साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Sunday, July 04, 2021
डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल-सुरेश सौरभ
Thursday, July 01, 2021
सवनवा आईल ना-अखिलेश कुमार अरुण
भोजपुरी कजरी गीत
ना आईल बलमुआ, सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
छन-छन पनियां परे सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
कूके बाग़ कोयलिया सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
धई-धई काटे रतिया सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
ना कईल सिंगरवा सोहे सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
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अखिलेश कुमार अरुण |
पता-ग्राम-हजरतपुर, पोस्ट-मगदापुर
जिला-लखीमपुर(खीरी)
'सम्मान दो-सम्मान लो' के स्लोगन पर कदमताल-डी०के०भास्कर
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डी०के०भास्कर |
टीकाकरण अभियान की सुस्त चाल और कुछ जायज सवाल-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
सोशल साइट्स पर नकेल क्यों नहीं डाल पा रही सरकार-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
Monday, June 28, 2021
ज़िम्मेदारी-डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर'
लघुकथा
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डॉ. शैलेष गुप्त 'वीर' |
मनचला-डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
लघुकथा
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-डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ |
अब ट्रेन पूरी स्पीड में थी। कानपुर चंद मिनटों की बात थी कि टीटीई ने एस-फोर कोच में प्रवेश किया और सात नम्बर की बर्थ से सटे उस नवयुवक को टोका- साबजादे, टिकट...उसने शायद उसकी बात सुनी नहीं या जानबूझकर अनसुनी कर दी। "अबे ओ मनचले, उधर मत निहार, टिकट दिखा।" इस बार आवेश भरे स्वर में टीटीई ने उससे टिकट की माँग की...अच्छा-अच्छा टि-टिकट...इस ज़ेब-उस ज़ेब में हाथ डालने लगा। तीनों महिलाएँ और आस-पास बैठे लोग मुस्कुराने लगे- "...अब स्साले को पता चलेगा। बहुत स्मार्ट...", "एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा जैसे...", बगल में एक सज्जन गीत गुनगुना रहे थे कि तभी हर ज़ेब खँगालने के बाद आख़िर में शर्ट की ज़ेब में हाथ डाला। सर, यह टिकट...एस-फोर, सेवन। तब तुम खड़े क्यों हो? टीटीई ने प्रश्न किया...साब, मेरे अम्मा-बाबू ने मुझे ऐसे ही संस्कार दिये हैं।
Saturday, June 26, 2021
हम बच्चे-मधुर कुलश्रेष्ठ
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मधुर कुलश्रेष्ठ |
ठानी थी बगावत करने की- कपिलेश प्रसाद
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कपिलेश प्रसाद |
जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में बीजेपी ने झोंकी पूरी ताकत, मैदान में उतरे योगी सरकार के मंत्री और प्रशासनिक अधिकारी-नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
राजनैतिक चर्चा
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नन्द लाल वर्मा |
बीजेपी की तैयारी ज्यादातर सीटों पर येनकेन प्रकारेण कब्ज़ा करने की है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी भी इस चुनाव में पूरे जोर-शोर से अपनी ताल ठोक रही है। अब इंतजार 26 जून और 3 जुलाई का है जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए नामांकन और वोट डाले जाएंगे और नतीजे भी उसी दिन घोषित हो जाएंगे।
