साहित्य

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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Tuesday, January 10, 2023

डॉ.आंबेडकर द्वारा ओबीसी उत्थान के लिए की गई संवैधानिक व्यवस्था का सामाजिक-राजनीतिक-अकादमिक विमर्श के पटलों/मंचों पर समय पर आकलन और आंकलन न हो पाना ओबीसी के सामाजिक न्याय और बहुजन समाज की राजनीति के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और हानिकारक साबित हुआ और आज भी हो रहा है-नन्दलाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

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एन०एल० वर्मा (असो.प्रोफ़ेसर) सेवा निवृत
वाणिज्य विभाग
वाईडीपीजी कॉलेज,लखीमपुर खीरी
इस आश्वासन के साथ शिष्ट मंडल को उल्टे पांव वापस आना पड़ा और इस तरह एक बार फ़िर मनुवादियों का ओबीसी को छलने का प्रयास सफल हो गया। 1जनवरी 1979 को बीपी मंडल की अध्यक्षता में एक नया आयोग गठित किया गया जिसने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार के सामने प्रस्तुत की। देश में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई लगभग 3744 जातियों की ओबीसी के रूप में पहचान की गई और उनकी जनसंख्या 52% आंकते हुए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27% आरक्षण की सिफारिश के साथ एससी-एसटी की तर्ज़ पर प्रोन्नति में आरक्षण और लोक सभा-विधान सभाओं में राजनीतिक आरक्षण की भी सिफारिश की। ओबीसी के उत्थान के लिए जो मंडल आयोग ने सिफारिशें की थी वे अधिकांश कालेलकर आयोग की सिफारिशों जैसी ही थीं। 1980 से 1990 तक अदृश्य सामाजिक-राजनीतिक भयवश किसी भी सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। ओबीसी आयोग की सिफारिशें एक बार फिर 10 साल तक दफ्तरों की फाइलों में धूल फांकती रहीं।
             इसी दौरान देश भर में मंडल आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशें लागू करने को लेकर विभिन्न सामाजिक - राजनीतिक मंचों से आवाजें उठती रहीं। उस समय बीएसपी के संस्थापक कांशी राम ने मुलायम सिंह ,लालू प्रसाद यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे ओबीसी नेताओं से मुलाकात कर अपने संगठन के जरिए सिफारिशें लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बनाया और नारा दिया कि "मंडल कमीशन लागू करो वरना कुर्सी खाली करो" और अंततः 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने राजनीतिक मजबूरी वश या दबाव में आकर मंडल कमीशन की रिपोर्ट की एक सिफारिश "सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण " की ऐतिहासिक घोषणा कर कई वर्षों से बोतल में बंद आरक्षण नाम के जिन्न को आज़ाद कर दिया तो आरक्षण विरोधी मनुवादी शक्तियों के विभिन्न संगठनों ने हिंदुत्व की चादर लपेटकर सड़क पर उतरकर देश को अराजकता और हिंसा की आग में झोंकने जैसा कार्य किया और इस अराजकता में देश की संपत्ति को भारी नुकसान हुआ जिसमें कथित हिन्दू संगठनो में विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, आरएसएस और बीजेपी का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आदि संगठनों की बड़ी भूमिका रही। बड़े पैमाने पर हिंसक आंदोलन शुरू कराए गए, लेकिन वीपी सिंह अपने निर्णय पर अडिग रहे और लेशमात्र टस से मस नही हुए। वीपी सिंह के इस साहसी निर्णय पर आरक्षण समर्थकों ने उन्हें " राजा नही फ़कीर है, देश की तक़दीर है " के बुलंद नारे के साथ सम्मान