आन-बान-शान-
'हिंदी' है अभिमान,
सिरमौर बने यह भाषा-
जो दे मुझे मेरी पहचान।
तुझे-
लाज क्यों है?
लजाता मनुज
तूं अपनी भाषा को,
है क्यों? छिपाता।
क्या तेरी भाषा, अपनी भाषा नहीं है?
किराए की भाषा का खेवनहार तूं-
शेखी बघारता,
आल्हादित होते हुए,
किराए के महल की बादशाहत-
तुझे लज्जित नहीं करती?
लाज आती है तुझे,
तूं शर्माता भी बहुत है-
जब तूझे कहे कोई 'ई देखो, हिन्दी बोलता है।'
ज़बाब क्यों नहीं देता?
पलट कर-
हिन्दी है हम,
हमारी भाषा है हिन्दी।
सारे देश को पिरोती-
यह संस्कृत की सूता है,
जो सूत बन-
कन्याकुमारी से कश्मीर
और
गुजरात से अरूणाचल तक
मोतीमाला को संजोए हुए है,
देश की अखंडता और गौरव का प्रतीक-
सर्वहारा की अभिव्यक्ति
जिसे हम और हमारा कुनबा समझता है।
सर्वोच्च न्यायालय की समझ से बाहर
जो न, हमें समझे-
न हम उसे समझें, क्योंकि-
वह गरीबों की भाषा नहीं बोलता।
हमारी भाषा हमारी पहचान है।
और आन-बान-शान है,
हिंदी हैं हम हिन्दी पहचान है।
(प्रकाशित वुमेन एक्सप्रेस, दिल्ली १४ सितम्बर २०२१ के अंक में और इन्दौर समाचार, मध्यप्रदेश के १६ सितंबर २०२१ के अंक में)
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