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suresh saurabh |
साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Monday, June 21, 2021
बापों की नई खेप-सुरेश सौरभ
राजनैतिक सत्ता और चुनावी डर से विनम्र और झुकने को मजबूर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बात-चीत के लिए आधीरात को तैयार सरकार-नन्द लाल वर्मा
आधी रात को भी स्वागत: किसानों के पक्ष में जाएगी सरकार या फिर एक कुटिल चाल
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एन०एल० वर्मा |
मध्यप्रदेश के ग्वालियर में
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि
भारत सरकार कृषि बिलों को लेकर किसानों से बातचीत करने के लिए तैयार है। एक्ट से
संबंधित प्रावधानों पर कोई भी किसान यूनियन अगर आधी रात को भी बातचीत करने के लिए
तैयार है तो मैं उसका स्वागत करता हूं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसान
संगठनों के साथ किसी भी प्रावधान पर बातचीत करने को तैयार है लेकिन कृषि कानूनों
को वापस लेने पर कोई बात नहीं होगी।
वहीं शुक्रवार को किसान नेता
राकेश टिकैत ने ट्वीट कर तीनों कृषि कानूनों को देश के किसानों के लिए डेथ वारंट
बताया। इसके अलावा एक और ट्वीट में उन्होंने लिखा कि सरकारें आरोप ढूंढती हैं
समाधान नहीं। यह कौन सा लोकतंत्र है! देशभर के किसान सात महीने से राजधानी में
धरने पर बैठे हैं और केंद्र सरकार तानाशाही का रवैया अपनाए हुए है। किसान संगठनों
और केंद्र सरकार के बीच आखिरी बातचीत 22 जनवरी,2021 को हुई थी। केंद्र सरकार ने किसान संगठनों को तीनों
कृषि कानूनों को डेढ़ साल तक निलंबित करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन किसान
संगठनों ने सरकार के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। किसान संगठनों ने केंद्र सरकार
से इन कानूनों को वापस लेने को कहा था लेकिन सरकार ने इससे साफ़ साफ़ मना कर दिया था।
नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद ने
भी कृषि कानूनों को निरस्त करने के बजाय इसकी कमियों को सुधारने की वकालत की है।
उन्होंने कहा है कि किसानों को बातचीत शुरू करने के लिए कृषि कानूनों को ख़त्म करने
के बजाय इसकी खामियों को स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार के सामने रखना चाहिए। हालांकि, राकेश टिकैत सहित सभी किसान
नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसान संगठन केंद्र सरकार के साथ बातचीत करने
को तैयार है लेकिन चर्चा सिर्फ कानून को निरस्त करने के बारे में ही होनी चाहिए।
केंद्रीय
कृषि मंत्री और नीति आयोग के सदस्य के बयानों को अगले साल होने वाले सात राज्यों
के विधानसभा चुनावों के व्यापक संदर्भों में लिया जाना चाहिए और देश के किसानों और
संगठनों को इनका निहितार्थ समझना चाहिए। आंदोलनरत किसानों से लगभग पांच महीने तक
किसी भी तरह का संवाद स्थापित न करने की सरकार के तानाशाही रवैये की ओर इशारा करती
है।जनवरी में हुई आखिरी मुलाकात के बाद सरकार ने किसानों के प्रति जो उदासीनता और