यूपी विधानसभा चुनाव 2022 से पहले अब जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर होने वाले चुनाव में सियासी दल अपना दम खम ठोक रहे हैं।75 जिलों में होने वाले इस जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए आज यानी 26 जून को नामांकन होना है। ऐसे में बीजेपी की तैयारी है कि इन चुनावों में साम,दाम, दंड, भेद से ज्यादा से ज्यादा सीटें हासिल की जाए। यही वजह है कि अब सरकार के मंत्री भी अपने-अपने क्षेत्र में नामांकन के दौरान मौजूद रहेंगे। पार्टी के उम्मीदवार का हौसला बढ़ाने के साथ ही साथ किस तरीके से लॉबिंग करके उम्मीदवार को जिताया जाए इस पर रणनीति भी तय करेंगे।कई जिलों से खबरें आ रही हैं कि जहां गैर बीजेपी दल मजबूत है, वहां के सपा, बीएसपी और निर्दलीय सदस्यों को स्थानीय जिला प्रशासन के माध्यम से कानूनी दांवपेंच प्रयोग कर या तो हिरासत में लिया जा रहा या फिर उनको सुरक्षित जगह रखा जा रहा है।
प्रदेश में होने वाले 75 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चुनाव खासतौर से सत्ताधारी बीजेपी के लिए नाक का सवाल बना हुआ है क्योंकि इस बार बीजेपी ने जिस आक्रामक ढंग से पंचायत चुनाव लड़ा था नतीजे उसके पक्ष में नहीं आए थे।बीजेपी से ज्यादा निर्दलीय जीते थे और बीजेपी तीसरे नंबर पर सपा के बाद चली गई थी। ऐसे में अब जब 3 जुलाई को जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए वोट डाले जाने हैं तो पार्टी की तैयारी है कि 75 में से तकरीबन 60 जिलों में अपना जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाया जाए और इसके लिए बीजेपी हर पैंतरा अपना रही है। पार्टी ने निर्दलीयों को साथ जोड़ने के नाम पर कानूनी शिकंजा या अन्य तरह का दबाव बनाना शुरू कर दिया है और कहीं कहीं पार्टी ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना रही है जिन्हें कुछ समय पहले अनुशासनहीनता/गुंडागर्दी के चलते पार्टी से निष्कासित कर दिया था।
आज 26 जून को यानी शनिवार को जिला अध्यक्ष पद के लिए नामांकन होना है।यह नामांकन दोपहर 3 बजे तक होगा ऐसे में सरकार के मंत्री अपने-अपने क्षेत्र में नामांकन के दौरान मौजूद रहेंगे और उम्मीदवारों का हौसला बढ़ाएंगे और विपक्षियों पर.......। बीजेपी के उम्मीदवार को जिला पंचायत अध्यक्ष कैसे बनाया जाए इस रणनीति पर भी पार्टी पदाधिकारियों और स्थानीय प्रशासन से बात चल रही है।
दरअसल, बीएल संतोष जब 2 दिन लखनऊ में थे तब भी पंचायत चुनाव को लेकर चर्चा हुई थी और तब मंत्रियों को अपने-अपने जिलों में जिला अध्यक्ष बनवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उसके बाद यह तय हुआ कि नामांकन के दौरान भी मंत्री वहां मौजूद रहेंगे। दरअसल, ऐसा माना जा रहा है कि जब पंचायत के चुनाव हुए तब कोरोना की दूसरी लहर की वजह से सरकार के मंत्री पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए नहीं उतर पाए थे जिसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ा और नतीजे उसके अनुकूल नहीं रहे। इससे सबक लेते हुए इस बार मंत्रियों को ही मैदान में उतार दिया है। ज्यादातर मंत्री कल नामांकन के दिन प्रत्याशियों के नामांकन में शामिल होंगे।
हालांकि कोविड के चलते नामांकन जुलूस पर तो सभी जगहों पर रोक है लेकिन कोविड प्रोटोकॉल को फॉलो करते हुए नामांकन किया जाएगा। 27 जून को सरकार के सभी मंत्री पूरे प्रदेश में तीसरी लहर के मद्देनजर बच्चों को जो मेडिसिन किट उपलब्ध कराई गई है उसका वितरण भी अपने-अपने क्षेत्रों में करेंगे और इसके बाद मंत्रियों का ब्लॉक स्तर पर दौरा भी होना है यानी 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अब बचे हुए 8 महीनों में सरकार के मंत्री आपको लखनऊ में कम और अपने विधानसभा क्षेतत्रों में, प्रभार वाले जिले में और ब्लॉक में प्रवास करते ज्यादा नजर आएंगे।क्योंकि आंतरिक कलह की वजह से यूपी का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए राजनैतिक रूप से जीवन-मरण का विषय बन चुका है
