साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Monday, May 23, 2022

समानता, स्वतन्त्रता,निष्पक्षता, निर्विवादिता और बंधुता के पर्याय : डॉ. भीमराव आंबेडकर : एक निर्भीक - अपराजेय नायक-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर)
वाणिज्य विभाग
वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी

            डॉ भीमराव आंबेडकर को जब संविधान-निर्माण की ज़िम्मेदारी दी गई तो वहां उन्होंने भारत के सबसे पिछड़े और वंचित समाज जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक और महिलाएं भी शामिल हैं, के सभी प्रकार के हितों का सबसे ज्यादा ख्याल रखा,लेकिन किसी गैर-वंचित वर्ग या समुदाय का उन्होंने ज़रा भी नुकसान होने नहीं दिया और न ही किसी प्रकार का वैरभाव या प्रतिक्रियावादी नज़रिया परिलक्षित होने दिया, यह हमारे संविधान का सबसे महत्वपूर्ण, खूबसूरत और सराहनीय पक्ष है। इसमें किसी को तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए कि यदि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के संविधान निर्माण की जिम्मेवारी किसी सवर्ण समाज के व्यक्ति के नेतृत्व में दी गयी होती तो ऐसा हरगिज नहीं हो पाता। लोकतंत्र में संख्या बल बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है। अशिक्षित-गरीब समस्त बहुजन समाज को एक समान वोट का अधिकार दिलाने में डॉ.आंबेडकर का अद्वितीय योगदान रहा और इसके लिए उन्हें संविधान सभा मे निर्भीकतापूर्वक खड़े होकर कड़ा संघर्ष करना पड़ा। उन्होंने खुद चुनाव लड़ा,भले ही वह हार गए। देश का एक बड़ा अभिजात्य वर्ग नहीं चाहता था कि डॉ.आंबेडकर जैसा उच्च शिक्षित,विधि वेत्ता,अर्थशास्त्री और देश की सामाजिक जाति व्यवस्था की ऊँच-नीच के मर्म को समझने और उसका समाधान निकालने की समझ वाला संविधान सभा में पहुंचें! डॉ आंबेडकर के संविधान सभा में पहुंचने की भी एक कहानी है। उसके पूर्व वह लगातार शोषित और वंचित वर्ग को राजनीतिक सत्ता के मायने और महत्व को समझाते रहे अर्थात आशय स्पष्ट था कि डॉ.आंबेडकर राजनीतिक सत्ता को ही सभी प्रकार की प्रगति का मूल मानते थे। इस देश का दलित और शोषित वर्ग देश का हुक्मरान बने,उसके लिए उन्हें समान मताधिकार और लोकसभा-विधानसभाओं में आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था की। उन्हें पता था कि भारत जैसे जातिवादी और धार्मिक कट्टरपंथी देश में वंचितों का हक़ यहां के मनुवादी संस्कृति के लोग आसानी से देने वाले नहीं हैं! इसके लिए उन्होंने तमाम देशों के संविधानों का गहन और सूक्ष्म अध्ययन कर देश मे निष्पक्षतापूर्वक    समतावादी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देष्य से महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधानों की व्यवस्था की।
             " शिक्षित बनो! संघर्ष करो! संगठित रहो!" के सूत्र द्वारा डॉ.आंबेडकर की दूरदृष्टि राजनीतिक सत्ता की तरफ ही थी। इसको बार-बार बोलकर वह अपनी सोयी वंचित-शोषित जनता की शक्ति का आह्वान करना चाहते थे कि शिक्षा, संघर्ष और संगठन को माध्यम बनाकर इस देश की बहुजन आबादी, जो कि पहले से ही यहाँ की हुक्मरान कौम रही है, अब संख्या बल के आधार पर लोकतंत्र में राजनीतिक सत्ता को हासिल करे। यद्यपि बीएसपी संस्थापक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में खास तौर से डॉ.आंबेडकर की इस सैद्धांतिकी को व्यावहारिक धरातल पर सच साबित करके दिखाया। उत्तर भारत मे दलित राजनीति की दस्तक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कोई सामान्य घटना नहीं है।
