राम को आदिपुरुष कहना भी सही नहीं 
वैसे भी राम को आदिपुरुष कहना भी सही नहीं है। राम रघुवंश में जन्मे थे। और गहराई मे जाएं तो भगवान राम इक्ष्वाकु वंश के 39 वें वंशज  थे। इसलिए ‘आदिपुरूष’ कोई होंगे तो इक्ष्वाकु होंगे। राम नहीं। भारत में जनमानस में राम की छवि मर्यादा पुरूषोत्तम की है और कई आक्षेपों के बाद भी यथावत है।

मनोज मुंतशिर ने एक नया ज्ञान यह भी दिया कि हनुमान स्वयं भगवान नहीं, बल्कि राम के भक्त हैं। तकनीकी तौर पर यह बात सही हो सकती है, लेकिन निराभिमानी हनुमान ने स्वयं पराक्रमी होते हुए भी स्वामी भक्ति की उस बुलंदी की मिसाल कायम की है, जहां भक्त स्वयं भगवान की पंक्ति में बैठने का हकदार हो जाता है। जन आलोचना और बाजार के दबाव में डायलॉग बदलने को तैयार हो जाने वाले मुंतशिर इसे कभी समझ नहीं पाएंगे। वरना इस देश में साहिर लुधियानवी जैसे शायर भी हुए हैं, जो अपने गीत में एक शब्द का हेरफेर करने से भी साफ इंकार कर देते थे।

दरअसल, लेखक की रचना और शब्द संसार में कहीं न कहीं उसका अपना चरित्र भी परिलक्षित होता है। इसके लिए किसी उधार ली गई कथा का आश्रय लेना जरूरी नहीं होता। एक तर्क दिया जा सकता है कि अगर रामायण आज लिखी जाती तो उसमें संवाद किस भाषा में होते?
 
वाल्मीकि की भाषा में, तुलसी की भाषा में, रामानंद सागर की भाषा में या फिर मनोज मुंतशिर की भाषा में? ज्यादातर लोग तीसरा विकल्प चुनते, जहां आधुनिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए आधुनिक भाषा में धार्मिक पौराणिक चरित्रों को उनकी शाश्वत मर्यादा के साथ रचा गया है, उनसे संवाद कहलवाए गए हैं। लेकिन कहीं भी फूहड़ता को आधुनिकता का जामा नहीं पहनाया गया है।

दरअसल मनोज के लिखे विवादित डायलॉग तो उससे भी घटिया हैं, जो किसी गांव में होने वाली रामलीला में कोई स्थानीय गुमनाम सा संवाद लेखक लिखता है और जिनके जरिए भी  दर्शक रामकथा से अपना सहज तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। ऐसे संवादों में अनगढ़पन हो सकता है, लेकिन फूहड़पन नहीं होता।  बहरहाल अगर बॉक्स ऑफिस की बात करें तो ‘आदिपुरूष’ का खुमार अब उतार पर है। फिल्म के इस हश्र ने साबित किया कि अब सोशल मीडिया ही बॉलीवुड फिल्मों का सबसे बड़ा नियंता है।

दूसरे, प्रयोगशीलता का अर्थ दर्शकों को हर कुछ परोसना नहीं है। इस फिल्म को लेकर राजनीति भी हुई। यहां तक दावे हुए कि ‘आदिपुरूष’ के पीछे छिपे राजनीतिक एजेंडे को हिंदूवादी संगठनों ने ही पलीता लगा दिया। और यह भी राम कथा के परिष्कार की गुंजाइश तो है, लेकिन उसे मनगढ़ंत तरीके से पेश करने की नहीं है।

(अमर उजाला डाॅट काॅम पर दि. 22 जून 2023 को प्रकाशित)

जांच एजेंसियों के रुख और विपक्षी गठबंधन के ढांचे पर बहुत कुछ निर्भर करेगा लोकसभा चुनाव:सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर नन्द लाल वर्मा

