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Thursday, May 02, 2024

संविधान और लोकतंत्र को खत्म करना संघ और बीजेपी का प्रमुख एजेंडा:प्रो.नन्द लाल वर्मा (सेवानिवृत्त)

नन्दलाल वर्मा
(सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर)
युवराज दत्त महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी
   चुनावी चर्चा 2024   
✍️सत्ताधारी भाजपा के नेता इस लोकसभा चुनाव के शुरूआती दौर में ‘चार सौ पार’ की बात कर रहे थे जिस पर बीजेपी की मातृ संस्था के मुख्यालय से विराम लगाने की सख्त हिदायत दिए जाने के बाद "अबकी बार -चार सौ पार" का नारा लगना बंद हो गया है। उनका मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी 370 से ज्यादा सीटें जीतेगी और उसके गठबंधन साथी 30 से ज्यादा। इस प्रकार एनडीए 400 पार हो जायेगा। यह संख्या किसी चुनाव विशेषज्ञ की राय या किसी वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर आधारित नहीं है। अचानक यह यह प्रचार अदृश्य तरीकों और तकनीकों से उनके गुप्त एजेंडे का चुनावी राजनीतिक हित साधने की नीयत से किया जा रहा था ।
✍️आख़िर,एनडीए को चार सौ पार करने की जरूरत क्यों है? इसका स्पष्टीकरण देते हुए भाजपा के कर्नाटक से सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता अनंत कुमार हेगड़े ने बताया कि संविधान को बदलने के लिए पार्टी को 400 सीटों की जरूरत होगी। उनका कहना है कि ‘‘कांग्रेस ने संविधान को विकृत कर दिया है,उसका मूल स्वरूप ही बदल दिया है,उसने संविधान में अनावश्यक चीजें (शायद उनका मतलब धर्मनिरेपक्षेता व समाजवाद से है) ठूंस दी हैं। उनका यह भी कहना है कि बहुत से ऐसे कानून बनाए गए हैं जो हिन्दू समुदाय का दमन करते हैं। ऐसे में अगर इस स्थिति को बदलना है अर्थात संविधान को बदलना है,तो वह उतनी सीटों से संभव नहीं है जितनी अभी बीजेपी के पास हैं।’’ यह तभी सम्भव हो सकता है जब बीजेपी को अकेले न्यूनतम दो तिहाई बहुमत हासिल होगा। भाजपा ने शातिराना अंदाज़ में हेगड़े के इस बयान से दूरी बना ली। उसने कहा कि वह अपने सांसद के वक्तव्य का अनुमोदन नहीं करती। ऐसी खबरें भी हैं कि यह बयान देने के कारण हेगड़े को पार्टी के टिकट से भी वंचित किया जा सकता है। ऐसा होता है या नहीं यह तो समय बतायेगा,लेकिन एक बात पक्की है,वह यह है कि भाजपा के लिए इस तरह के बयान और दावे कोई नई बात नहीं हैं। अनंत कुमार हेगड़े ने यही बात 2017 में भी कही थी जब वह एनडीए की केन्द्र सरकार में मंत्री थे,किंतु फिर भी उन्हें 2019 के चुनाव में टिकट दिया गया था।
✍️सांसद राहुल गांधी और कई अन्य का मानना है कि भाजपा को 400 सीटें उसी उद्देश्य के लिए चाहिए जिसकी बात अनंत हेगड़े कर रहे हैं। राहुल गांधी ने एक्स पर लिखा ‘‘भाजपा सांसद का यह बयान कि पार्टी को संविधान बदलने के लिए 400 सीटों की जरूरत होगी। दरअसल,यह मोदी और उनके संघ परिवार के गुप्त एजेण्डा का अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक उदघोष है। मोदी और बीजेपी का अंतिम लक्ष्य येनकेन संविधान को खत्म करना है। आरएसएस सामाजिक न्याय,समानता,नागरिक अधिकार,धर्मनिरपेक्षता,समाजवाद और लोकतंत्र जैसी संवैधानिक संकल्पनाओं से शुरू से ही नफरत करता आ रहा है।’’
✍️राहुल गांधी ने यह आरोप भी लगाया कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व ‘‘समाज को बांटकर,अभिव्यक्ति की आज़ादी पर रोक लगाकर और स्वतंत्र-स्वायत्त संस्थाओं को पंगु या सरकार की कठपुतली बनाकर संघ परिवार भारत के महान लोकतंत्र को अप्रत्यक्ष रूप से एक लोकतांत्रिक तानाशाही व्यवस्था में बदलना चाहता है और कथित भ्रष्टाचार के नाम पर ईडी,सीबीआई,आयकर जैसी एजेंसियों  के माध्यम से जांच के नाम पर विपक्ष को लगातार कमजोर और समाप्त किये जाने की अनवरत प्रक्रिया जारी रखना उसके षड़यंत्र और साजिश का हिस्सा है।’’ जब भी किसी विपक्षी दल के नेता से राजनीतिक नुकसान या लाभ होने की आशंका या संभावना दिखती है,उसी क्षण किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई का डर दिखाकर उसे कमल पुष्प की शीतल छाया में आने के लिए मजबूर कर दिया जाता है और पवित्र कमल के स्पर्श मात्र से वह सभी प्रकार के पापों,विकारों,भ्रष्टाचार और दोषों से मुक्त हो जाता है।