उपेक्षा पूर्ण व्यवहार कर जिस संवेदनहीनता का परिचय दिया है, वह इस देश के किसान आंदोलन में
सदैव याद किया जाता रहेगा।पांच महीनों तक कान में तेल डालकर किसानों की सुध न लेने
वाली सरकार के मंत्री द्वारा कृषि कानूनों पर बातचीत करने का एकतरफा दिया गया प्रस्ताव के
गूढ़ निहितार्थ का अवलोकन और आंकलन करने की जरूरत है।बंगाल विधानसभा चुनाव में पूरी
ताकत झोंकने के बावजूद अपेक्षित सफलता न मिलने और ममता की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने और मोदी सरकार और
राज्यपाल के सामने घुटने न टेकने की वजह से बीजेपी के नामी गिरामी एमपी- एमएलए
टीएमसी में वापस जाने के सैलाव से भयभीत बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में अब एक अजीब
तरह की राजनैतिक खलबली मची हुई दिखाई देती है।बीजेपी सरकार के कृषि मंत्री के रुख
में आये अचानक बदलाव को किसानों को सहजरूप में लेने की जरूरत नही है।
मोदी नेतृत्व और आरएसएस
नियंत्रित बीजेपी सरकार की राजनैतिक साजिशों, हरकतों और अतिरंजित घोषणाओं/वक्तव्यों से आम आदमी भी
सजग होने लगा है।मोदी की लच्छेदार बातों और चुनावी प्रलोभनों को आमजनता इनके सात
सालों के शासन को बखूबी समझ चुकी है।मोदी की जुमलेबाजी और झूठ बयानवाजी से देश का
किसान और बेरोजगार युवाओं की समझ मे आ चुका है।रही सही कसर कोविड महामारी में
सरकार की कार्यसंस्कृति ने पूरी कर दी।देश की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं के
मामले में सरकार पूरी तरह कोरी बयानवाजी करती नज़र आई है।सरकार की नोटबन्दी,जीएसटी और निजीकरण
(मोनेटाइजेशन) के दुष्परिणाम सबके समझ मे आ चुके हैं।कृषि कानूनों के माध्यम से
सरकार की मंशा को एक बहुत बड़ा मतदाता वर्ग किसान अच्छी तरह जान चुका है।निजीकरण के
माध्यम से एससी एसटी और ओबीसी को आरक्षण के माध्यम से राष्ट्र की व्यवस्था में
भागीदारी को खत्म करने की मंशा को भी लोग अच्छी तरह जान चुके हैं।सरकार की विशुद्ध
पूंजीवादी संस्कृति स्पष्ट हो चुकी है।देश की संवैधानिक संस्थाओं पर राजनैतिक दबाव
बना हुआ है और लोकतंत्र की जगह पूँजीतन्त्र स्थापित करने की पूरी योजना इस सरकार
की लगती है।देश की भोली भाली जनता को चुनावी प्रलोभनों में फंसाकर उसकी जेब से कई
गुना डीजल,पेट्रोल,खाद के कीमतों की बढ़ोतरी और नए
करों के माध्यम से निकाल ली जा रही है, उसे अब समझ मे आ चुका है। यूपी सरकार किसानों के गन्ना मूल्य के भुगतान/बढ़ोतरी
और गेहूं खरीद के मसले पर पूरी तरह लचर, असहाय और विफल सिद्ध हुई है।
सरकार
के केंद्रीय मंत्री की अचानक किसानों के की याद आने और वार्तालाप के लिए दरवाजे
खोलने के स्पष्ट राजनीतिक आसंकाओ और दुश्वारियों की ओर इशारा करती नज़र आ रही
हैं।विगत राज्य विधान सभा चुनावों में मिली शिकाश्त से आरएसएस और बीजेपी का शीर्ष
नेतृत्व की बेचैनी स्पष्ट नज़र आती है और निकट भविष्य में होने वाले पांच राज्यों
के विधान सभाओं के चुनावों ने उनकी नींद उड़ा रखी है क्योंकि यूपी और पंजाब जैसे
कृषि प्रधान राज्यों में किसानों की नाराजगी से भारी राजनैतिक नुकसान दिख रहा है।
देश की केंद्र की सरकार के बनाने और बिगाड़ने में यूपी की राजनीति की भूमिका को
