साहित्य

  • जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Sunday, July 11, 2021

मेरी अजीब किस्मत, -रिंकी सिद्धार्थ

    भाग दो   
समाज को आईना दिखाती एक लड़की के जीवन के संघर्षों की सच्ची कहानी
शहर में वैसे ही घर वालों के अत्याचार सहकर लड़कीयां जीवन व्यतीत करती रही। रीना कभी-कभी सोचती आखिर शहर में आने से उसकी जिंदगी में क्या परिवर्तन हुआ। गांव में  दादी और चाची ने कहा था कि शहर में अच्छे स्कूल में पढ़ने को मिलेगा, अच्छे टूयूसन टीचर लगेंगे और उसकी बिमारी का डॉ से इलाज होगा जिससे उसकी बचपन की बिमारी ठीक हो जायेगी। उसके साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसे तो ऐसे ही मुफ्त के एक स्कूल में डाल दिया गया जहां बच्चों की फीस भी नहीं पड़ती थी। किताब भी किसी से मांग कर दिला दी जाती थी। उसका कोई टूयूसन भी नहीं लगाया गया और घर में उसे कोई पढ़ाता नहीं था। उसे तो खुद ही पढ़ना पडता गांव में तो चाचा और बाबा उसे पूछने पर पढा भी देते थे। यहां अगर वो अपने मां बाप से कहती तो उसे कुछ काम के लिए बोल देते और दवा के नाम पर उसे नीम का चंदन, बांस जला कर लगाना, मिट्टी का तेल ,हल्दी चुना जैसे घरेलू नुस्खे करने को बोल देते जैसा गांव में होता था। साल में दो बार ही कपड़े दिलाये जाते होली और दिवाली इसके अलावा स्कूल की ड्रस, जूते, एक हवाई चप्पल, खाना, रहना इतना ही मिलता था। 

वे दोनों बहनें स्कूल पैदल ही पढने जाती थी। इतना मिलने के लिए उन्हें घर के काम करने पड़ते अगर मना करती तो मार खाती उन्हें बोलते हमारे घर मे रह रही हो छत रोटी कपड़ा मिल रहा है तन ढकने को तो दिमाग खराब है। बड़ी बहन थोड़ी बड़ी थी तो उस वक्त ज्यादा काम उसी को करना पड़ता और मार भी वो ही ज्यादा खाती थी। रीना की बिमारी धीरे-धीरे बढ़ रही थी। जब एक साल बाद वो गांव गई तो दादी और चाची उसकी हालत देखकर उन्हें डॉटने लगी। शहर में डॉ है सरकारी नौकरी से दोनों पैसा भी अच्छा कमा रहे तो भी बेटी का इलाज क्यों नहीं कराया। दादी को बोल दिया गया  बचपन की बिमारी है तो इलाज कराने से क्या फायदा और तुम को इससे ज्यादा हमदर्दी है तो तुम ही करा लो। तब दादी बोली मैं 70 साल की बुढिया अनपढ़ गांव में रहने वाली कमाती भी नहीं गांव में तो अच्छे डॉ भी नहीं। मैं इसका इलाज कहां कराऊँ फिर वो वापस शहर आ गई थी। 

सोचती कि उसके पूरे घर में कोई भी ऐसा नहीं है दादी, नानी ,मामीयां ,चाचीयां,बुआ ,मौसीयां,जो अपनी बेटियों के साथ ऐसा व्यवहार करती हो बल्कि उसकी नानी तो पुराने जमाने की सिर्फ पांच पास टीचर थी। वह अपने चारों बच्चों बेटा बेटी सब को डॉ,  इंजीनीयर, वकील, टीचर, बनाने की सोचती थी। नानी-नाना दोंनों ही नौकरी करते थे।इसीलिए सारे बच्चों को पढ़ाने के लिए घर में टूयूसन टीचर बुलाते थे। यहां तक की उसकी माँ जब नौ में आई तो फेल हो गई फिर वो जब स्कूल से घर आई सीधे छत पर जाकर रोने लगी। तब उसके नाना, नानी दोनों उसकी माँ के पास गये और बोले चिंता क्यों करती हो तुम्हारे मां बाप जिंदा है चाहे जितनी भी टूयूसन लगानी पड़े तुम पढना चाहती हो तो हम पढायेगें। तुम्हें उस के बाद उसकी माँ को दो घंटा पढ़वाने लगे बाकी बच्चों को एक घंटा क्योंकि वो फेल हो चुकी थी। 