✍️लोकतांत्रिक मूल्यों जिनमें समानता,समता और भाईचारा शामिल है,को कमजोर करने के लिए भाजपा की रणनीति दो स्तर पर है।उसका पितृ/मातृ संगठन आरएसएस संविधान बनने की तारीख से ही सख्त खिलाफत करता रहा है। संविधान लागू होने के बाद उसके गैर-आधिकारिक मुखपत्र ‘द आर्गनाईज़र’ ने लिखा था… ‘‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में हुए अनूठे सांस्कृतिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनुस्मृति की व्यवस्था आज की तारीख में भी दुनिया भर के लिए विशेष सम्मान का विषय है। वे लोगों को स्वाभाविक रूप से उनका पालन करने और उनके अनुरूप आचरण करने के लिए प्रेरित करते हैं,लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है।’’
✍️भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने 1998 में सत्ता में आने के बाद संविधान की समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन करने का काम किया था। इस वेंकटचलैया आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं की जा सकी, क्योंकि संविधान के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ का जबरदस्त विरोध हुआ था। भाजपा अपने बल पर 2014 से सत्ता में है और तब से उसने कई बार संविधान की मूल उद्देशिका का प्रयोग,उसमें से धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी शब्द हटाकर किया है।
✍️सन 2000 में सुदर्शन के आरएसएस का प्रमुख बनने के बाद बिना किसी लागलपेट के कहा था कि "भारत का संविधान पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और उसके स्थान पर एक ऐसा संविधान बनाया जाना चाहिए जो भारतीय पवित्र ग्रन्थों पर आधारित हो। सुदर्शन ने कहा कि वर्तमान संविधान भारत के लोगों के लिए किसी काम का नहीं है,क्योंकि वह गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट-1935 पर आधारित औपनिवेशिकता की निशानी है। उन्होंने यह भी कहा कि हमें संविधान को पूरी तरह से बदल डालने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए।"
✍️अभी पिछले साल अगस्त में ‘द मिंट’ में प्रकाशित अपने लेख में पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देब रॉय ने भी संविधान को बदलने की जरूरत बताई थी,लेकिन उन्होंने देश के पीएम को कभी यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुधारी जा सकती है,बेरोजगारी दूर कैसे हो सकती है,विदेशी मुद्रा के सापेक्ष रुपया क्यों गिरता जा रहा है?जबकि 2014 से पहले मोदी मंचों पर भारतीय रुपये के गिरने की चिंता में सदैव डूबे दिखाई देते थे। बीजेपी संगठन,संघ परिवार और सरकार का शीर्ष नेतृत्व समय-समय पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संविधान को बदलने की बात करते रहें हैं,लेकिन भाजपा और सरकार एक कूटनीति के तहत आधिकारिक रूप से कहती रहती है कि वह इन विचारों का कभी अनुमोदन नहीं करती।
✍️बीते एक दशक के शासनकाल में बीजेपी ने संविधान के मूलभूत मूल्यों को अनवरत नुकसान पहुंचाने का यथासंभव प्रयास किए हैं।लोकतांत्रिक राज्य के सभी स्तम्भों,संवैधानिक स्वायत्त संस्थाओं,जांच एजेंसियों और चुनाव आयोग पर सरकार का नियंत्रण दिखाई देता है। बीजेपी सरकार का मतलब है,एक व्यक्ति। ईडी हो,सीबीआई हो,आयकर विभाग या चुनाव आयोग हो,सभी एक ही व्यक्ति के नियंत्रण और निर्देशन में काम करते दिख रहे हैं। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है उसे भी अलग-अलग स्तरों पर अलग-अलग तरीकों से कमजोर करते हुए देखा जा सकता है। आखिर,क्या कारण है कि विपक्ष के नेताओं और सरकार की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों के वर्षों से जेल में होने के बावजूद कोई अदालत उनकी जमानत की अर्जी पर विचार करने को तैयार नहीं है!
