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  • लखीमपुर-खीरी उ०प्र०

Friday, December 19, 2025

यूपी की एसआईआर में मतदाताओं की घटी संख्या पर योगी आदित्यनाथ के आए चिंतायुक्त बयान और पंकज चौधरी की ताजपोशी की भावी राजनीति के संभावित निहितार्थ: प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

     

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.

     उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष के स्वागत समारोह में मुख्यमंत्री जी ने जनवरी 2025 के मुकाबले लगभग चार करोड़ मतदाता कम हो जाने पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इन  मतदाताओं का लगभग 80-90% वोट बीजेपी यानि कि हमारा वोट है। इन चार करोड़ मतदाताओं का गहनता पूर्वक जांच कर उनके एसआईआर से संबंधित प्रपत्र तैयार कर उन्हें जमा कराने के यथा संभव और शीघ्र प्रयास किए जाएं जिससे हमारा कोई मतदाता अपने मताधिकार से अर्थात लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागिता करने से वंचित न हो सके। भारी संख्या में घटे मतदाताओं को लेकर मुख्यमंत्री एक बड़े संभावित राजनीतिक घटनाक्रम या साजिश के मद्देनजर अपनी भावी राजनीति को भी लेकर चिंतित दिखाई देते हैं,ऐसा लोगों का मानना है। वह यूपी में घटे या कटे वोटों को बिहार की तर्ज़ पर बीजेपी द्वारा कथित वोट चोरी के रूप में नहीं देख रहे हैं,बल्कि उसके उलट अपनी भावी राजनीति के लिए आंशका और संशय भरी नज़रों से देख रहे हैं। वह वोटों की घटी संख्या को कथित वोट चोरी को बीजेपी की चुनावी रणनीति और राजनीति के पक्ष में नहीं देख रहे हैं,बल्कि वह ठीक उसके उलट इस कथित वोट चोरी/वोटों की संख्या में आई भारी कमी को लेकर बेहद गंभीर और राजनीतिक रूप से चिंतित दिखाई दे रहे हैं,जबकि बीजेपी और उसके आनुषंगिक संगठनों की ओर से भारी संख्या में घटे वोटों पर को बयान तक नहीं आया हुआ सुना या दिखाई दिया है। योगी आदित्य नाथ के बयान से ऐसा लगता है कि वोट की भारी कमी की समस्या उनकी खुद की है। वह इसे अपनी भावी राजनीति से संबद्ध कर देख रहे हैं। योगी के इस बयान के बड़े मायने हो सकते हैं,ऐसा विश्लेषकों का आकलन है।

        राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पंकज चौधरी योगी की पसंद नहीं हैं। इसीलिए गोरखपुर पावर पॉइंट से प्रदेश अध्यक्ष बनाना योगी की स्थानीय राजनीति में एक बड़ा हस्तक्षेप माना जा रहा है। भौगोलिक क्षेत्र की विविधता(डायवर्सिटी) को ध्यान में रखते हुए वहां से संगठन और सरकार में लोगों की सहभागिता,चुनावी राजनीतिक सफलता के विस्तार और पकड़ के हिसाब से उचित मानी जाती है,पंकज चौधरी की नियुक्ति इस व्यावहारिक सिद्धांत के अनुरूप नहीं दिख रही है। एक ही क्षेत्र में दो पावर पॉइंट बनने से....।

        सामाजिक-राजनीतिक समीकरण साधने के फार्मूले से कुर्मी समाज से प्रदेश अध्यक्ष बनाने की बीजेपी की रणनीति तो साफ दिखाई देती है। संभवतः अध्यक्ष पद के लिए योगी की पसंद पूर्व अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह थे जो उनके बेहद निकट,विश्वासपात्र और आज्ञाकारी माने जाते हैं,लेकिन गुजरात लॉबी कुर्मी समाज से ऐसे व्यक्ति को लाना चाहती थी जो सामाजिक और बीजेपी की आंतरिक राजनीतिदोनों को साध सके। माना जा रहा है कि शाह और मोदी की उसी राजनीतिक स्ट्रैटजी के टूल के रूप में बनाए गए और विकसित किए जाने वाले सामाजिक और राजनीतिक ब्रांड उत्पाद के रूप में देखे जा रहे हैं,पंकज चौधरी।

          नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष श्री पंकज चौधरी की नियुक्ति पर राजनीतिक विश्लेषकोंपत्रकारोंबुद्धिजीवी और जातीय संगठनों के गलियारों में तरह- तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म नज़र आ रहा है। कुछ का मानना है कि पंकज चौधरी की नियुक्ति योगी आदित्यनाथ को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करने या दरकिनार करने की दिशा में अमित शाह और मोदी जी का संयुक्त रूप से उठाया गया एक दूरगामी शांत कदम है जिसकी आहट भविष्य में सुनी जा सकती है,अर्थात पंकज चौधरी की नियुक्ति,योगी आदित्यनाथ की भविष्य में उभरने वाली राजनीति के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा रहा है। विगत कई चुनावों से योगी आदित्यनाथ को आरएसएस के हिंदू एजेंडे के लिए सर्वोत्तम और सर्वाधिक प्रभावी कैंडिडेट के तौर पर माना जा रहा है और आरएसएस के हिसाब से वो सबसे उपयुक्त हैं। इसलिए गुजरात लॉबी द्वारा पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाना आरएसएस के बेवजह बढ़ते दखल और दबाव तथा योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व की राजनीति के बढ़ते कद और आरएसएस की भावी रणनीति की काट करने और धीमी गति से विफल करने की दिशा और प्रक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।

         पंकज चौधरी की नियुक्ति को 2027 विधानसभा चुनाव में कुर्मी जाति के वोट साधने की कवायद की दिशा में भी देखा जा रहा है। 2024 में संपन्न लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से सात कुर्मी सांसदों का चुना जाना बीजेपी के शीर्ष रणनीतिकारों के लिए 2029 में बीजेपी के पूर्ण या दो तिहाई बहुमत के लिए लगातार बेचैनी पैदाकर रहा है। इस बहुमत को हासिल करना इसलिए ज़रूरी है,क्योंकि बिहार में नीतीश कुमार के जेडीयू और आंध्र प्रदेश में चन्द्र बाबू नायडू की राजनीतिक बैसाखी की वजह से कुछ अशुभ होने की आशंका की वजह से बीजेपी अपने एजेंडे पर अपनी पूरी गति से काम नहीं कर पा रही है। शाह और मोदी देश की वर्तमान संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था को अदृश्य तानाशाही के रूप को विधिक रूप से बदलना चाहते हैं। बुद्धिजीवियों का आकलन है कि मोदी और शाह की सत्ता का चरित्र इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी और जर्मन तानाशाह एडॉल्फ हिटलर से काफी हद तक मेल खाता दिखता है।

       बिहार विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के स्ट्राइक रेट से बीजेपी आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही है और इसी रणनीति से वह पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में सफलता करना चाहती है। चुनावी विश्लेषण और चर्चा में यह बात उभर कर आ रही है कि बीजेपी अपने मकसद में सफल हो सकती है। इसलिए पंकज चौधरी का अध्यक्ष बनाना यूपी के आगामी विधान सभा चुनाव की राजनीति में कुर्मी कार्ड के रूप में एक तुरुप का इक्का की तरह जीत के लिए अकाट्य और मजबूती की दिशा में भी देखा जा रहा है और चर्चा यहां तक है कि अमित शाह और मोदी द्वारा "एक तीर से दो शिकार" की कहावत को चरितार्थ करते हुए पंकज चौधरी को यूपी में आगामी विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री का फेस तक घोषित किया जा सकता है। ऐसा करने से यूपी के कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लाने की रणनीति काफी हद तक सफल भी हो सकती है और लोक सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी में गए कुर्मी समाज के आकर्षण को बढ़ने से रोके जाने में काफी राहत मिल सकने की संभावना जताई जा रही है,अर्थात् कुर्मी समाज को बीजेपी के पक्ष में लुभाने में महत्वपूर्ण फैक्टर साबित हो सकता है।