               बावजूद इसके, अफसोस और दुख की बात है कि मनुवादी व्यवस्था से लड़-भिड़कर डॉ.आंबेडकर के अथक प्रयत्नों से प्राप्त संवैधानिक अधिकारों के सम्बंध में अभी तक यहां का दलित-आदिवासी, ओबीसी, धार्मिक अल्पसंख्यक और महिला समुदाय सही अर्थों में समझ हासिल नहीं कर पाया है। यहां का बहुजन समाज अपनी धार्मिक और आर्थिक गुलामी के चलते वोट की अहमियत को पहचानने में अभी भी गुमराह और असफल होता रहता है। 2019 लोकसभा चुनाव और 2022 यूपी विधान सभा चुनाव में ओबीसी,अनुसूचित जाति और जनजातियों को डॉ.आंबेडकर के अथक प्रयासों से हासिल किए गए राजननैतिक मताधिकार को प्रति माह मिल रहे पांच किलो अनाज और पांच सौ रुपये किसान सम्मान निधि के स्वार्थ में मनुवादी राजनीतिक शक्तियों के पास गिरवीं रखने में अपने महानायक की त्याग-तपस्या की बलि देने में कोई संकोच तक नही हुआ। इस लालच भरे राजनैतिक कदम से डॉ.आंबेडकर द्वारा दिलाई गयी मताधिकार और लोकतांत्रिक शक्ति तात्कालिक रूप से कमज़ोर होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। एक तरह की इस चुनावी रिश्वतखोरी के दूरगामी दुष्प्रभावों से अनभिज्ञ बहुजन समाज में तेजी से उपजती आर्थिक गुलामी की संस्कृति की वजह से डॉ.आंबेडकर की राजनीतिक विचारधारा पर राजनीति करने वाले दलों के प्रति विश्वास और आस्था जैसा संदेश काफी पीछे जाता हुआ प्रतीत हो रहा है।
                 डॉ.आंबेडकर ने अपने अंतिम समय में बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर ऐतिहासिक धार्मिक और सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया था। इसके माध्यम से वह इस देश को प्रबुद्ध अर्थात ज्ञान आधारित भारत बनाना चाहते थे। उनका यह बहुत बड़ा सपना था जो उनके असमय परिनिर्वाण के चलते अधूरा रह गया। इसके लिए देश के शोषित और वंचित समुदाय को अभी बहुत काम करना होगा। आंबेडकरी मिशन-आंदोलन को और मजबूत करना होगा। कांशीराम के पैदल और साईकिल यात्रा रूपी संघर्ष से गांव-गांव तक पहुंचे इस आंदोलन को समय-समय पर जनजागरण के माध्यम से जिंदा रखना होगा। आंबेडकर के "पे बैक टू द सोसाइटी " के सिद्धांत को अपनाते हुए ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में पढ़े-लिखे और नौकरी- पेशा में लगे नौजवानों, महिलाओं और अवकाशप्राप्त अनुभवी लोगों को आगे आना होगा। उन्हें डॉ आंबेडकर की बहुआयामी वैचारिकी के कारवां का नेतृत्व संभालना होगा। बहुजन समाज के अंदर की पितृसत्ता को डॉ.आंबेडकर खतरनाक मानते थे। इसलिए एक लड़ाई उसके लिए भी समानांतर चलती रहनी चाहिए। कुल मिलाकर वंचित समाज को अपनी सामाजिक-राजनीतिक-धार्मिक - सांस्कृतिक-आर्थिक ज़मीन को सुदृढ़ बनाकर राजनीतिक ताकत को नए सिरे से हासिल करना होगा। इसके बाद ही तमाम तरह के शोषण-उत्पीड़न व भेदभाव से मुक्त समानता, स्वतन्त्रता और बंधुता पर आधारित समतामूलक समाज बनने का सपना सच होता दिख पाएगा। वास्तव में इस बड़े काम को संभव कर दिखाने के बाद इस देश का बहुजन समाज पूरी दुनिया को यह बताने में गौरवान्वित महसूस कर सकता है कि डॉ.आंबेडकर सही मायनों में "ज्ञान के प्रतीक" और "विश्व रत्न" हैं।
