साहित्य
- जन की बात न दबेगी, न छिपेगी, अब छपेगी, लोकतंत्र के सच्चे सिपाही बनिए अपने लिए नहीं, अपने आने वाले कल के लिए, आपका अपना भविष्य जहाँ गर्व से कह सके आप थे तो हम हैं।
- लखीमपुर-खीरी उ०प्र०
Saturday, September 24, 2016
Tuesday, September 13, 2016
हमारा हिंदी-प्रेम
अखिलेश कुमार अरुण-
हाय हेल्लो, डियर-सिस्टर एंड ब्रदर, आईये पधारिये एक मंच पर और अंग्रेजी में
सम्बोधन के बाद चीख-पुकार मचाइये अपने लिए
नहीं अपनी पहचान, रीती-रिवाज,संस्कृति के लिए जो पल-पल के सफ़र में जिन्दा है, जोर
और जबर से, चलना-फिरना तो कब से बंद कर दिया है, मुई मरती भी नहीं कि इस हाय! तोबा
से छुट्टी मिले. साल में यह एक ही तो दिन है जब हम सब इकट्ठा होते भी हैं, तो
इसलिए कि उसने अपनी अंतिम सांसे गिन चूकी है कि अभी बाकी है.
इस उपरोक्त भूमिका का तात्पर्य सीधा है कि १४ सितम्बर १९४९, यह एक ऐसा दिन है
जिस दिन हमें हमारी पहचान बड़ी जद्दो-जेहद के बाद बमुश्किल हाशिल हुई थी. फिर हमारे
कुछ भाईयों (दक्षिण भारतीय राज्य) ने इसे ठुकरा दिया था.
कुछ अजीब सा नहीं लगता है कि हम अपनी मातृभाषा के
कुशल मंगल के लिए 14 सितम्बर से पखवाड़ा मानते हैं. जगह-जगह सभाएं की जाती हैं, स्कूल-कालेजों
में हिंदी पढ़ना, लिखना और बोलने का संकल्प दिलवाते हैं. रेलवे, बस स्टेशन और
सरकारी कार्यालयों में “हिंदी में काम करना राष्ट्रीयता का घोतक है.” तख्ती
टंगवाते हैं. इन कर्तव्य निर्वहनों द्वारा हम कितना न्याय कर पा रहें हैं अपनी
भाषा के विकास के लिए बाद हम अपने लड़के को इंग्लिश बोर्डिंग के स्कूल में ही पढ़ने
को भेजते हैं. उसकी गिटर-पिटर के इंग्लिश पर पुलकित होकर असीम सुख पाते हैं. तोतले
मुंह बच्चे को वाटर, ब्रेड, नुडल्स, कहना सिखाते हैं. और यही सब हम-आप को अपनी
सोसायटी से अलग करती है और अपनी इस पहचान को मिटा कर, समान्य लोगों से अलग होने का
दंभ भरते हैं. मातृभाषा प्रेम के नाम पर अर्थ का अनर्थ करने वाले शब्दों (कृप्या,
गल्ती, परिक्षा, पुछो आदि) का प्रयोग करते हैं. साल में एक बार लेखक महोदय,
महानुभाव लोग भी अपनी लेखनी से कागज को काला करके हिंदी के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित
कर लेते हैं. अतः मैं भी अछूता क्यों रहता बहती गंगा में बार-बार हाँथ धोने का मौका
तो मिलता नहीं सो हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर ही इस कार्य को किया जाना हमने
उचित समझा है. किसी को शिकायत देने का मौका ही नहीं छोड़ा कि हम हिंदी प्रेमी नहीं
है. गद्य तो गद्य, पद्य में भी अगले वर्ष २०१५ में भी हमने कुछ पंक्तियों लिखा था.
प्रकाशन हेतु कुछ माह पूर्व भेजे भी थे. वानगी प्रस्तुत है-
“हिंदी के उद्दगार पर,
नतमस्तक बारम्बार हूँ.