बीजेपी ने इस बार उम्मीदवारों के नाम घोषित करने में भी अपनी रणनीति में बदलाव किया. दरअसल, पहले 3050 जिला पंचायत वार्ड के सदस्यों के नाम की घोषणा लखनऊ मुख्यालय से की गई लेकिन नतीजे पक्ष में नहीं आये. उसके बाद यह तय किया गया कि जिला पंचायत अध्यक्ष पद के उम्मीदवारों के नाम की घोषणा जिला स्तर पर ही की जाएगी. इसके पीछे मंशा यह थी कि किसी नाम पर अगर बवाल हो तो उससे सीधे-सीधे आलाकमान पर सवाल ना उठे, लेकिन इतनी सावधानी बरतने के बाद और कई स्तर पर स्क्रीनिंग करने के बावजूद उन्नाव में पार्टी को दोबारा बैकफुट पर आना पड़ा।
एक तरफ बीजेपी की तैयारी ज्यादातर सीटों पर कब्जा करने की है तो दूसरी तरफ इस चुनाव को विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मानकर समाजवादी पार्टी भी इस चुनाव में जोर-शोर से अपनी ताल ठोक रही है। हालांकि, लगातार समाजवादी पार्टी इस चुनाव में शासन सत्ता के दुरुपयोग का भी आरोप लगा रही है। लेकिन बीजेपी भी समाजवादी पार्टी को 2015 की याद दिला रही है। अब इंतजार आज यानी 26 जून और 3 जुलाई का है जब पंचायत चुनाव में जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए नामांकन हर वोट डाले जाएंगे और नतीजे भी उसी दिन घोषित हो जाएंगे।जो खबरें मिल रही हैं उससे ज़ाहिर होता है कि बीजेपी सरकार ने विपक्षियों पर नामांकन प्रक्रिया से पहले ही कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। क्योंकि मोदी के नेतृत्व में बीजेपी के लिए लोकतंत्र का मतलब मात्र चुनाव जीतना ही शगल बन चुका है। यह सर्वविदित है कि इस तरह के चुनावों में सत्ता का हमेशा दखल रहा है।लेकिन विपक्ष के सदस्यों को थोक भाव मे बिना किसी अपराध के हिरासत में लेने के पीछे की मंशा बहुत कुछ बयां करती है जिसका खुलासा आज के नामांकन दाखिल होने और मतदान की तारीख को हो जाएगा।
पता-लखीमपुर खीरी उ०प्र०
Friday, June 25, 2021
एक लोकतंत्रवादी अखबार की मौत पर दो आंसू-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
Thursday, June 24, 2021
सिमटते अखबार और सोशल मीडिया में ‘सूचनाओ का लंगर’-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
कोरोना की पहली लहर ने अखबारों को एनीमिक बनाया तो दूसरी लहर ने उनकी बची खुची कमर भी तोड़ दी है। बावजूद अपनी बेहतर विश्वसनीयता के अखबार एक-एक कर बंद होते जा रहे हैं। उनमें काम करने वाले मीडियाकर्मी भी सड़क पर आते जा रहे हैं। वो खुद अपनी आवाज उठाने के लायक भी नहीं रहे हैं, क्योंकि मीडिया अब खेमों में इतना विभाजित हो चुका है कि अपनों की मौत भी उसे ज्यादा विचलित नहीं करती। नौकरियां गंवाने के साथ बीते सवा साल में कोरोना से करीब 500 पत्रकारों ने अपनी जानें गंवा दी हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया में अखबार अब पीडीएफ के रूप में जिंदा रहने की कोशिश में हैं। यह अखबारों का वामनावतार है। इस बात पर तो चर्चा बहुत होती है कि मीडिया को क्या छापनाध्दिखाना चाहिए, क्या नहीं छापनाध्दिखाना चाहिए, लेकिन मीडिया और मीडिया के अपने हालात क्या हैं, इस पर तो खुद मीडिया वाले भी चर्चा से बचते हैं।
