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Friday, August 06, 2021

सर्वोच्च अदालत का श्रेष्ठ/उच्च मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत निर्णय, सार्वजनिक-धार्मिक स्थलों से भिखारियों को हटाने हेतु दायर याचिका-नन्द लाल वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर)



प्रोफ़ेसर एन एल वर्मा
     मोहल्लों,सड़कों,धार्मिक स्थलों और चौक-चौराहों पर  भीख मांगने पर दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए देश की सुप्रीम कोर्ट ने कोई स्पष्ट आदेश या निर्देश न देते हुए उसकी जिस श्रेष्ठ मानवीय संवेदनशीलता के साथ व्याख्या की है, वह गरीबी उन्मूलन की दिशा में समाज और सरकार के लिये भविष्य में गरीबों के हित में लिए जाने वाले फैसलों के लिए बेहद गौरतलब साबित होंगे अर्थात यह निर्देशात्मक- निर्णयात्मक व्याख्या देश में कई दशकों से चलाये जा रहे "गरीबी हटाओ अभियान" को एक नई सक्रियता- गतिशीलता और दिशा-दशा प्रदान करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
       सार्वजनिक और धार्मिक स्थलों पर भीख मांगने वालों के प्रति अदालत ने  मानवीय संवेदना का उच्च और श्रेष्ठ संवेदनशील आचरण का उदाहरण पेश किया है, वह न केवल स्वागतयोग्य है बल्कि,समाज और सरकार के लिए अनुकरण करने के लिए एक आईना भी दिखाता है। याचिका पर अदालत ने स्पष्ट रूप से दो टूक में जबाव देते हुए कहा है कि अदालत भिखारियों के मुद्दे को समाज के संभ्रांत वर्ग के नजरिए से नही देख और समझ सकती है। अदालत ने कहा कि "भीख मांगना एक सामाजिक-आर्थिक समस्या है"। खंड पीठ ने कहा कि वह सड़को- चौराहों से भिखारियों के हटाने या हटने का आदेश नही दे सकती है, क्योंकि शिक्षा ,संसाधन और रोजगार विहीनता के चलते, पेट की भूख शांत करने जैसी अपनी नैसर्गिक और बुनियादी जरूरत को पूरा करने के लिए भीख मांगना,भिखारियों की अपनी विवशता है।
          अदालत ने कहा है कि भिखारियों पर प्रतिबंध लगाना ठीक नहीं होगा और  प्रतिबंध से भीख मांगने की समस्या का हल भी नहीं होता दिखाई देगा। याचिकाकर्ता को शायद यह उम्मीद थी कि सुप्रीम अदालत सड़कों- चौराहों पर लोगों को भीख मांगने से रोकने के लिए कोई सख्त आदेश या निर्देश जारी करेगी। अदालत ने भीख जैसी समस्या की व्याख्या जिस मानवीय संवेदना के साथ की है, वह गरीबी हटाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। अदालत ने सरकार पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करते हुए पूछा है कि "आखिर लोग भीख क्यों मांगते हैं?" इसकी सामाजिक और आर्थिक विषमताओं और असमानताओं की तह में जाना होगा। आर्थिक और संसाधनों की एक गरीबी के कारण ही  दूसरे प्रकार की गरीबी जैसी स्थिति उपजती है और ऐसे बेबश लोग भिखारी बन जाते हैं। सामाजिक और राजनैतिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर यह यह कहने और वैचारिक विमर्श में बहुत अच्छा लगता है कि देश की सड़कों-चौराहों पर कोई भिखारी ना दिखे। ऐसा दिखने से किसी देश की अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से अच्छा नही माना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की ख़ुशहाली और साख के अवमूल्यन की स्थिति मानी जाती है जिससे देश की सरकार की छवि को धक्का लगता है। लेकिन, सड़कों-चौराहों से भिखारियों को हटा देने से क्या उनकी गरीबी दूर हो जाएगी ? क्या जो लाचार है या किसी के पास आय का कोई निश्चित और नियमित साधन नहीं है, उन्हें मरने के लिए मौत के खुले मुंह/ गड्ढे में छोड़ दिया जाएगा?
         न्यायमूर्ति ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील से यह भी कहा है कि "कोई भी भीख नहीं मांगना चाहता है।" सम्मान की रोजी-रोटी के साथ देश का हर नागरिक जीवन जीना चाहता है। कोर्ट का आशय साफ है कि सरकार को भीख मांगने की समस्या से अलग ढंग से निपटने के लिए कोई अन्य कारगर ठोस कदम उठाने होगे। इसमें कोई शक नहीं है कि सरकार की अधिकांश सामाजिक-आर्थिक लाभकारी योजनाएं राजनैतिक और नौकरशाही  भ्रष्टाचार और बँटवारे की वजह से अभी भी असंख्य लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है। राष्ट्र की मुख्यधारा से वंचित लोग ही भीख मांगने के लिए विवश है। ऐसे लोगों तक जल्दी से जल्दी सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचना चाहिए। जहां तक चौक-चौराहों पर भिखारियों की समस्या है, स्थानीय शासन-प्रशासन इस मामले में उचित कदम उठा सकता है। सड़क पर भीख मांगने वालों को सूचित और निर्देशित किया जा सकता है कि वह किसी सुरक्षित जगह पर ही भीख मांगने जैसा कार्य करें और भिखारियों पर भी पैनी नज़र रखनी होगी अन्यथा भिखारियों की आड़ में सामाजिक और आर्थिक अपराध पनपने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
          कोर्ट ने कहा है कि भीख मांगना एक सामाजिक समस्या है तो समाज को भी अपने स्तर पर इस समस्या का समाधान करने के विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। समाज के आर्थिक रूप से संपन्न, सक्षम और संभ्रांत वर्ग को अपने स्तर से इस समस्या का समाधान करने के यथा शक्ति-संभव प्रयास करने चाहिए।समाज के आर्थिक रूप से संपन्न और सक्षम लोगों को स्थानीय स्तर पर सरकार के साथ मिलकर गरीबों की भीख मांगने की विवशता और व्यवस्था का अंत करना चाहिए।बरहाल,सर्वोच्च अदालत ने कोरोना महामारी के मद्देनजर भिखारियों और बेघर लोगों के पुनर्वास और टीकाकरण पर याचिकाकर्ता की आग्रह करने वाली याचिका पर मंगलवार को केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है। याचिकाकर्ता की इस संबंध में प्रशंसा की जानी चाहिए कि उसमें कोरोना महामारी के बीच भिखारियों और बेघर लोगों के पुनर्वास, टीकाकरण ,आश्रय और भोजन उपलब्ध कराने का आग्रह भी इसी याचिका में अदालत से किया है। वाकई, भीख मांगने वाले और बेघर लोग कोरोना महामारी में देश के अन्य लोगों की तरह ही भोजन,आवास, स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं के हकदार हैं। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर वंचित लोगों के लिए स्वास्थ्य और रोजगार का दायरा बढ़ाना चाहिए ताकि जो बेघर है,निर्धन है,उनके पास पुरजोर तरीके से पहुंच सके।
लखीमपुर-खीरी (यूपी).....9415461224......885865600

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