साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Tuesday, May 31, 2022

आंबेडकर बनाम गांधी-गोलवलकर वैचारिकी/सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक समरसता/जाति उन्मूलन बनाम जाति समरसता-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

भाग तीन


एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर)
वाणिज्य विभाग
वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी

जिस देश में बुनियादी समस्याओं की उपेक्षा की जाती हैं,वहां गृह युद्ध जैसे हालात पैदा होने की संभावनाएं बन जाती हैं। जैसा कि अमेरिका में नस्लवाद के मामले में हुआ।अमेरिका बदला और गोरों के "व्हाइट हाउस" में कालों का वर्चस्व स्थापित हुआ,भले ही व्हाइट हाउस का नाम नही बदला,लेकिन वहां की लोकतांत्रिक संस्कृति जरूर बदली है।
✍️ यदि बहुजन नायकों की सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक लिखित/अलिखित वैचारिकी को शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रमों में शामिल कर पढ़ाया गया होता,तो वे 85% बहुजन के मन-मन और घर-घर पहुंच जाते,तो फिर काल्पनिक रामायण-महाभारत कौन देखता और सत्यनारयण - भागवत कथा कौन सुनता और विज्ञान के इस दौर के 2021 में भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का दंभ कैसे भरा जाता?
✍️डॉ.आंबेडकर का नाम आते ही आम आदमी के मन में उनकी क्या छवि बनती है? हाथ में संविधान लिए टाई और सूट-बूट में एक विद्वान,संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष या फिर अकेले में संविधान निर्माता,दलितों और आरक्षण के मसीहा के रूप में उन्हें कैद कर एक जाति/वर्ग के खांचे में कस दिया गया। डॉ.आंबेडकर की वैचारिकी को एक समाजशास्त्री,राजनीतिज्ञ और अर्थशास्त्री के साथ एक मानवविज्ञानी और नारीवादी विमर्श जैसे आयामों को वृहद स्तर पर समझना होगा। किसान,मजदूर व महिला उत्थान पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है और समाधान की संवैधानिक व्यवस्था भी की है। आरबीआई,प्रॉब्लम ऑफ रूपी,महिलाओ के श्रम के कार्य घंटे और समय के साथ उनके श्रम का आर्थिक मूल्यांकन,महिलाओ के सामाजिक अधिकार और उनके लिए प्रसूति अवकाश,किसानों की चकबंदी,सिंचाई बांध जैसे मूल विषयों पर सामाजिक न्याय की वैचारिकी के सबसे बड़े प्रणेता/प्रमुख स्वर"आंबेडकर"को सायाश भारतीय सामाजिक व राजनैतिक परिदृश्य से लगातार बाहर किया जाता रहा है। इनकी वैचारिकी का पाठ कम और कुपाठ ज्यादा किया गया। घोर प्रतिकूलताओं और विषमताओं के बावजूद तत्कालीन ब्राम्हणवादी मीडिया के समानांतर खड़ी की गई उनकी बहुजन मीडिया की पत्रकारिता का भी मूल्यांकन करना बहुत जरूरी है। आजकल सामाजिक/राजनैतिक आयोजनों/उत्सवों पर आंबेडकर की वैचारिकी खूब धमाल मचा रही है। बौद्धिक/सांस्कृतिक मंचों पर अब उनकी वैचारिकी बहस और विश्लेषण और उच्च अकादमिक स्तर पर शोधार्थियों के लिए गंभीर विषय का रूप धारण चुकी है।