देने का कार्य किया,वहीं आरक्षण विरोधी शक्तियों ने उन्हें "राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है" जैसे नारे देकर उन्हें अपमानित करने का कार्य भी किया। इस घोषणा के बाद वीपी सिंह अपनी जाति से एक तरह से बहिष्कृत से कर दिए गए और राजनीतिक सत्ता भी गंवानी पड़ी, लेकिन ओबीसी की जातियों में जहां वीपी सिंह एक मसीहा के तौर पर स्थापित होना चाहिए था, वह ओबीसी डॉ आंबेडकर के साथ-साथ वीपी सिंह के प्रति उनके जन्म जयंती और पुण्य तिथि पर सार्वजनिक रूप से कृतज्ञतापूर्वक सम्मान देना तो दूर उनको यादों में भी जिंदा नहीं रख सका। ओबीसी की इसी पिछड़ी और ओछी सोच की वजह से ही वह लोगों की नज़र में पिछड़ा माना जाता है।
            हिदुत्व की सबसे बड़ी और मजबूत संवाहक बनीं ओबीसी की जातियों का आरक्षण के मुद्दे से ध्यान हटाने और बंटाने के लिए बीजेपी में हिंदुत्व के बड़े राजनीतिक ठेकेदार लालकृष्ण आडवाणी ने हिन्दू धर्म के नाम पर सभी जातियों को लामबंद करने और ओबीसी आरक्षण के मुद्दे को नेपथ्य में ले जाने की साजिश रचने की दिशा में राम मंदिर आंदोलन को धार देने के उद्देश्य से सारनाथ से " राम रथ यात्रा " शुरू कर दी और इस रथ के सारथी बने थे आज के पीएम नरेन्द्र मोदी जो पीएम बनने के बाद अपने को ओबीसी कहने में गौरवान्वित महसूस करते हैं। जब रथ यात्रा बिहार की सीमा पर पहुंची तो वहाँ के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने राज्य की सीमा में घुसने पर गिरफ्तार करने की घोषणा कर दी। इसका बहाना बनाकर सवर्णों की पार्टी बीजेपी ने वीपी सिंह नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार तक गिरा दी थी,लेकिन आज भी बड़ी विडंबना यह है कि ओबीसी अपना सामाजिक और राजनीतिक दुश्मन या साजिशकर्ता की पहचान करने में लगातार बड़ी भूल करता जा रहा है। वर्ण व्यवस्था में ओबीसी की जातियों को सबसे नीचे पायदान पर बैठाया गया है। इसके बावजूद वह मनुवादियों की सामाजिक और धार्मिक आडंबरों-पाखंडों की साजिश को नहीं समझ पा रहा है। आधुनिक विज्ञान के दौर में भी ओबीसी हिन्दू बनकर मनुवादी व्यवस्था और कर्मकांडों में गहरी आस्था या अंधभक्ति में डुबकी लगाकर उनके इशारों पर नृत्यकला कर आनंद लेता हुआ अपना मूल कर्म-धर्म समझ रहा है।
           देश की आजादी के बाद केंद्र में कांग्रेस या बीजेपी के नेतृत्व वाली ही सरकारें राज करती रही हैं, लेकिन दोनों पार्टियों ने जानबूझकर जाति आधारित जनगणना पर लम्बी चुप्पी साधे रहीं। 1951 की जनगणना होने बाद सरकार ने फैसला लिया था कि 1961में जनगणना जाति आधारित होगी,लेकिन इस फ़ैसले पर जानबूझकर अमल नहीं किया गया। उसका कारण साफ था कि यदि ओबीसी को अपनी आबादी का पता चल गया तो चुनावी लोकतंत्र के माध्यम से उस शासन-प्रशासन में उनकी उचित हिस्सेदारी देनी पड़ेगी जिस पर 15% कथित सवर्ण अल्पसंख्यक समुदाय हज़ारों वर्षों से कुंडली मार कर बैठा हुआ है जिसने मंडल कमीशन की ओबीसी आरक्षण की एक सिफारिश को कोर्ट में ले जाकर क्रीमी लेयर और आरक्षण की 50% सीमा निर्धारित करवाने जैसा कार्य किया। यही 15% सवर्ण और उनके संगठन मंडल कमीशन की मात्र एक सिफारिश सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की घोषणा के बाद ओबीसी का ध्यान मंडल से हटाकर कमंडल की ओर ले जाने वाले लोग थे ,क्या वे ओबीसी के हितैषी थे? ओबीसी ने कभी भी इस गम्भीर साज़िश को समझने का प्रयास ही नही किया। दरअसल, इन्हीं मंडल विरोधियों ने डॉ.आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर पर विवादित और न्यायालय में लंबित मंदिर-मस्जिद ढांचा गिराकर देश को सांप्रदायिकता की आग में धकेलने का काम किया और आंबेडकरवाद से बहुजन समाज का ध्यान भटकाने की दिशा में एक गहरी साज़िश भी रच डाली। मनुवादी अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें आंबेडकर और आंबेडकरवाद से लगातार लड़ना होगा। आखिर, क्या बात है कि हमेशा उनके निशाने पर आंबेडकर और आंबेडकरवाद ही क्यों रहता है? मनुवादियों को पता है कि आंबेडकर ने ओबीसी के लिए क्या किया है, लेकिन ओबीसी को आज तक आभास नहीं हो पा रहा है और न ही सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के माध्यम से उन्हें समझाने के उचित प्रयास किये जा रहे हैं कि डॉ.आंबेडकर ने उनके लिए क्या किया है! उन्हें तो इसका अनुमान ही नहीं है कि यदि कालेलकर आयोग की दो-चार सिफारिशें ही 1955 में लागू हो गई होती तो अब तक ओबीसी वर्ग के करोड़ों परिवारों का जीवन स्तर ऊंचा उठ गया होता। दुर्भाग्य से तत्कालीन ओबीसी राजनेता और ओबीसी दोनों में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता न होने के कारण या अन्य अज्ञात कारणों से सामाजिक- राजनीतिक रूप से सोते रहे या अदृश्य भयवश चुप्पी साधे रहे और सवर्ण बड़ी चतुराई से इनका हिस्सा डकारता रहा।
          अजीब सी विडंबना है कि आज भी ओबीसी जातियों के अधिकांश लोग नेहरू,तिलक, इंदिरा गांधी आदि को ही अपना नेता मानते हैं जिन्होंने हमेशा सवर्णों के हितों को वरीयता दी और उन्हीं के हितों को ध्यान में रखकर सदैव नीतियां भी बनाई, लेकिन डॉ.आंबेडकर जिन्होंने भारतीयों के लिए ही नहीं ,बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए आजीवन कड़ा संघर्ष किया,संविधान सभा में मनुवादियों का विरोध झेला और ओबीसी के लिए अनुच्छेद 340 लिखकर उन्हें एक संवैधानिक विशिष्ट पहचान दिलाई, ओबीसी के उत्थान के लिए कमीशन गठित करने के लिए नेहरू जी को विवश किया ,लेकिन वे अपना उन्हें मसीहा या रहनुमा समझने, स्वीकार करने और बताने में संकोच और शर्म महसूस करते रहे और आज भी कर रहे हैं। डॉ.आंबेडकर को मनुवादियों ने मात्र एक दलित नेता के रूप में ही प्रचारित किया और आज भी किया जा रहा है। ओबीसी के लोग भी उनके दुष्प्रचार के झांसे में बहुत आसानी से आ गए जिसके परिणाम स्वरूप वे आज तक मनुवादियों के हाथों लूटे जा रहे हैं और तब तक लुटते रहेंगे जब तक उन्हें अपने वास्तविक चौकीदार/रहनुमा और लुटेरा/दुश्मन की पहचान नहीं हो जाती है। आज़ादी के 75 साल बाद भी ओबीसी मनुवादियों की वर्णव्यवस्था में फंसकर कई तरह के शोषण का शिकार हो रहा है। देश में आज हिंदुत्व-राष्ट्रवाद,हिन्दू बनाम मुस्लिम और भारत -पाकिस्तान का राग अलापकर ओबीसी का वोट लूटकर सत्ता की राजनीति हो रही है। एससी और एसटी भलिभांति समझ चुका है कि उसका उद्धार बहुजन समाज के महापुरुषों की वैचारिकी अपनाने और आत्मसात करने में ही सम्भव है, लेकिन ओबीसी के गले के नीचे यह बात नही उतर पा रही है। जिस दिन ओबीसी बहुजन दर्शन या आंबेडकरवाद को समझकर आत्मसात कर लेगा उसी दिन बहुजन समाज सामाजिक और राजनीतिक रूप से एकजुट होकर इन मुट्ठी भर मनुवादियों की सत्ता को उखाड़कर फेंकने में सफल होते देर नहीं लगेगी और तथागत बुद्ध की " बहुजन हिताय,बहुजन सुखाय " की वैचारिकी/संकल्पना साकार होती और फलती फूलती नज़र आने लगेगी।

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