नंदलाल वर्मा (सेवानिवृत्त ए0 प्रो0)
युवराज दत्त महाविद्यालय, खीरी 
विपक्षी एकता में दलों के प्रवेश करने की कार्य योजना के साथ-साथ केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों के सक्रिय होने और प्रवेश करने की भी प्रबल संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं।  विपक्षी दलों के गठबंधन का ढांचा और विस्तार सिर्फ विपक्षी दलों की भूमिका और आम सहमति पर ही निर्भर नहीं करेगा, बल्कि केंद्र सरकार के इशारे पर जांच एजेंसियों का रुख का असर भी उस पर पड़ता दिखेगा। आरएसएस और बीजेपी ज़ीरो रिस्क पर आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे है और किसी भी स्तर पर कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते है। यदि विपक्षी दल चुनावी एकजुटता क़ायम करने पर काम कर रहे हैं, तो बीजेपी भी अपने गठबंधन के संभावित विस्तार और विपक्ष के यथासंभव बिखराव पर सतत रूप से गम्भीर चिंतन-मंथन करती हुई दिख रही है। यूपी में जातिगत राजनीतिक दलों विशेषकर बीएसपी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कोर वोट बैंक के वोटिंग नेचर और उसकी राजनैतिक प्रासंगिकता को लेकर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के सोशल साइंटिस्ट और पॉलिटिकल साइंटिस्ट अपनी -अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला में लगातार शोध कार्य में लगे हुए हैं और आगामी लोकसभा चुनाव में संभावित चुनावी या वोटिंग पैटर्न और सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखते हुए गठबंधन से संभावित लाभ-हानि का भी अनुमान और आंकलन कर रहे होंगे।

2019 लोकसभा (सपा-बसपा गठबंधन) और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में मिले मतों और वोटिंग पैटर्न का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि बीएसपी के कोर वोट बैंक का वोटिंग पैटर्न दोनों चुनावों में एक जैसा प्रतीत नहीं हो रहा है, अर्थात विधानसभा चुनाव में तो वह बीएसपी के पक्ष में साफ खड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन लोकसभा चुनाव में वह गठबंधन के साथ नहीं दिखाई पड़ता है। इस तथ्य की पुष्टि किसी विधानसभा में बीएसपी के कोर वोट बैंक बाहुल्य बूथों में मिले मतों की संख्या से आसानी से की जा सकती है। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन के बावजूद वह सपा के साथ खड़ा हुआ नहीं दिखता है। इससे यह प्रतीत होता है कि वह एक लाभार्थी के रूप में बीजेपी के साथ चला गया है। परिणामस्वरूप बीएसपी ज़ीरो से दस सीट और सपा पांच सीट पर ही जीत हासिल कर पाई थी। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव में मिले मतों के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन और विश्लेषण करने पर पाते हैं कि लोकसभा गठबंधन के चुनाव में बसपा का कोर वोट बैंक सपा को ट्रांसफर होता हुआ नहीं दिखता है। उसके कारण जो मैं समझ पा रहा हूँ कि उसमें सरकार की मुफ़्त राशन और किसान सम्मान निधि प्रमुखता से प्रभावी रूप से घटक दिखते हैं। वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी के कोर वोट बैंक बाहुल्य पॉकेट्स/क्षेत्रों में बीएसपी को यथासंभव उसका अधिकतम वोट मिलता हुआ दिखाई देता है। गत विधानसभा चुनाव में भले ही बीएसपी का एक विधायक ही जीता हो,लेकिन उसका लगभग 12 से 13 प्रतिशत ठोस वोट बैंक किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में दिखता है। बदलते राजनीतिक परिवेश में विपक्षी गठबंधन को मजबूती और संपूर्णता प्रदान करने के लिए बीएसपी का वोट बैंक अपरिहार्य विषय बनता दिखता है। लोकसभा चुनाव में पक्ष या विपक्ष के साथ गठबंधन की स्थिति में बीएसपी का यही वोट बैंक बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक हो जाएगा यदि उसकी ट्रांस्फेरॉबिलिटी की विश्वसनीयता की गारंटी हो जाए।