नकारा नही जा सकता है,यह
बात बीजेपी और उसके आनुषंगिक संगठन बखूबी जानते हैं। कृषि मंत्री का आमंत्रण इन्ही
सब का परिणाम हैं। कृषि कानूनों की वापसी के अलावा कानूनों के प्रावधानों के
संशोधन पर बातचीत करने का अब कोई मतलब ही नही बचा है। जब किसान संगठन पहले ही
स्पष्ट कर चुके हैं कि तीनों कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की कानूनी गारंटी के
बिना किसान अपने घर वापस नही जाएगा।इसके बावजूद मंत्री का वार्ता के लिए आमंत्रण
का क्या औचित्य रह जाता है! सरकार के आमंत्रण से लग रहा है कि वह सन्निकट विधानसभा
चुनावों के डर से कृषि क़ानूनों पर बैक फुट पर जा सकती है।किसानों और किसान संगठनों
के लिए यही अवसर है जब वे सरकार पर कानूनों को वापस लेने के लिए प्रभावी दबाव
बनाया जा सकता है।किसानों की अडिगता, साहस और धैर्य ने यह साबित कर दिया है कि वे अपनी दो
मांगे पूरी न होने से पहले आंदोलन को खत्म नही करेंगे।लगता है कि सरकार रूपी ऊंट किसान/जनता रूपी
पहाड़ के नीचे आता नज़र आ रहा है। मेरे विचार से आने वाले विधान सभा चुनावों से पहले
कृषि कानूनों पर कोई बड़ा निणर्य करने के लिए सरकार की राजनैतिक मजबूरी हो सकती है।
नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
Ph.9415461224,8858
बेटी अनुप्रिया ने एमएलसी सीट के संबंध में मुझसे कोई बात नही की:कृष्णा पटेल-नन्द लाल वर्मा
पते की बात, एक विमर्श
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एन.एल.वर्मा |
ऐसी स्थिति में यूपी का कुर्मी समाज चाहते हुए अपना विश्वसनीय और हितैषी राजनैतिक नेतृत्व नही तलाश पा रहा है और राजनैतिक विकल्प की तलाश में वह राजनीति की अंतहीन अंधेरी सुरंग में फंसता हुआ नज़र आता है।मेरे विचार से प्रदेश के कुर्मी समाज को अपना दल के उस धड़े के साथ खड़ा होना चाहिये जिसका राजनैतिक गठबंधन ऐसे दल के साथ हो जिसके सामाजिक सरोकार ओबीसी/एससी/एसटी से व्यापक संदर्भों में मिलते-जुलते हों जिससे समाज को निर्णय लेने में राजनैतिक सहजता और सुविधा बनी रहे।
प्रदेश व केंद्र सरकार में
भाजपा की सहयोगी अनुप्रिया पटेल की अगुवाई वाले अपना दल (एस) ने विधान परिषद में
खाली हो रही सरकार की मनोनीत क्षेत्र के चार (एमएलसी सीटें) सदस्यों में से एक
सदस्य पद देने की मांग की है। अपना दल (एस) ने प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेताओं के
सामने अपनी यह मंशा जाहिर कर दी है। पार्टी सारे विवादों को किनारे रखकर स्व.
सोनेलाल पटेल की पत्नी कृष्णा पटेल को एमएलसी बनाना चाहती है, ताकि विधानसभा चुनाव में पार्टी
परिवार की पूरी एकता के साथ जनता के बीच नजर आए।
अनुप्रिया पटेल की पार्टी के एक
वरिष्ठ नेता ने भाजपा के शीर्ष नेताओं को यह समझाने का प्रयास किया है कि इसका लाभ
विधान सभा चुनाव के दौरान राज्य में एनडीए के सभी प्रत्याशियों को मिलेगा। कृष्णा
पटेल के साथ आ जाने से विपक्षियों को चुनाव में पटेल समाज को दिग्भ्रमित करने का
मौक़ा भी नहीं मिलेगा। मिली जानकारी के मुताबिक कृष्णा पटेल के नाम पर सहमति न
