लघुकथा
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गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम |
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गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम |
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सुरेश सौरभ |
लघुकथा
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डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' |
लघुकथा
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-डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ |
अब ट्रेन पूरी स्पीड में थी। कानपुर चंद मिनटों की बात थी कि टीटीई ने एस-फोर कोच में प्रवेश किया और सात नम्बर की बर्थ से सटे उस नवयुवक को टोका- साबजादे, टिकट...उसने शायद उसकी बात सुनी नहीं या जानबूझकर अनसुनी कर दी। "अबे ओ मनचले, उधर मत निहार, टिकट दिखा।" इस बार आवेश भरे स्वर में टीटीई ने उससे टिकट की माँग की...अच्छा-अच्छा टि-टिकट...इस ज़ेब-उस ज़ेब में हाथ डालने लगा। तीनों महिलाएँ और आस-पास बैठे लोग मुस्कुराने लगे- "...अब स्साले को पता चलेगा। बहुत स्मार्ट...", "एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे...", बगल में एक सज्जन गीत गुनगुना रहे थे कि तभी हर ज़ेब खँगालने के बाद आख़िर में शर्ट की ज़ेब में हाथ डाला। सर, यह टिकट...एस-फोर, सेवन। तब तुम खड़े क्यों हो? टीटीई ने प्रश्न किया...साब, मेरे अम्मा-बाबू ने मुझे ऐसे ही संस्कार दिये हैं।
लघुकथा एक मंदिर। एक पंडित। एक दूल्हा। उसके साथ एक बराती, उसका बाप। एक दुल्हन। उसके साथ एक घराती उसकी मां। बाकी सब जगह कोरोना। शादी मंदिर में हो गई। शादी के बाद उनके सुख से दिन बीतने लगे। दो बच्चे हुए। वे बरसों बाद जवान हुए। एक बेटी की शादी की।अपनी प्रतिष्ठा और परंपराओं की खातिर लाखों खर्च किए। उन पर कर्जा हुआ। वह बहुत परेशान हुए। खर्चे को लेकर पति-पत्नी में वाद-विवाद हुआ। तब कुढ़कर पत्नी बोली-कोरोना काल की ही शादी बढ़िया थी-न ज्यादा झंझट न, झूठी परंपराओं के सिरदर्द का बोझ। निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-262701 मो-7376236066 |
लघुकथा
लॉक डाउन की उपयोगिता और उससे उपजी जन समस्याओं पर गूगल मीट पर परिचर्चा हो रही थी। प्रोफेसर डॉव सारिका सिंह ने तर्क रखा,‘लॉक डाउन से लोग कम संसाधनों में जीना सीख गए हैं। एकान्तवास में रहते-रहते लोगों में सकारात्मकता आ रही है। सड़कों पर तमाम वाहनों की आवाजाही कम होने से, फैक्ट्रियाँ,कारखाने बंद होने से, प्रदूषण बहुत कम हुआ है। आकाश कितना निर्मल और स्वच्छ लग रहा है। अदभुत प्राकृतिक सौंदर्य लॉक डाउन के कारण बढ़ा है, जिसकी अनोखी छटा रूहानी सुकून दे रही है। उनके ही महाविद्यालय की प्रोफेसर क्षमा गुप्ता ने उनके तर्क का खण्डन करते हुए कहा-लंबे समय तक लॉकडाउन के कारण सारी फैक्ट्रियाँ बंद हैं, कारखाने बंद हैं, जिससे गरीबों, मजदूरों और प्राइवेट कामगारों की जीविका का निर्वाह होना मुश्किल हो गया है। लंबे समय