राजनीतिक विश्लेषकों और एकेडमिक चर्चाओं से जो निष्कर्ष निकलकर बाहर आ रहे हैं, उनसे सभी राजनीतिक दलों को गम्भीरता से समझना और सबक लेना होगा। बीएसपी सुप्रीमो की चुनावी चुप्पी या तटस्थता के निहितार्थ को विपक्ष और सत्ता पक्ष के लोग अपनी-अपनी राजनीतिक गणित और वोटर्स के व्यावहारिक-व्यावसायिक दर्शन और दृष्टिकोण से समझने के प्रयास कर रहे होंगे। फिलहाल,समाजवादी पार्टी अपने पिछले लोकसभा चुनाव में बीएसपी के साथ हुए गठबंधन में बहुजन समाज पार्टी के कोर वोट बैंक के वोटिंग नेचर/ पैटर्न/व्यवहार को अच्छी तरह समझ रही है जिसका परीक्षण आए चुनावी परिणामों से किया जा सकता है। समाजवादी पार्टी को आभास होने के साथ पुष्टि भी हो चुकी है कि पिछले लोकसभा चुनाव के साथ हुए गठबंधन में बीएसपी का कोर वोट बैंक का पैटर्न विधान सभा चुनाव 2022 से बिल्कुल मेल खाता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। इसलिए समाजवादी पार्टी विपक्षी एकता या गठबंधन में बहुजन समाज पार्टी की भूमिका को लेकर ज़्यादा चिंतित या विचलित होती नहीं दिख रही है। यूपी में कांग्रेस की चुनावी ज़मीन की हकीक़त किसी से छुपी नहीं है। लोकसभा चुनाव में अकेले उसकी कोई बड़ी भूमिका की उम्मीद भी नहीं की जा रही है,लेकिन राहुल गांधी की संसद सदस्यता जाने और भारत जोड़ो यात्रा ने कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के विकल्प के रूप में राजनीतिक क्षितिज पर स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई है। बीजेपी की साम्प्रदायिक राजनीति और पूर्वोक्त दोनों घटनाओं ने राजनीतिक वातावरण को काफी हद तक प्रभावित जरूर किया है। बादलते राजनीतिक घटनाक्रम की वजह से मुस्लिम समुदाय के वोट बैंक के व्यवहार के बदलाव से राजनीतिक माहौल बहुत कुछ बदलने के कयास लगाए जा रहे हैं। चूंकि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा और विधान सभा चुनाव में मिले वोट प्रतिशत के आधार पर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। इसी वोट बैंक की मजबूती के बल पर वह यह अन्य विपक्षी दलों के सामने यह प्रस्ताव रखने का राजनैतिक साहस जुटाती नज़र आ रही है कि जो दल सत्तारूढ़ बीजेपी को हटाना या हराना चाहते हैं, उन सभी दलों को समाजवादी पार्टी को आगामी लोकसभा चुनाव में खुलकर समर्थन देना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों और एकेडमिक चर्चाओं में मुस्लिम समुदाय के कांग्रेस की ओर झुकाव की ओर संकेत दिया जा रहा है और यह बदलाव बहुत कुछ विपक्षी गठबंधन के ढांचे पर निर्भर करेगा। यदि यूपी में विपक्षी गठबंधन में कांग्रेस और सपा ही शामिल होते हैं तो बीएसपी के कोर वोट बैंक का झुकाव इसी गठबंधन की ओर जा सकता है। कांग्रेस,बसपा और सपा के अलग-अलग रहने से मुस्लिम समुदाय के वोट बैंक के सामने ठोस निर्णय लेने की एक बड़ी असमंजसपूर्ण स्थिति पैदा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है, जिसका सीधा लाभ सत्तारूढ़ गठबंधन को मिलता हुआ दिखाई देता नज़र आएगा। जितना मुस्लिम समुदाय का वोट बैंक बिखरने की स्थितियां पैदा होंगी,उतना बीजेपी गठबंधन मजबूत होता दिखाई देगा।

आगामी लोकसभा चुनाव में पुरानी पेंशन योजना की बहाली को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के कई करोड़ कर्मचारियों और उनके परिवारों की बड़ी भूमिका को इग्नोर नहीं किया जा सकता है। कई राज्य सरकारों द्वारा पुरानी पेंशन योजना की बहाली की घोषणा के बावजूद केंद्र सरकार की अड़ंगेबाजी की वजह से धरातल पर लागू नहीं हो पा रही हैं। इसलिए सरकारी कर्मचारी यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि जब तक केंद्र में गैर बीजेपी या विपक्षी गठबंधन की सरकार नहीं बनती है, तब तक केंद्र और राज्यों में पुरानी पेंशन योजना की व्यावहारिक बहाली सम्भव नहीं है, चाहें किसी भी स्तर पर कितना भी व्यापक आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन क्यों न कर लिया जाए,क्योंकि जिस पार्टी के शासनकाल में पुरानी पेंशन योजना बंद हुई, उसी पार्टी को अपने ही शासनकाल में उसकी बहाली करना किसानों के तीन कानून वापस लेने की तरह थूककर चाटने जैसी स्थिति से गुजरना होगा। वर्तमान सत्तारूढ़ दल अपमान के इस घूँट को कैसे पी और सह पाएगी? पेंशन भोगी कर्मचारियों में एक और संशय घर करता हुआ दिखाई दे रहा है कि केंद्र सरकार और बीजेपी शासित राज्यों की सरकारें वर्तमान में मिल रही पुरानी पेंशन योजना को भी बंद कर सकती है या संशोधन कर उसे कम कर सकती है। विपक्षी दलों के गठबंधन को वर्तमान कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की स्थिति का राजनैतिक लाभ लेने के लिये चुनावी माहौल में हर सम्भव प्रयास करने में किसी तरह की चूक या देरी नहीं करनी चाहिए। किसानों की एमएसपी की कानूनी गारंटी , जातिगत जनगणना और अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवानों के साथ एक बीजेपी सांसद और कुश्ती संघ के अध्यक्ष द्वारा की गई अश्लील हरकतें और उससे उपजे आंदोलन जैसे मुद्दे आगामी लोकसभा चुनाव में प्रमुखता से उठाना विपक्षी दलों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते है।