बनने की स्थिति में अपना दल (एस) स्व. डा. सोनेलाल पटेल के राजनैतिक सहयोगी रहे
किसी पुराने कुर्मी नेता को विधान परिषद में भेजना चाहेगी। विधान परिषद में सपा के
चार मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल
पांच जुलाई को समाप्त हो रहा है।यह खबर एक दिन पहले प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
में थी।
उपर्युक्त खबर का खंडन करते हुए कृष्णा पटेल ने मीडिया से
मुखातिब होते हुए कहा है कि बेटी अनुप्रिया ने इस संबंध में मुझसे कोई बात नही की
है। इस खंडन से दो धड़ों में फंसे अपना दल की राजनीति में उलझे परिवार को फिर से एक
करने की अनुप्रिया पटेल की कोशिशें (खबरें) आसानी से परवान चढ़ती नज़र नहीं आ रही
हैं।अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष और सांसद अनुप्रिया पटेल की मां ने कहा है कि
ये सब बातें बेवज़ह हो रही हैं।उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्हें एमएलसी बनाने के
मुद्दे पर उनकी बेटी अनुप्रिया या उनके नेतृत्व वाले अपना दल के किसी भी जिम्मेदार
व्यक्ति ने मुझसे कोई बात नही की है।उन्होंने कहा कि जब चुनाव निकट आते हैं तो इस
तरह की बातें चर्चा में लाकर फैलाई जाती हैं जिससे समाज को दिग्भ्रमित किया जा
सके।उन्होंने यह भी कहा है कि इस तरह का कोई प्रस्ताव लाने से पूर्व एक साथ बैठकर
बात की जाती है,ऐसी कोई चर्चा उनसे या उनके दल
के किसी जिम्मेदार व्यक्ति से नही हुई है।उन्होंने कहा कि वह इस समय विधानसभा
चुनाव की तैयारियों में जुटी हैं।चुनाव के लिए जिस दल से बेहतर और सम्मानजनक
गठबंधन होने की संभावना दिखेगी,उससे
ही गठबंधन किया जाएगा और अपना दल ( कमेरावादी) पूरी मजबूती के साथ डॉ. सोने लाल
पटेल के राजनैतिक सपने को साकार करने के संकल्प के साथ चुनाव में उतरेगी।
विधान
परिषद की सीट पर अनुप्रिया पटेल और कृष्णा पटेल के इन परस्पर विरोधी
वक्तव्य/बयानबाज़ी का सामाजिक और राजनैतिक निहितार्थ/संदेश क्या हो सकता है?डॉ. सोने लाल पटेल द्वारा
स्थापित अपना दल में आस्था और उम्मीद रखने वाला कुर्मी समाज दो धड़ों में बंटे अपना
दल की पारिवारिक और राजनैतिक रस्साकशी, फूट और परस्पर विरोधी बयानबाज़ी से राजनैतिक रूप से
असमंजस और अनिर्णय की स्थिति में दिखाई देता है।आरएसएस नियंत्रित और ओबीसी विशेषकर
आरक्षण विरोधी बीजेपी सरकार की नीतियों और रीतियों से कुर्मी समाज का शिक्षित और
जागरूक वर्ग पूरी तरह नाखुश और आक्रोशित नज़र आता है और अपना दल का एक धड़ा उसी
बीजेपी सरकार का लंबे अरसे से सहयोगी बना हुआ है। पूंजीवाद परस्त बीजेपी सरकार का
ओबीसी,एससी और एसटी जिसका बहुत बड़ा
भाग जो खेत-खलिहान पर निर्भर है उसके सामाजिक-सांस्कृतिक- आर्थिक और शैक्षणिक
सरोकारों से दूर- दूर तक सम्बन्ध नही है या यह कहना भी अनुचित नही होगा कि बीजेपी
सरकार इन वर्गों के हितों के विरुद्ध कार्य करती नज़र आती है।यूपी सरकार किसानों के
गन्ना मूल्य के भुगतान/बढ़ोतरी और गेहूं खरीद के मसले पर पूरी तरह लचर, असहाय और विफल सिद्ध हुई है।
यहां यह उल्लेख करना जरूरी हो
जाता है कि सतना,मध्यप्रदेश से लगातार चार बार
