वंचित वर्ग का भविष्य
-ए०के० 'अरुण'
हमारे वर्तमान समय के
राजनेताओं आदि ने सम्वादिकीय स्तर को इतना निचे गिरा दिया है कि एक सभ्य समाज को
घिन्न आती है अपने को उन्हें राजनेता कहते हुए. देश-समाज के भावी भविष्य पर बोलना
हो तो मौन हो जाते हैं उन्हें सांप सूंघ जाता है, दिनों-दिन महंगाई,बेरोजगारी, भ्रष्टाचार,
कदाचार, व्यभिचार आदि में पर्याप्त बढोत्तरी हो रही है मजाल कि इसे रोकने का उपाय
किसी के द्वारा सुझाया जाय? सुझाये भी तो कहाँ से जब उस स्तर की जानकारी हासिल
किये हो तब न अमर्यादित बयानबाजी करने के लिए स्कूल तो जाना नहीं होता खुद ब ख़ुद
जेहन में आ जाता है.
एक तरफ़ जहाँ केन्द्र सरकार अपने
को दलित प्रेम बहाने में लगी हुई है वह्नी उसके अपने ही नेता रोज आये दिन भड़काऊ
बयानबाजी करके शुर्खियों में रहना अपनी शान समझते हैं और इसकी सबसे बड़ी कमी दलिओं
का एक नहोना है कुछ दिन पहले जर्नल वि.के.सिंह ने कहा था कि दलित कुत्ते के सामान
हैं. अभी इससे उबर ही नहीं पाए की दयाशंकर का बयान जलते आग में घी डालने जैसा था
उसने मायावती जी की तुलना एक वैश्या से कर बैठा.
वास्तव में यही स्थिति रही
तो लोगो का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा. राजनीति का स्तर अतिनिम्न हो जायेगा.
देश अपने विकाश के लक्ष्य को कभी नहीं पा सकेगा किन्तु ढोल-नागडे पिटे जायेंगे मेक
इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, साक्षर भारत आदि आदि का परिणाम सिफ़र.
किसका विकाश किसके लिए जब व्यक्ति सुकून से जिन्दा ही न रह सकें अपनी इज्जत, मान-सम्मान
को ही न पा सके धिक्कार है ऐसे ...........