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Thursday, October 29, 2026

नैतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष न्यायिक सेवा में कितना नैतिक और न्यायिक चरित्र का रहा होगा-प्रो० नन्दलाल वर्मा (सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)

नन्दलाल  वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
9415461224.


        इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और नैतिक पार्टी जिसे कई बार सवर्ण नैतिक पार्टी भी कहा जाता है) के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं चंद्र भूषण पांडे (सीबी पांडे) हैं। उन्होंने वर्ष 2022 में 'नैतिक पार्टी' की स्थापना की थी। वह यूपी के राज्यपाल के पूर्व विधिक सलाहकार भी रह चुके हैं। वह यूपी की राजनीति और आरक्षण जैसे सामाजिक न्याय के मुद्दों और ब्राह्मण सम्मेलनों से जुड़े कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं। उन्होंने कहा है कि "देश के युवा कॉकरोच नहीं शक्तिमान बने।"
        चंद्र भूषण पांडे के भाषण का एक वीडियो दिसंबर, 2025 में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था,जिसमें उन्होंने आरक्षण समर्थकों या आरक्षित वर्गों की सामाजिक और राजनीतिक ताकत को कमजोर करने के लिए दलितों (एससी-एसटी) और पिछड़ी जातियों (ओबीसी) की सामाजिक और राजनीतिक गोलबंदी (एकता) तोड़ने या बिखेरने की बात कही थी, अर्थात् वो ओबीसी और अनुसूचित एवं जनजातियों की गोलबंदी पर प्रहार कर उनमें बिखराव पैदा करने की बात करता है अर्थात् संवैधानिक आरक्षण जैसे एक मज़बूत अधिकार की ताकत कमजोर करने की बात करता है, अर्थात् वह संविधान विरोधी बात करता है।
       चंद्र भूषण पांडे ने अपने भाषण में कहा था कि आरक्षणवादियों की सबसे बड़ी ताकत दलितों और पिछड़ों के नाम पर बनी राजनीतिक गोलबंदी है,और यदि किसी तरह इस एकता को तोड़ दिया जाए या बिखेर दिया जाए तो सवर्ण समाज के लिए एक बड़ा समाधान निकल सकता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा था कि यहाँ पिछड़ी जातियों में 79 और अनुसूचित जातियों में 61जातियां शामिल हैं। इनके गठजोड़ पर यथासंभव प्रहार करना पड़ेगा।
         कांग्रेस के दलित नेता उदित राज ने इस भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करते हुए इसकी कड़ी आलोचना और निंदा की थी और आरक्षित वर्ग के लोगों से इसे खूब वायरल करने की अपील की थी। नवम्बर 2025 में चंद्र भूषण पांडे अयोध्या में ब्राह्मण समाज के साथ बैठक कर 2027 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की रणनीतियों पर भी चर्चा कर चुके हैं।
* गोलबंदी तोड़ने की बात: वायरल वीडियो और भाषण के अनुसार, उन्होंने कहा था कि आरक्षण समर्थकों और इन समुदायों की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक गोलबंदी है। यदि दलितों और पिछड़ों की इस गोलबंदी पर प्रहार कर तोड़ दिया जाए, तो सवर्णों की समस्या का समाधान हो सकता है।
* जातियों के विभाजन का सुझाव: उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा था कि यहाँ पिछड़ी जातियों में 79 जातियां और अनुसूचित जातियों में 61 जातियां हैं। अलग-अलग वर्गों को आपस में विभाजित करके (जैसे दलितों में जाटव और ओबीसी में यादवों के खिलाफ बात रखकर) इनकी एकता को तोड़ा जा सकता है।
* प्रतिक्रिया: कांग्रेस नेता उदित राज सहित कई अन्य नेताओं और राजनीतिक दलों ने इस भाषण का वीडियो शेयर कर तीखी आलोचना की थी और इसे आरक्षण तथा सामाजिक न्याय के खिलाफ सवर्णों विशेषकर ब्राम्हणों की एक बड़ी साजिश बताया था।
    पूर्व जज सीबी पांडे ने कहा कि "दलितों की अन्य जातियों को जाटव/चमार और ओबीसी की अन्य जातियों को यादवों के खिलाफ भड़का दो,उनकी राजनीतिक एकता या जुगलबंदी टूट जाएगी।"
10% ईडब्ल्यूएस अर्थात् सुदामा आरक्षण अकेले डकारने वाले पांडे बता रहा है कि देश को कैसे तोड़ना है।
अब सवाल उठता है कि यह घोर जातिवादी मानसिकता से ग्रसित जज महोदय अपनी न्यायिक सेवा काल में संविधान और संवैधानिक व्यवस्था जैसे सामाजिक न्याय,नागरिक अधिकारों,लिंग और नस्ल, समानता और समता,धर्मनिरपेक्षता जैसे मौलिक विषयों और अधिकारों के प्रति कितना संविधान सम्मत,संवेदनशील और सहज रहा होगा,अर्थात् वह देश के नागरिकों और संविधान के प्रति कितना ईमानदार,न्यायिक और नैतिक चरित्र का  रहा होगा! हर मुक़दमे में सबसे पहले धर्म और जाति ढूंढता होगा,उसके बाद संविधान को ताक पर रखकर निर्णयादेश लिखवाता और जारी करवाता रहा होगा!
''फूट डालो राज करो' अंग्रेजों की नहीं,बल्कि यहां के स्वघोषित सनातनी लोगों की संस्कृति या परंपरा रही है!" यह इनकी मानसिकता और रग रग में पली वसी सामाजिक विकृति का द्योतक है। पहले जातियों में बांटकर समाज को तोड़ने वाले कथित सनातनी आज भी उसी षड्यंत्र और कुकर्म में लिप्त हैं और समाज में झूठी अफवाह फैलाकर सामाजिक ऊंच-नीच की भावना को हवा देकर वही पुरानी मनुवादी व्यवस्था और सोच पैदा कर रहे हैं।
       सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक लोगों द्वारा अपने बयानों में यह दावा किया जाता है कि अंग्रेज मानते थे कि "ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र" (Judicial Character) या निष्पक्षता की कमी होती है, इसलिए उन्हें जज या प्रीवी काउंसिल का चेयरमैन नहीं बनाया जा सकता था।

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