से सांसद श्री गणेश सिंह पटेल को ओबीसी कल्याण की पार्लियामेंट कमेटी के चेयरमैन
के पद पर दुबारा नियुक्ति इसलिए नही की गई क्योंकि उन्होंने पद पर रहते हुए ओबीसी
के लिए बनी "क्रीमी लेयर" की आय सीमा को आठ लाख रुपये से बढ़ाकर पन्द्रह
लाख रुपये (कृषि आय और वेतन को न शामिल कर) करने की सिफारिश मोदी सरकार से की
थी।जब सरकार ने पटेल जी की सिफारिशों को तवज्जो न देकर एक सेवानिवृत्त भ्रष्ट
आईएएस अफसर पं. बीके शर्मा की अध्यक्षता में बनाई गई डीओपीटी की कमेटी जो
पार्लियामेंट कमेटी के सामने बहुत छोटी और नगण्य होती है, की बारह लाख रुपए (कृषि आय और
वेतन को शामिल कर ) की सिफारिश को मोदी सरकार मान लेती है तब पटेल जी ने संसद के
सभी पार्टियों के ओबीसी सांसदों को पत्र लिखकर इस सम्बंध में ट्वीट या पत्र के
माध्यम से मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए ओबीसी के व्यापक हित मे आग्रह किया
था।पटेल जी के इस पत्र के सिलसिले में एनडीए में शामिल किसी दल के ओबीसी सांसद ने
पत्र लिखना तो दूर संसद में एक शब्द तक बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका था। श्री
पटेल जी के कार्यकाल समाप्त होने के लगभग सात महीने बाद उसी अध्यक्ष पद पर सीतापुर
से सांसद श्री राजेश वर्मा को मनोनीत किया गया है।पटेल जी की सिफारिशों को न मानने
से ओबीसी के बहुत से बच्चे सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण की
परिधि से बाहर कर दिए गए हैं। मोदी नेतृव बीजेपी सरकार की कथनी और करनी में कोई
तालमेल नही है और सरकार ने जितने निर्णय लिए हैं उनसे आम आदमी ही परेशान हुआ है।
काला धन के नाम पर नोटबन्दी,जीएसटी, कृषि कानून,विदेशों में जमा काला धन वापस
लाने और जनता में बांटने के अतिरंजित वक्तव्यों,भ्रष्टाचार और निजीकरण आदि पर बीजेपी सरकार के
निर्णयों का अवलोकन-आकलन करने का वक्त आ गया है।
ऐसी
स्थिति में यूपी का कुर्मी समाज चाहते हुए अपना विश्वसनीय और हितैषी राजनैतिक
नेतृत्व नही तलाश पा रहा है और राजनैतिक विकल्प की तलाश में वह राजनीति की अंतहीन
अंधेरी सुरंग में फंसता हुआ नज़र आता है।मेरे विचार से प्रदेश के कुर्मी समाज को
अपना दल के उस धड़े के साथ खड़ा होना चाहिये जिसका राजनैतिक गठबंधन ऐसे दल के साथ हो
जिसके सामाजिक सरोकार ओबीसी/एससी/एसटी से व्यापक संदर्भों में मिलते-जुलते हों
जिससे समाज को निर्णय लेने में राजनैतिक सहजता और सुविधा बनी रहे।सामाजिक और
राजनीतिक महानुभावों से विनम्रता और आदर के साथ आग्रह करना चाहता हूं कि व्यक्तिगत
सामाजिक/राजनैतिक लाभ को दरकिनार कर मेरे उक्त विचार को निष्पक्ष और निरपेक्ष भाव
से स्वीकार कर उस पर चिंतन और मनन करें।
नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
पिता शिक्षक पिता रक्षक-श्यामकिशोर बेचैन
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श्याम किशोर बेचैन |
Sunday, June 20, 2021
20 जून पितृदिवस-श्याम किशोर बेचैन
सबल भाई की निर्बल भाई
पर गुंडा गर्दी ना होती ।
काश पिता जीवित होता तो
ऐसी सरदर्दी ना होती ।।
सबका अपना हिस्सा होता
सबका अपना घर होता ।
होता सच्चा प्यार सामने
झूठी हमदर्दी ना होती ।।