Monday, June 05, 2023

बीजेपी की साम्प्रदायिक राजनीति की काट,सिर्फ डाइवर्सिटी और सामाजिक न्याय की विस्तारवादी राजनीति-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

*दो टूक*
नंदलाल वर्मा (सेवानिवृत्त ए0 प्रो0)
युवराज दत्त महाविद्यालय, खीरी 
कर्नाटक चुनाव के परिणामों को राजनीतिक गलियारों में मोदी सरकार की विदाई के संदेश के रूप में लिया जा रहा है। ऐसा अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों और बुद्धिजीवियों द्वारा माना जा रहा है,लेकिन इससे सहमत होने के बावजूद इस चुनाव से दो और महत्वपूर्ण संदेश निकलते हुए दिखाई देते हैं। पहला यह है कि बीजेपी नफ़रत की राजनीति किसी भी दशा  में छोड़ने या कम करने से बाज नहीं आ सकती है। आरएसएस से निकली बीजेपी की प्राणवायु धार्मिक विद्वेष का प्रचार-प्रसार ही है। बीजेपी राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के रास्ते से सत्ता में आई और उसने केंद्र से लेकर कई राज्यों के चुनावों में नफरत फैलाकर ही सफलता और सत्ता हासिल की है। बस,बीच-बीच में वह "सबका साथ- सबका विकास" का तड़का ज़रूर लगाती हुई देखी गयी है,लेकिन उसका ज्यादातर फ़ोकस साम्प्रदायिक नफ़रती राजनीति पर ही रहा है। राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही गुलामी के प्रतीकों की दुहाई देना, विशेषकर मुस्लिम प्रतीकों से मुक्ति के नाम पर भावनात्मक नफ़रत फैलाकर चुनाव जीतती रही है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो चुनावी रैलियों में 80 बनाम 20 का खुल्लमखुल्ला बिगुल बजाते हुए देश के सबसे बड़े राज्य के हारे हुए चुनाव को जीत में बदल दिया। बीजेपी ने सत्ता हासिल करने के बाद देश के कोने-कोने में स्थित मुस्लिम गुलामी के प्रतीकों (मस्जिदों) की एक सूची तक जारी कर डाली है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के साथ आरएसएस और बीजेपी वाराणसी मे स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े मुद्दों को " अयोध्या तो झांकी है,काशी - मथुरा बाकी है " पहले से ही सामाजिक स्तर पर और चुनावों में उठाती रही है। हिंदुत्व के एजेंडे को मजबूती देने के उद्देश्य से आरएसएस और बीजेपी ऐसे साम्प्रदायिक मुद्दों से दूर होना नही चाहती है।