कोविड-1 के समय मीडिया डेंजर जोन में चला गया था, अब कोविड-2 में मीडिया में दो तरह के बदलाव नमूदार हुए और हो रहे हैं। पहला तो ‘जनता की आवाज’ समझे जाते रहे ज्यादातर अखबार अब अपने वजूद की संध्या छाया से जूझ रहे हैं। इस देश में अखबारों 240 साल की महान परंपरा मिटने की कगार पर है। वो पत्रकारिता, जिसने तमाम खामियों के बावजूद आजादी के आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत में भी कई दूसरे आंदोलन और समाज सुधार के अभियान चलाए, भंडा फोड़ किए अब खुद पाठकों को तलाश रही है। आश्चर्य नहीं कि दो दशक बाद आने वाली नस्ल अखबार की दुनिया को इतिहास के एक अध्याय के रूप में पढ़े। बड़े अखबारों का आकार सिमट रहा है, तो ज्यादातर छोटे अखबार छपना बंद होकर डिजीटल एडीशन पर चले गए हैं। दूसरी तरफ सोशल मीडिया में अखबारों का पीडीएफ और खबरों का लिंक कल्चर तेजी से उभर रहा है। अपनी खबर पढ़वाने के लिए भी हाथ-पैर जोड़ना पड़ रहे हैं कि मेहरबानी कर फलां लिंक को खोलें, लाइक या कमेंट करें। यानी आप का एक लाइक अथवा कमेंट किसी खबर नवीस के लिए जिंदगी की खुराक हो सकता है।
यहां तर्क दिया जा सकता है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इससे मीडिया अपवाद कैसे हो सकता है? अखबारों ने अपनी जिंदगी जी ली, जी भर कर खेल लिया। अब बदले वक्त में इंटरनेट ने सब कुछ बदल कर रख दिया है। मिलेनियल पीढ़ी नेट को ही भगवान मानती है। हाथ में अखबार लेकर पढ़ना, उसके स्पर्श से रोमांचित होना, उसे सुबह की चाय का अनिवार्य साथी समझना, बिना अखबार के दिन सूना-सूना महसूस करना, यह सब 20 सदी के एहसास हैं। या यूं कहें कि यह विचार और सूचना की भूख कम, आदत की लाचारी ज्यादा है। अब जब सूचना के तमाम साधन मौजूद हैं, तब अखबार की जरूरत ही क्या है ? मोबाइल पर हर सूचना हर क्षण मौजूद है।
मुझे याद है कि 2011 में एक प्रतिष्ठित पत्र में लेख छपा था कि भारत में प्रिंट उद्योग के इतने ‘अच्छे दिन’ क्यों चल रहे हैं, जब कि बाकी दुनिया में इंटरनेट धीरे-धीरे अखबारों को लील रहा है। ये वो दिन थे, जब अखबारों में नए-नए संस्करण निकालने की होड़ सी मची थी। ‘हमारे इतने संस्करण’ यह गर्व के साथ कहा जाता था। अब यही बात दबी जबान से भी करने को लोग तैयार नहीं है। नोटबंदी के बाद दूसरा बड़ा झटका कोविड ने पिछले साल दिया, जब लोगों ने बड़ी तादाद में संक्रमण के डर के मारे अखबार बंद कर दिए। विज्ञापन राजस्व 67 फीसदी तक घट गया। हजारों पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की नौकरियां चली गईं। अखबार में काम करना दुरूस्वप्न बन गया। कुछ ऐसी ही हालत इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की भी है। मीडिया जगत ने सरकार से बेलआउट पैकेज भी मांगा। लेकिन सरकार के लिए दूसरी चिन्ताएं ज्यादा महत्वपूर्ण थीं और जागरूक मीडिया कोई भी सरकार नहीं चाहती। बीते सवा साल में कितने अखबार या चैनल बंद हुए अथवा वेंटीलेटर पर जिंदा हैं, इसका कोई निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह सैकड़ों में है। अखबार बंद होने से बेरोजगार हुए अनेक पत्रकार अब डिजीटल मीडिया या दूसरे नए मीडिया में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। कई पत्रकार खुद प्रकाशक बन गए हैं। हालांकि वहां भी अपनी पहचान बनाने और पहचान बचाने की मारा-मारी है। इस बीच कई नवाचार भी देखने को मिल रहे हैं। मसलन नई न्यूज साइट्स, फैक्ट चैक पत्रकारिता, डाटा विश्लेषण पत्रकारिता, सनसनीखेज बहसें आदि। इनमें से कई तो लोगों से चंदा करके अपने वेंचर चला रहे हैं। हर खबर को मसालेदार बनाने का चलन आम होता जा रहा है। उधर यू ट्यूब आदि पर तो ऐसे पत्रकारों का सैलाब-सा आया हुआ है और मौलिकता दांव पर लगी हुई है। सोशल मीडिया में जो दिखाया, बताया जा रहा है, वो कितना सही, कितना गलत है, कितना ज्ञान और कितना एजेंडा है, समझना मुश्किल है।
