क्रांति की अमिट कहानी था।
वह वीर बहुत अभिमानी था।
डरा नहीं वह गोरों से,
लहज़ा उसका तूफ़ानी था।
जल जंगल धरती की ख़ातिर,
जिसने सबकुछ वारा था।
क्रांति बसी थी रग-रग में,
वह जलता हुआ अंगारा था।
सन् 1875 में जन्मा,
राँची के उलिहातू ग्राम में।
नाम था बिरसा मुंडा जिसका,
जो हटा न कभी संग्राम में।
आदिवासियों का महापुरुष,
जो आज भी पूजा जाता है।
जिसकी गाथा सुनने से,
रग-रग में साहस भर जाता है।
मानवता के विरुद्ध ज़ुल्म जब,
बहुत अधिक बढ़ जाता है।
बिरसा जैसा महापुरुष,
तब ज़ुल्म मिटाने आता है।