साहित्य

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Tuesday, July 20, 2021

बीएसपी सुप्रीमो मायावती का "ब्राम्हण-मन्त्र/अस्त्र " चुनाव और फुले-आंबेडकर मिशन के लिए कितना कारगर साबित होगा-नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)

Prof. N.L.Verma
          2007 में ब्राम्हण समाज की सामाजिक केमिस्ट्री से यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हो चुकी बहुजन समाज पार्टी 2022 में भी ब्राम्हण समाज पर दांव लगाकर चुनावी लक्ष्य पर निशाना भेदने की रणनीति बना चुकी है। बीएसपी में मायावती के बाद दूसरे कद्दावर नेता सतीश चंद्र मिश्रा के नेतृत्व में बीएसपी ने यूपी में ब्राम्हण सम्मेलनों के माध्यम से ब्राम्हणों की चुनावी गणेश परिक्रमा शुरू कर दी है। अखिल भारतीय ब्राम्हण महासभा भी बीएसपी के पक्ष में अपने समर्थन की घोषणा भी कर चुकी है। क्या आज ब्राम्हण समाज की राजनैतिक दिशा और दशा 2007 जैसी ही है और 2022 के चुनाव में वैसी ही बनी रहेगी, यह एक बड़ा सवाल है! क्या मायावती की इस जातीय शतरंजी चाल से अन्य दलों की चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है? यह सच्चाई है कि " नेता उधर ही भागने की जुगाड़ में रहता है जिधर वोट भागता हुआ दिखाई देता है।" आज के दौर में लगभग सभी दलों के लिए लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज होने तक सिमट चुका है। कोई राजनैतिक दल धर्म के नाम पर साम्प्रदायिक और कोई जाति के नाम पर जातीय भेदभाव और वैमनस्यता का ज़हर घोलकर चुनावी रण युद्ध मे जीत हासिल कर सत्ता की कुर्सी पर येन केन प्रकारेण कब्जा करना चाहता है। आज दलों के चुनावी एजेंडे में आम आदमी के बुनियादी मुद्दों पर धर्म और जाति भारी पड़ती नज़र आ रही है,अर्थात ज्वलंत मुद्दों की जगह नही रह गई है। धर्म और जाति के बिगड़ैल और घातक घोड़े पर सवार होकर मिली सत्ता की प्रवृत्ति-प्रकृति, दिशा-दशा और जीवनकाल कैसा और कितना अनुशासित और लोक कल्याणकारी साबित होगा? धार्मिक और जातीय शक्तियों के बल पर मिली सत्ता में यही राजनैतिक शक्तियां सामाजिक तानाबाना को उधेड़ने में कोई कोर कसर छोड़ती नज़र नही आएगी।
              मा.कांशी राम जी द्वारा अत्यधिक त्याग, तपस्या और परिश्रम से डॉ. भीमराव आंबेडकर के मिशन और दर्शन पर बनाई गई बीएसपी जातियों के बल पर मिली सत्ता में जातियों का विनाश करने के डॉ.आंबेडकर के लक्ष्य को कितना भेद पाएगी? धार्मिक और जातीय शक्तियों के समीकरण से सत्ता का राजनैतिक लक्ष्य तो भेदा जा सकता है लेकिन सामाजिक और लक्ष्य नही। डॉ.आंबेडकर अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में " राजनैतिक लोकतंत्र से पहले सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र विकसित और सशक्त करने के हमेशा पक्षधर रहे हैं। सामाजिक जातीय वर्णव्यवस्था में कथित ब्रम्हमुख से उपजे सर्वोच्च ब्राम्हण की जातीय पीठ पर कथित निम्न जाति आधारित दल सवार होकर ज्योतिबा फुले और डॉ.आंबेडकर के मिशन की यात्रा कैसे पूरी कर पायेगा ?

लखीमपुर-खीरी (यूपी).....9415461224......8858656000

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