दूसरी तरफ देश में छपने वाले अखबारों की संख्या सिकुड़ने से सोशल मीडिया और खासकर व्हाॅट्स एप पर हम एक नया ‘पीडीएफ कल्चर’ पनपते देख रहे हैं। अपने ग्रुप में यथाशीघ्र जमाने भर के अखबारों की पीडीएफ उपलब्ध कराना भी अब एक ‘नई समाज सेवा’ है। यह बात अलग है कि इन्हें मुहैया कराने वाले ज्यादातर पीडीएफ सेवकों और पीडीएफ पाठकों को भी ‘पीडीएफ’ का फुल फार्म ( पोर्टेबल डाॅक्युमेंट फार्मेट ) और अर्थ भी शायद ही मालूम होता हो। लोग इतना ही जानते हैं कि व्हाट्स एप पर झलकने वाला अखबार ही पीडीएफ है। आंखों पर जोर डालने वाले ये आॅन लाइन अखबार कितनी गंभीरता से पढ़े जाते हैं, कहना मुश्किल है। अलबत्ता लेकिन किसी खास लेख या खबर को पढ़वाने के लिए भी लेखक या रिपोर्टर को पूरा दम लगाना पड़ता है। यानी समग्रता में अखबार पढ़ना और उस पर मनन का युग भी समाप्ति की ओर है। यह पीडीएफ पत्रकारिता भी बच्चों को रात में तारे दिखाने जैसी है। लेकिन इससे इतना फायदा जरूर हुआ है कि वो तमाम अखबार, जिनके शीर्षक भी आपके लिए मनोरंजन का कारण हो सकते हैं, खूब आॅन लाइन हो रहे हैं।
इसी के साथ एक नई डिजीटल पत्रकारिता संस्कृति भी फल-फूल रही है। गुजरे जमाने में लोग अखबार मांग कर पढ़ते थे, अब डिजीटल में अपनी खबर या लेख लोगों को पढ़वाने गुहार करती पड़ती है। एक ही खबर या सूचना पचासों ग्रुपों में अलग-अलग लिंक के रूप में पोस्ट होती रहती है। हर लिंक आप से लाइक और कमेंट मांगती है ताकि उसके हिट्स बढ़ें। कुलमिलाकर माहौल किसी धार्मिक स्थल पर जमे भिक्षुओं की माफिक होता है। यानी ‘एक लाइक’ या ‘एक हिट’ का सवाल है बाबा ! इस ‘लिंक सैलाब’ के चलते डिजीटल मीडिया में विविधता का भारी का अकाल है। मौलिकता का घोर टोटा है। संपादन की कंगाली है। ऊपर से एक ग्रुप से बचो तो वही खबर दूसरे ग्रुप में लिंक के रूप में आपको चुनौती देती लगती है। संतोष की बात केवल इतनी है कि आप सोशल मीडिया पर जो चाहो, जैसा चाहो, कह सकते हैं, पोस्ट और फारवर्ड कर सकते हैं। क्योंकि किसी के पास सोचने, समझने और मेहनत के साथ उसे अभिव्यक्त करने का न तो वक्त है और न ही ऐसी कोई इच्छा है। दरअसल सोशल मीडिया ‘खबरों का लंगर’ है। जिसको जो मिले, जैसा बने, परोसता रहता है। लोग भी उसे पूरा पढ़े या समझे बगैर फारवर्ड करते रहते हैं। यानी यहां उद्देश्य सूचना की जिज्ञासा के शमन से ज्यादा उसकी चिंगारी सुलगाते रहना होता है। सोशल मीडिया के गुलाम हो चुके, लोगों की मजबूरी यह है कि उन्हें भी हर पल कुछ नया चाहिए। वो सही है या गलत है, इससे किसी को कोई खास मतलब नहीं होता।
सोशल मीडिया की यह ‘अराजकता’ भी अब एक बड़ी ताकत बन चुकी है, जो सत्ताओं को भी हिला देती है। भविष्य का मीडिया यही है। अखबार चाटकर उससे दिमागी भूख मिटाने का दौर खत्म हुआ समझो। सोशल मीडिया पर हर पल आने और फारवर्ड होने वाली सूचनाएं चैंकाने, भड़काने या फिर डराने वाली ज्यादा होती है। इन पर अविश्वास के साथ विश्वास करते जाने का एक नया सामाजिक संस्कार हिलोरें ले रहा है। ऐसा संस्कार जिसकी कोई जवाबदेही नहीं है। हालांकि सरकार सोशल मीडिया पर कानूनी नकेल डालने की कोशिश कर रही है, लेकिन वह बहुत ज्यादा कामयाब नहीं होगी ( उससे राजनीतिक प्रतिशोध का मकसद भले पूरा हो जाए)। क्योंकि यह मूलतरू बिगडैल या स्वच्छंद सांड का बस्ती में घूमना है। लोग उससे डरते भी हैं, साथ में उसे देखते और छेड़ते भी हैं।
किसी ने कहा था कि ये दुनिया अब ‘कोविड पूर्व’ और ‘कोविड पश्चात’ में विभक्त हो जाएगी। अखबारों की थमती सांसें, मीडियाकर्मियों की बेकारी-लाचारी और सोशल मीडिया की बेखौफ लंगोट घुमाने की अदा यही साबित करती है कि तकनीक के साथ सूचनाओं की बमबारी और बढ़ेगी। लोग उससे घायल भी होंगे। लेकिन सूचनाओं की विश्वसनीयता वेंटीलेटर पर पड़ी दिखेगी। इसका आगाज हो चुका है।
वरिष्ठ संपादक दैनिक सुबह सवेरे मध्य प्रदेश
पढ़िये आज की रचना
मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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