हे कल्याणकारी तरण-तारिणी,
जनमानस की संकल्प धारिणी-
तेरा अभिनंदन और वंदन है,
तूं सरल ह्रदय सा स्पंदन
है.”
हमारे पड़ोस के अज़ीज़ हिंदी प्रेमी मियां शेख़ साहब हिन्दवी होने का दम्भ भरते
हैं. ऐसा नहीं कि मियाँ शेख़ की प्रारम्भिक पढ़ाई हिंदी में ही हुई. हुआ यूँ कि मियां
शेख़ इंग्लिश सिखने का कोई कसर बाकी नहीं छोड़े परन्तु बिचारे उच्चारण (c का स,क,
t का ट,त) व व्याकरणिक ( I want to eat date. मैं तिथि खाना चाहता हूँ.
नहीं नहीं ...खजूर) दोष के चलते उन्हें हिन्दवी होना पड़ा.
हम अपनी हिंदी से अगर वास्तव में प्यार करते हैं. और उसका सम्मान करते हैं तो
हिंदी के लिए साल का एक दिन न होकर वल्कि वर्ष के पूरे ३६५ दिन हिंदी के ही नाम
होना चाहिए. हमें जहाँ कहीं जब भी मौका मिले हिंदी के उत्थान की ही बात करें. तभी
हमारी हिंदी हमारी न होकर बल्कि विश्व की हो सकेगी और इसका भी मान-सम्मान
देश-विदेश में होगा. अपने आस्तित्व को लेकर हिंदी आँसू नहीं बहायेगी और न ही उसे
इंग्लिश के सामने अपमानित ही होना पड़ेगा.
जय हिंदी जय
भारत
Sunday, July 31, 2016
गोमती नदी वरदान भी अभिशाप भी
-अखिलेश कुमार अरुण
आज तक हम भिन्न-भिन्न विषयों पर लिखतें रहे है लेकिन प्रकृति पर लिखने का यह मेरा पहला सौभाग्य है. परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है की मैं कभी प्रकृति प्रेमी नहीं रहा हूँ. बचपन मेरा प्रकृति की गोद में ही बीता है. फूल,पत्तियों, पेड़-पौधों तितलियों के साथ खेलते हुए. मेरा पुश्तैनी परिवार खेती-किसानी से जुडा हुआ है. जिसके चलते कृषि कार्य करने का भी अनुभव है. जब-तब यदा-कदा लगे हाथ आजमा भी लेता हूँ. क्योंकि आज के समय में, मैं उच्च ज्ञानार्जन हेतु शहर की शरण में पिछले 15-20 सालों से आया हुआ हूँ. जिसके चलते गाँव की सौंधी सुगंध स्वपन सा हो गया है. वे दिन बहुत याद आते हैं जब बचपन में अठखेलियाँ करते हुए स्कूल जाया करते थे. घर की आँगन से लेकर दरवाजे तक वेल-बुटो को लगाते रहते थे. और उसमें आये फूलों को अपने परिश्रम से उपजाये हुये सम्पति की हैसियत से देखते थे. तोड़ना तो दूर छूने भी नहीं देते किसी को, जब कोई तारीफों के पूल बाँधता तो दिल उछलने लगता मन बाग़-बाग़ हो जाता. उसकी अपेक्षा शहर तो निरे निठल्लो का देश हो गया है. ज्ञान के नाम पर विशाल विद्वता है परन्तु सच्चाई इसके बिलकुल विपरीत प्रकृति-प्रेमी होने का ढिंढोरा पीटने के लिए लाखों खर्च कर देते हैं. काले अक्षरों का अम्बार लगा देते हैं. आये दिन रोज कहीं न कहीं प्रकृति पर बोलने का मजमा लगा रहता. शुद्ध आरो का पानी पी-पी कर पसीना बहाते पर आम-लीची, बबूल-इमली, धान-गेंहू में अंतर करना नहीं आता. रही बात पेड़-पौधे लगाने की तो घर के अहाते में गलती से एक घास भी निकल आये तो उसका समूल ऐसे नष्ट करते जैसे किसी अपने पूराने दुश्मन का सर धड़ से अलग कर रहे हों. वर्ग फीट में खरीदी गयी जमीन का सदुपयोग करना तो शहरवाशियों से सिखाना चाहिए मकान गली के रोड से धंसा देंगें और कूलर, गाड़ी रोड की तरफ ये है शहर.
