गजल
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नन्दी लाल निराश गोला गोकर्ण नाथ (खीरी) |
बाजरे के खेत से बाहर निकलने का समय।
आ गया है अब चिड़ी के घर बदलने का समय।।
कुछ दिखाई दी नई उम्मीद की चढ़ती किरण,
जो लगा उनको तुम्हारे साथ चलने का समय।।
गर्दिशी में दिन गुजारे हैं कई सालों से अब,
बीत आया बैठ खाली हाथ मलने का समय।।
चेतना के स्वर जहन में यार के मुखरित हुए ,
मिल गया सरकार से जो फिर सँभलने का समय।।
गर्म जोशी से हवाएँ चल रही मद मस्त अब,
क्या फिजा में लग रहा पर्वत पिघलने का समय।।
तेल, बाती, दीप ,झालर से सजा दीवाल, घर,
आ गया दीपावली के दीप जलने का समय।।
फिर लगायेंगे हवा में गाँठ करतब बाज, है
पूड़ियाँ सुखी कढ़ाई बीच तलने का समय।।