तक का लॉकडाउन, और बार-बार का लॉकडाउन, कोराना रोकने का कारगर इलाज नहीं? जरूरी यह है कि सरकार टेस्टिंग बढाए,जरूरत के हिसाब से दवाएँ,बेड,वेंटिलेटर और डॉक्टरों की भारी कमी को पूरा करे,जिससे इस कोरोना पर पूरी तरह काबू पाया जा सके,पर सरकार कहीं मंदिर बनवाने में, कहीं मूर्ति लगवाने में,कहीं सेन्ट्रल विस्टा, तो कहीं स्टेडियम बनवाने में पड़ी रही और कोरोना काल के साल भर में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को दुरूस्त करने में उसने कोई रूचि न ली।
उनके इस तर्क से डॉ0 सारिका चिढ़ गई, तैश में बोलीं-कुछ लोग हमेशा नाकारात्मकता ही फैलातें रहतें हैं। सरकार लोगों के लिए क्या कर रही हैं,यह उनको नहीं दिखता हैं, छिद्रान्वेषी लोगों का काम ही होता, बस हर काम में कमियाँ निकालना।
फिर बहस लॉक डाउन की खूबियों और खराबियों के पक्ष-विपक्ष में चलती रही।
दो माह बाद डॉ0 सारिका की कोरोना से मौत हो गई।
उनके लड़के भक्त सिंह ने सोशल मीडिया पर एक रोते हुए एक वीडियो डाला जिसमें वह कह रहा था-ऑक्सीजन, वेटिंलेटर न मिल पाने के कारण मेरी माँ की मौत हुई। मेरी माँ की मौत का असल कारण सरकार की बदइंजामी है। यह क्रूर सरकार किसी की सगी नही हैं।
पता-निर्मल नगर लखीमपुर खीरी
पिन-262701
लघुकथा
करीम मियाँ
क्वारन्टीन में तसल्ली से अपने दिन काट रहे थे। वह कोरोना पोजीटिव हो गये थे। घर
पर ही उन्हें डाक्टरों ने क्वारन्टीन किया था। बेटें, बहुएं और
पोते-पोतियाँ पल-पल उनका हाल-चाल फोन से लेते और खाना-पानी दवाई आदि उचित समय पर, उचित दूरी से दे
जाते। अभी वह मस्ती में दोस्तों की चैटिंग का जवाब दे ही रहे थे, तभी उनके पुराने
साथी दशरथ मांझी का फोन आ गया-करीम ने फोन रिसीव किया, उधर से आवाज आई-और
करीम मियाँ कैसे हो?
'सब अल्लाह का करम है, अब बुढ़ापे में यही
सब देखना बाकी रह गया था। तुम्हारी भाभी जान तो, पाँच बरस पहले मुझे तन्हा छोड़ करके
चलीं गईं। अब इस कोरोना ने इस कदर तन्हा किया है कि बस अब कोई हाल न पूछो।
'अरे! चिन्ता न करें भाई, जल्दी ही स्वस्थ हो
जाएंगे, डरे बिल्कुल न।'
'हुंह अब मुझे कौन चिन्ता, कौन सा डर। पहले से
गुड फील कर रहा हूँ। कहीं सब्जी लाओ, कहीं दूध लाओ, कहीं राशन-वाशन
बाजार से लाओ। कहीं मुन्ने को छोड़ कर आओ, कभी लेने जाओ, अब तो बड़े सुकून से
बैठे-ठाले खाना-पानी समय से मिल रहा है और दवा-दारू भी.. तभी उनके हाथों में चाय आ
गई सिप-सिप पीते हुए, ‘पूरे घरवाले पल-पल मेरा ख्याल रख रहें हैं। बड़ा चैनों सुकून मिल
रहा है, इस एकान्तवास में। सोचता हूँ, हम बूढ़ों के,अगर ऐसे ही सुकून
भरे दिन कटते, तो कितना अच्छा हो।'
'करीम भाई सेवा आप की नहीं, आप की उस चालीस
हजार पेंशन की हो रही है, जो आप को हर महीने मिल रही है, जो आप के बाद किसी को न मिलेगी।
जैसे किसी ने, एकदम से, पैरों के नीचे से, जमीन खींच ली हो।
जैसे तमाम सुइयाँ पूरे दिमाग में बड़ी तेजी से चुभने लगी हों। करीम मियॉ छटपटाकर
खामोश हो गये।
'हैलो हैलो हैलो! क्या हुआ? क्या हुआ? करीम भाई? कुछ बोलते क्यों
नहीं?