हांथ पिता का सर पे होता
तो अनाथ ना कहलाता ।
और जमाने भर में मेरी
ऐसी बे कदरी ना होती ।।
पिता एक अंकुश होता है
पिता हौसला होता है ।
पिता नही होता तो शायद
तनपे कोई वर्दी ना होती ।।
पिता के दम से मान हुआ
पूरा हर अरमान हुआ ।
पिता के होते हावी मुझपर
गर्मी और सर्दी ना होती ।।
हर बच्चे को मिलता चैन
होता ना कोई बेचैन ।
पिताके होते दुनियां ऐसी
जालिम बेदर्दी ना होती ।।
कवि श्याम किशोर बेचैन
संकटा देवी बैंड मार्केट
लखीमपुर खीरी
Saturday, June 19, 2021
कोरोना में शादी- सुरेश सौरभ
लघुकथा एक मंदिर। एक पंडित। एक दूल्हा। उसके साथ एक बराती, उसका बाप। एक दुल्हन। उसके साथ एक घराती उसकी मां। बाकी सब जगह कोरोना। शादी मंदिर में हो गई। शादी के बाद उनके सुख से दिन बीतने लगे। दो बच्चे हुए। वे बरसों बाद जवान हुए। एक बेटी की शादी की।अपनी प्रतिष्ठा और परंपराओं की खातिर लाखों खर्च किए। उन पर कर्जा हुआ। वह बहुत परेशान हुए। खर्चे को लेकर पति-पत्नी में वाद-विवाद हुआ। तब कुढ़कर पत्नी बोली-कोरोना काल की ही शादी बढ़िया थी-न ज्यादा झंझट न, झूठी परंपराओं के सिरदर्द का बोझ। निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-262701 मो-7376236066 |
क्या हर ‘जांगिड’ की नियति ‘खेमका’ होना ही है-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हम कुछ बातों पर
गौर करें। आईएएस या ऐसी ही समकक्ष सेवाओं में ज्यादातर युवा इसलिए आते हैं क्योंकि
कम उम्र में ही उन्हें बड़ी सत्ता और अधिकारों का उपभोग करने का अवसर मिलता है।
बहुत से लोग इसे ‘देशसेवा का परम अवसर’ तो कुछ की निगाह में यह ‘भ्रष्टाचार के चरम अवसर’ का स्थायी परवाना होता है। गिने-चुने अफसर होते हैं, जो अंतरात्मा को जिंदा रखते हुए व्यवस्था में लगे
घुन को चीन्हकर उन्हें मिटाने को अपना कर्तव्य मान बैठते हैं। ध्यान रहे कि कोई भी
तंत्र उसे असुविधाजनक लगने वाले हर तत्व को खामोश करने या हाशिए पर डालने में
संकोच नहीं करता। ऐसा नहीं कि अशोक खेमका के पहले सिस्टम के सताए हुए अफसर नहीं
हुए, लेकिन खेमका सिस्टम में रहकर सिस्टम के सितम सहते
हुए उससे भिड़ते रहने के प्रतीक बन गए हैं।
अब जांगिड स्वयं कितने ईमानदार हैं, कहना मुश्किल है, लेकिन बकौल उनके
उन्होंने जिला कलेक्टर के आचरण पर सवाल उठाए, जिसके परिणामस्वरूप
उनका तबादला कर िदया गया। इसे कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने यह आरोप लगाकर हवा
दे दी कि (सरकार के लिए) चंदा जुटाने में नाकाम रहने पर जांगिड को हटाया गया। उधर
जांिगड ने समूची ब्यूरोक्रेसी को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है, इसलिए उन्हे कहीं से मदद मिलना नामुमकिन सा है।
जाहिर है पानी में रहकर मगर से बैर करने पर दो ही विकल्प होते हैं। या तो आप आंख
मूंद कर मगर के मुंह में चले जाएं या पानी से ही बाहर निकल आएं। जांिगड के मुताबिक
जान से मारने की धमकी मिलने के बाद उन्होंने ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है। लेकिन
पुलिस भी तो हस्तिनापुर से बंधी है। तात्पर्य ये कि जांगिड को अपनी लड़ाई खुद लड़ना
