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N.L.Verma |
पिछड़े समाज के परिवार से आने और पिछड़ों की सरकार की बार-बार दुहाई देने वाले बीजेपी सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने यूपी विधान सभा चुनाव की बडी रणनीति के तहत एक तरफ अपनी कैबिनेट में पिछड़े समाज से आने वाले 27 लोगों को मंत्री बनाकर ओबीसी का राजनैतिक रूप से परम् हितैषी साबित करने का खेल रचा गया और दूसरी तरफ नीट (NEET) मेडिकल परीक्षा में ओबीसी के आल इंडिया कोटे के 27% आरक्षण को एक झटके में छीनकर सवर्णों को देने की साजिश और दूरदर्शिता को ओबीसी और उसके ओबीसी मंत्री अच्छी तरह नहीं समझ पा रहे हैं। इस निर्णय से लगभग ग्यारह हजार ओबीसी परीक्षार्थी आरक्षण से डॉक्टर बनने के अवसरों से वंचित हो जाएंगे। गौर करने लायक है कि सरकार में लगभग सभी ओबीसी मंत्रियों के ऊपर एक सवर्ण मंत्री बैठाया गया है जिससे ओबीसी मंत्री संवैधानिक सामाजिक न्याय सिध्दांत के आरक्षण जैसे मुद्दों पर न तो बोल सके और न ही कार्य करने की हिम्मत जुटा सकें। ओबीसी को ओबीसी मंत्रियों के चेहरे दिखाकर आने वाले चुनाव में बीजेपी की उनके 52 % वोट बैंक पर कब्जा करने की रणनीति का एक अहम हिस्सा है।
सामाजिक न्याय का एजेंडा लेकर पैदा हुए जो भी राजनैतिक दल आज बीजेपी सरकार का हिस्सा बने हुए हैं क्या वे सरकार में रहते हुए सामाजिक न्याय पर बोलने और कार्य करने की हिम्मत जुटा पाएंगे? यह एक बड़ा सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। बीजेपी सरकार के इस निर्णय से 27 ओबीसी लोगों को मंत्री बनाकर लगभग 52 % ओबीसी का हक मारा जाएगा और अपने अपने ओबीसी मंत्रियों का जलवा देखकर ओबीसी सड़क से लेकर विधानसभा-संसद तक खुश होता नजर आएगा। सामाजिक न्याय के एजेंडे पर काम करने की आवाज़ बुलंद करने वाले जो दल आज सत्ता और चुनाव के लालच में बीजेपी सरकार का हिस्सा बने हुए हैं उनकी स्थिति पेड़ काटने के लिए "लोहे की कुल्हाड़ी " में पड़े "लकड़ी के बेंट " जैसी ही है जो अन्ततः अपने परिवार के लिए घोर नुकसानदेह और विनाशकारी साबित होती है। यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में जागरूक ओबीसी इन्हीं दलों से मेडिकल आरक्षण खत्म होने और सवर्णों को 10 % आरक्षण पर जब सवाल करता हुआ पेश आएगा तो इन दलों के नेताओं के पास क्या जवाब होगा ? इस विषय पर ओबीसी और दलित एजेंडा पर बने सभी दलों को अभी सचेत और एकजुट हो जाने की जरूरत है अन्यथा जागरण ओबीसी से बेइज़्ज़त होने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नही दिखाई देता नज़र आएगा।अभी भी वक्त है कि अपनी सामाजिक और राजनैतिक जिम्मेदारी का बोध/अहसास करते हुए सामाजिक न्याय और किसान विरोधी पार्टी बीजेपी से जितना जल्दी हो सके राजनैतिक दूरी बनाने के निर्णय पर अविलंब विचार-आचार करें। यदि ये दल बीजेपी सरकार से अलग नही होते हैं तो ओबीसी के प्रति सबसे घातक सामाजिक और राजनैतिक अविश्वास माना जायेगा।
यदि संविधान प्रदत्त बहुसंख्यक समाज के सामाजिक न्याय की सुरक्षा और सरंक्षण चाहते हैं तो ओबीसी और दलित कोर वोट बैंक वाले सभी दलों और समाज को अपने राजनैतिक दुराग्रह-विग्रह दरकिनार कर और सत्ता के शीर्ष बनने के अहम और महत्वाकांक्षा को त्यागकर चुनावी रणभूमि में एक साथ आना होगा अन्यथा बीजेपी और आरएसएस की आरक्षण और किसान विरोधी मानसिकता की सरकार को निकट भविष्य में हटाया जाना सम्भव नही होगा।
लखीमपुर-खीरी (यूपी).....9415461224......8858656000