✍️जहां तक अभिव्यक्ति की आज़ादी का सवाल है बीजेपी के शासन काल में वह लगभग खत्म सी हो गयी है। मुख्यधारा का मीडिया सरकार का प्रशंसक,चाटुकार,प्रचार एजेंसी और सरकार पोषित कार्पोरेट घरानों के नियंत्रण में है और लगभग सभी नामीगिरामी टीवी चैनल और अखबार सरकार के भोंपू बन चुके हैं। स्वतंत्र रूप से सोचने वाले और आज़ादी से बोलने वालों के लिए बहुत कम जगह बची है अर्थात आज के दौर में असहमति या आलोचना के लिए कोई जगह नहीं बची है और यह तब जब हम सब जानते हैं कि बोलने की हमारी आज़ादी संवैधानिक लोकतंत्र का हिस्सा है।
✍️अंतर्राष्ट्रीय सूचकांकों के अनुसार भारत में धार्मिक स्वतंत्रता लगातार कमज़ोर होती जा रही है। अमरीका के धार्मिक स्वतंत्रता "वॉचडॉग" के अनुसार भारत ‘‘विशेष चिंता’’ का विषय है। "वी-डेम" के अनुसार प्रजातंत्र के सूचकांक पर भारत का नंबर 104 है। यह गिरावट पिछले दस सालों में ही आई है। वर्तमान सरकार अपनी जांच एजेंसियों और अपने निर्णयों के जरिये सांविधानिक लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का लगातार गला घोंटती जा रही है।
✍️बहुत ज्यादा समय नहीं गुजरा है जब लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि भारत में अघोषित आपातकाल लागू है। देश में हिन्दू राष्ट्रवाद के लड़ाके हर तरह की आज़ादी को कुचल रहे हैं और सरकारी तंत्र भी यही कर रहा है।सरकार दर्शक दीर्घा में है और इन तत्वों को उसका साफ संदेश है कि वे अल्पसंख्यकों और समाज के कमजोर वर्गों के लोकतांत्रिक नागरिक अधिकारों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन और दमन कर सकते हैं और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।
✍️ हम अपने आसपास देखते हैं तो मालूम होता है कि प्रत्येक धार्मिक राष्ट्रवादी संस्थाओं को लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं से एलर्जी है। वे सभी संविधान को बदलना चाहते हैं और उनके कार्यकर्ता ज़मीनी स्तर पर बाँटने और दमन करने वाली राजनीति करते हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान और श्रीलंका में यही होता आया है। अब भारत भी लोकतंत्र को कुचलने वाले देशों के उस क्लब में शामिल होने की कोशिश में है। संघ और भाजपा की रणनीति एकदम साफ दिखती है कि " एक तरफ संविधान को बदलने की बात करो और दूसरी तरफ जो वर्तमान संविधान है उसे लगातार यथासंभव कमज़ोर और निष्प्रभावी करने के प्रयास जारी रखो।"

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