यका यक प्रकृति पर लिखने का यह विचार मुझे लखनऊ में हो रहे गोमती नदी पर अतिक्रमण को देखकर कौंध उठा मैं अपने आप को लेखनी उठाने से रोक न सका क्योंकि यह वही गोमती है जिसकी आँचल में मैंने अपना बचपन बिताया हुआ है. प्राथमिक की शिक्षा गाँव में पुरी होने के बाद की शिक्षा के लिए इस नदी को पार करना पड़ता था. वह चौमास में नाव से और गर्मी के दिनों में घुटने भर पानी हेलकर आनंद दोनों में ही बराबर था. परन्तु कुछ वर्षों के अंतराल पर जब अबकी बार नदी होकर आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तो, दो सवारी दुपहिया पर बैठे-बैठे पार कर गए उसके पानी के बूंद तक ने हमें न छू सका मेरी आत्मा रो गयी. उस नदी की हालत आज शहरों से केवेल गंदे पानी को ढोकर गंगा में पहुचाने तक रह गया है. शहर वाले अमन चैन की ज़िंदगी विता सकें और तो और लगे हाँथ राजनीति की रोटी भी सेंक सकें. यह गोमती गंगा तो है नहीं कि लोगों के आस्तिकता की बात की जाय परन्तु छिट-पुट भूले भटके लोग भी यदा-कदा फूल-माला अस्थि विसर्जन आदि करते रहते हैं. क्योंकि राजनेताओं की नज़र अभी इस पर नहीं है.
ज्यादातर इससे लाभान्वित होने वाले किसान वर्ग आतें है यह नदी शांत नदी की श्रेणी में आती है. १० साल पहले जहाँ थी आज भी वहीँ है जिसके चलते कृषक वर्ग इसके कनारे तक की भूमि का प्रयोग खेती-बाड़ी के लिए करता है. इस प्रकार जिला पीलीभीत से लेकर जौनपुर तक के लाखों सीमांत किसान अपना जीवन-यापन करते है. इस दृष्टि से देखें तो लखनऊ में नदी को संकरा किया जाना किसी भी तरह उचित नहीं है. क्योंकि इससे नदी के आस्तित्व एवं उससे होने वाले हानि का अनुमान लगा पाना मुस्किल है. जहाँ एक तरफ तो सूखे की हालत और दूसरी तरफ़ जल भराव की समस्या बनी रहेगी. एक तरफ किसान को पानी नहीं मिलेगा वहीँ दूसरी तरफ़ के किसानो की फ़सल का पानी में खड़े-खड़े सड़ जाने की सम्भावना है. ऐसा नहीं है कि इस नदी में कभी बाढ़ नहीं आती है. बाढ़ आती थी किन्तु पानी का ठहराव ज्यादा दिन नहीं रहता था. जिससे फ़सल की ज्यादा क्षति नहीं होती थी.बहते हुए पानी की अपेक्षा ठहरा हुआ पानी फ़सल के लिए ज्यादा हानिकारक होता है.
अब आने वाले समय में ऐसा नहीं होगा नदीं के संकरा हो जाने से पानी का निकास सामान्य से बहुत कम हो जाएगा. और निचले स्तर के क्षेत्र (पीलीभीत, लखीमपुर, सीतापुर आदि) जलमग्न रहेंगे वहीँ उसकी दूसरी तरफ के जिलों (बाराबंकी, गाजीपुर, जौनपुर) को वर्षाकाल में भी पर्याप्त जलापूर्ति नहीं होगी. दोनों तरफ़ के सीमांत किसान इससे प्रभावित होंगे. इस लिहाज से गोमती नदी को शहरी विकास के नाम पर संकरा किया जाना उचित नहीं है. आज नहीं तो कल इसका खामियाजा मानव समाज को भुगतना ही पड़ेगा. इसलिए विकास के सीमा का विस्तार वहीँ तक करे जहाँ तक उचित हो अपने लिए नहीं सबके लिए और आने वाली पीढ़ी के लिए भी.
