साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Tuesday, July 20, 2021
आंगन की दीवारों से, 'नन्दी लाल'-रमाकांत चौधरी
Wednesday, July 14, 2021
‘आमिर-किरण’ बनाम ‘शिवसेना-भाजपा’ की पारिवारिकता-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
ऊपर का खेल-सुरेश सौरभ
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सुरेश सौरभ |
योगी को विधान सभा चुनाव में बुरे परिणाम का भय, हर हथकंडा अपनाने को आतुर दिखती बीजेपी-आरएसएस-नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
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एन०एल०वर्मा |
Tuesday, July 13, 2021
आन्दोलन में केवल किसान ही क्यों?-अखिलेश कुमार अरुण
उन किसानों का जमाना गया जिन्हें अस्सी-नब्बे के दशकों वाली फिल्मों में दर्शाया जाता था। मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास में कभी हरिया तो कभी हल्कू बनकर आता था। मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर की कविताओं में चरित्र अभिनेता के किरदार में एक दरिद्र होता था। अब किसान खुद का जमीदार है सब कुछ बदल देने की क्षमता रखता है।
Monday, July 12, 2021
दलित पत्रकारिता का नायाब नगीना थे महीपाल सिंह-डी०के०भास्कर
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महीपाल सिंह (सम्पादक-दलित टुडे) |
"वह आम आदमी की पीड़ा को प्रखरता मुखरता से बल देते थे। वे किसी भी तरह से डरने वाले नहीं थे, इसलिए वह अदम्य साहस के साथ लिखते थे। अम्बेडकरवाद के प्रति प्रतिबद्धता ही थी कि कोई उनके लेखन का कायल हुए बिना नहीं रह सकता था। उन्होंने कांग्रेस मुखिया सोनिया गाँधी को इंगित करते हुए लिखा था कि हमें सत्ता चाहिए, सांत्वना नहीं।' कांग्रेस दलितों को सांत्वना देती रही, मगर सत्ता का असली मजा, वही लेती रही।"
Sunday, July 11, 2021
मेरी अजीब किस्मत, -रिंकी सिद्धार्थ
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रिंकी सिद्धार्थ |
Wednesday, July 07, 2021
ओबीसी और दलितों की सामाजिक वैचारिकी में संघर्ष-नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)
"ऊंची कुर्सियों पर मात्र काबिज बने रहने के लिए वे राजनेता आंबेडकर को याद करते हैं जो वास्तव में उनकी वैचारिकी/सैद्धांतिकी की घोर खिलाफत में हमेशा खड़े नजर आते हैं।यह विडम्बना ही है कि वे आज उनके नाम में उनके पिता जी के नाम के "राम" को देखकर/जोड़कर अलग किस्म की धार्मिक सियासत करना चाहते हैं।"
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एन एल वर्मा |
Monday, July 05, 2021
मेरी अजीब किस्मत-रिंकी सिद्धार्थ
समाज को आईना दिखाती एक लड़की के जीवन के संघर्षों की सच्ची कहानी
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गूगल से साभार |
जब उसके माता पिता ने गाँव छोड़ कर शहर में रहने का फैसला लिया, गांव में सारा परिवार साथ रहता था। अतः मां बाप चाहते हुये भी अपनी बेटियों के साथ ज्यादा बुरा व्यवहार नहीं कर पाते थे। बाकी परिवार वाले बेटियों को बचा लेता थे उनके जुल्म से. पर शहर आने पर माता पिता का व्यवहार बेटियों के प्रति और खराब होता चला गया गाँव में चैन से खेलने वाली लड़कियों को घर के काम में जुतना पड़ा। उन पति पत्नी के पास एक बहाना था क्योंकि वो दोनों पति पत्नी सरकारी नौकरी करते थे तो जब कभी कोई उन्हें बोलता आप छोटी बच्चीयों से इतना काम क्यों लेती है तो वो बोल देती मैं नौकरी करती हूं तो मुझे लड़कियों की मदद लेनी पड़ती हैं और लड़कीयां अगर उनकी बात न माने घर के काम न करके पढना चाहे तो वो लड़कीयों को चिल्लाते और मारते थे जब कोई पडोसी उनसे पूछता क्यों डाँट मार रही हैं लड़की को तो वो बोल देते हमारी बात नहीं मानती है इसलिए जबकि उनकी बड़ी बेटी और छोटी बेटी के बीच में एक बेटा था उससे कोई काम नहीं कहती करने को वो पढाई भी नहीं करता था सारा दिन वो सिर्फ टीवी देखता और दोस्तों के साथ घूमता फिर भी वो अपने बेटे को कभी डांटती भी नहीं थी पति कुछ बोले तो उसे भी रोक लेती लड़का है हमारे बुढ़ापे का सहारा है इसको कुछ मत बोलो. सुधा रुपवती और पैसा कमाने वाली स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है।
