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कपिलेश प्रसाद |
मेरी भी एक हसरत थी
विचारों की श्रंखला में ,
मेरा भी " वाद " चले
मैं महज़ मेरे नाम के
" ज़िन्दाबाद " से कुछ अलग
लक़ीरे ख़ीचना चाहता था ।
सो खिच गई ,
ऐसा लगता है ... ।
दुनिया की सैर पर ,
मैं निरन्तर यों नहीं निकल पड़ा था ।
कई -कई " वाद " देखे हैं मैने ,
मैं भी तो एक " वादी " हूँ ...
एक अपने " वाद " का होना
ही कुछ अलग बात है ,
यह दिगर बात है कि
मैं जनवादी नहीं ।
अभिलाषाओं , महत्वाकाँक्षाओं की वादी मेरी ,
निर्विवाद नहीं ,
शून्य से शिखर तक का
यह सफर मेरा ,
सदा-सदा आबाद रहे ।
मैं रहूँ , ना रहूँ ...
मेरा " वाद " रहे ।
यों ही कोई सिकंदर महान
और एडोल्फ हिटलर नहीं बन जाता !