Monday, July 25, 2016
शिक्षा व्यवस्था
(एक सच्चाई यह भी)
ए०के०’अरुण’
उ०प्र० की शिक्षा व्यवस्था
को क्या कहें ग़ालिब ..........जुलाई में तो फल मिल जाता है, किताब नहीं मिलती. यह चंद लाईनें किसी शायर की नहीं बल्कि कुशीनगर
के खण्ड शिक्षा अधिकारी व्हाट्स एप्स लिखें है. और उनकी शामत इसलिए बन आई है की वे वर्तमान
सरकार में अच्छे ओहदे पर होते हुए उ०प्र० की शिक्षा व्यवस्था पर एक कुटिल सत्य को
लिखने का साहस किया है. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. जिसकी थाली में खाओ उसकी
थाली में छेद तो न करो भाई जो जैसा है वैसा चलने दो क्योंकि आप सरकार की नजरों से
नहीं बच सकते वह बात अलग है की कत्ल, बलात्कार, चोरी, राहजनी करनें वालों की कोई
खोज कबर नहीं है. वे घटना को अंजाम देकर मस्ती करते रहते हैं जब तक की पीड़ित आकर
ऍफ़.आई.आर. लिखने के लिए चार चक्कर न लगाये.
उ०प्र० में गिरती शिक्षा
व्यवस्था की सबसे बड़ी कमी प्रशासन तन्त्र की सबसे बड़ी लापरवाही है. मैं समय-समय पर
इससे समन्धित लेख लिखता रहा हूँ. और आज भी उसी को दोहरा रहा हूँ की ऐसे शिक्षा से
क्या लाभ जब की छात्र प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर सही तरीके से लिखने-पढनें की इल्म
न ले सकें दूसरी भाषाओँ की जिक्र करना छोड़ दें उन्हें हिंदी का भी शुद्ध ज्ञान
नहीं है. उसे पढ़ा-लिखा गंवार नहीं तो और क्या कहेंगे और उनसे हम देशहित का क्या स्वप्न
सज़ा सकते हैं जबकि उसका खुद ही जीवन अँधेरे में हो.
यहाँ पर शिक्षा के नाम पर
प्रत्येक दिन इस प्रकार की जानकारी आला अफ़सर को दी और ली जाती है कि आज फलां-फलां
स्कूल में XYZ बच्चों की संख्या थी. XYZ के लिए कुल इतना अल्पाहार बनाया गया दूध
फल आदि बटवाये गये. परन्तु सरकारी तंत्र की लापरवाही के चलते कभी इस प्रकार की जानकारी
को हासिल किये जाने का प्रयास नहीं किया गया कि मासिक, त्रैमासिक छमाही कोर्स पूरा
किया गया कि नहीं बच्चों को कक्षा में कितना पढ़ाया गया. और कोई अन्य क्रियाविधि
करायी गयी की नहीं आदि-आदि.
अब इस प्रकार की सच्चाई को
उजागर करना सरकार की बुराई करना है या फिर .........इसका निर्णय पाठक वर्ग
ख़ुद-ब-ख़ुद करें..
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पढ़िये आज की रचना
मौत और महिला-अखिलेश कुमार अरुण
(कविता) (नोट-प्रकाशित रचना इंदौर समाचार पत्र मध्य प्रदेश ११ मार्च २०२५ पृष्ठ संख्या-1 , वुमेन एक्सप्रेस पत्र दिल्ली से दिनांक ११ मार्च २०२५ ...

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