वह
अपने हाथों से कोई काम न करती।घर का सारा काम बेटियों से कराना चाहती।पिता की
आँखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब बेटीयों में सब बुराइयाँ-ही- बुराइयाँ नजर आतीं थी
बेटों में नहीं । सुधा की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आँखें बंद करके मान
लेता था। बेटीयों की शिकायतों की जरा परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि बेटियों ने
शिकायत करना ही छोड़ दिया। किसके सामने रोये? जब मां बाप ही
गलत करते हैं , अब कुछ लोगों को छोड़ कर लगभग सारे लोग ही जैसे
उसके दुश्मन बन गये। बड़ी जिद्दी लड़कीयां है,सुधा को तो कुछ
समझती ही नहीं; बेचारी उनका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती
है यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, सुधा
इतनी सीधी-सादी है कि निबाह हो जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल
की फरियाद भी कोई नहीं सुनता! बेटियों का हृदय माँ बाप की ओर से दिन-दिन फटता रहा
बेटीयां माता पिता के जुल्म सहती रही सिर्फ इस डर में कि जब घर के लोग इतना बुरा
व्यवहार करते हैं तो बाहर के लोग कैसा व्यवहार करेंगें उनके साथ और वो अगर घर से
भाग कर घर वालों के जुल्मों से बच कर जाना भी चाहे तो जाये तो जाये कहां जहां उनके
साथ बुरा न हो कोई ऐसी सुरक्षित जगह नजर न आती उन्हें जहां वो रह सके जुल्मों से
बच सके इसलिए उन्होंने इतने बुरे माता पिता का मिलना अपने प्रारब्ध के बुरे कर्मो
का फल मान लिया और वैसे ही घरवालों के अत्याचार सह कर जीवन व्यतीत करती रही!
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रिंकी सिद्धार्थ |
पता-बनारस उत्तर प्रदेश
Sunday, July 04, 2021
डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल-सुरेश सौरभ
Thursday, July 01, 2021
सवनवा आईल ना-अखिलेश कुमार अरुण
भोजपुरी कजरी गीत
ना आईल बलमुआ, सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
छन-छन पनियां परे सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
कूके बाग़ कोयलिया सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
धई-धई काटे रतिया सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
ना कईल सिंगरवा सोहे सखी हो कब आई बलमुआ ना
सखी हो सवनवा आईल ना
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
सवनवा आईल ना हो सवनवा आईल ना-2
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अखिलेश कुमार अरुण |
पता-ग्राम-हजरतपुर, पोस्ट-मगदापुर
जिला-लखीमपुर(खीरी)
'सम्मान दो-सम्मान लो' के स्लोगन पर कदमताल-डी०के०भास्कर
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डी०के०भास्कर |
टीकाकरण अभियान की सुस्त चाल और कुछ जायज सवाल-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
सोशल साइट्स पर नकेल क्यों नहीं डाल पा रही सरकार-अजय बोकिल
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अजय बोकिल |
पढ़िये आज की रचना
मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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