✍️डॉ.आंबेडकर के समग्र चिंतन को लगभग सत्तर वर्षों तक जानबूझकर सामाजिक व राजनैतिक साज़िश के तहत उपेक्षित किया जाता रहा। तत्कालीन राजनीतिक,सांस्कृतिक और बौद्धिक मंचों/बहसों और शैक्षिक/अकादमिक संस्थाओं के किसी स्तर के किसी विषय के पाठ्यक्रम में एक पन्ने की जगह तक न मिल पाना,उनकी वैचारिकी के प्रति नफ़रत या परहेज की कलुषित भावना परिलक्षित होती है।ज्योतिबा राव-सावित्री फुले,विरसा मुंडा,पेरियार,फातिमा शेख, कालेलकर,वीपी मंडल,रामस्वरूप वर्मा,जगदेव प्रसाद और ललई सिंह आदि की वैचारिकी को तो ये दक्षिणपंथी फूटी आंख भी देखना नहीं चाहते हैं और राजनीति में आते-आते मुलायम,लालू यादव और मायावती इन्हे जातिवादी दिखने लगते हैं।उच्च प्रतिष्ठानों पर काबिज लोगो ने बहुजन समाज की घोर उपेक्षा के साथ उनका मानसिक और आर्थिक शोषण करने में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है।
✍️आज के दौर में जाति के आधार पर छुआछूत लगभग नहीं रह गयी है किन्तु अब यह छोटी-बड़ी संस्थाओं में यह शोषण का दूसरे प्रकार का अस्त्र अबश्य बन गया है। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों,सरकारी नौकरियों की लिखित परीक्षा से लेकर साक्षात्कार तक जानबूझकर कम अंक देने की संस्कृति परदे के नीचे अब जातिवाद अपने महीन/बारीक रूप में पहले से ज्यादा खतरनाक रूप में जिंदा है।
✍️कोविड-19 के संकट काल में टीवी चैनल पर रामायण और महाभारत दिखाकर आंबेडकर के सामाजिक न्याय के स्थान पर दक्षिणपंथी प्रभु वर्ग की सामाजिक समरसता फैलाने की साज़िश है।अभी भी अपना वर्चस्व कायम करने के लिए जाति व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं।धर्म और धार्मिक कर्म काण्ड/ आडंबर जातियों का सरंक्षण करते हैं।इसलिए इनका पहले विनाश होना जरूरी है।इन्हीं सब की वजह से भारत आज भी डॉ.आंबेडकर की वैचारिकी से बाहर खड़ा दिखाई देता है। बहुजन समाज को पढ़ना ही है,तो डॉ.आंबेडकर का बनाया संविधान,पेरियार और ललई सिंह की सच्ची रामायण पढ़िए। दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत के साथ &टीवी पर प्रसारित होने वाला धारावाहिक "एक महानायक: डॉ.भीमराव आंबेडकर" का भी प्रसारण होना चाहिए।
✍️लाला लाजपतराय,बाल गंगाधर तिलक व राजेन्द्र प्रसाद जैसे दक्षिणपंथी लोगों को "राष्ट्र-निर्माताओं" की श्रेणी में स्थापित किया जाता है और आंबेडकर को मात्र "दलितों और आरक्षण के नेता" के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया जाता है।विद्वता होने के बावजूद आंबेडकर को राष्ट्र निर्माण व अकादमिक पाठ्यक्रमों और पुस्तकालयों में जगह नहीं मिल पाती है।अब जब कुछ हालात बदल रहे हैं तो दक्षिणपंथी उसमें तरह तरह से छिद्रान्वेषण कर उनकी वैचारिकी की दिशा-दशा बदलने की साज़िश करने से बाज नहीं आ रहे।
✍️देश की बुनियादी समस्यायों पर केन्द्रित अनु. 340(52%ओबीसी के लिए प्रतिनिधित्व ),अनु.341 (अनुसूचित जातियों के लिए 15%आरक्षण)और अनु.342 (अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5% आरक्षण) में "आंबेडकर जी सबसे पहले देश के 52%ओबीसी के प्रतिनिधित्व की बात करते हैं।" अनु.340 का सरदार पटेल विरोध करते हुए प्रश्न करते हैं कि यह ओबीसी क्या है? एससी-एसटी की तो पहचान हो चुकी थी इसलिए उनके लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था के साथ"राजनैतिक आरक्षण"(केवल लोकसभा व राज्य विधान सभाओं में केवल दस वर्ष के लिए,किंतु राज्य सभा और राज्य विधान परिषदों में नहीं)भी हो गया,किन्तु ओबीसी की जातियों की पहचान का कार्य पूर्ण नहीं हो पाया था,इसलिए अनु.340 की व्यवस्था दी गई थी,किंतु इस "अनुच्छेद के हिसाब से आयोग गठित न होने के कारण,हिन्दू कोड बिल पर राजेन्द्र और तिलक द्वारा धमकी ओर कैबिनेट वितरण में नेहरू द्वारा आंबेडकर के साथ भेदभाव(आंबेडकर योजना मंत्रालय लेना चाहते थे) आदि विषयो का उल्लेख करते हुए डॉ. आंबेडकर 1951में ओबीसी के खातिर मंत्रिपरिषद से इस्तीफा तक दे देते है।लेकिन दुर्भाग्य है कि ओबीसी आंबेडकर के योगदान और त्याग को नहीं समझ पाया और अभी भी नहीं समझ पा रहा है।नेहरू ने इस त्याग पत्र को डॉ.आंबेडकर को संसद में जानबूझकर पढ़ने नहीं दिया,क्योंकि ओबीसी और वंचित वर्ग को इस्तीफे का असली कारण पता चल जाता। बाद में उन्होंने अपने इस्तीफे का कारण प्रसार के माध्यम से संसद के बाहर रखा था।

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