'चाय पी रहा था, तुमसे बात करने से
पहले मीठी लग रही थी। अब पता नहीं क्यों कड़वी लगने लगी है। कुछ तबीयत नासाज़ हो
रही है। ठीक है, दशरथ भाई कुछ सिर भारी हो रहा है। बाद में बात होगी, यह कहते-कहते करीम
मियाँ ने फोन काट दिया। अब चित लेटे हुए, अपनी खामोश आँखों से छत की ओर एकटक
ताक रहे थे। कुछ देर बाद उनकी आँखों से आँसू रिसने लगे। तभी फोन कें कें कें करने
लगा। नम्बर देखा, बहू का था।कंपकंपाते हाथ बढ़े,पर एकाएक ठहर गये। बेहद आंतरिक पीड़ा
से बुदबुदाए-नामुराद सारी दुनिया स्वार्थी है, हे! कोरोना तू मुझे इस दुनिया से उठाए
या न उठाए, पर स्वार्थी और मतलब परस्त दुनिया वालों को जरूर उठा ले।
लेखक- सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर
खीरी
पिन-262701
लघुकथा
मैं उस दावत में जाने को कतई तैयार न था, पर मेरा मित्र पीछे
पड़ गया ’अमां चलो यार,
मेरे रिश्तेदार की शादी है। फिर कोई
क्या कहेगा?
मैंने कहा-देखो मेरा निमत्रंण नहीं है, उचित नहीं लगता है।
'अरे! यार तू भी किन
दकियानूसी बातों में पडा है। इतनी बड़ी पार्टी में कौन आया, कौन गया, कौन ध्यान दे पाता
है। उसने अपने तर्क से मुझे निरुत्तर कर दिया।
हम दोनों पार्टी में पहुंचे। अपनी-अपनी इच्छानुसार प्लेटों में
लजीज व्यंजन लेकर खाने लगे। तभी मेरे मित्र की नजर, सामने भीड़ में जल्दी-जल्दी खाना खा
रहे एक युवक पर पड़ी। ‘और श्याम भाई बढ़िया है’ मित्र ने एक सवाल उस पर फेंका। श्याम
ने अचकचा कर खाते-खाते हैरत से,
मेरे मित्र की ओर देखते हुए, थोड़ा गर्दन झुका कर
झेंपते हुए,मौन भाषा में फौरन नमस्कार किया। ’ठीक है, ठीक है, अरे! कोई दिक्कत नहीं, आराम से खाइए।
मैंने देखा अब वह भय-विस्मय से खाते हुए इधर-उधर कनखियों से देखने लगा।
हम दोनों दावत खाकर लौट रहे थे। तभी मैंने अपने मित्र से पूछा-यार!
ये बताओ उस युवक से तुमने ये क्यों कहा ठीक है! ठीक है! कोई दिक्कत नहीं आराम से
खाइए।
मित्र हंसते हुए बोला-मेरे गांव का वह गरीब युवक था। बेचारा कोई
छोटा-मोटा प्राइवेट काम जहां-तहां करता रहता है। अक्सर देर रात को थका-हारा लौटता
है और खाना नहीं बना पाता, तो मजबूरन ऐसे ही किसी न किसी अनजानी पार्टियों में अपने पेट की आग
बुझा लेता है।
'अगर किसी ने इसे
पहचान लिया तो-मैंने अधीरता से पूछा।
’तो क्या एक-दो
तमाचे पड़ेंगे, पर भूख के आगे एक-दो तमाचे की परवाह इस जैसे गरीब, बेकार, लाचार बिलकुल नहीं
करते?