           आइए!जानते हैं कि डॉ.भीमराव आंबेडकर के महान और अतुलनीय व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में दुनिया के विकसित देश और उनके प्रमुख किस प्रकार सोचते हैं:
अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा : यदि डॉ.भीमराव आंबेडकर हमारे देश मे पैदा हुए होते तो हम उन्हें " सूर्य" की उपाधि से नवाज़ते।
साऊथ आफ्रिका के राष्ट्रपति नेल्सेन मंडेला: भारत से लेने लायक एक ही चीज़ है, वह है, डॉ.आंबेडकर द्वारा रचित संविधान।"
हंगरी : " हम अपनी लड़ाई डॉ.आंबेडकर की क्रांति के आधार पर लड़ रहे हैं।"
नेपाल: "हमारा आने वाला संविधान डॉ आंबेडकर के नेतृत्व में लिखा गया भारतीय संविधान पर आधारित होगा।"
पाकिस्तान: "अगर हमारे देश में डॉ.आंबेडकर रहे होते तो हमें धार्मिक कट्टरता मिटाने में आसानी होती।
इंग्लैण्ड के गवर्नर जनरल (आज़ादी से पहले): "अगर भारत को पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये तो डॉ. आंबेडकर जैसे अनुभवी, निष्पक्ष राजनीतिज्ञ और समाजशास्त्री को संविधान सभा में होना ही चाहिये।"
जापान: " डॉ आंबेडकर ने मानवता की सच्ची लड़ाई लड़ी थी।" (जापान में डॉ.आंबेडकर की मूर्ति लगाई जा रही है)
कोलंबिया यूनिवर्सिटी: " हमें गर्व है कि हमारी यूनिवर्सिटी में एक ऐसा छात्र पढ़ा जिसने भारत का संविधान लिखा।"(यूनिवर्सिटी में मूर्ति स्थापना पर यूनिवर्सिटी प्रमुख)
                दुनिया के लगभग 100 से अधिक देशों ने डॉ.आंबेडकर की बहुआयामी वैचारिकी को अपनाया है, किंतु जो सम्मान उन्हें दुनिया के अन्य विकसित देशों ने दिया वह सम्मान उन्हें अपने देश में मिलने में काफी देर कर दी गयी, क्योंकि भारत में जाति और धर्म की व्यवस्था आज भी मानवतावाद पर हावी है जो व्यक्ति के योगदान को नहीं,बल्कि जाति व धर्म को ज्यादा महत्व देती है। एक विश्वरत्न को कथित श्रेष्ठ जातिवादियों की छोटी मानसिकता ने जाति से जोड़कर उन्हें छोटा साबित करने में कोई कोर-कसर नही छोड़ी है! डॉ आंबेडकर एक व्यक्ति नही है, वह एक  छोटी-मोटी एकेडमिक संस्था जैसी है जिसमे समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र,अर्थशास्त्र,पत्रकारिता और कानून जैसे विषयों के गूढ़ रहस्यों के अध्ययन और अध्यापन की अपार संभावनाएं छुपी हुई हैं। उनके व्यक्तित्व को संविधान निर्माता और दलितों के मसीहा तक सीमित करने की मनुवादियों की साज़िश को समझना और समाज को समझाना होगा। यदि डॉ आंबेडकर किसी ब्राम्हण समाज मे पैदा हुए होते तो यही डॉ.आंबेडकर घर-घर किसी देवी-देवता से कम पूजनीय नही होते। कांश! डॉ आंबेडकर जी कुछ वर्षों और जीवित रहे होते तो एससी - एसटी और ओबीसी की सामाजिक,शैक्षणिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन दिखाई देता और विविध संकटों के दौर से गुजरती बहुजन समाज की राजनीतिक दुर्दशा भी नही देखनी पड़ती।

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