है। बताया जाता है कि उन्होंने मप्र सरकार के रवैए से क्षुब्ध होकर गृह राज्य
महाराष्ट्र कैडर में तीन साल के लिए प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जताई है।
लेकिन जांगिड शायद भूल गए कि महाराष्ट्र के ‘खेमका’ और ईमानदार अधिकारी तुकाराम मुंढे को नागपुर में
स्मार्ट सिटी कंपनी के सीईओ रहते केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी से पंगा लेने की सजा
भुगतनी पड़ रही है। ठाकरे सरकार ने इस आईएएस अफसर को अब महाराष्ट्र मानवाधिकार आयोग
में सचिव के पद पर लूप लाइन में डाल दिया है। मुंढे भी 15 साल की नौकरी में 17 से
ज्यादा तबादले झेल चुके हैं। वजह उन्होंने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी
थी।
दुर्भाग्य से ऐसे ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अफसरों
के साथ राजनेताओ का व्यवहार सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष में रहते हुए अलग- अलग तरह का
होता है। उदाहरण के लिए हरियाणा में कांग्रेस के शासन काल में राॅबर्ट वाड्रा के
जमीन खरीदी घोटाले को बेनकाब करने वाले अफसर अशोक खेमका तब विपक्ष में बैठी भाजपा
की आंखों के तारे थे, लेकिन जैसे ही भाजपा
वहां सत्ता में आई, खेमका उसकी आंखों को
खटकने लगे। 30 साल की नौकरी में 53 तबादले झेलने वाला यह अफसर अब भाजपा शासन काल
में महानिदेशक पुरातत्व की लूप लाइन पोस्ट पर तैनात है। खेमका को भी जान से मारने
की धमकियां मिल चुकी हैं। हालांकि खेमका से पहले चाकरी के दौरान अधिकतम तबादलों का
रिकाॅर्ड एक और प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप कास्नी के नाम है, जिन्हें 35 साल की नौकरी में सरकार ने 71 बार इधर
से उधर किया। बावजूद इसके कास्नी ‘तबादला हीरो’ नहीं बन पाए और यह सेहरा खेमका के सिर ही बंधा।
उदाहरण और भी हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी
पार्टी के शासनकाल में एक मस्जिद की अवैध दीवार गिराने वाली और खनन माफिया के
खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली धाकड़ अफसर दुर्गाशक्ति नागपाल कभी हिंदुवादियों की ‘आदर्श’ थीं, लेकिन जब उनकी सरकार आई तो दुर्गाशक्ति को यूपी छोड़
दिल्ली केन्द्र में प्रति नियुक्ति पर जाना पड़ा। बताया जाता है कि वो आजकल वाणिज्य
और उद्दयोग मंत्रालय में उपसचिव बनकर दफ्तयर में बैठी हैं। यानी दुर्गाशक्ति का भी
केवल राजनीतिक इस्तेमाल कर लिया गया। ऐसे ही एक आईएएस अफसर हैं केरल कैडर के राजू
नारायण सामी। अच्छे काम का सिला उन्हें 20 साल में 22 तबादलों के रूप में मिला।
भ्रष्ट राजनेताओं का मोहरा बनने से इंकार करने पर सामी के खिलाफ जांच बैठाई गई।
मोदी सरकार ने उन्हें नारियल बोर्ड के चेयरमैन पद से हटाया तो राज्य की वामंपथी
सरकार ने भी उन्हें संसदीय कार्य विभाग का प्रमुख सचिव बनाकर बिठा रखा है। हालांकि
सामी ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी और न ही कोई शिकायत की। इसी तरह तमिलनाडु कैडर के
1991 बैच के आईएएस अधिकारी रहे यू. सागयन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने पर 27 साल