बहुजन बुद्धिजीवियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी की साम्प्रदायिक चुनावी राजनीति की काट सिर्फ डाइवर्सिटी और सामाजिक न्याय की राजनीति का विस्तार ही हो सकती है। विपक्षी दलों की एकता और चुनावों में सामाजिक न्याय की पिच पर केंद्रित हो जाने से बीजेपी कोई चुनाव जीत नहीं सकती है। इसलिए विपक्षी दलों के लिए एकजुट होकर सामाजिक न्याय के दायरे के विस्तार के लिए जातिगत जनगणना के लिए व्यापक जनांदोलन करना बहुत जरूरी लगता है। चुनावी रैलियों में एक खास संदेश यह जाना चाहिए कि सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों और ठेकों सहित विकास की सारी योजनाओं में एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय को कम से कम 85% आरक्षण मिलना चाहिए। ऐसी घोषणा का संदेश दूरगामी राजनीति पर प्रभाव डालेगा। विपक्षी दलों को यह एलान कर देना चाहिए कि 2024 के चुनाव में एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय को अपने वोट से कमंडल की राजनीति के बैनर को फ़ाड़ना होगा। आगामी चुनाव मंडल बनाम कमंडल पर केंद्रित होकर जातिगत जनगणना कराए जाने तथा बामसेफ और डीएस-4 से होते हुए बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के मूल मंत्र " जिसकी जितनी संख्या भारी- उसकी उतनी भागीदारी " में छुपे सामाजिक - राजनीतिक संदेश को मजबूती के साथ बुलंद करने की जरूरत है। सामाजिक न्याय के विस्तार का यह नारा बीजेपी के राजनीतिक मनशूबों पर पानी फेर सकता है, अर्थात बीजेपी की चुनावी राजनीति का आंकड़ा बिगाड़ा जा सकता है। 90 प्रतिशत पिछड़ों पर 10 प्रतिशत अगड़ों का राज अब नहीं चलना चाहिए। पिछड़ों को अपने पुरखों के अपमान का बदला राजनीति के माध्यम से सत्ता हासिल कर लेना होगा। सामाजिक न्याय के विस्तार से बीजेपी की नफ़रती राजनीति काफी हद तक ध्वस्त हो सकती है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के संविधान समीक्षा के बिहार में दिए गए चुनावी वक्तव्य की भी याद दिलानी होगी। सामाजिक न्याय के मुद्दे पर बीजेपी को कई राज्यों के चुनाव में करारी शिकस्त मिल चुकी है,जिसका सीधा असर 2015 में बिहार (लालू प्रसाद यादव : मंडल की बनेगा कमंडल की काट) और 2023 में कांग्रेस द्वारा कर्नाटक चुनावों में सामाजिक न्याय और राहुल गांधी की राजनीति " नफ़रत की बाज़ार में मोहब्बत की दुकान " पर केंद्रित होंने से यह सिद्ध हो चुका है कि सामाजिक न्याय और सौहार्द्र पर केंद्रित राजनीति से ही सत्तारूढ़ दल की नफ़रत की राजनीति को परास्त किया जा सकता है। धर्मनिरपेक्ष विपक्षी दलों को सुर में सुर मिलाकर सरकार के सवर्ण वर्ग के ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) आरक्षण को आधार बनाकर एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय के सामाजिक न्याय के विस्तार की राजनीति पर केंद्रित होने की जरूरत है, अन्यथा 2024 के चुनाव में बीजेपी को सत्ता हासिल करने से फिर रोकना आसान नहीं होगा।

बहरहाल, अधिकांश राजनीतिक बुद्धिजीवियों और विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि बीजेपी मुस्लिम विरोधी नफ़रती बयान के बिना कोई चुनाव जीत नही सकती है। इसलिए अभी हाल सम्पन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त से सबक लेते हुए 2024 में हेट पॉलिटिक्स को और अधिक ऊंचाई देने से बाज नही आएगी। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए सामाजिक न्याय की नई पिच तैयार करने के लिए दो काम किये जा सकते हैं। पहला, एससी-एसटी,ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए सरकारी और निजी क्षेत्रों में आरक्षण 50% से 85% तक विस्तार करने की घोषणा होनी चाहिए। दूसरा काम यह करना होगा कि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में सप्लाई,डीलरशिप,ठेका,आउटसोर्सिंग जॉब आदि धनोपार्जन की सभी गतिविधियों तक सामाजिक न्याय के दायरे को बढ़ाने की घोषणा करना होगा। कांग्रेस के राहुल गांधी ने जिस तरह बीजेपी की नफ़रती राजनीतिक सत्ता के खिलाफ मोहब्बत की बात करते हुए भारत जोड़ो यात्रा की है, ठीक उसी तर्ज पर सम्पूर्ण विपक्षी दलों को कुछ वैसा ही सामाजिक - राजनीतिक भारतमय उपक्रम करना होगा। सामाजिक-राजनीतिक बुद्धिजीवियों और विश्लेषकों का मानना है कि इसके लिए " जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी भागीदारी" का सामाजिक-राजनीतिक संदेश देते हुए एक विशाल जनअभियान चलाया जाए तो आगामी चुनाव सामाजिक न्याय की विस्तारवादी सोच पर केंद्रित हो सकता है जो आरएसएस और बीजेपी की नफ़रती राजनीति की सबसे बड़ी काट साबित हो सकती है और सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक हिंदुत्ववादी साधु - संतों के नफ़रती गैंगों और सवर्ण मानसिकता वाली गोदी मीडिया की ताकत के प्रभाव को कम या ध्वस्त किया जा सकता है।

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नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर) युवराज दत्त महाविद्यालय लखीमपुर-खीरी 9415461224.        भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में वर्णि...

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