         कुर्मी समाज की राजनीतिक फलक पर पहचान कराने और स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और अपना दल के संस्थापक डॉ.सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल के नेतृत्व वाला अपना दल (एस) विगत कई चुनावों में बीजेपी के एनडीए गठबंधन में शामिल होकर चुनावी राजनीति का एक अभिन्न और मजबूत हिस्सा बना हुआ है और राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में उसकी भागीदारी भी है। चुनाव में सीट शेयरिंग के मामले में बीजेपी नेतृत्व एनडीए गठबंधन के सहयोगी दल विशेषकर जाति आधारित पार्टियां चुनाव के समय अपनी-अपनी जाति की संख्या की दुहाई देकर बड़ी हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाती रही हैं जिसमें सामाजिक और राजनीतिक रूप से मजबूत माने जाने वाला अपना दल (एस) बड़ी भूमिका का दावा करता रहा है। सुभासपा के  ओमप्रकाश राजभर और निषाद पार्टी के संजय निषाद चुनाव के वक्त गिरगिट और बरसती मेढक की तरह रंग बदलकर किसी पार्टी के नेतृत्व के बारे में अगड़म बगड़म बोलने में कोई संकोच नहीं करते हैं और इन लोगों के बारे में लोगों का मानना है कि सत्ता की मलाई के लिए ये नेता चुनाव से पहले और बाद में किसी भी संभावित सत्ताधारी दल की गोद में बैठ सकते हैं। कुर्मी जाति से आने वाले पंकज चौधरी की नियुक्ति ऐसे दलों से उपजने वाले सामाजिक और राजनीतिक दबाव को कम करने की संभावना के रूप में देखी जा रही है।

         भविष्य में यदि पंकज चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने की बीजेपी/मोदी-शाह की संभावित रणनीति सफल साबित होती है तो फिर एक सजातीय राजनीतिक दल का दबाव कम होना बहुत स्वाभाविक हो सकता है,क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में एक कुर्मी नेता की घोषणा मात्र से कुर्मी समाज में एक अभूतपूर्व सामाजिक - राजनीतिक चेतना और जोश का संचार होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसा इसलिए संभव है कि आज तक किसी भी राजनीतिक दल की ओर से ऐसा होने की कोई संभावना तक नहीं दिखाई दी है। लोगों का अनुमान है कि यदि बीजेपी की ओर से ऐसा किया जाता है तो यूपी में कुर्मी समाज अपने राजनीतिक विस्तारसम्मान और समृद्धि की प्रबल संभावना को देखते हुए बीजेपी के साथ भारी संख्या में जाने से रोकना संभव नहीं होगा और ऐसी स्थिति में बीजेपी के एनडीए गठबंधन में अपना दल को सम्मान जनक और महत्वपूर्ण सहभागिता मिलती है तो यह राजनीतिक परिस्थिति "सोने में सुहागा" होने जैसी हो सकती है। पंकज चौधरी को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करना और एनडीए में अपना दल (एस) को पर्याप्त भागीदारी मिलने पर कुर्मी बिरादरी भारी संख्या में एनडीए गठबंधन के साथ जाना स्वाभाविक लगता है,लेकिन कुर्मी समाज का शिक्षित और जागरूक वर्ग जिसकी संख्या लगभग नगण्य लगती है,संवैधानिक सामाजिक न्याय के आरक्षण और संविधान की रक्षा के लिए बीजेपी के खिलाफ और विपक्ष के साथ जाने में कोई कोर कसर भी नहीं छोड़ने वाला है।

        बीएसपी की राजनीतिक सक्रियता के निम्न तापमान और गठबन्धन की राजनीति से दूरी अर्थात् बीजेपी की "बी" टीम होने वाला बीएसपी पर लगता कथित आरोप बीजेपी की चुनावी राजनीति में सफलता में सहूलियत देता नजर आता है। उधर असुदुद्दीन ओवैसी की एआईआईएमआई और तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बंगाल में अचानक बाबरी मस्जिद निर्माण और एक अलग राजनीतिक दल बनाने की घोषणा और ओवैसी के साथ पश्चिम बंगाल में मिलकर चुनाव लड़ने की संभावना जताने और उसी दौरान पश्चिम बंगाल में धीरेन्द्र शास्त्री के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए निकाली जा रही यात्रा बीजेपी की हिंदुत्व की राजनीति को और मज़बूत करती हुई दिखाई देती है। राजनीतिक विचारकों का मानना है कि ये सब उपक्रम और उपकरण बीजेपी के लिए मुफीद साबित होते दिखाई दे रहे हैं।

 

 

 


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