मां बाप के ज्यादा ध्यान देने की वजह से वो दस पास कर ली और दस करने के बाद उनकी मां ने उन्हें नौकरी मिलने का प्रार्थना पत्र डलवा दिया उस जमाने में दस पास को नौकरी मिल जाती थी। उसके बाद नानी ने उसकी माँ की शादी कर दी उसकी माँ को नौकरी मिल गई इसकी खबर उन्हें शादी के बाद मिली तब तक उसकी दादी बहुँओ के नौकरी के खिलाफ थी, पढ़ाई के खिलाफ नहीं थी। पर उनका कहना था कि अगर पति अच्छा कमाता हैं तो  औरत को नौकरी नहीं करनी चाहिए दोनों बाहर कमाने जाते हैं। घर बर्बाद हो जाता तब उसकी नानी दादी के यहां आकर लड़ाई, शादी, बेटी हमारी है। हम इसको नौकरी जरूर करायेगें कल कोई बुरा वक्त पड़े तो ये ससुराल या मायके के सहारे न रहे अपनी जिंदगी खुद की कमाई से जी ले इसलिए हमने इसको इतना पढ़ाया हैं। हमारी बेटी को किसी के सहारे जिंदा न रहना पड़े फिर उसकी दादी भी मान गई ये सब बातें उसकी माँ ही बताती रहती थी।अक्सर चाचीयों को ,दादी ने भी अपनी जिम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाई थी दादी तो गांव की अनपढ़ औरत थी फिर भी उन्होने अपने बेटा बेटी सब को बहुत पढ़ाया उस वक़्त उतना कोई उनके पूरे गांव में नहीं पढ़ा था और अपने सारे बच्चों को पैरों पर खड़ा किया यहां तक की जब उसकी बुआ पर ससुराल में अत्याचार हुआ तो दादीे बुआ को वापस बुला ली और घर में बेटों के बराबर का हिस्सा भी बेटी को दिया ताकि दादी बाबा के मरने के बाद बुआ के साथ कोई बुरा व्यवहार न करे और बेटी को उतने ही सम्मान से रखा जैसे बेटो को रखती थी।  

हां बस एक बात उनकी जो लोगों को बुरी लगी पर रीना को सही लगी कि अगर दोनों घर के बाहर पैसा कमाने जाते हैं तो उनके बच्चों की अच्छी परवरिश नहीं हो पाती लेकिन बाद में तो दादी भी बदल गई। उसके बाद उनकी जितनी बहुंयें आई सब ने नौकरी की पर हां सब ने नौकरी के साथ अपने बच्चों की परवरिश में भी कोई कमी नहीं आने दी। उनकी नौकरी से जो ज्यादा पैसे घर में आये उससे उनके बच्चों की पढाई दवाई और अच्छी हो सकी रीना सोचती उसके परिवार में कोई भी तो ऐसा नहीं है जो बेटियों को उनके बेसिक अधिकार भी न दे। जो हर बच्चे का हक है दवाई पढाई और सम्मान, जैसे जितनी कमाई है जिसके पास सब उस हिसाब से अपने बच्चों को अच्छे स्कूलो में पढ़ाते, अच्छे डॉ को दिखाते, सम्मान से रखते और जब कभी उसकी चचेरी बहनो को उसके चाचा या चाची बिमारी की दवा दिलाने शहर लाते तो उन्हें भाई के घर छोड जाते क्योंकि रीना की चचेरी बहनो को भी एक को त्वचा की दूसरी को बाल की बिमारी थी।  