में 25 तबादले झेले और दो साल पहले ही नौकरी से रिटायरमेंट ले लिया। कर्नाटक कैडर
के 2009 बैच के आईएएस अधिकारी डी.के.रवि ने तो कोलार जिले में रेत माफिया के खिलाफ
अभियान चलाने की कीमत आत्महत्या कर चुकाई।
व्यवस्थाा के खिलाफ बगावत की बड़ी हर सिस्टम में
चुकानी पड़ती है, फिर चाहे वह राजनीति में हो या नौकरी में हो। फर्क
इतना है कि राजनेता बगावत के बाद यू-टर्न भी बड़ी बेशरमी से ले लेते हैं, लेकिन नौकरी में उतनी गुंजाइश नहीं होती। यह फर्क
अंतरात्मा का भी हो सकता है। यहां एक व्यवस्थावादी तर्क हो सकता है कि नौकरी करने
का मतलब ही आका के हुक्म का पालन है। आदेश की अवहेलना या उसे अपनी सुविधानुसार
पारिभाषित करने का विकल्प आपके पास नहीं होता। यह आपको नौकरी में आने से पहले
सोचना चाहिए। मनमर्जी से जीना है तो चाकरी न करें। दूसरे शब्दों में कहें तो आप
होते अंततरू व्यवस्था के गुलाम ही हैं, चाहे अधिकारों से
कितने ही विभूषित क्यों न हों। जो इस मर्यादा को नियति मानकर नौकरी करता जाता है, वह न सिर्फ सुरक्षित पार लग जाता है बल्कि
रिटायरमेंट के बाद भी मनसबदारी पा सकता है। फिर शिकायत क्यों?
दरअसल
सरकार और प्रशासन में ‘अनुकूल’ और ‘प्रति कूल’ अफसर का रेखांकन इसी से तय होता है कि आप
नियम-कानून का पालन सरकार और राजनेता के हितों के अनुकूल कराते हैं या प्रतिकूल
कराते हैं। यूं सार्वजनिक रूप से अफसरों को निष्पक्ष, समदर्शी और पुण्यात्मा की माफिक काम करने, संविधान की रक्षा और कानून का पालन कराने की
नसीहतें दी जाती हैं। जबकि हकीकत इससे उलट होती है, जहां ईमानदारी और
मूकदर्शिता में फर्क लगभग समाप्त हो जाता है। जांगिड जैसे अफसरों की यही परेशानी
है कि वो पुण्यात्मा होने के चक्कर में अंतरात्मा को प्रशासित करने में नाकाम रहते
हैं। यही अंतर्द्वंद्व उन्हें उस राह पर ढकेलता है, जिसे आम बोलचाल और
व्यवस्था की भाषा में बगावत कहते हैं। इसका अंजाम व्यवस्था से खुद को अलग करने, उसे कोसते रहकर उसमें बने रहने, खुदकुशी कर लेने या फिर खुद तंत्र में विलीन हो
जाने में हो सकता है। अब जांगिड आगे क्या करते हैं, यह देखने की जिज्ञासा
चुप्पी साधे जितने बाकी आईएएस और दूसरे अफसरों में है, उससे ज्यादा उस आम पब्लिक में है, जो यदा-कदा ही ऐसे लोगों के पक्ष में सड़क पर उतरती
है।
(वरिष्ठ संपादक दैनिक सुबह सवेरे मप्र-9893699939)
पढ़िये आज की रचना
मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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ले लो भैया गरम समोसा खाओ भैया इडली डोसा । अजब- गजब संग चटनी वाला , चटपट- चटपट स्वाद निराला । बोलो बोलो क्या है लेना , नहीं...
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अपने जन्मदिन पर विशेष मेरे जन्म का प्रमाण पापा जी के द्वारा हस्तलिखित आज फेसबुक चुपके-चुपके हमारे जन्मदिन का टैग चला रहा है. अपने चाहन...
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सभ्य मानव की बर्बर कहानी हिरोशिमा पर परमाणु बम गिरने के ठीक 4 दिन पहले शिन को उसके तीसरे जन्मदिन पर चटक लाल रंग की तिपहिया साइकिल उसके चाचा ...