'अब मुझे लगा दावत
का लजीज खाना मेरे हलक में अटकने लगा है। मैं अंदर ही अंदर छटपटाने लगा, फिर अजीब तड़प और
खासी उलझन में एकाएक अपने गालों पर हाथ फेरने लगा, सहलाने लगा, ऐसा लगा, किसी ने मेरी कनपटी
पर एक जोरदार तमाचा रसीद कर दिया हो।
निर्मल नगर लखीमपुर
खीरी पिन-262701 यूपी
मो-7376236066
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सुरेश सौरभ |
एक सड़ी हुई क्षत-विक्षत लावारिस डेड बॉडी अस्पताल में आई। पोस्टमार्टम हाउस में कोई डॉक्टर उसे पहचान नहीं पा रहा था कि बॉडी स्त्री की है या पुरूष की। सड़ांध के कारण, दूर से ही डॉक्टर खानापूरी करना चाह रहे थे। तब डॉक्टरों ने सफाईकर्मी कमरूद्दीन को बुलाया। डॉक्टरों ने उससे कहा कि वह पहचाने कि बॉडी किस की है। कमरूद्दीन ने एक ही क्षण में निहार कर कहा-साहब स्त्री की है।
तब एक डॉक्टर ने उससे चुटकी ली-यार! ये बताओ हम उतनी देर से नहीं पहचान पाए, तुम इतनी जल्दी कैसे पहचान गये?
कमर-मैंने दिल की आँखों से, मन की आँखों से देखा।
दूसरा डॉक्टर बोला-अरे! यार, ये आँखें हमें क्यों नहीं मिली?
कमर-क्यों कि आप डॉक्टर हैं, मैं सफाई कर्मी हूँ?
अब वहाँ निःशब्दता में मिश्रित शून्यता, छा गई। डॉक्टर शान्ति से खानापूरी में
लग गए।
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सुरेश सौरभ |
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी
पिन-262701
लव जेहाद
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-सुरेश सौरभ |
बेटी-पर यह तो
सरासर गलत है। हमने एक ऐप के जरिए दोस्ती की, फिर
मैंने ही उसे हैदराबाद से यहाँ बुलाया।
माँ तैश
में-नालायक तू उसके साथ वहाँ पकड़ी गई है। तू क्या हमारी बिलकुल नाक ही कटाने पर
तुली है, करमजली, अब तू वही कहेगी,
जो मैं तुझे समझा रही हूँ। वर्ना अपनी सोसाइटी में इज्जत की
धज्जियाँ उड़ जाएंगी और ऊपर से धर्म के आवारा सांड, हमें
हुड़ेस-हुड़ेस कर कहीं का न छोडेंगे।
बेटी-पर मम्मी,
ये तो अन्याय होगा?
माँ-अपनी और
हमारी सलामती चाहती है, तो पुलिस के सामने यही कहना कि वह
तुझे लव जिहाद
में फँसाने के लिए, बरगलाने के लिए, यहाँ इस शहर
में आया था। न मानी, तो तेरे बाप भी मार-मार कर तेरा भुरता
बना देंगे।
बेटी टूटे मन
से-ठीक है, आप जैसा कहेंगी वैसा ही करूँगी। जैसा लोगों ने,
आप को पढ़ाया है, वहीं तुम मुझे पढ़ा रही हो।
उस लड़की से,
हैदराबाद से, मिलने आया, वह लड़का लोगों की अनुकम्पा से अब थाने में कैद था। फिर उस लड़की का बयान
थाने में आया। फिर धर्म के उजड्ड सांड वहाँ आए। अफरा-तफरी मची। मीडिया कर्मी उस
अफरा-तफरी में पूरी तरह कूदे और फिर वह लड़का, बाइज्जत लव
जेहाद के जुर्म में जेल भेज दिया गया।
अब लड़की को
सजा मिली, उसके बाप ने उसका स्मार्ट फोन छीन कर अपने कब्जे
में कर लिया।
निर्मल
नगर लखीमपुर खीरी पिन-262701 यूपी
मो-7376236066
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...