उनका शहर से बराबर कई सालों तक इलाज चलता था। यह देख कर रीना और उसकी बड़ी बहन अक्सर बातें करती इससे तो अच्छा होता हम भी गांव में ही होते कम से कम परिवार वालों के डर से ही सही गाँव में ही उनकी अच्छी पढ़ाई दवाई हो जाती और इतना मार भी नहीं खाती इतनी बेज्जती भी न होती मोहल्ले में क्योंकि उनके घर में जब भी नया झाड़ू आता किसी न किसी बात पर उसकी बड़ी बहन को जरूर उसी नये झाड़ू से पिटा जाता। मतलब नये फूलझाड़ू की सफाई बेटियों पर करते थे। मां-बाप झाड़ू मजबूत नहीं हो तब चप्पल जूते डंडे से मार पड़ती थी। उन्हें .ये सब सिर्फ उनके साथ ही हो रहा था पूरे परिवार की बेटीयों को छोड़कर हां सिर्फ एक मौसी थी।उसकी जिन्हें भी बहुत पुत्र मोह था पर वो भी रीना की मां के जैसी नहीं थी वो बेटे को ज्यादा प्यार जरूर करती थी।पर बेटीयों का पूरा हक उन्हें देती थी बेटीयों की पढाई, दवाई, सम्मान में कोई कमी नहीं करती थी दूर से देखकर तो ऐसा ही लगता था उसे उनके घर भी बहुत बाद में आना जाना शुरू हुआ उन लोगों का तब तक रीना 7 में आ चुकी थी उस जमाने में फोन इतने सस्ते तो नहीं थे कि रोज बात हो जाये सबसे और वो दूसरे शहर में रहती थी तो बहुत कम मिलना होता उनसे हां बस जब रीना 7 में थी। 

एक बार उसके मां बाप रीना को लेकर बहन के घर गये थे तब मौसी ने रीना को रोक लिया था। ये बोलकर हम बाद में लेकर आयेगें इसको तब कुछ दिनों के लिए रीना उनके घर रूकी थी। गांव से आने के बाद वही दिन रीना की जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन थे। उन दिनो में उसे कभी भी ऐसा नहीं लगा मौसी बेटी बेटा में भेद करती हैं और वही रीना ने साइकिल चलाना सीखा था। खूब मस्ती की इसीलिए रीना को वो भी अपने मां बाप के जैसे नहीं लगे मौसा को ज्योतिष का अच्छी जानकारी थी। एक दिन मौसा ने रीना को बताया तुम जीवन में पहले बहुत तकलीफ पाओगी पर आगे तुम्हें बहुत खुशयां मिलेगी तब रीना हंसते हुये बोली क्या बुढ़ापे में मुझे खुशी मिलेगी मौसा तब वो भी हंसने लगे खैर रीना को लगता था उसकी माँ बेटो के साथ अच्छा सिर्फ इसलिए करती थी। क्योंकि उन्हें बुढ़ापे का डर है भारतीय परम्परा के अनुसार मां बाप बेटीयों के घर का पानी भी नहीं पीते है। 

बेटों के साथ ही रहते बुढ़ापे में जब शरीर काम नहीं करेगा तो पास में पैसा होकर भी वो खुद अकेले डॉ के यहां नहीं जा पायेगें तो उनका बुढ़ापा अच्छे से बीते पैसे के लालच में ही सही बेटे उनकी सेवा करेंगे बुढापे में कोई चाहिए सेवा करने वाला अगर रीना के मां बाप को बुढ़ापे का डर नहीं होता तो शायद वो किसी पर अपना एक रूपया खर्च नहीं करती, और हिटलर की तरह सब को अपना गुलाम बना कर रखते रीना के मां बाप बहुत स्वार्थी लोग थे जो सिर्फ अपना जीवन अच्छे से बिताना चाहते थे। अपना वर्तमान और भविष्य बनाने के लिए वो अपने बच्चों का वर्तमान और भविष्य दोनों बर्बाद कर रहे थे पर उन्हें उस वक्त शायद ये नहीं पता था सब को 84 योनियों में एक बार ही मनुष्य जीवन मिलता है और आप बच्चे सोचकर न इंसान समझ कर ही इंसानियत के नाते किसी दूसरे इंसान का मनुष्य जीवन बर्बाद न करना था क्योंकि बच्चे बीज की तरह होते हैं। उन्हें पढ़ाई, स्वास्थ्य,सम्मान,संस्कार ,का सही पोषण मिले तो आज का बच्चा चाहे गरीब का ही हो कल प्रधानमंत्री बन सकता और बच्चे हमारे देश का भविष्य है ये ही सोच कर कम से कम बच्चों के बेसिक हक उन्हें जरूर देती !
रिंकी सिद्धार्थ


पता-बनारस उत्तर  प्रदेश


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